१८. सामान वितरण का रास्ता
आर्थिक समानता, अर्थात् जगत के पास समान सम्पत्ति का होना यानी सबके पास इतनी सम्पत्ति का होना कि जिससे वे अपनी कुदरती आवश्यकतायें पूरी कर सकें। कुदरत ने ही एक आदमी का हाजमा अगर नाजुक बनाया हो और वह केवल पांच ही तोला अन्न खा सके, और दूसरे को बीस तोला अन्न खाने की आवश्यकता हो, तो दोनों को अपनी पाचन-शक्ति के अनुसार अन्न मिलना चाहिये। सारे समाज की रचना इस आदर्श के आधार पर होनी चाहिये। अहिंसक समाज का दूसरा आदर्श नहीं रखना चाहिये। पूर्ण आदर्श तक हम कभी नहीं पहुंच सकते। मगर उसे नजर में रखकर हम विधान बनावें और व्यवस्था करें। जिस हद तक हम इस आदर्श को पहुंच सकेगें उसी हद तक सुख और संतोष प्राप्त करेंगे और उसी हद तक सामाजिक अहिंसा सिद्ध हुई कही जा सकेगी।
इस आर्थिक समानता के धर्म का पालन एक अकेला मनुष्य भी कर सकता है। दूसरों के साथ की उसे आवश्यकता नहीं रहती। अगर एक आदमी इस धर्म का पालन कर सकता है, तो जाहिर की एक मण्डल भी कर सकता है। यह कहने की जरूरत इसीलिए है कि किसी भी धर्म के पालन में जहां तक दूसरे उसका पालन न करें वहां तक हमें रूके रहने की आवश्यकता नहीं। और फिर, ध्येय की आखिरी हद तक न पहुंच सकें वहां तक कुछ भी त्याग न करने की वृत्ति बहुधा लोगों में आती है। यह भी हमारी गति को रोकती है।
अहिंसा के द्वारा आर्थिक समानता कैसे लाई जा सकती है इसका विचार करें। पहला कदम यह कि जिसनें इस आदर्श को अपनाया हो वह अपने जीवन में आवश्यक परिवर्तन करें। हिन्दुस्तान की गरीब प्रजा के साथ अपनी तुलना करके अपनी आवश्यकतायें कम करे। अपनी धन कमाने की शक्ति को नियंत्रण में रखे। जो धन कमावे उसे ईमानदारी से कमाने का निश्चय करे। सट्टे की वृत्ति हो तो उसका त्याग करे। घर भी अपनी सामान्य आवश्यकता पूरी करने लायक ही रखे और जीवन को हर तरह से संयमी बनावे। अपने जीवन में संभव सुधार कर लेने के बाद अपने मिलने-जुलने वालों और अपने पड़ोसियों में समानता के आदर्श का प्रचार करे।
आर्थिक समानता की ज ड़ में धनिक का ट्रस्टीपन निहित है। इस आदर्श के अनुसार धनिक को अपने पड़ोसी से एक कौड़ी भी ज्यादा रखने का अधिकार नहीं। तब उसके पास जो ज़्यादा है, क्या वह उससे छीन लिया जाये? ऐसा करने के लिए हिंसा का आश्रय लेना पड़ेगा। और हिंसा के द्वारा ऐसा करना संभव हो, तो भी समाज को उससे कुछ फायदा होने वाला नहीं है। क्योंकि द्रव्य इकठ्टा करने की शक्ति रखने वाले एक आदमी की शक्ति को समाज खो बैठेगा। इसलिए अहिंसक मार्ग यह हुआ कि जितनी मान्य हो सकें उतनी अपनी आवश्यकतायें पूरी करने के बाद जो पैसा बाकी बचे उसका वह प्रजा की ओर से ट्रस्टी बन जाये। अगर वह प्रामाणिकता से संरक्षक बनेगा तो जो पैसा पैदा करेगा उसका सद्व्यय भी करेगा। जब मनुष्य अपने-आपको समाज का सेवक मानेगा, समाज के खातिर धन कमावेगा, समाज के कल्याण के लिए उसे खर्च करेगा, तब उसकी कमाई में शुद्धता आयेगी। उसके साहस में भी अहिंसा होगी। इस प्रकार की कार्य-प्रणाली का आयोजन किया जाये, तो समाज में बगैर संघर्ष के मूक क्रान्ति पैदा हो सकती है।
इस प्रकार मनुष्य-स्वभाव में परिवर्तन होने का उल्लेख इतिहास में कहीं देखा गया है? ऐसा प्रश्न हो सकता है। व्यक्तियों में तो ऐसा हुआ ही है। बड़े पैमाने पर समाज में परिवर्तन हुआ है, यह शायद सिद्ध न किया जा सके। इसका अर्थ इतना ही है कि व्यापक अहिंसा का प्रयोग आज तक नहीं किया गया। हम लोगों के ह्दय में इस झूठी मान्यता ने घर कर लिया है कि अहिंसा व्यक्तिगत रूप से ही विकसित की जा सकती है और वह व्यक्ति तक ही मर्यादित है। दरअसल बात ऐसी है नहीं। अहिंसा सामाजिक धर्म है, सामाजिक धर्म के तौर पर वह विकसित किया जा सकता है, यह मनवाने का मेरा प्रयत्न और प्रयोग है। यह नयी चीज है इसलिए इसे झूठ समझकर फेंक देने की बात इस युग में तो कोई नहीं कहेगा। यह कठिन है, इसलिए अशक्य है, यह भी इस युग में कोई नहीं कहेगा। क्योंकि बहुत-सी चीजें अपनी आखों के सामने नई-पुरानी होती हमने देखी हैं। मेंरी यह मान्यता है कि अहिंसा के क्षेत्र में इससे बहुत ज्यादा साहस शक्य है, और विविध धर्मों के इतिहास इस बात के प्रमाणों से भरे पड़े हैं। समाज में से धर्म को निकालकर फेंक देने का प्रयत्न बांझ के घर पुत्र पैदा करने जितना ही निष्फल है; और अगर कहीं सफल हो जाये तो समाज का उसमें नाश है। धर्म के रूपान्तर हो सकते हैं। उसमें निहित प्रत्यक्ष वहम, सड़न और अपूर्णतायें दूर हो सकती हैं, हुई हैं और होती रहेंगी। मगर धर्म तो जहां तक जगत है वहां तक चलता ही रहेगा, क्योंकि एक धर्म ही जगत का आधार है। धर्म की अंतिम व्याख्या है ईश्वर का कानून। ईश्वर और उसका कानून अलग-अलग चीज़ें नहीं हैं। ईश्वर अर्थात् अचलित, जीता-जागता कानून। उसका पार कोई नहीं पा सकता। मगर अवतारों ने और पैगम्बरों ने तपस्या करके उसके कानून की कुछ-न-कुछ झांकी जगत को कराई है।
किन्तु महाप्रयत्न करने पर भी धनिक संरक्षक न बनें, और भूखों मरते हुए करोड़ों को अहिंसा के नाम से और अधिक कुचलते जायं तब क्या करे? इस प्रश्न का उत्तर ढूंढ़ने में ही अहिंसक कानून-भंग प्राप्त हुआ। कोई धनवान गरीबों के सहयोग के बिना धन नहीं कमा सकता। मनुष्य को अपनी हिंसक शक्ति का भान है, क्योंकि वह उसे लाखों वर्षों से विरासत में मिली हुई है। जब उसे चार पैर की जगह दो पैर और दो हाथ वाले प्राणी का आकार मिला, तब उसमें अहिंसक शक्ति भी आई। अहिंसा-शक्ति का भान भी धीरे-धीरे, किन्तु अचूक रीति से रोज-रोज बढ़ने लगा। वह भान गरीबों में प्रसार पा जाये, तो वे बलवान बनें और आर्थिक समानता को, जिसके कि वे शिकार बने हुए हैं, अहिंसक तरीके से दूर करना सीख लें। (1)
भारत की जरूरत यह नहीं है कि चंद लोगों के हाथों में बहुत सारी पूंजी इकठ्टी हो जाय। पूंजी का ऐसा विवरण होना चाहिये कि वह इस 1900 मील लम्बे और 1500 मील चौड़े विशाल देश को बनाने वाले साढ़े-सात लाख गांवों को आसानी से उपलब्ध हो सके। (2)
अनुक्रमणिका
- १. मेरे सपनो का भारत
- २. स्वराज्य का अर्थ
- ३. राष्ट्रवाद का सच्चा स्वरूप
- ४. भारतीय लोकतंत्र
- ५. भारत और समाजवाद
- ६. भारत और साम्यवाद
- ७. उद्योगवाद का अभिशाप
- ८. वर्गयुध्द
- ९. हड़ताल
- १०. मज़दूर क्या चुनेंगे?
- ११. अधिकार या कर्तव्य ?
- १२. बेकारी का सवाल
- १३. दरिद्र-नारायण
- १४. शरीर-श्रम
- १५. सर्वोदय
- १६. संरक्षता का सिद्धांत
- १७. अहिंसक अर्थ-व्यवस्था
- १८. सामान वितरण का रास्ता
- १९. भारत में अहिंसा की उपासना
- २०. सर्वोदयी राज्य
- २१. सत्याग्रह और दुराग्रह
- २२. किसान
- २३. गांवों की ओर
- २४. ग्राम-स्वराज्य
- २५. पंचायत राज
- २६. ग्रामोद्योग
- २७. सरकार क्या कर सकती है?
- २८. ग्राम-प्रदर्शनियां
- २९. चरखे का संगीत
- ३०. मिल-उद्योग
- ३१. स्वदेशी
- ३२. गोरक्षा
- ३३. सहकारी गो पालन
- ३४. गांवों की सफाई
- ३५. गांव का आरोग्य
- ३६. गांवों का आहार
- ३७. ग्राम सेवक
- ३८. समग्र ग्राम सेवा
- ३९. युवकों को आह्वान
- ४०. राष्ट्र का आरोग्य, स्वच्छता और आहार
- ४१. शराब और अन्य मादक द्रव्य
- ४२. शहरों की सफाई
- ४३. विदेशी माध्यम की बुराई
- ४४. मेरा अपना अनुभव
- ४५. भारत की सांस्कृतिक विरासत
- ४६. नई तालीम
- ४७. बुनियादी शिक्षा
- ४८. उच्च शिक्षा
- ४९. शिक्षा का आश्रमी आदर्श
- ५०. राष्ट्रभाषा और लिपि
- ५१. प्रान्तीय भाषायें
- ५२. दक्षिण में हिन्दी
- ५३. विद्यार्थियों के लिए अनुशासन के नियम
- ५४. भारतीय स्त्रियों का पुनरूत्थान
- ५५. स्त्रियों की शिक्षा
- ५६. संतति-नियमन
- ५७. काम-विज्ञान की शिक्षा
- ५८ (……..)
- ५९. साम्प्रदायिक एकता
- ६०. वर्णाश्रम धर्म
- ६१. अस्पृश्यता का अभिशाप
- ६२. भारत में धार्मिक सहिष्णुता
- ६३. धर्म – परिवर्तन
- ६४. (…)
- ६५. प्रान्तों का पुनर्गठन
- ६६. अल्पसंख्यकों की समस्यायें
- ६७. भारतीय गवर्नर
- ६८. समाचार-पत्र
- ६९. शान्ति सेना
- ७०. भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस
- ७१. भारत पाकिस्तान और काश्मीर
- ७२. भारत में विदेशी बस्तियां
- ७३. भारत और विश्वशांति
- ७४. पूर्व का संदेश
- ७५. स्फूट वचन
