१२. बेकारी का सवाल

जब तक एक भी सशक्‍त आदमी ऐसा हो जिसे काम न मिलता हो या भोजन न मिलता हो, तक तब हमें आराम करने या भरपेट भोजन करने में शर्म महसूस होनी चाहिये। (1)

ऐसे देश की कल्‍पना कीजिये जहां लोग प्रतिदिन औसतन पोच ही घण्‍टे काम करते हों और वह भी स्‍वेच्‍छा से नहीं बल्कि परिथस्थितियों की लाचारी के कारण; बस, आपको भारत की सही तस्‍वीर मिल जायेगी। यदि पाठक इस तस्‍वीर को देखना चाहता हो तो उसे अपने मन से शहरी जीवन में पायी जाने वाली व्‍यस्‍त दौड़धूप को, या कारखानों की मज़दूरों की शरीर को चूर कर देने वाली थकावट को या चाय-बगानों में दिखाई पड़नें वाली गुलामी को दूर कर देना चाहिये। ये तो भारत की आबादी के समुद्र की कुछ बूंदे ही हैं। अगर उसे कंकाल-मात्र रह गये भूखे भारतीयों की तस्‍वीर देखना हो, तो उसे उस अस्‍सी प्रतिशत आबादी की बात सोचना चाहिये, जो अपने खेतों में काम करती है, जिसके पा स साल में करीब चार महीने तक कोई धंधा नहीं होता और इसलिए जो लगभग भुखमरी की जि़न्‍दगी जीती है। यह उसकी सामान्‍य स्थिति है। इस विवश बेकारी में बार-बार पड़ने वाले अकाल काफी बड़ी वृद्धि करते हैं। (2)

हमारी औसत आयु इतनी कम है कि सोचकर दु:ख होता है। इसी तरह हम दिन-दिन अधिकाधिक गरीब होते जा रहे हैं। इस‍का कारण्‍ा यह है कि हमने अपने सात लाख गांवो की उपेक्षा की है। उनका खयाल नहीं रखा। उनसे जितने पैसे मिल सकें उतने लेने की हम कोशिश करते हैं, उन्‍हें कंगाल करके हम स्‍वयं कंगाल हो रहे हैं। यह हिस्‍दुस्‍तान पहले स्‍वर्ण-भूमि कहलाता था। यह किसकी बदौलत कंगाल हुआ? हमारी ही बदौलत। हमारे पास तमाम ऐश-आराम की चीज़ें हैं। मोटरें हैं, सोने को गद्दे हैं और अन्‍य सुविधायें हैं; परन्‍तु सच पूछा जाये तो हमको इनमें से एक भी चीज़ का अधिकार नहीं है।

हिस्‍दुस्‍तान की सभ्‍यता पश्चिम की सभ्‍यता से निराली है। जहां ज़मीन ज्‍यादा हो और लोग कम, और जहां ज़मीन कम हो और लोग ज्‍यादा, उसमें तो फर्क होना ही चाहिये। मशीनें या कलें उन अमरीका वालो के लिए ज़रूरी होगी ही जहां लोग कम और काम ज्‍यादा है। किन्‍तु हिस्‍दुस्‍तान में जहां एक काम के लिए अनेक लोग खाली हैं, मशीनरी की जरूरत नहीं और न इस प्रकार भूखों मरकर समय बचाना ठीक है। यदि हम खाना भी यंत्र द्वारा खायें तो मैं समझता हूं कि आप वह कभी पसन्‍द न करेंगे। इसीलिए हमें उस खाली या बेकार जनता का उपयोग कर लेना चाहिये। हिस्‍तुस्‍तान की आबादी इतनी बढ़ गई है कि उसके भरण-पोषण के लिए उसकी ज़मीन बहुत कम है, ऐसा बहुत से अर्थशास्‍त्रज्ञ कहते हैं। पर मैं इसे नहीं मानता। हम यदि उद्योग करें तो दूना पैदा कर सकते हैं। इसमें मुझे पूरा विश्‍वास है। यह हमारे सोचने की बात है कि हम सच्‍चा उद्योग करें और देहातियों के साथ सम्‍पर्क बढ़ावें और उनके सच्‍चे सेवक बन जाया, तो मुझे पूर्ण विश्‍वास है कि हम हिस्‍दुस्‍तान के छोटे-छोटे उद्योगों से करोड़ों रूपये का धन पैदा कर सकते हैं। उसमें पैसे की भी विशेष आवश्‍यकता नहीं, ज़रूरत है लोगों की, मेहनत की।द्य यदि हम विचारशील जीवन रखें, तो हमारा बड़ा फायदा हो सकता है।

हम लोग जो आटा खाते हैं वह आटा नहीं, ज़हर खाते हैं। हमारे लिए आस्‍ट्रेलिया से खाने को आटा आता है, वह तो ज़हर ही है। ऐसा मैं नहीं कहता, आपके डॉक्‍टर लोग कहते हैं। यहां हम अमृत को भी ज़हर बन‍ाकर खाते हैं। जो आटा हम कल से पिसाकर खाते हैं, उसका सब द्रव्‍य निकल जाता है और हम नि:सत्‍व भोजन खाते हैं। इससे हम दिनोंदिन क्षीण हो रहे हैं। आटा तो रोज़ घर की चक्‍की में पीसकर ताजा खाना चाहिये। मनों आटा पीसकर नहीं रख छोड़ना चाहिये। क्‍योंकि कुछ दिन के बाद दूषित हो जाता है। इस प्रकार घर में आटा पीस लेने से दो फायदे हैं। पहला ता शुद्ध, शक्तियुक्‍त भोजन खानें को मिलता है, जिससे हम दीर्घजीवी हो सकते हैं; और दूसरे, उस बहाने हमारी बहिनों का, जो निकम्‍मी-सी हो गई हैं, व्‍यायाम हो जायेगा, जिससे वे भी स्‍वास्‍थ्‍य-लाभ कर सकेंगी। यदि इतना पैसा जिसे हम कल में पिसवाने के लिए देते हैं बचता रहें, तो सब मिलाकर देश का कितना फायदा हो सकता है? इससे तो आम के आम और गुठली के दाम भी मिल जाते हैं। हमारी इससे कितनी बचत हो सकती है? धन भी बचे और स्‍वास्‍थ्‍य-लाभ भी हो। यह अर्थशास्‍त्र की बात नहीं, अनुभव कीबात है।

इसी प्रकार चावल के साथ भी अत्‍याचार करते हैं। आज मैं यह दु:ख की बात सुनता हूं। चावल की भूसी कलों द्वारा न निकलवानी चाहिये। उससे चावल का पोषक द्रव्‍य नष्‍ट हो जाता है। उसे तो घर में ही हाथों से कूटकर साफ करना चाहिये। यही बात तेल और गुड़ के लिए है। हमें शक्‍कर का प्रयोग न करके गुड़ खाना चाहिए। गुड़ की ललाई ही खून को बढ़ाती है, शक्‍कर की सफेदी नहीं। वह तो ज़हर हैं। लेकिन आतकल तो शुद्ध गुड़ नहीं मिनता। उसे हमे स्‍वयं तैयार करना चाहिये। इससे भी दूना लाभ होगा। शहद-जैसी कीमती चीज़ भी इसी प्रकार पैदा की जा सकती है। अभी शहद इतना कीमती है कि या तो बड़े-बड़े लोग उसे काम में ला सकते हैं या वैद्यराज अपनी गोलियां बनाने में, सर्वसाधारण नहीं।

शहद भी मधुमक्खियों पालकर पैदा किया जा सकता है। हमें गुड़ और शहद के लिए देखना होगा कि वह सफाई से बनाया और निकाला जाय। इन छोटे-छोटे उद्योगों से आगे बढ़े तो हमारा जीवन ही कलामय हो जाय और हम करोड़ो रूपया पैदा कर सकें। हम अरोग्‍यशास्‍त्र भी नहीं जानते। इससे तो हमें स्‍वयं ही अरोग्‍यशास्‍त्र का सामान्‍य ज्ञान हो सकता है। मल भी अशुद्ध नहीं है। उससे भी हम सोना बना सकते हैं, अर्थात् अच्‍छी खाद बनाने के उपयोग में वह आ सकता है। उसका प्रयोग न करके हम उसका दुरूपयोग करते हैं और बाहर दरिया वगैरा में फेंककर अनेक रोग पैदा करते हैं, जो हमारे प्राण घातक हैं।
संपेक्ष में मेरा यही निवेदन है कि मैंने आपका ध्‍यान इधर खींचने की कोशिश की है। यदि आप इससे लाभ न उठावें तो मैं लाचार हूं। आप इन छोटी-छोटी बातों बहुत कुछ कर सकते हैं, लेकिन एक शर्त है कि इन्‍हें चन्‍द लोग करें और बाकी उन पर निर्भर रहें तो वे अवश्‍य भूखे मरेंगे। किन्‍तु यदि सब मिलकर करेंगे तो करोड़ों रूपये का फायदा हो सकता है, ऐसा मेरा पूर्ण विश्‍वास है। सबको अपना हिस्‍सा देना चाहिये। यह बात उद्यमशील के लिए है, अनुद्यमी के लिए नहीं। मैं उम्‍मीद करता हूं कि आप लोग इस पर अवश्‍य विचार करके इसे अमल में लायेंगे। (3)

[ इन्‍दौर की एक आम सभा में दिये गये मूल हिन्‍दी भाषण से संक्षिप्‍त अंश ]

एक तरह से देखें तो हमारे देश में बेकारी का सवाल उतना कठिन नहीं है जितना दूसरें देशों में है। इस सवाल का लोगों की रहन-सहन के तरीके से घनिष्‍ठ सम्‍बन्‍ध है। पश्चिम के बेकार मज़दूरों को गरम कपड़ा चाहिये, दूसरे लोगों की ही तरह जूते और मोजे चाहिये, गरम घर चाहिये और ठंडी आबहवा में आवश्‍यक अन्‍य अनेक वस्‍तुएं चाहिये। हमें इन सब चीजों की जरूरत नहीं है। लेकिन मुझे स्‍वीकार करना चाहिये कि इस स्थिति के लिए हमारी अपनी उपेक्षा और अज्ञान ही जिम्‍मेदार हैं। शारीरिक-श्रम करने में जो गौरव है उसे हम नहीं जानते। उदाहरण के लिए, मोची जूते बनाने के सिवा कोई दूसरा काम नहीं करता; वह ऐसा समझता है कि दूसरे काम उसके प्रतिष्‍ठा के अनुकूल नहीं हैं। यह गलत खयाल दूर होना चाहिये। उन सब लोगों के लिए, जो अपने हाथों और पांवो से ईमानदारी के साथ मेहनत करना चाहते हैं, हिस्‍दुस्‍तान में काफी धंधा है। ईश्‍वर ने हर एक को काम करने की और अपनी रोजी की रोटी से ज्‍यादा कमाने की क्षमता दी है। और जो भी इस क्षमता का उपयोग करने के लिए तैयार हो, उसे काम अवश्‍य मिल सकता है। ईमान की कमाई करने की ईच्‍छा रखने वाले को चाहिये की वह किसी भी काम को नीचा न माने। जरूरत इस बात की है कि ईश्‍वर ने हमें जो हाथ-पांव दिये हैं, उनका उपयोग करने के लिए हम तैयार रहें। (4)

मैं मानता हूं कि मेहनत-मजदूरी करके अपनी जीविका कमाने वालों के लिए विविध धंधों के पर्याप्‍त ज्ञान की वही कीमत है, जो कि पैसे की पूंजीपति के लिए है। मजदूर का कौशल ही ऊंची पूंजी है। जिस तरह पूंजीपति अपनी पूंजी को मजदूरों के सहयोग क बिना फलप्रद नहीं बना सकता, उसी तरह मजदूर भी अपनी मेहनत को पूंजी के सहयोग के बिना फलप्रद नहीं बना सकते। और मजदूरों तथा पूंजीवालों, दोनों की बुद्धि का विकास समान रूप से हुआ हो और दोनों को एक-दूसरे से न्‍यायोचित व्‍यवहार हासिल करने की अपनी क्षमता में विश्‍वास हो, तो वे एक-दूसरें को किसी समान कार्य में लगे हुए समान दरजे के सहकारी मानना सीखेंगे, और एक दूसरे का वैसा ही आदर करने लगेंगे। जरूरत इस बात की है कि वे एक-दूसरे को अपना ऐसा विरोधी समझना बन्‍द कर दें, जिनमें मेल कभी हो ही नहीं सकता। कठिनाई यह है कि आज पूंजी वालों में तो संघटन है और ऐसा भी मालूम होता है कि उन्‍होंने अपने पैर मजबूती से जमा रखे हैं; लेकिन मजदूरों का नहीं है। इसके सिवा मजदूर अपने जड़ और यांत्रिक व्‍यवसाय से भी जकड़ा हुआ है। इस व्‍यवसाय के कारण उसे अपनी बुद्धि का विकास करने के लिए मौका ही नहीं मिलता। इसीलिए वह अपनी स्थिति की शक्ति को और उसके गौरव को पूरी तरह समझने में असमर्थ रहा है। उसे यह मानना सिखाया गया है कि उसका वेतन तो पूंजी वाले ही तय करेंगे; उसके सम्‍बन्‍ध में वह खुद अपनी कोई मांग नहीं कर सकता। उपाय यह है कि वे सही ढंग से अपना संघटन करें, अपनी बुद्धि का विकास करें और एक से अधिक धंधों में निपुणता प्राप्‍त करें। ज्‍यों ही वे ऐसा करेंगे त्‍यों ही वे अपना सिर ऊंचा रखकर चलने में समर्थ हो जायेंगे और अपनी जीविका के बारे में फिर उन्‍हें डरने की कोई आवश्‍यकता नहीं रहेगी। (5)

ईमेल से पढ़ें(सब्सक्राइब करें):

Web Designing and Development

अनुक्रमणिका

हमारे बारे में

"मेरे सपनों का भारत" विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में महात्मा गांधी द्वारा लिखे गए लेखों का संकलन है। इस पुस्तक को आनलाइन लाने का उद्देश्य नई पीढ़ी को महात्मा गांधी के विचारों से अवगत कराना है।
पुस्तक को आनलाइन लाने का कार्य अभी जारी है। यदि आपको इसमें कोई त्रुटि दिखाई पड़े या कोई सुझाव हों तो हमें ईमेल द्वारा सूचित कर सकते हैं।

हम और भी पुस्तकों को आनलाइन लाना चाहते हैं। अत:जो लेखक/प्रकाशक/ट्रस्ट/संस्थाएं इस कार्य में सहयोग प्रदान करना चाहें हमसे इस पते पर संपर्क कर सकते हैं:

ईमेल : admin (at) antarjaal (dot) in

मेरे सपनों का भारत (कापीराइट नवजीवन ट्रस्ट, अहमदाबाद)