१४. शरीर-श्रम
महान प्रकृति की इच्छा तो यही है कि हम अपनी रोटी पसीना बहाकर कमायें। इसलिए जो आदमी अपना एक मिनट भी बेकारी में बिताता है, वह उस हद तक अपने पड़ोसियों पर बोझ बनता है। और ऐसा करना अहिंसा के बिलकुल पहले नियम का उल्लंघन करना है।….. अहिंसा यदि अपने पड़ोसी के हित का खयाल न हो, तब तो उसका कोई अर्थ ही न रहे। आलसी आदमी अहिंसा की इस प्रारंभिक कसौटी में ही खोटा सिद्ध होता है। (1)
रोटी के लिए हर एक मनुष्य को मजदूरी करना चाहिये, शरीर को (कमर को ) झुकाना चाहिये, यह ईश्वर का कानून है। यह मूल खोज टॉल्स्टॉय की नहीं है, लेकिन उससे बहुत कम मशहूर रशियन लेखक टी.एम. बोन्दरेव्ह की है। टॉल्स्टॉय ने उसे रोशन किया और अपनाया। इसकी झांकी मेरी आंखे भगवद्गीता के तीसरे में अध्याय में करती हैं। यज्ञ किये बिना जो खाता है वह चोरी का अन्न खाता है, ऐसा कठिन शाप यज्ञ नहीं करने वाले को दिया गया है। यहां यज्ञ का अर्थ जात-मेहनत या रोटी-मजदूरी ही शोभता है और मेरी राय में यही मुमकिन है।
जो भी हो, हमारे इस व्रत का जन्म इस तरह हुआ है। बुद्धि भी उस चीज की ओर हमें ले जाती है। जो मजदूरी नहीं करता उसे खाने का क्या हक है? बाइबल कहती है; ‘अपनी रोटी तू अपना पसीना बहाकर कमा और खा।’ करोड़पति भी अगर अपने पलंग पर लोटता रहे और उसके मुंह में कोई खाना डाले तब खायें, तो वह ज्यादा देर तक खा नहीं सकेगा, इसमें उसको मज़ा भी नहीं आयेगा। इसलिए वह कसरत वगैरा करके भूख पैदा करता है और खाता तो है अपने ही हाथ-मुंह हिलाकर। अगर यों किसी-न-किसी रूप में अंगों की कसरत राजा-रंक सबको करनी ही पड़ती है, तो रोटी पैदा करने की कसरत ही सब क्यों न करें? यह सवाल कुदरती तौर पर उठता है। किसान को हवाखोरी या कसरत करने के लिए कोई कहता नहीं है और दुनियाके 90 फीसदी से भी ज्यादा लोगों का निर्वाह खेती पर होता है। बाकी के दस फीसदी लोग अगर इनकी नकल करें, तो जगत में कितना सुख, कितनी शांति और कितनी तन्दुरूस्ती फैल जाये? और अगर खेती के साथ बुद्धि भी मिले, तो खेती से सम्बन्ध रखने वाली बहुत-सी मुसीबतें आसानी से दूर हो जायेंगी। फिर, अगर इस जात-मेहनत के निरपवाद कानून को सब मानें तो तो ऊंच-नीच का भेद मिट जाय।
आज तो जहां ऊंच-नीच की गंध भी नहीं थी वहां यानी वर्ण-व्यवस्था में भी वह घुस गई है। मालिक-मजदूर का भेद आम और स्थायी हो गया है और गरीब धनवान से जलता है। अगर सब रोटी के लिए मजदूरी करें, तो ऊंच-नीच का भेद न रहे; और भी धनिक वर्ग रहेगा तो वह खुद को मालिक नहीं बल्कि उस धन का रखवाला या ट्रस्टी मानेगा और उसका ज्यादातर उपयोग सिर्फ लोगों की सेवा के लिए ही करेगा।
जिसे अहिंसा का पालन करना है, सत्य की भक्ति करनी है, ब्रहाचर्य को कुदरती बनाना है, उसके लिए तो जात-मेहनत रामबाण-सी हो जाती है। यह मेहनत सचमुच तो खेती में ही है। लेकिन सब खेती नहीं कर सकते, ऐसी आज तो हालत है ही। इसलिए खेती के आदर्श को खयाल में रखकर खेती के एवज में आदमी भले-दूसरी मजदूरी करे-जैसे कताई, बुनाई, बढ़ईगिरी, लुहारी वगैरा-वगैरा। सबको खुद के भंगी तो बनना ही चाहिये। जो खाता है वह टट्टी तो फिरेगा ही। इसलिए जो टट्टी फिरता है वही अपनी टट्टी जमीन में गाड़ दे यह उत्तम रिवाज है। अगर यह नहीं ही हो सके तो प्रत्येक कुटुम्ब अपना यह फर्ज अदा करे।
जिस समय समाज में भंगी का अलग पेशा माना गया है, उसमें कोई बड़ा दोष पैठ गया है, ऐसा मुझे तो बरसों से लगता है रहा है । इस जरूरी और तन्दुरूस्ती बढ़ाने वाले (आरोग्य-पोषक) काम से लगता रहा हैं । इस जरूरी और तन्दुरूस्ती बढ़ाने वाले (आरोग्य-पोषक) काम को सबसे नीचा काम पहले-पहल किसने माना, इसका इतिहास हमारे पास नहीं हैं । जिसने माना उसने हम पर उपकार तो नहीं ही किया । हम सब भंगी है यह भावना हमारे मन बचपन से ही जम जानी चाहिये; और उसका सबसे आसान तरीका यह है कि जो समझ गये है वे जात-मेहनत का आरंभ्ा पाखाना-सफाई से करें । जो समझ-बुझकर, ज्ञानपूर्वक यह करेगा, वह उसी क्षण से निराले ढ़ग से और सही तरीके से समझने लगेगा ।
अधिकारों की उत्पत्ति का सच्चा स्त्रोत कर्तव्यों का पालन है । यदि हम सब अपने कर्तव्यों का पालन करें, तो अधिकारों को ज्यादा ढूढ़ने की जरूरत नहीं रहेगी । लेकिन यदि हम कर्तव्यों को पूरा किये बिना अधिकारों के पीछे दौड़े तो वह मृग-मरीचिका के पीछे पड़ने जैसा ही वैध सिद्ध होगा । जितने हम उनके पीछे जायेंगे उतने ही वे हमसे दूर हटते जायेंगे । यही शिक्षा श्रीकृष्णा ने इन अमर शब्दों में दी है: ‘तुम्हारा अधिकार कर्म में ही है, फल में कदापि नहीं।’ यहां कर्म कर्तव्य है और फल अधिकार।
जीवन की आवश्यकताओं को पाने का हर एक आदमी का समान अधिकार है । यह अधिकार को तो पशुओं और पक्षियों को भी हैं । और चूंकि प्रत्येक अधिकार के साथ एक सम्बन्धित कर्तव्य जुड़ा हुआ है और उस अधिकार पर कही से कोई आक्रमण हो तो उसका वैसा ही इलाज भी है, इसलिए हमारी समस्या का रूप यह है कि हम उस प्रारंभिक बुनियादी समानता को सिद्ध करने के लिए उस समानता के अधिकार से जुड़े कर्तव्य और इलाज ढूंढ़ निकाले । वह कर्तव्य यह है कि हम अपने हाथ-पांव से मेहनत करें और वह इलाज यह है कि जो हमारी मेहनत के फल से वंचित करें उसके साथ हम असहयोग करें ।
यदि सब लोग अपने ही परिश्रम की कमाई खावे तो दुनिया में अन्न की कमी न रहें, और सबको अवकाश का काफी समय भी मिलें । न तब किसी को जनसंख्या वृद्धि की शिकायत रहें, न कोई बिमारी आवे, और न मनुष्य को कोई कष्ट या क्लेश ही सतावे । वह श्रम उच्च-से-उच्च प्रकार का यज्ञ होगा । इनमें संदेह नही कि मनुष्य अपेन शरीर या बुद्धि के द्वारा और भी अनेक काम करेंगे, पर उसका वह सब श्रम लोक-कल्याण के लिए प्रेम का श्रम होगा । उस अवस्था में न कोई राजा होगा, न कोई रंक; न कोई उच्च होगा, न कोई नीच; न कोई स्पृश्य रहेगा, न कोई अस्पृश्य ।
भले ही वह एक अलभ्य आदर्श हो, पर इस कारण हमें अपना प्रयन्त बन्द कर देने की जरूरत नहीं । यज्ञ के सम्पूर्ण नियम को अर्थात अपने ‘जीवन के नियम’ को पूरा किये बिना ही अगर हम अपने नृत्य के निर्वाह के लिए पर्याप्त शारीरिक श्रम करेंगे, तो उस आदर्श के बहुत कुछ निकट तो हम पहुंच ही जायेंगे ।
यदि हम ऐसा करेंगे तो हमारी आवश्यकतायें बहुत कम हो जायेगी । और हमारा भोजन भी सादा बन जायेगा । तब हम जीने के लिए खायेंगे, न कि खाने के लिए जीयेंगे । इस बात की यथार्थता में जिसे शंका हो वह अपने परिश्रम की कमाई खाने का प्रयन्त करें । अपने पसीने की कमाई खाने में उसे कुछ और ही स्वाद मिलेगा, उसका स्वास्थ्य भी अच्छा रहेगा, और उसे यह मालूम हो जायेगा कि जो बहुत-सी विलास की चीजें उसने अपने ऊपर लाद रखीं थीं वे सब बिलकुल ही फिजूल थीं ।
बुद्धिपूर्वक किया हुआ शरीर-श्रम समाज-सेवा का सर्वोत्कृष्ट रूप है । यहां शरीर-श्रम शब्द के साथ ‘बुद्धिपूर्वक किया हुआ’ विशेषण यह दिखाने के लिए जोड़ा गया है कि किये हुए शरीर-श्रम के पीछे समाज-सेवा का निश्चित उदे्दश्य हो, तभी उसे समाज-सेवा का दरजा मिल सकता है । ऐसा न हो तब तो कहा जायेगा कि हर एक मजदूर समाज-सेवा करता ही है । वैसे एक अर्थ में यह कथन सही भी है, लेकिन यहां उससे कुछ ज्यादा अभीष्ट है । वह जरूर समाज की ही सेवा करता है; और उसकी आवश्यकतायें पूरी होनी ही चाहिये । इसलिए ऐसा शरीर-श्रम समाज-सेवा से भिन्न नहीं है ।
क्या मनुष्य अपने बौद्धिक श्रम से अपनी आजीविका नहीं कमा सकते? नहीं । शरीर की आवश्यकताएं शरीर द्वारा ही पूरी होनी चाहिये । केवल मानसिक और बौद्धिक श्रम आत्मा के लिए और स्वयं अपने ही संतोष के लिए है । उसका पुरस्कार कभी नहीं मांगा जाना चाहिये । आदर्श राज्य में डाक्टर, वकील और ऐसे ही दूसरे लोग केवल समाज के लाभ के लिए काम करेंगे; अपने लिए नहीं । शारीरिक श्रम के धर्म का पालन करने से समाज की रचना में एक शांत क्रांति हो जायेगी । मनुष्य की विजय इसमें होगी कि उसने जीवन-संग्राम के बजाय परस्पर सेवा के संग्राम की स्थापना कर दी । पशु-धर्म के स्थान पर मानव-धर्म कायम हो जायेगा ।
देहात में लौद जाने का अर्थ यह है कि शरीर-श्रम के धर्म को उसके तमाम अंगों के साथ हम निश्चित रूप में स्वेच्छापूर्वक स्वीकार करते हैं । परन्तु आलोचक कहते हैं, ‘भारत की करोड़ों संतानें आज भी देहात में रहती हैं, फिर भी उन्हें पेट भर भोजन नसीब नहीं होता ।’ अफसोस के साथ कहना पड़ता है कि यह बिलकुल सच बात है । सौभाग्य से हम जानते हैं कि उनका शरीर-श्रम के धर्म का पालन स्वेच्छापूर्ण नहीं है । उनका बस चले तो वे शरीर-श्रम कभी न करें और नजदीक के शहर में कोई व्यवस्था हो जाय तो वहां दौड़कर चले जायं । मजबूर होकर किसी मालिक की आज्ञा पालना गुलामी की स्थिति है, स्वेच्छा से अपने पिता की आज्ञा मानना पुत्रत्व का गौरव है । इसी प्रकार शरीर-श्रम के नियम क विवश होकर पालन करने से दरिद्रता, रोग और संतोष उत्पन्न होते हैं । यह दासत्व की दशा है । शरीर-श्रम के नियम का स्वेच्छापूर्वक पालन करने से संतोष और स्वास्थ्य मिलता है । और तन्दुरूस्ती ही असली दौलत है, न कि सोने-चांदी के टुकड़े । ग्रामोद्योग-संघ स्वेच्छापूर्ण शरीर-श्रम का ही एक प्रयोग है ।
भिखारियों की समस्या
मेरी अहिंसा किसी ऐसे तन्दुरूस्त आदमी को मुफ्त खाना देने का विचार बरदाश्त नहीं करेगी, जिसने उसके लिये ईमानदारी से कुछ-न-कुछ काम न किया हो; और मेरा वश चले तो जहां मुफ्त भोजन मिलता है, वे सब सदाव्रत मैं बन्द कर दूं । इससे राष्ट्र का पतन हुआ है और सुस्ती, बेकारी, दंभ और अपराधों को भी प्रोत्साहन मिला है । इस प्रकार का अनुचति दान देश के भौतिक्य आध्यात्मिक धन की कुछ भी वृद्धि नहीं करता और दाता के मन में पुण्यात्मा होन का झूठा भाव पैदा करता है । क्या ही अच्छी और बुद्धिमानी की बात है, यदि दानी लोग ऐसी संस्थाएं खोल जहां उनके के लिए काम करने वाले स्त्री-पुरूष को स्वास्थ्यप्रद और स्वच्छ हालत में भोजन दिया जाये। मेरा खुद का तो यह विचार है कि चरखा या उससे सम्बन्धित क्रियाओं में से कोई भी कार्य आदर्श होगा । परन्तु उन्हें यह स्वीकार न हो तो वे कोई भी दूसरा काम चून सकते है। जो भी हो, नियम यह होना चाहिये कि ‘मेहनत नहीं तो खाना भी नहीं ।’ प्रत्येक शहर के लिए भिखमंगों की अपनी-अपनी अलग कठिन समस्या है, जिसके लिए धनवान जिम्मेदार है । मैं जानता हूं कि आलसियों को मुफ्त भोजन करा देना बहुत आसान है, परन्तु ऐसी कोई संस्था संगठित करना बहुत कठिन है, जहां किसी को खाना देने से पहले उससे ईमानदारी से काम कराना जरूरी हो । आर्थिक दृष्टि से, कम-से-कम शुरू में, लोगों से काम लेने के बाद उन्हें खाना खिलाने का खर्च मौजूदा मुफ्त के भोजनालयों के खर्च से ज्यादा होगा । लेकिन मुझे पक्का विश्वास है कि यदि हम भूमिति की गति से देश में बढ़ने वाले आवारा गर्द लोगों की संख्या नहीं बढ़ाना चाहते, तो अंत में यह व्यवस्था अधिक सस्ती पड़ेगी ।
भीख मांगने को प्रोत्साहन देना बेशक बुरा है, लेकिन मैं किसी भिखारी को काम और भोजन दिये बिना नहीं लौटाऊंगा । हां, वह काम करना मंजूर न करें तो मैं उसे भोजन के बिना ही चला जाने दूंगा । जो लोग शरीर से लाचार है, जैस लगड़े या विकलांग उसका पोषण राज्य को करना चाहिये । लेकिन बनावटी या सच्ची अंधता की आड़ में भी काफी धोखा-धड़ी चल रही है। कितने ही ऐसे अंधे है जिन्होनें अपनी अंधता का लाभ उठाकर काफी पैसा जमा कर लिया है । वे इस तरह अपनी अंधता का एक अनुचित लाभ उठाये, इसके बजाय यह ज्यादा अछा होगा कि उन्हें अपाहिजों की देखभाल करने वाली किसी संस्था में रख दिया जाये।
अनुक्रमणिका
- १. मेरे सपनो का भारत
- २. स्वराज्य का अर्थ
- ३. राष्ट्रवाद का सच्चा स्वरूप
- ४. भारतीय लोकतंत्र
- ५. भारत और समाजवाद
- ६. भारत और साम्यवाद
- ७. उद्योगवाद का अभिशाप
- ८. वर्गयुध्द
- ९. हड़ताल
- १०. मज़दूर क्या चुनेंगे?
- ११. अधिकार या कर्तव्य ?
- १२. बेकारी का सवाल
- १३. दरिद्र-नारायण
- १४. शरीर-श्रम
- १५. सर्वोदय
- १६. संरक्षता का सिद्धांत
- १७. अहिंसक अर्थ-व्यवस्था
- १८. सामान वितरण का रास्ता
- १९. भारत में अहिंसा की उपासना
- २०. सर्वोदयी राज्य
- २१. सत्याग्रह और दुराग्रह
- २२. किसान
- २३. गांवों की ओर
- २४. ग्राम-स्वराज्य
- २५. पंचायत राज
- २६. ग्रामोद्योग
- २७. सरकार क्या कर सकती है?
- २८. ग्राम-प्रदर्शनियां
- २९. चरखे का संगीत
- ३०. मिल-उद्योग
- ३१. स्वदेशी
- ३२. गोरक्षा
- ३३. सहकारी गो पालन
- ३४. गांवों की सफाई
- ३५. गांव का आरोग्य
- ३६. गांवों का आहार
- ३७. ग्राम सेवक
- ३८. समग्र ग्राम सेवा
- ३९. युवकों को आह्वान
- ४०. राष्ट्र का आरोग्य, स्वच्छता और आहार
- ४१. शराब और अन्य मादक द्रव्य
- ४२. शहरों की सफाई
- ४३. विदेशी माध्यम की बुराई
- ४४. मेरा अपना अनुभव
- ४५. भारत की सांस्कृतिक विरासत
- ४६. नई तालीम
- ४७. बुनियादी शिक्षा
- ४८. उच्च शिक्षा
- ४९. शिक्षा का आश्रमी आदर्श
- ५०. राष्ट्रभाषा और लिपि
- ५१. प्रान्तीय भाषायें
- ५२. दक्षिण में हिन्दी
- ५३. विद्यार्थियों के लिए अनुशासन के नियम
- ५४. भारतीय स्त्रियों का पुनरूत्थान
- ५५. स्त्रियों की शिक्षा
- ५६. संतति-नियमन
- ५७. काम-विज्ञान की शिक्षा
- ५८ (……..)
- ५९. साम्प्रदायिक एकता
- ६०. वर्णाश्रम धर्म
- ६१. अस्पृश्यता का अभिशाप
- ६२. भारत में धार्मिक सहिष्णुता
- ६३. धर्म – परिवर्तन
- ६४. (…)
- ६५. प्रान्तों का पुनर्गठन
- ६६. अल्पसंख्यकों की समस्यायें
- ६७. भारतीय गवर्नर
- ६८. समाचार-पत्र
- ६९. शान्ति सेना
- ७०. भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस
- ७१. भारत पाकिस्तान और काश्मीर
- ७२. भारत में विदेशी बस्तियां
- ७३. भारत और विश्वशांति
- ७४. पूर्व का संदेश
- ७५. स्फूट वचन
