६८. समाचार-पत्र

सामाचार- पत्र सेवा से ही चलाने चाहिये। सामाचार- पत्र एक जबरदस्‍त शक्ति है; किन्‍तु जिस प्रकार निरंकुश पानी का प्रवाह गांव- के- गांव डुबो देता है और फसल को नष्‍ट कर देता है, उसी प्रकार निरंकुश कलम का प्रवाह भी नाश की सृष्टि करता है। यदि ऐसा अकुंश बाहर से आता है, तो वह निरंकुशता से भी अधिक विषैला सिद्ध होता है। अकुंश अंदर का ही लाभदायक हो सकता है।

यदि यह विचार धारा सच हो, तो दुनिया के कितने सामाचार- पत्र इस कसौटी पर खरे उत्‍तर सकते हैं ? लेकिन निकम्‍मों को बन्‍द कौन करे ? कौन किसे निकम्‍मा समझे ? उपयोगी और निकम्‍मे दोनों- भलाई और बुराई की तरह- साथ – साथ ही चलते रहेंगे। उनमें से मनुष्‍य को अपना चुनाव करना होगा।

आधुनिक पत्रकार- कला में गहराई का अभाव, विषय का कोई एक ही पक्ष पेश करना, तथ्‍यों के वर्णन में भूलें और अक्‍सर बेईमानी आदि जो दोष आ गये हैं, वे उन ईमानदार व्‍यक्तियों को लगा तार गुमराह करते हैं, जो शुद्ध न्‍याय होते देखना चाहते हैं।

मेरे सामने विविध पत्रों के ऐसे उद्धहरण हैं, जिनमें बहुत – सी आपत्तिजनक बातें हैं। उनमें साम्‍प्रदायिक भावनाओं को उभाड़ने की कोशिश्‍ा है, हकीकतों को अत्‍यंत गलत ढ़ंग से पेश किया गया है और हत्‍या की हद तक राजनीतिक हिंसा को उत्‍तेजना दी गयी है। सरकार चाहे तो लेखों के लेखकों के खिलाप मुकदमे चला सकती है या उन्‍हें रोकने के लिए दमनकारी कानून पास कर सकती है। लेकिन इन उपायों से अभीष्‍ट लक्ष्‍य की सिद्धि या तो होती नहीं या बहुत अस्‍थायी तौर पर होती है। और उन लेखकों का मानस- परिवर्तन तो इनसे कभी नहीं होता। कारण, जब उन्‍हें अपनी बात के प्रचार के लिए सामाचार- पत्रों का सबके लिए खुला हुआ स्‍थान नहीं मिलता, तो वे अक्‍सर गुप्‍त प्रचार का आश्रय लेते हैं।

इस बुराई का सच्‍चा ईलाज तो ऐसे स्‍वथ्‍य लोकमत का निर्माण है, जो इस किस्‍म के जहरीले पत्रों आश्रय देने से इनकार कर दे। हमारा पत्रकारों का अपना संघ है। इस संघ को अपना एक ऐसा विभाग क्‍यों नहीं खोलना चाहिये, जो सब पत्रों को ध्‍यान से पढे़, आपत्तिजनक लेखों को ढूंढ़ निकाले और उन्‍हें उन पर पत्रों के सम्‍पादकों की नजर में लाये ? इस विभाग का कार्य अपराधी पत्रों से सम्‍पर्क स्‍थापित करने तक और जहां अभीष्‍ट सुधार इस सम्‍पर्क से सिद्ध न किया जस सके, वहां उन आपत्तिजनक लेखों की सार्वजनिक आलोचना करने तक सीमित रहे। समाचार – पत्रों की स्‍वतंत्रता ऐसा कीमती अधिकार है, जिसे कोई भी देश छोड़ना नहीं चाहेगा। लकिन इस अधिकार के दुरूपयोग को ररेकने के लिए मामूली प्रकार की कानूनी रोक के सिवा कोई दूसरी कानूनी रोक न हो, तो मैंन जैसी आन्‍‍तरिक रोक सुझाई है वैसी आन्‍तरिक रो असंभव नहीं होनी चाहिये। और वह लगायी जाय तब उसका विरोध नहीं होना चाहिये।

मैं अवश्‍य ही यह मानता हूं कि अनीति से भरे हुए विज्ञापनों की मदद से समाचार- पत्रों को चलाना उचित नहीं है। मैं यह भी मानता हूं कि विज्ञापन यदि लेने ही हों तो उन पर समाचार- पत्रों के मालिकों और सम्‍पादकों की तरफ से बडी़ सख्‍त चौकीदारी होना आवश्‍यक है और केवल शुद्ध और पवित्र विज्ञापन ही लिये जाने चाहिये। …. आज अच्‍छे प्रतिष्ठित गिने जाने वाले समाचार पत्रों और मासिकों पर भी यह दूषित विज्ञापनों का अनिष्‍ट हावी हो रहा है। यह अनिष्‍ट तो समाचार- पत्रों के मालिकों और सम्‍पादकों की विवेक- बुद्धि को शुद्ध करके ही दूर किया जा सकता है। मेरे जैसे नौसिखुवे संपादक के प्रभाव से यह शु‍द्धि नहीं हो सकती। लेकिन जब उनकी विवेक- बुद्धि इस बढ़ने वाले अनिष्‍ट के प्रति जाग्रत होगी, अथवा जब राष्‍ट्र का शुद्ध प्रतिनिधित्‍व करने वाला और राष्‍ट्र की नैतिकता पर सदा ध्‍यान रखने वाला राजतंत्र उस विवेक- बुद्धि को जाग्रत करेगा तभी वह जाग्रत हो सकेगी।

मेरा आग्रह है कि विज्ञापनों में सत्‍य का यथेष्‍ट ध्‍यान रखा जाना चाहिये। हमारे लोगों की एक आदत यह है कि वे पुस्‍तक या अखबार में छिपे हुए शब्‍दों को शास्‍त्र- वचनों की तरह सत्‍य मान लेते हैं। इसलिए विज्ञापनों की सामाग्री तैयार करने में अत्‍यंत सावधानी बरतने की जरूरत है। झूठी बातें बहुत खतरनाक होती हैं।

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मेरे सपनों का भारत (कापीराइट नवजीवन ट्रस्ट, अहमदाबाद)