१६. संरक्षता का सिद्धांत
फर्ज कीजिये कि विरासत के या उद्योग-व्यवसाय के द्वारा मुझे प्रचुर सम्पत्ति मिल गई। तब मुझे यह जानना चाहिये कि वह सब समपत्ति मेरी नहीं हैं, बल्कि मेरा तो उस पर ईतना अधिकार है कि जिस तरह दूसरे लाखों आदमी गुजर करते हैं उसी तरह मैं भी ईज्जत के साथ अपना गुजर भर करूं। मेरी शेष सम्पत्ति पर राष्ट्र का हक है और उसी के हितार्थ उसका उपयोग होना आवश्यक है। इस सिद्धांत का प्रतिपादन मैंने तब किया था, जब की जमींदारों और राजाओं की सम्पत्ति के संबंध में समाजवादी सिद्धांत देश सामने आया था। समाजवादी इस सुविधा-प्राप्त वर्गों को खतम कर देना चाहते हैं, जब की मै यह चाहता हूं कि वे ( जमींदार और राजा-महाराजा ) अपने लोभ और सम्पत्ति के बावजूद उन लोगों के समकक्ष बन जायें जो मेहनत करके रोटी कमाते हैं। मजदूरों को भी यह महसूस करना होगा कि मजदूर का काम करने की शक्ति पर जितना अधिकार है, मालदार आदमी का अपनी सम्पत्ति पर उससे भी कम है।
यह दूसरी बात है कि इस तरह के सच्चे ट्रस्टी कितने हो सकते हैं, अगर सिद्धांत ठीक हैं, तो यह बात गौण है कि उनका पालन अनेक लोग कर सकते हैं या केवल एक ही आदमी कर सकता है। यह प्रश्न आत्मविश्वास का है। अगर आप अहिंसा के सिद्धांत को स्वीकार करें, तो आपको उसके अनुसार आचरण करने की कोशिश करनी चाहिये, चाहें उसमें आपको सफलता मिले या असफलता। आप यह तो कह सकते हैं कि इस पर अमल करना मुश्किल है, लेकिन इस सिद्धांत में ऐसी कोई बात नहीं है जिसके लिए यह कहा जा सके कि वह बुद्धिग्राह्रा नहीं है।//1//
आप कह सकते हैं कि ट्रस्टीशिप तो कानून-शास्त्र की एक कल्पना मात्र है; व्यवहार में उसका कही कोई अस्तित्व दिखाई नहीं पड़ता। लेकिन यदि लोग उस पर सतत विचार करें और आचरण में उतारने की कोशिश भी करते रहें, तो मनुष्य-जाति के जीवन के नियामक शक्ति के रूप में प्रेम आज जितना प्रभावशाली दिखाई देता है, उससे कहीं अधिक दिखाई पड़ेगा। बेशक, पूर्ण ट्रस्टीशिप तो युक्लिड की बिन्दु की व्याख्या की तरह एक कल्पना ही है और उतनी ही अप्राप्य भी है। लेकिन यदि उसके लिए कोशिश की जाए, तो दुनिया मे समानता की स्थापना की दिशा में हम दूसरे किसी उपाय से जितनी दूर तक जा सकते हैं, उसके बजाए इस उपाय से ज्यादा दूर तक जा सकेंगे। …… मेरा दृढ़ निश्चय है कि यदि राज्य मे पूंजीवाद को हिंसा के द्वारा दबाने की कोशिश की, तो वह खुद ही हिंसा के जाल में फंस जायेगा और फिर कभी भी अहिंसा का विकास नहीं कर सकेगा। राज्य हिंसा का एक केन्द्रित और संघटित रूप ही है। व्याक्ति में आत्मा होती है, परंतु चूंकि राज्य एक जड़ यंत्र मात्र है इसलिए उसे हिंसा से कभी नहीं छुड़ाया जा सकता। क्योंकि हिंसा से ही तो उसका जन्म होता है। इसीलिए मैं ट्रस्टीशिप के सिंद्धांत को तरजीह देता हूं। यह डर हमेशा बना रहता है कि राज्य उन लोगों के खिलाफ, जो उससे मतभेद रखते हैं, बहुत ज्यादा हिंसा का उपयोग न करे। लोग यदि स्वेच्छा से ही ट्रस्टियों की तरह व्यवहार करने लगें, तो मुझे सचमुच बड़ी खुशी होगी। लेकिन यदि वे ऐसा न करें तो मेरा खयाल है कि हमें राज्य के द्वारा भरसक कम हिंसा का आश्राय लेकर उनसे उनकी सम्पत्ति ले लेनी पड़ेगी।… ( यही कारण है कि मैंने गोलमेज़ परिषद में यह कहा था कि सभी निहित हित वालो की सम्पत्ति की जांच होनी चाहिये और जहां आवश्यक मालूम हो वहां उनकी सम्पत्ति राज्य को… मुआवजा देकर या मुआवजा दिये बिना ही, जहां जैसा उचित हो, अपने हाथ में कर लेनी चाहिये। ) व्यक्तिगत तौर पर तो मैं यह चाहूंगा की राज्य के हाथो में शक्ति का ज्यादा केन्द्रीकरण न हो, उसके बजाय ट्रस्टीशिप की भावना का विस्तार हो। क्योंकि मेरी राय में राज्य की हिंसा की तुलना में वैयक्तिक मालिकी की हिंसा कम हानीकार है। लेकिन यदि राज्य की मालिकी अनिवार्य ही हो, तो मै भरसक कम-से-कम राज्य की मालिकी की सिफारिश करूंगा।//2//
आजकल यह कहना फैशन हो गया है कि समाज को अहिंसा के आधार पर न तो संघटित किया जा सकता है और न चालाया जा सकता है। मैं इस कथन का विरोध करता हूं। परिवार में जब पिता अपने पुत्र को अपराध करने पर थप्पड़ मार देता हैं, तो पुत्र उसका बदला लेने की बात नहीं सोचता। वह अपने पिता की आज्ञा इसलिए स्वीकार कर लेता है कि इस थप्पड़ के पिछे वह अपने पिता के प्यार को आहत हुआ देखता है, इसलिए नहीं की थप्पड़ उसे वैसा अपराध दुबारा करने से रोकता है। मेरी राय में समाज की व्यव स् था इस तरह होनी चाहिये; यह उसका एक छोटा रूप है। जो बात परिवार के लिय सही है, वही समाज के लिए भी सही है; क्योंकि समाज एक बड़ा परिवार ही है।//3//
मेरी धारणा है कि अहिंसा केवल वैयक्तिक गुण नहीं है। वह एक सामाजिक गुण भी है और अन्य गुणो की तरह उसका भी विकास किया जाना चाहियें। यह तो मानना ही होगा कि समाज के पारस्परिक व्यवहारों का नियमन बहुत हद तक अहिंसा के द्वारा होता हैं। मैं इतना ही चाहता हूं कि इस सिद्धांत का बड़े पैमाने पर, राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय पैमाने पर विचार किया जाय।//4//
मेरा ट्रस्टीशिप का सिद्धांत कोई ऐसी चीज नहीं है, जो काम निकालने के लिए आज गढ़ लिया गया हो। अपनी मंशा छिपाने के लिए खड़ा किया गया आवरण तो वह हरगिज नहीं है। मेरा विश्वास है कि दूसरे सिद्धांत जब नहीं रहेंगे तब भी वह रहेगा। उसके पिछे तत्वज्ञान और धर्म के समर्थन का बल हैं। धन के मालिकों ने इस सिद्धांत के अनुसार आचरण नहीं किया है, इस बात से यह सिद्ध नहीं होता कि वह सिद्धांत झूठा है; इससे धन की मालिकों की कमजोरी मात्र सिद्ध होती है। अहिंसा के साथ किसी दूसरे सिद्धांत का मेल नहीं बैठता। अहिंसक मार्ग की खूबी यह है कि अन्यायी यदि अपना अन्याय दूर नहीं करता, तो वह अपना नाश खुद ही कर डालता है। क्योंकि अहिंसक असहयोग के कारण या तो वह अपनी गलती देखने और सुधारने के लिए मजबूर हो जाता है या वह बिलकुल अकेला पड़ जाता है।//5//
मै इस राय के साथ नि:संकोच अपनी सम्मति जाहिर करता हूं कि आमतौर पर धनवान-केवल धनवान ही क्यों, बल्कि ज्यादातर लोग-इस बात का विशेष विचार नहीं करते कि वे पैसा किस तरह कमाते हैं। अहिंसक उपाय का प्रयोग करते हुए यह विश्वास तो होना ही चाहिये की कोई आदमी कितना ही पतित क्यों न हो, यदि उसका इलाज कुशलतापूर्वक और सहानुभूति के साथ किया जाय तो उसे सुधारा जा सकता हैं। हमें मनुष्यों में रहने वाले दैवी अंश को प्रभावित करना चाहिये और अपेक्षा करनी चाहिये कि उसका अनुकूल परिणाम निकलेगा। यदि समाज का हर एक सदस्य अपनी शक्तियों का उपयोग वैयक्तिक स्वार्थ साधने के लिए नहीं, बल्कि सबके कल्याण के लिए करे, तो क्या इससे समाज की सुख-समृद्धि में वृद्धि नहीं होगी ? हम ऐसी जड़ समानता का निर्माण नहीं करना चाहते, जिसमें कोई आदमी योग्यताओं का पूरा-पूरा उपयोग कर ही न सके। ऐसा समाज अंत में नष्ट हुए बिना नहीं रह सकता। इसलिए मेरी सलाह बिलकुल ठीक है कि धनवान लोग चाहे करोड़ों रूपये कमायें (बेशक, ईमानदारी से) ; लेकिन उसका उद्देश्य वह सारा पैसा सबके कल्याण में समर्पित कर देने का होना चाहिये। ‘ तेन त्यक्तेन भुंजीथा: ‘ मंत्र में असाधारण्ा ज्ञान भारा पड़ा है। मौज़ुदा जीवन-पद्धति की जगह, जिसमें हर एक आदमी पड़ोसी की परवाह किये बिना केवल अपने ही लिए जीता है, सर्व- कल्याणकारी नयी जीवन-पद्धति का विकास करना हो, तो उसका सबसे निश्चित मार्ग यही है।
अनुक्रमणिका
- १. मेरे सपनो का भारत
- २. स्वराज्य का अर्थ
- ३. राष्ट्रवाद का सच्चा स्वरूप
- ४. भारतीय लोकतंत्र
- ५. भारत और समाजवाद
- ६. भारत और साम्यवाद
- ७. उद्योगवाद का अभिशाप
- ८. वर्गयुध्द
- ९. हड़ताल
- १०. मज़दूर क्या चुनेंगे?
- ११. अधिकार या कर्तव्य ?
- १२. बेकारी का सवाल
- १३. दरिद्र-नारायण
- १४. शरीर-श्रम
- १५. सर्वोदय
- १६. संरक्षता का सिद्धांत
- १७. अहिंसक अर्थ-व्यवस्था
- १८. सामान वितरण का रास्ता
- १९. भारत में अहिंसा की उपासना
- २०. सर्वोदयी राज्य
- २१. सत्याग्रह और दुराग्रह
- २२. किसान
- २३. गांवों की ओर
- २४. ग्राम-स्वराज्य
- २५. पंचायत राज
- २६. ग्रामोद्योग
- २७. सरकार क्या कर सकती है?
- २८. ग्राम-प्रदर्शनियां
- २९. चरखे का संगीत
- ३०. मिल-उद्योग
- ३१. स्वदेशी
- ३२. गोरक्षा
- ३३. सहकारी गो पालन
- ३४. गांवों की सफाई
- ३५. गांव का आरोग्य
- ३६. गांवों का आहार
- ३७. ग्राम सेवक
- ३८. समग्र ग्राम सेवा
- ३९. युवकों को आह्वान
- ४०. राष्ट्र का आरोग्य, स्वच्छता और आहार
- ४१. शराब और अन्य मादक द्रव्य
- ४२. शहरों की सफाई
- ४३. विदेशी माध्यम की बुराई
- ४४. मेरा अपना अनुभव
- ४५. भारत की सांस्कृतिक विरासत
- ४६. नई तालीम
- ४७. बुनियादी शिक्षा
- ४८. उच्च शिक्षा
- ४९. शिक्षा का आश्रमी आदर्श
- ५०. राष्ट्रभाषा और लिपि
- ५१. प्रान्तीय भाषायें
- ५२. दक्षिण में हिन्दी
- ५३. विद्यार्थियों के लिए अनुशासन के नियम
- ५४. भारतीय स्त्रियों का पुनरूत्थान
- ५५. स्त्रियों की शिक्षा
- ५६. संतति-नियमन
- ५७. काम-विज्ञान की शिक्षा
- ५८ (……..)
- ५९. साम्प्रदायिक एकता
- ६०. वर्णाश्रम धर्म
- ६१. अस्पृश्यता का अभिशाप
- ६२. भारत में धार्मिक सहिष्णुता
- ६३. धर्म – परिवर्तन
- ६४. (…)
- ६५. प्रान्तों का पुनर्गठन
- ६६. अल्पसंख्यकों की समस्यायें
- ६७. भारतीय गवर्नर
- ६८. समाचार-पत्र
- ६९. शान्ति सेना
- ७०. भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस
- ७१. भारत पाकिस्तान और काश्मीर
- ७२. भारत में विदेशी बस्तियां
- ७३. भारत और विश्वशांति
- ७४. पूर्व का संदेश
- ७५. स्फूट वचन
