२२. किसान

यदि भारतीय समाज को शान्तिपूर्ण मार्ग पर सच्‍ची प्रगति करनी है, तो धनिक वर्ग को निश्चित रूप से स्‍वीकार कर लेना होगा कि किसान के पास भी वैसी ही आत्‍मा है जैसी उनके पास हैऔर अपनी दौलत के कारण वे गरीब से श्रेष्‍ठ नहीं हैं। जैसा जापान के उमरावों ने किया, उसी तरह उन्‍हें भी अपने-आपको संरक्षक मानना चाहिये। उनके पास जो धन है उसे यह समझकर रखना चाहिये कि उसका उपयोग उन्‍हें अपने संरक्षित किसानों की भलाई के लिए करना है। उस हालत में वे अपने परिश्रम के कमीशन के रूप में वाजिब रकम से ज्‍यादा नहीं लेंगे। इस समय धनिक वर्ग के सर्वथा अनावश्‍यक दिखाने और फिजूल-खर्ची में तथा जिन किसानों के बीच में वे रहते हैं उनके गंदगी भरे वातावरण और कुचल डालने वाले दारिद्र्य में कोई अनुपात नहीं है। इसलिए एक आदर्श जमींदार किसान का बहुत कुछ बोझ, जो वह अभी उठा रहा है, एकदम घटा देगा। वह किसानों के गहरे संपर्क में आयेगा और उनकी आवश्‍यकताओं को जानकर उस निराशा के स्‍थान पर, जो उनके प्राणों को सुखाये डाल रही है, उनमें आशा का संचार करेगा। वह किसानों के सफाई और तन्‍दुरूस्‍ती के नियमों के अज्ञान को दर्शक की तरह देखता नहीं रहेगा बल्कि इस अज्ञान को दूर करेगा। किसानों के जीवन की आवश्‍यकताओं की पूर्ति करने के लिए वह स्‍वयं अपने को दरिद्र बना लेगा। वह अपने किसानों की आर्थिक स्थिति का अध्‍ययन करेगा और ऐसे स्‍कूल खोलेगा, जिनमें किसानों के बच्‍चों के साथ-साथ अपने खुद के बच्‍चों को भी पढ़ायेगा। वह गांव के कुएं और तालाब को साफ करायेगा । व‍ह किसानों को अपनी सड़कें और अपने पाखाने खुद आवश्‍यक परिश्रम करके साफ करना सिखायेगा। वह किसानों के बेरोक- टोक इस्‍तेमाल के लिए अपने खुद के बाग- बगीचे नि: संकोच भाव से खोल देगा। जो गैर- जरूरी इमारतें वह अपनी मौज के लिए रखता है,उनका उपयोग अस्‍पताल, स्‍कूल या ऐसे ही कामों के लिए करेगा।

यदि पूंजीपति वर्ग काल का संकेत समझकर सम्‍पति के बारे में अपने इस विचार को बदल डाले कि उस पर उनका ईश्‍वर- प्रदत्‍त अधिकार है, तो जो सात लाख घूरे आज गांव कहलाते हैं उन्‍हे आनन-फानन में शान्ति, स्‍वास्‍श्‍य और सुख के धाम बनाया जा सकता है। मुझे दृढ़ विश्‍वास है कि यदि पूंजिपति जापान के उमरावों का अनुकरण करें, तो वे सचमुच कुछ खोयेंगे नहीं और सब कुछ पायेंगे । केवल दो मार्ग हैं जिनमें से हमें अपना चुनाव कर लेना है। एक तो यह कि पूंजिपति अपना अतिरिक्‍त संग्रह स्‍वेच्‍छा से छोड़ दें और उसके परिणामस्‍वरूप सबको वास्‍तविक सुख प्राप्‍त हो जाय। दूसरा यह कि अगर पूंजिपति सतय रहते न चेतें तो करोड़ों जाग्रत किन्‍तु अज्ञान और भूखे लोग देश में ऐसी गड़बड़ मचा दें, जिसे एक बलशाल‍ी हुकुमत की फौजी ताकत भी नहीं रोक सकती । मैंने यह आशा रखी है कि भारतवर्ष इस विपत्ति से बचने में सफल रहेगा ।

किसानों का- फिर वे भूमिहीन हों या मेहनत करने वाले जमीन- मालिक हों- स्‍थान पहला है। उनके परिश्रम से ही पृथ्‍वी फलप्रस और समृद्ध हुई हैं और इसलिए सच कहा जाय तो जमीन उनकी ही है होनी चा‍हिये, जमीन से दूर रहने वाले जमींदारों की नहीं। लेकिन अहिंसक पद्धति में मजदूर- किसान इन जमींदारों से उनकी बलपूर्वक नहीं छीन सकता । उसे इस तरह काम करना चाहिये कि जमींदार के लिए उसका शोषण करना असम्‍भ्‍ाव हो जाय। किसानों में आपस में घनिष्‍ठ सहकार होना नितान्‍त आवश्‍यक है। इस हेतु की पूर्ति के लिए, जहां वैसी समितियां न हों वहां वे बनायी जानी चाहिये और जहां हों वहां आवश्‍यक होने पर उनका पुनर्गठन होना चाहिये। किसान त्‍यादातर अपढ हैं। स्‍कूल जाने की उमर वालों को और वयस्‍कों को शिक्षा दी जानी चाहिये । शिक्षा पुरूषों और स्त्रियों, दोंनो को दी जानी जाहिये । भूमिहीन खेतिहर मजदूरों की मजदूरी इस हद तक बढ़ाई जानी चाहिये कि वे सभ्‍यजनोचिज जीवन की सुविधायें प्राप्‍त कर सकें। यानी , उन्‍हें संतुलित भोजन और आरोग्‍य की दृष्टि से जैसे चाहिये वैसे घर और कपड़े मिल सकें ।

मुझे इसमें कोई सन्‍देह नहीं कि यदि हमें लोकतांत्रि‍क स्‍वराज्‍य हासिल हो – और यदि हमने अपनी स्‍वतंत्रता अहिंसा से पायी तो जरूर ऐसा ही होगा -तो उसमे किसानों के पास राजनीतिक सत्‍ता के साथ हर की सत्‍ता होनी चाहिये।

अगर स्‍वराज्‍य सारी जनता की कोशिशों के फलस्‍वरूप आता है, और चूंकि हमारा हथियार अहिंसा है इ‍सलिए ऐसा ही होगा, तो किसानों को उनकी योग्‍य स्थिति मिलनी ही चाहिये और देश में उनकी आवाज ही सबसे ऊपर होनी चाहिये। लेकिन यदि ऐसा नहीं होता है और मर्यादित मताधिकार के आधार पर सरकार और प्रजा के बीच कोई व्‍यवहारिक समझौता हो जाता है, तो किसानों के हितों को ध्‍यान में देखते रहना होगा। अगर विधान-सभायें किसानों के हितों की रक्षा करने में असमर्थ सिद्ध होती हैं, तो किसानों के पास सविनय अवज्ञा और असहयोग का अचूक इलाज तो हमेशा होगा ही। लेकिन…. अंत में अन्‍याय या दमन से जो चीज प्रजा की रक्षा करती है, वह कागजों पर लिखे जाने वाले कानून, वीरतापूर्ण शब्‍द या जोशीले भाषण नहीं हैं, बल्कि अहिंसक संघटन, अनुशासन और बलिदान से पैदा होने वाली ताकत हैं।

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