१३. दरिद्र-नारायण
मनुष्य-जाति को-जो वैसे नामहीन है और मनुष्य की बुद्धि की पहुंच के परे है-जिन अनन्त नामों से पहचानती है, उनमें से एक नाम दरिद्र-नारायण है; उसका अर्थ है गरीबों का या गरीबों के हृदय में प्रकट होने वाला ईश्वर। (1)
गरीबों के लिए रोटी ही अध्यात्म है। भूख से पीडि़त उन लाखों-करोड़ों लोगों पर किसी और चीज का प्रभाव पड़ नहीं सकता। कोई दूसरी बात उनके हृदयों को छू ही नहीं सकती। लेकिन उनके पास आप रोटी लेकर जाइये और वे आपको ही भगवान की तरह पूजेंगे। रोटी के सिवा उन्हें और कुछ सूझ ही नहीं सकता। (2)
अपने इन्हीं हाथों से मैंने गरीबों के फटे-पुराने कपड़ो की गांठों में मजबुती से बंधे हुए मटमैले पैसे इकठ्टे किये हैं। उनसे आधुनिक प्रगति की बातें न कीजियें। उनके सामने व्यर्थ ही ईश्वर का नाम लेकर उनका अपमान मत कीजिये। हम उनसें ईश्वर की बात करेंगे, तो वे आपको और मुझे राक्षस बतायेंगे। अगर वें किसी ईश्वर को पहिचानते हैं, तो उसके बारे में उनकी कल्पना यही हो सकती है कि वह लोगों को आतंकित करने वाला, एक निर्दय अत्याचारी है। (3)
भूखा रहकर आत्माहत्या करने की इच्छा का संवरण मैं अपने इसी विश्वास के कारण कर पाया हूं कि भारत जागेगा और यह कि उसमें इस विनाशकारी गरीबी से अपना उद्धार कर सकने की सामर्थ्य है। यदि इस सम्भावना में मेरा विश्वास न हो, तो मुझे जीने में कोई दिलचस्पी न रहे। (4)
मेरी उनके पास ईश्वर का सन्देश ले जाने की हिम्मत नहीं होती। मैं उन करोड़ों भूखों के सामने, जिनकी आंखों में तेज नहीं और जिनका ईश्वर उनकी रोटी ही है, ईश्वर का नाम लूं, तो फिर वहां खड़े उस कुत्ते के सामने भी ले जा सकता हूं। उनके पास ईश्वर का सन्देश ले जाना हो, तो यह काम मैं उनके पास पवित्र परिश्रम का सन्देश ले जाकर ही कर सकता हूं। हम यहां बढि़या नाश्ता उड़ाकर बैठे हों और उससे भी बढि़या भोजन की आशा रखते हों, तब ईश्वर की बात करना हमें भला मालूम होता है। लेकिन जिन लाखों लोगों को दो जून खाने की भी नसीब नहीं होता, उनसे मैं ईश्वर की बात कैसे कहूं? उनके सामने तो ईश्वर रोटी और मक्खन के रूप में ही प्रकट हो सकता है। भारत के किसानों को रोटी अपन जमीन से मिल रही थी। मैंने उन्हें चरखा दिया, ताकि उन्हें थोड़ा मक्खन भी मिल सके। अगर आज यहां मैं लंगोटी पहिनकर आया हूं, तो इसका कारण यही हैं कि मैं उन लाखों आधे भूखे, आधे नंगे और मूक मानव-प्राणियों का एकमात्र प्रतिनिधि बनकर आया हूं। (5)
हमारे लाखों मूक देशवासियों के हृदयों में जो ईश्वर निवास करता है, उसके सिवा मैं किसी दूसरे ईश्वर को नहीं जानता। वे उसकी उपस्थिति का अनुभव नहीं करते; मैं करता हूं। और मैं सत्यरूप ईश्वर या ईश्वर रूप सत्य की पूजा इन मूक देशवासियों की सेवा के द्वारा ही करता हूं। (6)
रोज की जरूरत जितना ही रोज पैदा करने का ईश्वर का नियम हम नहीं जानते, या जानते हुए भी उसे पालते नहीं। इसलिए जगत में असमानता और उसमें से पैदा होने वाले दु:ख हम भुगतते हैं। अमीर के यहां उसको न चाहिये वैसी चीजें भरी पड़ी होती हैं, वे लापरवाही से खो जाती हैं, बिगड़ जाती हैं; जब की इन्हीं चीजों के कमी के कारण करोड़ों लोग भटकते हैं, भूखों मरते हैं, ठंड से ठिठुर जाते हैं। सब अगर अपनी जरूरत की चीजों का ही संग्रह करें, तो किसी को तंगी महसूस न हो और सबको संतोष हो। आज तो दोनों (तंगी) महसूस करते हैं। करोड़पति अरबपति होना चाहता है, फिर भी उसको संतोष नहीं होता। कंगाल करोड़पति होना चाहता है; कंगाल को भरपेट ही मिलने से संतोष होता हो ऐसा नहीं देखा जाता। फिर भी उसे भरपेट पाने का हक है, और उसे उतना पाने वाला बनाना समाज का फर्ज है। इसलिए उसके (गरीब के) और अपने संतोष के खातिर अमीर को पहल करनी चाहिये। अगर वह अपना बहुत ज्यादा परिग्रह छोड़े, तो गंगाल को अपनी जरूरत का आसानी से मिल जाय और दोनों पक्ष संतोष का सबक सीखें। (7)
सही सुधार, सच्ची सभ्यता का लक्षण परिग्रह बढ़ाना नहीं है, बल्कि सोच-समझकर और अपनी इच्छा से उसे कम करना हैं। ज्यों-ज्यों हम परिग्रह घटाते जाते हैं त्यों-त्यों सच्चा सुख और सच्चा संतोष बढ़ता जाता है, सेवा की शक्ति बढ़ती जाती है। अभ्यास से, आदत डालने से आदमी अपनी हाजतें घटा सकता हैं; और ज्यों-ज्यों उन्हें घटाता जाता है त्यों-त्यों वह सुखी, शांत और सब तरह से तन्दुरूस्त होता जाता है। (8)
सुनहला नियम तो…… यह है कि जो चीज लाखों लोगों को नहीं मिल सकती, उसे लेने से हम भी दृढ़तापूर्वक इनकार कर दें। त्याग की यह शक्ति हमें कहीं से एकाएक नहीं मिल जायेगी। पहले तो हमे ऐसी मनोवृत्ति पैदा करनी चाहिये कि हमें उन सुख-सुविधाओं का उपयोग नहीं करना है, जिनसे लाखों लोग वंचित हैं। और उसके बाद तुरन्त ही अपनी इस मनोवृत्ति के अनुसार हमें शीघ्रतापूर्वक अपना जीवन बदलने में लग जाना चाहिये। (9)
ईसा, मुहम्मद, बुद्ध, नानक, कबीर, चैतन्य, शंकर, दयानन्द, रामकृष्ण, आदि ऐसे व्यक्ति थे, जिनका हजारों-लाखों लोगों पर गहरा प्रभाव पड़ा और जिन्होंने उनके चरित्र का निर्माण किया। वे दुनिया में आये तो उससे दुनिया समृद्ध हुई है। और वे सब ऐसे व्यक्ति थे जिन्होंने गरीबी को जान-बूझकर अपनाया। (10)
अनुक्रमणिका
- १. मेरे सपनो का भारत
- २. स्वराज्य का अर्थ
- ३. राष्ट्रवाद का सच्चा स्वरूप
- ४. भारतीय लोकतंत्र
- ५. भारत और समाजवाद
- ६. भारत और साम्यवाद
- ७. उद्योगवाद का अभिशाप
- ८. वर्गयुध्द
- ९. हड़ताल
- १०. मज़दूर क्या चुनेंगे?
- ११. अधिकार या कर्तव्य ?
- १२. बेकारी का सवाल
- १३. दरिद्र-नारायण
- १४. शरीर-श्रम
- १५. सर्वोदय
- १६. संरक्षता का सिद्धांत
- १७. अहिंसक अर्थ-व्यवस्था
- १८. सामान वितरण का रास्ता
- १९. भारत में अहिंसा की उपासना
- २०. सर्वोदयी राज्य
- २१. सत्याग्रह और दुराग्रह
- २२. किसान
- २३. गांवों की ओर
- २४. ग्राम-स्वराज्य
- २५. पंचायत राज
- २६. ग्रामोद्योग
- २७. सरकार क्या कर सकती है?
- २८. ग्राम-प्रदर्शनियां
- २९. चरखे का संगीत
- ३०. मिल-उद्योग
- ३१. स्वदेशी
- ३२. गोरक्षा
- ३३. सहकारी गो पालन
- ३४. गांवों की सफाई
- ३५. गांव का आरोग्य
- ३६. गांवों का आहार
- ३७. ग्राम सेवक
- ३८. समग्र ग्राम सेवा
- ३९. युवकों को आह्वान
- ४०. राष्ट्र का आरोग्य, स्वच्छता और आहार
- ४१. शराब और अन्य मादक द्रव्य
- ४२. शहरों की सफाई
- ४३. विदेशी माध्यम की बुराई
- ४४. मेरा अपना अनुभव
- ४५. भारत की सांस्कृतिक विरासत
- ४६. नई तालीम
- ४७. बुनियादी शिक्षा
- ४८. उच्च शिक्षा
- ४९. शिक्षा का आश्रमी आदर्श
- ५०. राष्ट्रभाषा और लिपि
- ५१. प्रान्तीय भाषायें
- ५२. दक्षिण में हिन्दी
- ५३. विद्यार्थियों के लिए अनुशासन के नियम
- ५४. भारतीय स्त्रियों का पुनरूत्थान
- ५५. स्त्रियों की शिक्षा
- ५६. संतति-नियमन
- ५७. काम-विज्ञान की शिक्षा
- ५८ (……..)
- ५९. साम्प्रदायिक एकता
- ६०. वर्णाश्रम धर्म
- ६१. अस्पृश्यता का अभिशाप
- ६२. भारत में धार्मिक सहिष्णुता
- ६३. धर्म – परिवर्तन
- ६४. (…)
- ६५. प्रान्तों का पुनर्गठन
- ६६. अल्पसंख्यकों की समस्यायें
- ६७. भारतीय गवर्नर
- ६८. समाचार-पत्र
- ६९. शान्ति सेना
- ७०. भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस
- ७१. भारत पाकिस्तान और काश्मीर
- ७२. भारत में विदेशी बस्तियां
- ७३. भारत और विश्वशांति
- ७४. पूर्व का संदेश
- ७५. स्फूट वचन
