१०. मज़दूर क्या चुनेंगे?
भारत के सामने आज दो रास्ते है, वह चाहे तो पश्चिम के ‘शक्ति ही अधिकार हैं’ वाले सिध्दांत को अपनायें और चालायें या पूर्व के इस सिध्दांत पर दृढ़ रहे और उसी की विजय के लिए अपनी सारी ताकत लगायें कि सत्य की ही जीत होती हैं’ सत्य में कभी हार है ही नहीं’ और ताकतवर तथा कमजोर, दोनों को न्याय पाने का समान अधिकार है। यह चुनाव सबसे पहले मज़दूर-वर्ग को करना है। क्या मज़दूरों को अपने वेतन में वृध्दि, यदि वैसा संभव हो तो भी, हिंसा का आश्रय लेकर करानी चाहिये? उनके दावे कितने भी उचित क्यो न हो? उन्हें हिंसा का आश्रय करानी चाहियें? उनके दावें कितने भी उचित क्यो न हो उन्हें हिंसा का आश्रय नही लेनी चाहिये। अधिकार प्राप्त करने के लिए हिंसा क ा आश्रय लेना शायद आसान मालूम हो, किन्तु यह रास्ता अंत में कांटो वाला सिध्द होता है। जो लोग तलवार के द्वारा जीवित रहते है, वे तलवार से ही मरतें है। तैराक अक्सर डुब कर मरता है। यूरोप की ओर देखिये। वहा कोई भी सुखी दिखाई नहीं देता, क्योकि किसी को भी संतोष नहीं है। मज़दूर पूंजीपति का विश्वास नहीं करता और पूंजीपति को मज़दूर मे विश्वास नहीं है। दोनों मे एक प्रकार की स्फूर्ति और ताकत है, लेकिन वह तो बैलों में भी होती है। बैल भी मरने की हद तक लड़ते है। किसी भी गति-प्रगति नहीं है। हमारे पास यह मानने का कोई कारण नहीं है कि यूरोप के लोग प्रगति कर रहे है। उनके पास जो पैसा उससे यह सूचित नहीं होता कि उनमें कोई नैतिक या आध्यात्मिक सद्गुण है। दुर्योधन असीम धन का स्वामी था, लेकिन बिदुर या सुदामा की तुलना में गरीब ही था। आज दुनिया बिदुर और सुदामा की पूजा करती है, लेकिन दुर्योधन नाम तो उस सब बुराईयों के प्रतीक के रूप मे ही याद किया जाता है जिससे आदमी को बचना चाहिये।
…..पूंजी और श्रम चल रहे संघर्ष के बारे में आम तौर पर यह कहां जा सकता है कि गलती अक्सर पूंजीपतियों से ही होती है। लेकिन जब मज़दूरों को अपनी ताकत का पूरा भान हो जायेगा तब मै जानता हूं कि वे लोग पूंजीपतियों से भी ज्यादा अत्याचार कर सकते है। यदि मजदूर मिल मालिको की बुध्दि हासिल कर ले, तो मिल-मालिको को मज़दूरो को दी हुई शर्तो पर काम करना पड़ेगा। लेकिन यह स्पष्ट है कि मज़दूरों में वह बुध्दि कभी नही आ सकती। अगर वे वैसी बुध्दि प्राप्त कर ले तो मज़दूर मज़दूर ही न रहे और मालिक बन लाये। पूंजीपति केवल पूंजी की ताकत पर नहीं लड़ते, उनके पास बुध्दि और कौशल भी है।
हमारे सामने सवाल यह है : मजदूरों में, उनके मजदूर रहते हुए, अपनी शक्ति और अधिकारों की चेतना आ जाये, उस समय उन्हें किस मार्ग का अवलम्बन करना चाहिये ? अगर उस समय मजदूर अपनी संख्या के बल का यानी पशु-शक्ति का आश्रय लें, तो यह उनके लिए आत्मघातक शिद्ध होगा । ऐसा करके वे देश के उद्योगों को हानि पहुंचायेगें । दूसरी ओर यदि वे शुद्ध न्याय का आधार लेकर लड़ें और उसे पाने के लिए खुद कष्ट सहन करें, तो वे अपनी हर कोशिश में न सिर्फ सफल होगें बल्कि अपने मालिकों के ह्दय का परिवर्तन कर डालेंगे, उद्योगों का ज्यादा विकास करेगें और अन्त में मालिक और मजदूर, दोनों एक ही परिवार के सदस्यों की भांति रहने लगेंगे । मजदूरों की हालत के संतोषजनक सुधार में निम्नलिखित वस्तुओं का समावेश होना चाहिये :
1. श्रम का समय इतना ही होना चाहिये की मजदूरों को आराम करने के लिए भी काफी समय बचा रहें ।
2. उन्हें अपने शिक्षण की सुविधायें मिलनी चाहिये ।
3. उनके बच्चों की आवश्यक शिक्षा के लिए तथा वस्त्र और पर्याप्त दूध के लिए व्यवस्था की जानी चाहिये ।
4. मजदूरों के लिए साफ-सुथरे घर होने चाहिये ।
5. उन्हें इतना वेतन मिलना चाहिये कि वे बुढ़ापे में अपनी निर्वाह के लिए काफी रकम बचा सकें।
अभी तो इनमें से एक भी शर्त पूरी नही होती । इस हालत के दोनों ही पक्ष जिम्मेदार हैं । मालिक लोग केवल काम की पर्वाह करते है । मजदूरों का क्या होता है, उससे वे कोई सम्बन्ध नहीं रखते । उनकी सारी कोशिशों का मकसद यही होता है कि पैसा कम-से-कम देना पड़े और काम ज्यादा-से-ज्यादा मिलें । दूसरी ओर मजदूरों की कोशिश ऐसी सब युक्तियां करने की होती हैं, जिससे पैसा उसे ज्यादा-से-ज्यादा मिलें और काम कम-से-कम करना पड़े । परिणाम यह होता है हि यद्यदि मजदूरों के वेतन में वृद्धि होती हैं, परन्तु काम की मात्रा में कोई सुधार नहीं होता । दोनों पक्षों के सम्बन्ध शुद्ध नहीं बनते और मजदूर लोग अपनी वेतन-वृद्धि का समुचित उपयोग नहीं करते ।
इन दोनों पक्षों के बीच में एक तीसरा पक्ष खड़ा हो गया हैं । वह मजदूरों का मित्र बन गया है। ऐसे पक्ष की आवश्यकता से इंकार नहीं किया जा सकता । लेकिन यह पक्ष मजदूरों के प्रति अपनी मित्रता का निर्वाह उसी हद तक कर सकेगा, जिस हद तक उनके प्रति उसकी मित्रता स्वार्थ से अछूती होगी ।
अब वह समय आ पहुंचा है जब कि मजदूरों का उपयोग कई तरह से शतरंज की प्यादों की तरह से करने की कोशिशें की जायेगी । जो लोग राजनीति में भाग लेने की इच्छा रखते हैं, उन्हें इस सवाल पर विचार करना चाहिये । वे लोग क्या चुनेंगे : अपना हित या मजदूरों की और राष्ट्र की सेवा? मजदूरों को मित्रों की बड़ी आवश्यकता है । वे नेतृत्व के बिना कुछ नहीं कर सकते । देखना यह है कि यह नेतृत्व उन्हें किस किस्म के लोगों से मिलता है;क्योंकि उससे ही मजदूरों की भावी परिस्थतियों का निर्धारण होन वाला है ।
काम छोड़कर बैठ जाना, हड़तालें आदि बेशक बहुत प्रभावशाली साधन हैं, लेकिन उनका दुरूपयोग आसान है । मजदूरों को अपने शक्तिशाली यूनियन बनाकर अपना संगठन कर लेना चाहिये और इन यूनियनों की सहमति के बिना कभी भी कोई हड़ताल नहीं करनी चाहिये । हड़ताल करने के पहले सहमति के बिना कभी भी कोई हड़ताल नहीं करनी चाहिये । हड़ताल करने के पहले मिल-मालिकों से बातचीत के द्वारा समझौते की कोशिश होनी चाहिये; उसके बिना हड़ताल का खतरा मोल लेना ठीक नहीं। यदि मिल-मालिक झगड़े के निपटारे के लिए पंच-फैसले का आश्रय लें, तो पंचायत की बात दोनों पक्षों को उसका निर्णय समान रूप से जरूर मान लेना चाहिये, भले उन्हें वह पसंद आया हो या नहीं ।
मेरा सर्वत्र यही अनुभव रहा है कि सामान्यत: मालिक की तुलना में मजदूर लोग अपने कर्तव्य ज्यादा ईमानदारी के साथ और ज्यादा परिणामकारी ढ़ंग से पूरे करते हैं, यद्यपि जिस तरह मालिक के प्रति मजदूरों के कर्तव्य होते हैं उसी तरह मजदूरों के प्रति मालिक के भी कर्तव्य होते हैं । और यही कारण है कि मजदूरों के लिए इस बात की खोज करना आवश्यक हो जाता है कि वे मालिकों से अपनी मांग किस हद तक मनवा सकते हैं । अगर हम यह देखें कि हमें काफी वेतन नहीं मिलता या कि हमें निवास की जैसी सुविधा चाहिये वैसी नहीं मिल रही है, तो हमें काफी वेतन और समुचित निवास की सुविधा चाहिये, इस बात का रास्ता ढूढ़ंना पड़ता है । मजदूरों को कितनी सुख-सुविधा चाहिये, इस बात का निश्चय कौन करे ? सबसे अच्छी बात तो यही होगी कि तुम मजदूर लोग खुद यह समझो कि तुम्हारे अधिकार क्या हैं, उन अधिकारों को मालिकों से मनवाने का उपाय क्या है और फिर उन्हें उन लोगों से तुम खुद ही हासिल करो । लेकिन इसके लिए तुम्हारे पास पहले से ली हुई थोड़ी-सी तालीम होनी चाहिये-शिक्षा होनी चाहिये ।
मेरी नम्र राय में यदि मज़दूरों में काफी संगठन हो और बलिदान की भावना हो, तो उन्हें अपने प्रयत्नों में हमेशा सफलता मिल सकती है । पूंजीपति कितने ही अत्याचारी हों, मुझे निश्चय है कि जिनका मजदूरों से सम्बन्ध है और जो मजदूर-आंदोलन का मार्गदर्शन हैं, खुद उन्हें भी अभी इस बात की कल्पना नहीं है कि मजदूरों की साधन-सम्पत्ति कितनी विशाल है । उनकी साधन-सम्पत्ति सचमूच इतनी विशाल है कि पूंजीपतियों की उतनी कभी हो ही नहीं सकती । अगर मजदूर इस बात को पूरी तरह समझ लें कि पूंजी श्रम का सहारा पाये बिना कुछ नहीं कर सकती, तो उन्हें अपना उचित स्थान तुरंत ही प्राप्त हो जायेगा ।
दुर्भाग्यवश हमारा मन पूंजी की मोहनी से मूढ़ हो गया है और हम यह मानने लगे है कि दुनिया में पुंजी की सब-कुछ हैं । लेकिन यदि हम गहरा विचार करें तो छड़ मात्र में हमें यह पता चल जायेगा कि मजदूर के पास जो पूंजी है वह पूंजीपतियों के पास कभी हो ही नहीं सकती । …. अंग्रेजी में एक बहुत जोरदार शब्द है- यह शब्द आपकी फ्रैंच भाषा में दुनिया की दूसरी भाषाओं में भी है । यह है ‘नहीं’ । बस, हमने अपनी सफलता के लिए यही रहस्य खोज निकाला है कि जब पूंजीपति मजदूरों से ‘हां’ कहलवाना चाहते हो उस समय यदि मजदूर ‘हां’ न कहकर ‘नहीं’ कहने की इच्छा रखते हो, तो उन्हें निस्संकोच ‘नहीं’ का ही गर्जन करना चाहिये । ऐसा करने पर मजदूरों को तुरंत ही इस बात का ज्ञान हो जायेगा कि उन्हें यह आजादी है कि जब वे ‘हां’ कहना चाहे तब ‘हां’ कहे और जब ‘नहीं’ कहना चाहे तब ‘नहीं’ कह दे; और यह कि वे पूंजी के अधीन नहीं है बल्कि पूंजी को ही खुश रखना है । पूंजी के पास बंदूक और तोप और यहां तक जहरीले गैस जैसे डरावने अस्त्र भी है, तो भी इस स्थिति में कोई फर्क नहीं पड़ सकता । अगर मजदूर अपनी ‘नहीं’ की टेक कायम रखें, तो पूंजी अपने उन सब शस्त्रास्त्रों के बावजूद पूरी तरह असहाय सिद्ध होगी । उस हालत में मजदूर प्रत्याक्रमण नहीं करेंगे, बल्कि गोलियों और जहरीले गैस की मार सहते हुए भी झुकेंगे नहीं और अपनी ‘नहीं’ की टेक पर अडिग रहेंगे । मजदूर अपने प्रयन्त में अक्सर असफल होते हैं, उनका कारण यह है कि वे जैसा मैंने कहा है वैसा करके पूंजी का शोधन नहीं करते, बल्कि (मैं खुद मजदूर के नाते ही यह कह रहा हूं) उस पूंजी को स्वयं हथियाना चाहते है और खुद पूंजीपति शब्द के बुरे अर्थ में पूंजीपति बनना चाहते हैं । और इसलिय पूंजीपतियों को, जो अच्छी तरह संगठित हैं और अपनी जगह मजबूती से डटे हुए है, मजदूरों में अपना दर्जा पाने के अभिलाषी उम्मीदवार मिल जाते है और वे मजदूरों के इस अंश का उपयोग मजदरों को दबाने के लिए करते है । अगर हम लोग पूंजी की इस मोहनी के प्रभाव में न होते, तो हममें से हर एक इस बुनियादी सत्य को आसानी से समझ लेता ।
अनुक्रमणिका
- १. मेरे सपनो का भारत
- २. स्वराज्य का अर्थ
- ३. राष्ट्रवाद का सच्चा स्वरूप
- ४. भारतीय लोकतंत्र
- ५. भारत और समाजवाद
- ६. भारत और साम्यवाद
- ७. उद्योगवाद का अभिशाप
- ८. वर्गयुध्द
- ९. हड़ताल
- १०. मज़दूर क्या चुनेंगे?
- ११. अधिकार या कर्तव्य ?
- १२. बेकारी का सवाल
- १३. दरिद्र-नारायण
- १४. शरीर-श्रम
- १५. सर्वोदय
- १६. संरक्षता का सिद्धांत
- १७. अहिंसक अर्थ-व्यवस्था
- १८. सामान वितरण का रास्ता
- १९. भारत में अहिंसा की उपासना
- २०. सर्वोदयी राज्य
- २१. सत्याग्रह और दुराग्रह
- २२. किसान
- २३. गांवों की ओर
- २४. ग्राम-स्वराज्य
- २५. पंचायत राज
- २६. ग्रामोद्योग
- २७. सरकार क्या कर सकती है?
- २८. ग्राम-प्रदर्शनियां
- २९. चरखे का संगीत
- ३०. मिल-उद्योग
- ३१. स्वदेशी
- ३२. गोरक्षा
- ३३. सहकारी गो पालन
- ३४. गांवों की सफाई
- ३५. गांव का आरोग्य
- ३६. गांवों का आहार
- ३७. ग्राम सेवक
- ३८. समग्र ग्राम सेवा
- ३९. युवकों को आह्वान
- ४०. राष्ट्र का आरोग्य, स्वच्छता और आहार
- ४१. शराब और अन्य मादक द्रव्य
- ४२. शहरों की सफाई
- ४३. विदेशी माध्यम की बुराई
- ४४. मेरा अपना अनुभव
- ४५. भारत की सांस्कृतिक विरासत
- ४६. नई तालीम
- ४७. बुनियादी शिक्षा
- ४८. उच्च शिक्षा
- ४९. शिक्षा का आश्रमी आदर्श
- ५०. राष्ट्रभाषा और लिपि
- ५१. प्रान्तीय भाषायें
- ५२. दक्षिण में हिन्दी
- ५३. विद्यार्थियों के लिए अनुशासन के नियम
- ५४. भारतीय स्त्रियों का पुनरूत्थान
- ५५. स्त्रियों की शिक्षा
- ५६. संतति-नियमन
- ५७. काम-विज्ञान की शिक्षा
- ५८ (……..)
- ५९. साम्प्रदायिक एकता
- ६०. वर्णाश्रम धर्म
- ६१. अस्पृश्यता का अभिशाप
- ६२. भारत में धार्मिक सहिष्णुता
- ६३. धर्म – परिवर्तन
- ६४. (…)
- ६५. प्रान्तों का पुनर्गठन
- ६६. अल्पसंख्यकों की समस्यायें
- ६७. भारतीय गवर्नर
- ६८. समाचार-पत्र
- ६९. शान्ति सेना
- ७०. भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस
- ७१. भारत पाकिस्तान और काश्मीर
- ७२. भारत में विदेशी बस्तियां
- ७३. भारत और विश्वशांति
- ७४. पूर्व का संदेश
- ७५. स्फूट वचन
