६३. धर्म – परिवर्तन
मेरी हिन्दू धर्मवृत्ति मुझे सिखाती है कि थोडे़ या बहुत अंशों में सभी धर्म सच्चे हैं। सबकी उत्पत्ति एक ही ईश्वर से हुई है, परन्तु सब धर्म अपूर्ण हैं; क्योंकि वे अपूर्ण मानव- माध्यम के द्धारा हम तक पहुंचे हैं। सच्चा शुद्धि का आन्दोलन यह होना चाहिये किहम सब अपने अपने धर्म में रहकर पूर्णता प्राप्त करने का प्रयत्न करें। इस प्रकार की योजना में एकमात्र चरित्र ही मनुष्य की कसौटी होगा। अगर एक बडें से निकलकर दूसरे में चले जाने से कोई नैतिक उत्थान न होता हो तो जाने से क्या लाभ ? शुद्धि या तबलीग का फलितार्थ ईश्वर की सेवा ही होना चाहिये। इसलिए मैं ईश्वर की सेवा के खातिर यदि किसी का धर्म बदलने की कोशिश करूं तो उसका क्या अर्थ होगा, जब मेरे ही धर्म को मानने वाले रोज अपने कर्मों से ईश्वर का इनकार करते हैं ? दुनियावी बातों के बनिस्बत धर्म के मामलों मेंयह कहावत अधिक लागू होती है कि ‘ वैद्यजी, पहले अपना इलाज कीजिये ‘
मैं धर्म- परिवर्तन की आधुनिक पद्धति के खिलाप हूं। दक्षिण अफ्रीका में और भारत में लोगों का धर्म – परिवर्तन जिस तरह किया जाता है, उसके अनेक वर्षों के अनुभव से मुझे इस बात का निश्चय हो गया है कि उससे नये ईसाइयों की नैतिक भावना में कोई सुधार नहीं होता; वे यूरोपीय सभ्यता की उपरी बातों की नकल करने लगते हैं, किन्तु ईसा की मूल शिक्षा से अछूते ही रहते हैं। मैं सामान्यत: जो परिणाम आता है उसी की बात कर रहा हूं; इस नियम के कुछ उत्तम अपवाद तो होते ही हैं। दूसरी ओर ईसाइ मिशनरियों के प्रयत्न से भारत को अप्रत्यक्ष प्रकार का लाभ बहुत हुआ है। उसने हिन्दुओं और मुसलमानों को अपने – अपने धर्म की शोध करने के लिए उत्साहित किया है। उसने हमें अपने घर को साफ- सुधरा और व्यवस्थित बनाने के लिए मजबूर किया है। ईसाई मिशनरियों द्धारा चलायी जाने वाली शिक्षा – संस्थाओं तथा अस्पतालों आदि को भी मैं अप्रत्यक्ष लाभों में गिनता हूं, क्योंकि उनकी स्थापना शिक्षा – प्रचार या स्वाथ्य- संवर्धन के लिए नहीं, बल्कि धर्म – परिवर्तन की उनकी मुख्य प्रवृत्ति के सहायक साधन के रूप में ही हुई है।
मेरी राय में मावन- दया के कार्यों की आड़ में धर्म – परिवर्तन करना कम- से – कम अहितकर तो है ही। अवश्य ही यहां के लोग इसे नाराजी की दृष्टि से देखते हैं। आखिर तो धर्म एक गहरा व्यक्तिगत मामला है, उसका सम्बंध हृदय से है। कोई ईसाई डाक्टर मुझे किसी बीमारी से अच्छा कर दे तो मैं अपना धर्म क्यों बदल लूं, या जिस समय मैं उसके असर में रहूं तब वह डॉक्टर मुझसे इस तरह के परिवर्तन की आशा क्यों रखे या ऐसा सुझाव क्यों दे ? क्या डॉक्टरी सेवा अपने- आप में ही एक पारितोषिक और संतोष नहीं है ? या जब मैं किसी ईसाई शिक्षा – संस्था में शिक्षा लेता होउं तब मुझ पर ईसाई शिक्षा क्यों थोपी जाय ? मेरी राय में ये बातें उपर उठाने वाली नहीं हैं, और अगर भीतर – ही- भीतर शत्रुता पैदा नहीं करती तो भी सन्देह अवश्य उत्पन्न करती हैं। धर्म परिवर्तन के तरीके ऐसे होने चाहिये, जिस पर सीजर की पत्नी की तरह किसी को कोई शक न हो सके। धर्म की शिक्षा लौकिक विषयों की तरह नहीं दी जाती। वह हृदय की भाषा में दी जाती है। अगर किसी आदमी में जीता- जागता धर्म है तो उसकी सुंगन्ध गुलाब के फूल की तरह अपने- आप फैलती है। सुगन्ध दिखाई नहीं देती, इसलिए फूल की पंखुडियों के रंग की प्रयत्क्ष सुन्दरता से उसकी सु्गन्ध का प्रभाव अधिक व्यापक होता है।
मैं धर्म- परिवर्तन के विरूद्ध नहीं हूं, परन्तु मैं उसके आधुनिक उपायों के विरूद्ध हूं। आजकल और बातों की तरह धर्म- परिवर्तन ने भी एक व्यापार का रूप ले लिया है। मुझे ईसाई धर्म- प्रचारकों की एक रिपोर्ट पढी हुई याद है, जिसमें बताया गया था कि प्रत्येक व्यक्ति का धर्म बदलने में कितना खर्च हुआ, और फिर ‘ अगली फसल ‘ के लिए बजट पेश किया गया था।
हां, मेरी यह राय जरूर है कि भारत के महान धर्म उसके लिए सब तरह से काफी हैं। ईसाई और यहूदी धर्म के अलावा हिन्दू धर्म और उसकी शाखायें, इस्लाम और पारसी धर्म सब सजीव धर्म हैं। दुनिया में कोई भी एक धर्म पूर्ण नहीं है। सभी धर्म उनके मानने वालों के लिए समान रूप से प्रिय हैं। इसलिए जरूरत संसार के महान धर्मों के अनुयायियों में सजीव और मित्रतापूर्ण संपर्क स्थापित करने की है, न कि हर सम्प्रदाय द्धारा दूसरे धर्मों की अपेक्षा अपने धर्म की श्रेष्ठता जताने की व्यर्थ कोशिश करके आपस में संघर्ष पैदा करने की। ऐसे मित्रतापूर्ण संबंध के द्धारा हमारे लिए अपने – अपने धर्मों की कमियां और बुराइयां दूर करना संभव होगा ।
मैंने उपर जो कुछ कहा है उससे यह निष्कर्ष निकलता है कि जिस प्रकार का धर्म – परिवर्तन मेरी दृष्टि में है उसकी हिन्दुस्तान में जरूरत नहीं है। आज की सबसे बडी़ आवश्यकता यह है कि आत्मशुद्धि , आत्म- साक्षात्कार के अर्थ में धर्म- परिवर्तन किया जाय। परन्तु धर्म- परिवर्तन करने वालों का यह हेतु कभी नहीं होता। जो भारत का धर्म – परिवर्तन करना चाहते हैं, उनसे क्या यह नहीं कहा जा सकता कि ‘ वैद्यजी , आप अपना ही इलाज कीजिये ?
कोई ईसाई किसी हिन्दू को ईसाई धर्म में लाने की या कोई हिन्दू किसी ईसाई को हिन्दू धर्म में लाने की इच्छा क्यों रखे ? वह हिन्दू यदि सज्जन है या भगवद्- भक्त है, तो उक्त ईसाई को इसी बात से संतोष क्यों नहीं हो जाना चाहिये । यदि मनुष्य का नैतिक आचार कैसा है इस बात की परवाह न की जाय, तो फिर पूजा की पद्धति- विशेष- वह पूजा गिरजाधर, मसजिद या मंदिर में कहीं भी क्यों न की जाय-एक निरर्थक कर्मकांड ही होगी। इतना ही नहीं, वह व्यक्ति या समाज की उन्नति में बाधारूप भी हो सकती है और पूजा की अमुक पद्धति के पालन का अथवा अमुक धार्मिक सिद्धान्त के उच्चारण का आग्रह हिंसापूर्ण लडा़ई- झगडों का एक बडा़ कारण बन सकता है। ये लडा़ई- झगडें आपसी रक्तपात की ओर ले जाते हैं और इस तरह उनकी परिसमाप्ति मूल धर्म में यानी ईश्वर में ही घोर अश्रद्धा के रूप में होती है।
अनुक्रमणिका
- १. मेरे सपनो का भारत
- २. स्वराज्य का अर्थ
- ३. राष्ट्रवाद का सच्चा स्वरूप
- ४. भारतीय लोकतंत्र
- ५. भारत और समाजवाद
- ६. भारत और साम्यवाद
- ७. उद्योगवाद का अभिशाप
- ८. वर्गयुध्द
- ९. हड़ताल
- १०. मज़दूर क्या चुनेंगे?
- ११. अधिकार या कर्तव्य ?
- १२. बेकारी का सवाल
- १३. दरिद्र-नारायण
- १४. शरीर-श्रम
- १५. सर्वोदय
- १६. संरक्षता का सिद्धांत
- १७. अहिंसक अर्थ-व्यवस्था
- १८. सामान वितरण का रास्ता
- १९. भारत में अहिंसा की उपासना
- २०. सर्वोदयी राज्य
- २१. सत्याग्रह और दुराग्रह
- २२. किसान
- २३. गांवों की ओर
- २४. ग्राम-स्वराज्य
- २५. पंचायत राज
- २६. ग्रामोद्योग
- २७. सरकार क्या कर सकती है?
- २८. ग्राम-प्रदर्शनियां
- २९. चरखे का संगीत
- ३०. मिल-उद्योग
- ३१. स्वदेशी
- ३२. गोरक्षा
- ३३. सहकारी गो पालन
- ३४. गांवों की सफाई
- ३५. गांव का आरोग्य
- ३६. गांवों का आहार
- ३७. ग्राम सेवक
- ३८. समग्र ग्राम सेवा
- ३९. युवकों को आह्वान
- ४०. राष्ट्र का आरोग्य, स्वच्छता और आहार
- ४१. शराब और अन्य मादक द्रव्य
- ४२. शहरों की सफाई
- ४३. विदेशी माध्यम की बुराई
- ४४. मेरा अपना अनुभव
- ४५. भारत की सांस्कृतिक विरासत
- ४६. नई तालीम
- ४७. बुनियादी शिक्षा
- ४८. उच्च शिक्षा
- ४९. शिक्षा का आश्रमी आदर्श
- ५०. राष्ट्रभाषा और लिपि
- ५१. प्रान्तीय भाषायें
- ५२. दक्षिण में हिन्दी
- ५३. विद्यार्थियों के लिए अनुशासन के नियम
- ५४. भारतीय स्त्रियों का पुनरूत्थान
- ५५. स्त्रियों की शिक्षा
- ५६. संतति-नियमन
- ५७. काम-विज्ञान की शिक्षा
- ५८ (……..)
- ५९. साम्प्रदायिक एकता
- ६०. वर्णाश्रम धर्म
- ६१. अस्पृश्यता का अभिशाप
- ६२. भारत में धार्मिक सहिष्णुता
- ६३. धर्म – परिवर्तन
- ६४. (…)
- ६५. प्रान्तों का पुनर्गठन
- ६६. अल्पसंख्यकों की समस्यायें
- ६७. भारतीय गवर्नर
- ६८. समाचार-पत्र
- ६९. शान्ति सेना
- ७०. भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस
- ७१. भारत पाकिस्तान और काश्मीर
- ७२. भारत में विदेशी बस्तियां
- ७३. भारत और विश्वशांति
- ७४. पूर्व का संदेश
- ७५. स्फूट वचन
