९. हड़ताल
आजकल हड़तालों का दौर-दौरा है। वे वर्तमान असंतोष की निशानी हैं। तरह-तरह के अनिश्चित विचार हवा में फैल रहे हैं। सबके दिलों मे एक धुंधली-सी आशा बंधी हुई है। और यदि वह आशा निश्चित रूप धारण नहीं करेगी, तो लोगों को बड़ी निराशा होगी। और देशों की तरह भारत में भी मज़दूर-जगत उन लोगों की दया पर निर्भर है, जो सलाहकार और पथदर्शक बन जाते हैं। ये लोग सदा सिध्दांत-पालक नहीं होते और सिध्दांत-पालक होते भी हैं तो हमेशा बुध्दिमान नहीं होते। मज़दूरों को अपनी हालत पर असंतोष है। असंतोष के लिए उनके पास पूर कारण हैं। उन्हें सह सिखाया जा रहा है, और ठीक सिखाया जा रहा है, कि अपने मालिकों को धनवान बनाने का मुख्य साधन वे ही हैं। राजनीतिक स्थिति भी भारत के मज़दूरों को प्रभावित करने लगी है। और ऐसे मज़दूर-नेताओं का अभाव नहीं है, जो यह समझते हैं कि राजनीतिक हेतुओं के लिए हड़तालें कराई जा सकती हैं।
मेरी राय में ऐसे हेतु के लिए मज़दूर-हड़तालों का उपयोग करना अत्यंत गंभीर भूल होगी। मैं इससे इनकार नहीं करता कि ऐसी हड़तालों से राजनीतिक गरज़ पूरी की जा सकती है। परन्तु वे अहिंसक असहयोग की योजना में नहीं आतीं। यह समझने के लिए बुध्दि पर बहुत ज़ोर डालने की ज़रूरत नहीं है कि जब तक मज़दूर देश की राजनीतिक स्थिति को समझ न लें और सबकी भलाई के लिए काम करने को तैयार न हों, तब तक मज़दूरों का राजनीतिक उपयोग करना बहुत ही खतरनाक बात होगी? इस व्यवहार की उनसे अचानक आशा रखना कठिन है। यह आशा उस वक्त तक नहीं रखी जा सकती, जब तक वे अपनी खुद की हालत इतनी अच्छी न बना लें कि शरीर और आत्मा की ज़रूरतें पूरी करके सभ्य और शिष्ट जीवन व्यतीत कर सकें। (1)
इसलिए सबसे बड़ी राजनीतिक सहायता मज़दूर यह कर सकते हैं कि वे अपनी स्थिति सुधार लें, अधिक जानकार हो जायें, अपने अधिकारों का आग्रह रखें और जिस माल के तैयार करने में उनका इतना महत्वपूर्ण हाथ होता है उसके उचित उपयोग की भी मालिकों से मांग करें। इसलिए मज़दूरों के लिए सही विकास यही होगा कि वे अपना दरज़ा बढ़ायें और आंशिक मालिको का दरजा प्राप्त करें।
अत: अभी तो हड़तालें मज़दूरों की हालत के सीधे सुधार के लिए ही होनी चाहिये और जब उनमें देश-भक्ति की भावना पैदा हो जाय, तब अपने तैयार किये हुए माल की कीमतों के नियंत्रण के लिए भी हड़ताल की जा सकती है।
सफल हड़तालों की शर्ते सीधी-सादी हैं, और जब वे पूरी हो जाती हैं तो हड़ताल कभी असफल सिध्द होनी ही नहीं चाहिये :
1. हड़ताल का कारण न्यायपूर्ण होना चाहिये।
2. हड़तालियों में व्यावहारिक एकमत होना चाहिये।
3. हड़ताल न करने वालों के विरूध्द हिंसा काम में नहीं लेनी चाहिये।
4. हड़तालियों में यह शक्ति होनी चाहिये कि संघ के कोष का आश्रय लिये बिना वे हड़ताल के दिनों में अपना पालन-पोषण कर सकें। इसके लिए उन्हें किसी उपयोगी और उत्पादक अस्थायी धंधे में लगना चाहिये।
5. जब हड़तालियों की जगह लेने के लिए दूसरे मज़दूर काफी हों, तब हड़ताल का उपाय बेकार साबित होता है। उस सूरत में अन्यायपूर्ण व्यवहार हो, नाकाफी मज़दूरी मिले या ऐसा ही और कोई कारण हो, तो त्यागपत्र ही उसका एकमात्र उपाय है।
6. उपरोक्त सारी शर्ते पूरी न होने पर भी सफल हड़तालें हुई हैं। परन्तु इससे तो इतना ही सिध्द होता है कि मालिक कमजोर थे और उनका अन्त:करण अपराधी था। (2)
ज़ाहिर है कि बिना वज़नदार कारण के हड़ताल होनी ही न चाहिये। नाजायज़ हड़ताल को न तो कामयाबी हासिल होनी चाहिये और न ही किसी हालत में उसे आम जनता की हमदर्दी मिलनी चाहिये। आमतौर पर लोगों को यह मालूम ही नहीं हो सकता कि हड़ताल जायज़ है या नाजायज़, सिवा इसके कि हड़ताल का सर्मथन कोई ऐसे लोग करें, जो निष्पक्ष हों और जिन पर आम लोगों का पूरा विश्वास हो। हड़ताली खुद अपने मामले में राय देने के हकदार नहीं। इसलिए या तो मामला ऐसे पंच को सुपुर्द करना चाहिये, जो दोनों तरफ के लोगों को मंजूर हो, या उसे अदालती फैसले पर छोड़ना चाहिये। …… ..
जब इस तरीके से काम किया जाता है, तो आम तौर पर जनता के सामने हड़ताल का मामला पेश करने की नौबत ही नहीं आती। अलबत्ता, कभी-कभी यह ज़रूर होता है कि मग़रूर मालिक पंच के या अदालत के फैसले को ठुकरा देते हैं, या गुमराह मज़दूर अपनी ताकत के बल पर मालिक से ज़बरदस्ती और भी रियायतें पाने के लिए फैसले को मंजूर करने से इनकार कर देते हैं। ऐसी हालत में मामला आम जनता के सामने आता है। (3)
जो हड़ताल माली हालत की बेहतरी के लिए की जाती है, उसमें कभी अंतिम ध्येय के तौर पर राजनीतिक तरक्की कभी नहीं हो सकती। बल्कि होता यह है कि अक्सर हड़तालियों को ही इसका नतीजा भुगतना पड़ता है, चाहे उन हड़तालों का असर आम लोगों की जिन्दगी पर पड़े या न पड़े। सरकार के सामने कुछ दिक्कतें ज़रूर खड़ी हो सकती हैं, लेकिन उनकी वजह से हुकूमत का काम रूक नहीं सकता। अमीर लोग रूपया खर्च करके अपने डाक का बन्दोबस्त खुद कर लेगें, लेकिन असल मुसीबत तो गरीबी को झेनली पड़ती है। ऐसी हड़ताले तो तभी करना चाहियें, जब इन्साफ कराने के दूसरे सब उचित साधन असफल साबित हो चुके हो।
ऊपर की इन से यह जाहीर है कि राजनीतिक हड़तालों की अपनी अलग जगह है और उनकों आर्थिक हड़तालों के साथ न तो मिलाना चाहियें और न दोनों का आपस में कोई रिस्ता रखा जाना चाहिये। अहिंसक लड़ाई राजनीतिक हड़तालों की अपनी एक खास जगह होती हैं। वे चाहे जब और चाहे जैसे ढ़ंग से नहीं की जानी चाहियें। ऐसी हड़तालें बिल्कुल खुली हाेनी चाहियें और उनमें गुण्डाशाही की कोई गुंजाईस नहीं रहनी चाहियें। उनकी वजह से कही किसी तरह की हिंसा नही होनी चाहियें। (4)
अनुक्रमणिका
- १. मेरे सपनो का भारत
- २. स्वराज्य का अर्थ
- ३. राष्ट्रवाद का सच्चा स्वरूप
- ४. भारतीय लोकतंत्र
- ५. भारत और समाजवाद
- ६. भारत और साम्यवाद
- ७. उद्योगवाद का अभिशाप
- ८. वर्गयुध्द
- ९. हड़ताल
- १०. मज़दूर क्या चुनेंगे?
- ११. अधिकार या कर्तव्य ?
- १२. बेकारी का सवाल
- १३. दरिद्र-नारायण
- १४. शरीर-श्रम
- १५. सर्वोदय
- १६. संरक्षता का सिद्धांत
- १७. अहिंसक अर्थ-व्यवस्था
- १८. सामान वितरण का रास्ता
- १९. भारत में अहिंसा की उपासना
- २०. सर्वोदयी राज्य
- २१. सत्याग्रह और दुराग्रह
- २२. किसान
- २३. गांवों की ओर
- २४. ग्राम-स्वराज्य
- २५. पंचायत राज
- २६. ग्रामोद्योग
- २७. सरकार क्या कर सकती है?
- २८. ग्राम-प्रदर्शनियां
- २९. चरखे का संगीत
- ३०. मिल-उद्योग
- ३१. स्वदेशी
- ३२. गोरक्षा
- ३३. सहकारी गो पालन
- ३४. गांवों की सफाई
- ३५. गांव का आरोग्य
- ३६. गांवों का आहार
- ३७. ग्राम सेवक
- ३८. समग्र ग्राम सेवा
- ३९. युवकों को आह्वान
- ४०. राष्ट्र का आरोग्य, स्वच्छता और आहार
- ४१. शराब और अन्य मादक द्रव्य
- ४२. शहरों की सफाई
- ४३. विदेशी माध्यम की बुराई
- ४४. मेरा अपना अनुभव
- ४५. भारत की सांस्कृतिक विरासत
- ४६. नई तालीम
- ४७. बुनियादी शिक्षा
- ४८. उच्च शिक्षा
- ४९. शिक्षा का आश्रमी आदर्श
- ५०. राष्ट्रभाषा और लिपि
- ५१. प्रान्तीय भाषायें
- ५२. दक्षिण में हिन्दी
- ५३. विद्यार्थियों के लिए अनुशासन के नियम
- ५४. भारतीय स्त्रियों का पुनरूत्थान
- ५५. स्त्रियों की शिक्षा
- ५६. संतति-नियमन
- ५७. काम-विज्ञान की शिक्षा
- ५८ (……..)
- ५९. साम्प्रदायिक एकता
- ६०. वर्णाश्रम धर्म
- ६१. अस्पृश्यता का अभिशाप
- ६२. भारत में धार्मिक सहिष्णुता
- ६३. धर्म – परिवर्तन
- ६४. (…)
- ६५. प्रान्तों का पुनर्गठन
- ६६. अल्पसंख्यकों की समस्यायें
- ६७. भारतीय गवर्नर
- ६८. समाचार-पत्र
- ६९. शान्ति सेना
- ७०. भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस
- ७१. भारत पाकिस्तान और काश्मीर
- ७२. भारत में विदेशी बस्तियां
- ७३. भारत और विश्वशांति
- ७४. पूर्व का संदेश
- ७५. स्फूट वचन
