२३. गांवों की ओर
मेरा विश्वास है और मैंने इस बात को असंख्य बार दुहराया है कि भारत अपने चन्द शहरों में नहीं बल्कि सात लाख गांवों में बसा हुआ है। लेकिन हम शहरवासियों का खयाल है कि भारत शहरो में ही है और गांवों का निर्माण शहरों की जरूरतें पूरी करने के लिए ही हुआ है। हमने कभी यह सोचने की तकलीफ ही नहीं उठाई कि उन गरीबों को पेट भरने जितना अन्न और शरीर ढ़ाकने जितना कपड़ा मिलता है या नहीं और धूप तथा वर्षा से बचने के लिए उनके सिर पर छप्पर है या नहीं। (1)
मैंने पाया है कि शहरवासियों ने आम तौर पर ग्रामवासियों का शोषण किया है; सच तो यह है कि वे गरीब ग्रामवासियों की ही मेहनत पर जीते हैं। भारत के निवासियों की हालत पर कई ब्रिटिश अधिकारियों ने बहुत कुछ लिखा है। जहां तक मै जानता हूं किसी ने भी यह नहीं कहा कि भारतीय ग्रामवासियों को भरपेट अन्न मिलता है। उलटे, उन्होंने यह स्वीकार किया है कि अधिकांश आबादी लगभग भुखमरी की हालत में रहती है, दस प्रतिशत अधभूखी रहती है और लाखों लोग चुटकीभर नमक और मिर्चों के साथ मशीनों का पालिस किया हुआ नि:सत्व चावल या रूखा-सूखा अनाज खाकर अपना गुजारा चलाते हैं।
आप विश्वास कीजियें कि यदि उस किस्म के भोजन पर हम लोगों में से किसी को रहने के लिए कहा जाय, तो हम एक माह से ज्यादा जीने की आशा नहीं कर सकते, या फिर हमें यह डर लगेगा कि ऐसा खाने में कहीं हमारी दिमागी शक्तियां नष्ट न हो जायं। लेकिन हमारे ग्रामवासियों को इस हालत में से रोज-रोज गुजरना पड़ता है। (2)
हमारी आजादी का पचहत्तर प्रतिशत से ज्यादा हिस्सा कृषिजीवी है। लेकिन यदि हम उनसे उनकी मेहनत का सारा फल खुद छीन लें या दूसरों को छीन लेने दें, तो यह नहीं कहा जा सकता कि हममें स्वराज्य की भावना काफी मात्रा में है। (3)
शहर अपनी हिफाजत आप कर सकते हैं। हमें तो अपना ध्यान गांवों की ओर लगाना चाहिये। हमें उन्हें उनकी संकुचित दृष्टि, उनके पूर्वाग्रहो और वहमों आदि से मुक्त करना है; और इसे करने के सिवा इसके और कोई तरीका नहीं है कि हम उनके साथ उनके बीच में रहें, उनके सुख-दु:ख में हिस्सा लें और उनमें शिक्षा का तथा उपयोगी ज्ञान का प्रचार करें। (4)
हमें आदर्श ग्रामवायी बनना है; ऐसे ग्रामवासी नहीं जिन्हें सफाई की या तो कोई समझ ही नहीं है या है तो बहुत विचित्र प्रकार की, और जो इस प्रकार का कोई विचार ही नहीं करते की व क्या खाते हैं और कैसे खाते हैं। उनमें से ज्यादातर लोग चाहे जिस तरह अपना खाना पका लेते हैं, किसी भी तरह खा लेते हैं और किसी भी तरह रह लेते हैं। वैसा हमें नहीं करना है। हमें चाहियें कि हम उन्हें आदर्श आहार बतलायें। आहार के चुनाव में हमें अपनी रूचियों और अरूचियों का विचार नहीं करना चाहिये, बल्कि खाद्य वस्तुओं के पोषक तत्वों पर ही नजर रखनी चाहिये। (5)
हमें जिनकी पीठ पर जलता हुआ सूरज अपनी किरणों के तीर बरसाता है और उस हालत में भी जो कठिन परिश्रम करते रहते हैं उन ग्रामवासियों से एकता साधनी है। हमें सोचना है कि जिस पोखर में वे नहाते हैं और अपने कपड़े तथा बरतन धोते हैं और जिसमें उनके पशु लोटते और पानी पीते हैं, उसी में से यदि हमें भी उनकी तरह पीने का पानी लेना पड़े तो हमे कैसा लगेगा। तभी हम उस जनता का ठीक प्रतिनिधित्व कर सकेंगे और तब वे हमारे कहने पर जरूर ध्यान देंगे। (6)
हमें उन्हें बताना है कि वे अपनी साग-भाजियां विशेष कुछ खर्च किये बिना खुद उगा सकते हैं और अपने स्वास्थ्य की ठीक रक्षा कर सकते हैं। हमें उन्हें यह भी सिखाना है कि पत्ता-भाजियां को वे जिस तरह पकाते हैं, उसमें उनके अधिकांश विटामिन नष्ट हो जाते हैं। (7)
हमें उन्हें यह सिखाना है कि वे समय, स्वास्थ्य और पैसे की बचत कैसे कर सकते हैं। लिओनेल कार्टिस ने हमारे गोवों का वर्णन करते हुए उन्हें ‘घूरे के ढेर’ कहा है। हमें उन्हें आदर्श बस्तियों में बदलना हमारे ग्राम वासियों को शुद्ध हवा नहीं मिलती, यद्यपि वे शुद्ध हवा से घिरे हुए हैं, उन्हें ताजा अन्न नहीं मिलता, यद्यपि उनके चारों ओर ताजे-से- ताजा अन्न होता है। इस अन्न के मामले में मैं मिशनरी की तरह इसीलिए बोलता हूं कि मैं गांवों को एक सुन्दर दर्शनीय वस्तु बना देने की आकांक्षा रखता हूं। (8)
क्या भारत के गांव हमेशा वैसे ही थे जैसे कि वे आज हैं, इस प्रश्न की छान- बीन करने से कोई लाभ नहीं होगा। अगर वे कभी भी अच्छे नहीं थे तो इससे हमारी पुरानी सभ्यता का, जिस पर हम इतना अभिमान करते हैं, एक बड़ा दोष प्रगट होता है। लेकिन सदि वे कभी अच्छे नहीं थे तो सदियों से चली आ रही नाश क्रिया को, जो हम अपने आस- पास आज भी देख रहे हैं, वे कैसे सह सके?… हर एक देश- प्रेमी के सामने आज जो काम है वह यह है कि इस नाश की क्रिया को रोका जाय, ताकि किसी के लिए भी उनमें रहना उतना ही आसान हो जाय जितना आसान वह शहरों में माना जाता है। सचमुच हर एक देशभक्त के सामने यही काम है। सम्भव है कि ग्रामवासियों का पुनरूद्धार अशक्य हो , और यही सच हो कि ग्राम- सभ्यता के दिन अब बीत गये हैं और सात लाख गांवों की जगह अब केवल सात सौ सुव्यवस्थित शहर ही रहेंगें और उनमें 30 करोड़ आदमी नहीं, केवल तीन ही आदमी रहेंगें। अगर भारत के भाग्य में यही हो तो भी यह स्थिति एक दिन में तो नहीं आयेगी: आखिर गांवों और शहरवासियों में परिवर्तन करने में समय तो लगेगा ही।(9)
ग्राम- सुधार आदोंलन में केवल ग्रामवासियों के ही शिक्षण की बात नहीं है, शहरवासियों को भी उससे उतना ही शिक्षण लेना है। इस काम को उठाने के लिए शहरों से जो कार्यकार्ता आयें, उन्हें ग्राम- मानस का विकास करना है और ग्रामवासियों की तरह रहने की कला सीखनी है। इसका यह अर्थ नही की ग्रामवासियों की तरह भूखें मरना है; लेकिन इसका यह अर्थ जरूर है कि जीवन की उनकी पुरानी पद्धति में आमूल परिर्वतन होना चाहिये। (10)
इसका एक ही उपाय : हम जानकर उनके बीच में बैठ जायें और उनके आश्रयदाताओं की तरह नहीं बल्कि उनके सेवकों की तरह दृढ़ निष्ठा से उनकी सेवा करें; हम उनके भंगी बन जायें और उनके स्वास्थ्य की रक्षा करने वाले परिचारक बन जायें। हमें अपने सारे पूर्वाग्रह भुला देने चाहिये। एक क्षण के लिए हम स्वाराज्य को भी भूल जायें और अमीरों की बात तो भूल ही जायें, यद्यपि उनका होना हमें हर कदम पर खटकता है। वे तो अपनी जगह हैं ही। और कई लोग हैं जो इन बड़े सवालों को सुलझाने में लगे हुए हैं। हमें तो गांवों के सुधार के इस छोटे काम में लग जाना चाहिये, जो आज भी जरूरी है और तब भी जरूरी होगा जब हम अपना उद्देश्य प्राप्त कर चुकेंगे। सच तो यह है कि ग्रामकार्य की यह सफलता स्वयं हमें अपने उद्देश्य के निकट ले जायेगी। (11)
ग्राम-बस्तियों का पुनरूत्थान होना चाहिये। भारतीय गांव भारतीय शहरों की सारी जरूरतें पैदा करते थे और उन्हें देते थे। भारत की गरीबी तब शुरू हुई जब हमारे देश विदेशी माल के बाजार बन गये और विदेशों का रास्ता और भद्दा माल गांवों में भरकर उन्हें चूसने लगे। (12)
गांवों और शहरों के बीच स्वास्थ्यपूर्ण और नीतियुक्त सम्बंध का निर्माण तब होगा जबकि शहरों को अपने इस कर्तव्य का ज्ञान होगा कि उन्हें गांवों को अपने स्वार्थ के लिए शोषण करने के बाजय गांवों से जो शक्ति और पोषण वे प्राप्त्ा करते है उसका पर्याप्त बदला देना चाहिये। और यदि समाज के पुनर्निर्माण के इस महान और उदात्त कार्य में शहर के बालकों को अपना हिस्सा अदा करना है, तो जिन उद्योगों के द्वारा उन्हें अपनी शिक्षा दी जाती है वे गांवों की जरूरतों से सीधे सम्बन्धित होने चाहिये। (13)
हमें गांवों को अपने चंगुल में जकड़ रखने वाली जिस त्रिविध बीमारी का इलाज करना है, वह इस प्रकार है : 1. सार्वजनिक स्वच्छता की कमी, 2. पर्याप्त और पोषक आहार की कमी, 3. ग्रामवासियों की जड़ता।… ग्रामवासी जनता अपनी उन्नति की ओर से उदासीन है। स्वच्छता के आधुनिक उपायों को न तो वे समझतें हैं और न उनकी कद्र करते हैं। अपने खेतों को जोतने-बोने या जिस किस्म का परिश्रम वे करते आये हैं वैसा परिश्रम करने के सिवा अधिक कोई श्रम करने के लिए वे राजी नहीं हैं। ये कठिनाइयां वास्तविक और गम्भीर हैं। लेकिन उनसे हमें घबड़ाने की या हतोत्साह होने की जरूरत नहीं। हमें अपने ध्येय और कार्य में अमिट श्रद्धा होनी चाहिये। हमारे व्यवहार में धीरज होना चाहिये। ग्रामकार्य में हम खुद नौसिखिया ही तो हैं। हमें एक पुरानी और जटिल बीमारी का इलाज करना है। धीरज और सतत परिश्रम से, यदि हममें ये गुण हों तो, कठिनाइयों के पहाड़ तक जीते जा सकते हैं। हम उन परिचारिकाओं की स्थिति में हैं, जो उन्हें सौंपे हुए बीमारों को इसलिए नहीं छोड़ सकतीं कि उन बीमारों की बीमारी असाध्य है। (14)
इन भारतीय किसानों से ज्यों ही तुम बातचीत करोगे और वे तुमसे बोलने, लगेंगे, त्यों ही तुम देखोगे कि उनके होंठों से ज्ञान का निर्झर बहता है। तुम देखोगे कि उनके अनगढ़ बाहरी रूप के पिछे आध्यात्मिक अनुभव और ज्ञान का गहरा सरोवर भरा पड़ा है। मैं इसी चीज को संस्कृति कहता हूं। पश्चिम में तुम्हें यह चीज नहीं मिलेगी। तुम किसी यूरोपीय किसान से बातचीत करके देखो; तुम पाओगे कि उसे आध्यात्मिक वस्तुओं में कोई रस नहीं है। (15)
भारतीय किसान में फूहड़पन के बाहरी आवरण के पीछे युगों पुरानी संस्कृति छिपी पड़ी है। इस बाहरी आवरण को अलग कर दें, उसकी दीर्घकालीन गरीबी और निरक्षरता को हटा दें, तो हमें सुसंस्कृत, सभ्य और आजाद नागरिक का एक सुन्दर-से-सुन्दर नमूना मिल जायेगा। (16)
अनुक्रमणिका
- १. मेरे सपनो का भारत
- २. स्वराज्य का अर्थ
- ३. राष्ट्रवाद का सच्चा स्वरूप
- ४. भारतीय लोकतंत्र
- ५. भारत और समाजवाद
- ६. भारत और साम्यवाद
- ७. उद्योगवाद का अभिशाप
- ८. वर्गयुध्द
- ९. हड़ताल
- १०. मज़दूर क्या चुनेंगे?
- ११. अधिकार या कर्तव्य ?
- १२. बेकारी का सवाल
- १३. दरिद्र-नारायण
- १४. शरीर-श्रम
- १५. सर्वोदय
- १६. संरक्षता का सिद्धांत
- १७. अहिंसक अर्थ-व्यवस्था
- १८. सामान वितरण का रास्ता
- १९. भारत में अहिंसा की उपासना
- २०. सर्वोदयी राज्य
- २१. सत्याग्रह और दुराग्रह
- २२. किसान
- २३. गांवों की ओर
- २४. ग्राम-स्वराज्य
- २५. पंचायत राज
- २६. ग्रामोद्योग
- २७. सरकार क्या कर सकती है?
- २८. ग्राम-प्रदर्शनियां
- २९. चरखे का संगीत
- ३०. मिल-उद्योग
- ३१. स्वदेशी
- ३२. गोरक्षा
- ३३. सहकारी गो पालन
- ३४. गांवों की सफाई
- ३५. गांव का आरोग्य
- ३६. गांवों का आहार
- ३७. ग्राम सेवक
- ३८. समग्र ग्राम सेवा
- ३९. युवकों को आह्वान
- ४०. राष्ट्र का आरोग्य, स्वच्छता और आहार
- ४१. शराब और अन्य मादक द्रव्य
- ४२. शहरों की सफाई
- ४३. विदेशी माध्यम की बुराई
- ४४. मेरा अपना अनुभव
- ४५. भारत की सांस्कृतिक विरासत
- ४६. नई तालीम
- ४७. बुनियादी शिक्षा
- ४८. उच्च शिक्षा
- ४९. शिक्षा का आश्रमी आदर्श
- ५०. राष्ट्रभाषा और लिपि
- ५१. प्रान्तीय भाषायें
- ५२. दक्षिण में हिन्दी
- ५३. विद्यार्थियों के लिए अनुशासन के नियम
- ५४. भारतीय स्त्रियों का पुनरूत्थान
- ५५. स्त्रियों की शिक्षा
- ५६. संतति-नियमन
- ५७. काम-विज्ञान की शिक्षा
- ५८ (……..)
- ५९. साम्प्रदायिक एकता
- ६०. वर्णाश्रम धर्म
- ६१. अस्पृश्यता का अभिशाप
- ६२. भारत में धार्मिक सहिष्णुता
- ६३. धर्म – परिवर्तन
- ६४. (…)
- ६५. प्रान्तों का पुनर्गठन
- ६६. अल्पसंख्यकों की समस्यायें
- ६७. भारतीय गवर्नर
- ६८. समाचार-पत्र
- ६९. शान्ति सेना
- ७०. भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस
- ७१. भारत पाकिस्तान और काश्मीर
- ७२. भारत में विदेशी बस्तियां
- ७३. भारत और विश्वशांति
- ७४. पूर्व का संदेश
- ७५. स्फूट वचन
