३५. गांव का आरोग्य
मेरी राय में जिस जगह शरीर-सफाई, घर-सफाई ग्राम-सफाई हो तथा युक्ताहार और योग्य व्यायाम हो, वहां कम-से-कम बीमारी होती है। और, अगर चित्तशुद्धि भी हो, तो कहा जा सकता है कि बीमारी असंभव हो जाती है। राम नाम के बिना चित्तशुद्धि नहीं हो सकती । अगर देहात वाले इतनी बात समझ जायं, तो वैद्य, हकीम या डॉक्टर की जरूरत न रह जाय।
कुदरती उपचार के गर्भ में यह बात रही है कि मानव- जीवन की आदर्श रचना में देहात की या शहर की आदर्श रचना आ ही जाती है। और उसका मध्यबिन्दू तो ईश्वर ही हो सकता है।
कुदरती ईलाज के गर्भ में यह बात रही है। कि उसमें कम- कम खर्च और ज्यादा से ज्यादा सादगी होनी चाहिये। कुदरती उपचार का आदर्श ही यह है कि जहां तक संभव हो, उसके साधन ऐसे हाने चाहिये कि उपचार देहात में ही हो सके। जो साधन नहीं है वे पैदा किए जाने चाहिये। कुदरती उपचार में जीवन- परिवर्तन की बात आती है। यह काई वैध की दी हुई पुडि़या लेने की बात नहीं है, और अस्पताल मुफ्त दवा लेने या वहां रहने की बात है। जो मुफ्त दवा लेता है वह भिक्षुक बनता है। जो कुदरती उपचार करता है, वह कभी भिक्षुक नहीं बनता। वह अपनी प्रतिष्ठा बढ़ाता है और अच्छा होने का उपाय खुद ही कर लेता है। वह अपने शरीर से जहर निकालकर ऐसा प्रयत्न करता है, जिससे दुबारा बीमार न पड़ सके। और कुदरती इलाज में मध्यबिन्दु तो रामनाम ही है न ?
पथ्य खुराक- युक्ताहार- इस उपचार का अनिवार्य अंग है। आज हमारे देहात हमारी ही तरह कंगाल है। देहात में साग- सब्जि, फल- दूध,वगैरा पैदा करना कुदरती इलाज का खास अंग है। इसमें जो समय खर्च होता है, वह व्यर्थ नहीं जाता । बल्कि उससे सारे देहातियों को और आखिर में सारे हिन्दुस्तान की लाभ होता है।
निचोड़ यह निकला कि अगर हम सफाई के नियम जानें, उनका पालन करें और सही खुराक लें, तो हम खुद अपने डॉक्टर बन जायें। जो आदमी जीने के लिए खाता है, जो पांच महाभूतों का यानी मिट्टी, पानी, आकाश, सूरज और हवा का दोस्त बनकर रहता है, जो उसको बनाने वाले ईश्वर का दास बनकर जीता है, वह कभी बीमार न पड़ेगा। पड़ा भी तो ईश्वर के भरोसे रहता हुआ शान्ति से मर जायेगा। वह अपने गांव के मैदानों या खेतों में मिलने वाली जड़ी-बुटी या औषधि लेकर ही सन्तोष मानेगा। करोड़ों लोग इसी तरह जीते और मरते हैं। उन्होंने तो डॉक्टर का नाम तक नहीं सुना। वे उसका मुंह कहां से देखें ? हम भी ठीक ऐसे ही बन जायं और हमारे पास जो देहाती लड़के और बड़े आते हैं, उनको भी इसी तरह रहना सिखा दें। डॉक्टर लोग कहते हैं कि 100 में से 99 रोग गन्दगी से, न खाने जैसा खाने से और खाने लायक चीजों के न मिलने और न खाने से होते हैं। अगर हम इन 99 लोगों को जीने की कला सिखा दें, तो बाकी एक को हम भूल जा सकते हैं। उसके लिए कोई परोपकारी डॉक्टर मिल जायेगा। हम उसकी फिकर न करें। आज हमें न तो अच्छा पानी मिलता है, न अच्छी मिट्टी और न साफ हवा ही मिलती है। हम सूरज से छिप-छिपकर रहते हैं। अगर हम इन सब बातों को सोचें और सही खुराक सही तरीके से लें, तो समझिये कि हमने जमानों का काम कर लिया। इसका ज्ञान पाने के लिए न तो हमें कोई डिग्री चाहिये और न करोड़ों रूपये। जरूरत सिर्फ इस बात की है कि हममें ईश्वर पर श्रद्धा हो, सेवा की लगन हो, पांच महाभूतों का कुछ परिचय हो, और सही भोजन का सही ज्ञान हो। इतना तो हम स्कूल और कॉलेज की शिक्षा के बनिस्बत खुद ही थोड़ी मेहनत से और थोड़े समय में हासिल कर सकते हैं।
जाने-अजाने कुदरत के कानूनों को तोड़ने से ही बीमारी पैदा होती है। इसलिए उसका इलाज भी यही हो सकता है कि बीमार फिर कुदरत के कानूनों पर अमल करना शुरू कर दे। जिस आदमी ने कुदरत के कानून को हद से ज्यादा तोड़ा है, उसे तो कुदरत की सजा भोगनी ही पड़ेगी, या फिर उससे बचने के लिए अपनी जरूरत के मुताबिक डॉक्टरों या सर्जनों की मदद लेनी होगी। वाजिब सजा को सोच-समझकर चुपचाप सह लेने से मन की ताकत बढ़ती है, मगर उसे टालने की कोशिश करने से मन कमजोर बनता है।
मैं यह जानना चाहूंगा कि ये डॉक्टर और वैज्ञानिक लोग देश के लिए क्या कर रहें हैं ? वे हमेशा खास-खास बीमारियों के इलाज के नये-नये तरीके सीखने के लिए विदेशों में जाने के लिए तैयार दिखाई देते हैं। मेरी सलाह है कि वे हिन्दुस्तान के 7 लाख गांवो की तरफ ध्यान दें। ऐसा करने पर उन्हें जल्दि ही मालूम हो जायेगा कि डॉक्टरी की डिगियां लिये हुए सारे मर्द और औरतों की, पश्चिमी नहीं बल्कि पूर्वी ढंग पर, ग्रामसेवा के काम में जरूरत है। तब वे इलाज के बहुत से देशी तरीकों को अपना लेंगे। जब हिन्दुस्तान के गांवों में ही कई तरह की जडी़- बुटियों और दवाईयों का अखूट भण्डार मौजूद है, तब उसे पश्चिमी देशों से दवांइयां मंगाने की कोई जरूरत नहीं। लेकिन दवांइयां से भी ज्यादा इन डॉक्टरों को जीने का सही तरीका गांववालों को सिखाना होगा।
मेरा कुदरती इलाज तो सिर्फ गांववालों और गांवों के लिए ही है। इसलिए उसमें खुर्दबीन, एक्स- रे, वगैरा की काई जगह नहीं है। और नहीं कुदरती इलाज में कुनैन, अमिटीन, पेनिसिलीन वगैरा दवांओं की गुजांइस है। उसमें अपनी सफाई, गांव की सफाई और तन्दुरूस्ती को हिफाजत का पहला और पूरा- पूरा स्थान है। इसकी तह में खयाल यह है कि अगर इतना किया जाय या हो सके, तो काई बीमारी ही न हो। और बीमारी आ जाय तो उसे मिटाने के लिए कुदरत के सभी कानूनों पर अमल करने के साथ-साथ राम- नाम ही उसका असल इलाज है। यह इलाज सार्वजनिक या आम नहीं हो सकता। जब तक खुद इलाज करने वाले में राम- नाम की सिद्धि न आ जाय, तब तक राम- नाम- रूपी इलाज करने को एकदम आम नहीं बनाया जा सकता।
अनुक्रमणिका
- १. मेरे सपनो का भारत
- २. स्वराज्य का अर्थ
- ३. राष्ट्रवाद का सच्चा स्वरूप
- ४. भारतीय लोकतंत्र
- ५. भारत और समाजवाद
- ६. भारत और साम्यवाद
- ७. उद्योगवाद का अभिशाप
- ८. वर्गयुध्द
- ९. हड़ताल
- १०. मज़दूर क्या चुनेंगे?
- ११. अधिकार या कर्तव्य ?
- १२. बेकारी का सवाल
- १३. दरिद्र-नारायण
- १४. शरीर-श्रम
- १५. सर्वोदय
- १६. संरक्षता का सिद्धांत
- १७. अहिंसक अर्थ-व्यवस्था
- १८. सामान वितरण का रास्ता
- १९. भारत में अहिंसा की उपासना
- २०. सर्वोदयी राज्य
- २१. सत्याग्रह और दुराग्रह
- २२. किसान
- २३. गांवों की ओर
- २४. ग्राम-स्वराज्य
- २५. पंचायत राज
- २६. ग्रामोद्योग
- २७. सरकार क्या कर सकती है?
- २८. ग्राम-प्रदर्शनियां
- २९. चरखे का संगीत
- ३०. मिल-उद्योग
- ३१. स्वदेशी
- ३२. गोरक्षा
- ३३. सहकारी गो पालन
- ३४. गांवों की सफाई
- ३५. गांव का आरोग्य
- ३६. गांवों का आहार
- ३७. ग्राम सेवक
- ३८. समग्र ग्राम सेवा
- ३९. युवकों को आह्वान
- ४०. राष्ट्र का आरोग्य, स्वच्छता और आहार
- ४१. शराब और अन्य मादक द्रव्य
- ४२. शहरों की सफाई
- ४३. विदेशी माध्यम की बुराई
- ४४. मेरा अपना अनुभव
- ४५. भारत की सांस्कृतिक विरासत
- ४६. नई तालीम
- ४७. बुनियादी शिक्षा
- ४८. उच्च शिक्षा
- ४९. शिक्षा का आश्रमी आदर्श
- ५०. राष्ट्रभाषा और लिपि
- ५१. प्रान्तीय भाषायें
- ५२. दक्षिण में हिन्दी
- ५३. विद्यार्थियों के लिए अनुशासन के नियम
- ५४. भारतीय स्त्रियों का पुनरूत्थान
- ५५. स्त्रियों की शिक्षा
- ५६. संतति-नियमन
- ५७. काम-विज्ञान की शिक्षा
- ५८ (……..)
- ५९. साम्प्रदायिक एकता
- ६०. वर्णाश्रम धर्म
- ६१. अस्पृश्यता का अभिशाप
- ६२. भारत में धार्मिक सहिष्णुता
- ६३. धर्म – परिवर्तन
- ६४. (…)
- ६५. प्रान्तों का पुनर्गठन
- ६६. अल्पसंख्यकों की समस्यायें
- ६७. भारतीय गवर्नर
- ६८. समाचार-पत्र
- ६९. शान्ति सेना
- ७०. भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस
- ७१. भारत पाकिस्तान और काश्मीर
- ७२. भारत में विदेशी बस्तियां
- ७३. भारत और विश्वशांति
- ७४. पूर्व का संदेश
- ७५. स्फूट वचन
