१५. सर्वोदय

हमने देखा कि मनुष्‍य की वृत्तियां चंचल उसका मन बेकार की दौड़-धूप किया करता है। उसका शरीर जैसे-जैसे ज्‍यादा देते जायें वैसे-वैसे ज्‍यादा मांगता जाता है। ज्‍यादा लेकर भी वह सुखी नहीं होता। भोग भोगने से भोग की इच्‍छा बढ़ती जाती है। इसलिए हमारे पुरखों ने भोग की हद बांध दी। बहुत सोचकर उन्‍होंने देखा कि सुख-दु:ख तो मन के कारण है। अमीर अपना अमीरी की वजह से सुखी नहीं है, गरीब अपनी गरीबी के कारण दुखी नहीं है। अमीर दुखी देखने में आता है और गरीब सुखी देखने में आता है। करोड़ों लोंग तो गरीब ही रहेंगे, ऐसा देखकर पूर्वजों ने भोग की वासना छुड़वाई। हजारों साल प‍हले जो हल काम लिया जाता था उससे हमने काम चलाया। हजारों साल पहले जैसे झोंपड़े थे उन्‍हें हमने कायम रखा। हजारों पहले जैसी हमारी शिक्षा थ‍ी वही चलती आई। हमने नाशकारक होड़ को जगह नहीं दी। सब अपना-अपना धंध करते रहे। उसमें उन्‍होंने दस्‍तूर के मुताबिक दाम लिये। ऐसा नहीं था कि हमें यंत्र वगैरा की खोज करना ही नहीं आता था। लेकिन हमारे पूर्वजों ने देखा की लोग अगर यंत्र वगैरा की झंझट में पड़ेंगे, तो गुलाम ही बनेंगे और अपनी नी‍ति को छोड़ देंगे। उन्‍होंने सोच-समझकर कहा कि हमें अपने हाथ-पैरों से जो काम हो सके वही करना चाहिये। हाथ-पैरों का इस्‍तेमाल करने में ही सच्‍चा सुख है, उसी में तन्‍दुरूस्‍ती है।

उन्‍होंने सोचा कि बड़े शहर कायम करना बेकार की झंझट है। उनमें लोग सुखी नहीं होंगे। उनमें धूर्तो की टोलियां और वेश्‍याओं की गलियां पैदा होंगी; गरीब अमीरों से लूटे जायेंगे। इसलिए उन्‍‍होंने छोटे गांवों से ही संतोष माना।

उन्‍होंने देखा की राजाओं और उनकी तलवार की बनिस्‍बत नीति का बल ज्‍यादा बलवान है। इसलिए उन्‍होंने राजाओं को नीतिवान पुरूषों-ऋषियों और फकीरों-से कम दरजें का माना।

ऐसी जिस प्रजा का गठन है, वह प्रजा दूसरों को सिखाने लायक है; वह दूसरों से सीखने लायक नहीं है।

इस राष्‍ट्र में अदालतें थीं, वकील थे, डॉक्‍टर-वैद्य थे। लेकिन वे सब ठीक ढंग से नियम के मुताबिक चलते थे। सब जानते थे कि ये धंधे बड़े धंधे नहीं हैं। और वकील, डॉक्‍टर वगैरा लोगों में लूट नहीं चाहते थे, वे तो लोगों के आश्रित थे। वे लोगों के मालिक बनकर नहीं रहते थे। इन्‍साफ काफी अच्‍छा होता था। अदालतों में न जाना लोगों का ध्‍येय था। उन्‍हें भरमानें वाला स्‍वार्थी लोग समाज में नहीं थे। इतनी सड़न भी सिर्फ राजा और राजधानी के आस-पास ही थी। यों आम प्रजा तो उनसे स्‍वतंत्र रहकर अपने खेतों का मालिकी हक भोगती थी-खेती करके अपना निर्वाह करती थी। उसके पास सच्‍चा स्‍वराज्‍य था। (1)

ऐसी नम्रता-शून्‍यता-आदत डालने कैसे आ सकती है? लेकिन व्रतों को सही ढंग से समझनें से नम्रता अपने-आप आने लगती है। सत्‍य का पालन करने की इच्‍छा रखने वाला अहंकारी कैसे हो स‍कता है? दूसरे के लिए प्राण न्‍यौछावर करने वाला अपनी जगह बनाने कहां जाय? उसने तो जब प्राण न्‍यौछावर करने का निश्‍चय किया तभी अपनी देह को फेंक दिया। ऐसी नम्रता का मतलब पुरूषार्थ का अभाव तो नहीं हैं? ऐसा अर्थ हिन्‍दू धर्म में कर डाला गया है सही। और इसलिए आलस्‍य की ओर पाखंड को बहुतेरे स्‍थानों पर जगह मिल गई है। सचमुच तो नम्रता के मानी हैं तीव्रतम पुरूषार्थ, सख्‍त-से-सख्‍त मेहनत। लेकिन वह सब परमार्थ के लिए होना चाहिये। ईश्‍वर खुद चौबीसों घण्‍टे एक सांस से काम करता रहता है, अंगड़ाई लेने तक की फुरसत नहीं लेता। उसके हम हो जायं, उसमें हम मिल जायं, तो हमारा उद्यम उसके जैसा ही अतंद्रित हो जायेगा-होना चाहिये। (2)

के नाम पर किया गया और उसे समर्पित किया गया कोई भी काम छोटा नहीं है। इस तरह किये गये हर एक छोटे या बड़े काम का समान मूल्‍य है। कोई भंगी यदि अपना काम भगवान की सेवा की भवना से करता हो तो उसके और उस राजा के काम का, जो अपनी प्रतिभा का उपयोग भगवान के नाम पर और ट्रस्‍टी की तरह करता है, समान महत्‍व है। (3)

अहिंसा का पुजारी उपयोगितावाद (बड़ी-से-बड़ी संख्‍या का ज्‍यादा-से-ज्‍यादा हित) का समर्थन नहीं करता। वह तो ‘सर्वभूत-हिताय’ यानी सबके अधितम लाभ के लिए ही प्रयत्‍न करेगा और इस आदर्श की प्राप्ति में मर जायेगा। इस प्रकार वह इसलिए मरना चाहेगा कि दूसरे जी सकें। दूसरों के साथ-साथ वह अपनी सेवा भी आप मरकर करेगा। सबके अधिकतम सुख के भीतर अधिकांश का अधिकतम सुख भी मिला हुआ है। और इसलिए अहिंसावादी और उपयोगितावादी अपने रास्‍ते पर कई बार मिलेंगे। किन्‍तु अन्‍त में ऐसा भी अवसर आयेगा, जब उन्‍हें अलग-अलग रास्‍ते पकड़ने होंगे और किसी-किसी दशा में एक-दूसरे का विरोध भी करना होगा। तर्कसंगत बने रहने के लिए उपयोगितावादी अपने को कभी बलि नहीं कर सकता। परन्‍तु अहिंसावादी हमेशा मिट जाने को तैयार र‍हेगा। (4)

जब तक सेवा की जड़ प्रेम या अहिंसा में न हो तब तक वह सम्‍भव ही नहीं है। सच्‍चा प्रेम समुद्र की तरह निस्‍सीम होता है और ह्दय के भीतर ज्‍वार की तरह उठकर बढ़ते हुए वह बा‍हर फैल जाता है तथा सीमाओं को पार करके दुनिया के छोरों तक जा पहुंचता है। सेवा के लिए आवश्‍यक दूसरी चीज है शरीर-श्रम, जिसे गीता में यज्ञ कहा गया है; शरीर-श्रम के बिना भी सेवा असंभव है। सेवा के लिए जग कोई पुरूष या स्‍त्री शरीर-श्रम करती है, तभी उसे जीने का अधिकार प्राप्‍त होता है। (5)

जब तक हम अपना अहंकार भूलकर शून्‍यता की स्थिति प्राप्‍त नहीं करते, तब तक हमारे लिए अपने दोषों को जीतना संभव नहीं है। ईश्‍वर पूर्ण आत्‍म-समर्पण के बिना संतुष्‍ट नहीं होता। वास्‍तविक स्‍वतंत्रता का मूल्‍य वह अवश्‍य चाहता है। और जब मनुष्‍य अपना ऐसा समर्पण कर चुकता है तब तुरन्‍त ही अपने को प्राणिमात्र की सेवा में लीन पाता है। यह सेवा ही तब उसके आनन्‍द और आमोद का विषय हो जाती है। तब वह एक बिल्‍कुल नया ही आदमी बन जाता है और ईश्‍वर की स सृष्टि की सेवा में अपने को खपाते हुए कभी नहीं थ‍कता। (6)

इस सत्‍य की भक्ति के कारण ही हमारी हस्‍ती हो। उसी के लिए हमारा हर एक काम, हर एक प्रवृत्ति हो। उसी के लिए हम हर सांस लें। ऐसा करना हम सीखें तो दूसरे सब नियमों के पास भी आसानी से पहुंच सकते हैं; और उनका पालन भी आसान हो जायेगा। सत्‍य के बगैर किसी भी नियम का शुद्ध पालन नामुमकिन है। (7)

सत्‍य की खोज करने वाला, अहिंसा बरतने वाला परिग्रह नहीं कर सकता। परमात्‍मा परिग्रह नहीं करता। अपने लिए जरूरी चीज वह रोज की रोज पैदा करता है। इसलिए अगर हम उस पर पूरा भरोसा रखते है, तो हमें समझना चाहिये कि हमारी जरूरत की चीज़े वह रोजाना देता हैं, और देगा। (8)

साधन और साध्‍य

लोग कहते है, ‘आखिर साधन तो साधन ही है ।’ मैं कहूंगा ‘आखिर तो साधन ही सब कुछ हैं ।’ जैसे साधन होंगे वैसे ही साध्‍य होंगा । साधन और साध्‍य को अलग करने वाली कोई दीवार नहीं हैं। वास्‍तव में सृष्टिकर्ता ने हमें साधनों पर नियंत्रण (और वह भी बहुत सीमित नियंत्रण) दिया हैं; साध्‍य पर तो कुछ भी नहीं दिया है । लक्ष्‍य के सिद्धि ठीक उतनी ही सिद्ध होती है, जितने हमारे साधन सिद्ध होते हैं। यह बात ऐसी है जिसममें किसी अपवाद की गुंजाइस नहीं है।

हिंसा पूर्ण उपायों से लिया गया स्‍वराज्‍य भी हिंसकपूर्ण होगा और वह दुनिया के लिए तथा खुद भारत के लिए भय का कारण सिद्ध होगा ।

गंदे साधनों से मिलने वाली‍ चीज भी गंदी ही होगी। इसलिए राजा को मारकर राजा और प्रजा एक से नहीं बन सकेंगे । मालिक का सिर काटकर मजूदर मा‍लिक नहीं हो सकेंगे । यही बात सब पर लागू की जा सकती हैं ।

कोई असत्‍य से सत्‍य को नहीं पा सकता । सत्‍य को पाने के लिए हमेशा सत्‍य का आचरण करना ही होगा । अहिंसा और सत्‍य की तो जोड़ी है न ? हरगिज नहीं । सत्‍य में अहिंसा छिपी हुई और अहिंसा में सत्‍य । इसीलिए मैंने कहा है कि सत्‍य और अहिंसा एक ही सिक्‍के के दो रूख हैं । दोनों की कीमत एक ही है । केवल पढ़ने में ही फर्क है; एक तरफ अहिंसा है, दूसरी तरफ सत्‍य। पूरी-पूरी पवित्रता के बिना अहिंसा और सत्‍य निभ ही नही सकते।शरीर या मन की अपवित्रता को छिपाने से असत्‍य और हिंसा की पैदा होगीं ।

इसलिए सत्‍यवादी, अहिंसक और पवित्र समाजवादी ही दुनिया में या हिन्‍दुस्‍तान में समाजवाद फैला सकता है ।

ईमेल से पढ़ें(सब्सक्राइब करें):

Web Designing and Development

अनुक्रमणिका

हमारे बारे में

"मेरे सपनों का भारत" विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में महात्मा गांधी द्वारा लिखे गए लेखों का संकलन है। इस पुस्तक को आनलाइन लाने का उद्देश्य नई पीढ़ी को महात्मा गांधी के विचारों से अवगत कराना है।
पुस्तक को आनलाइन लाने का कार्य अभी जारी है। यदि आपको इसमें कोई त्रुटि दिखाई पड़े या कोई सुझाव हों तो हमें ईमेल द्वारा सूचित कर सकते हैं।

हम और भी पुस्तकों को आनलाइन लाना चाहते हैं। अत:जो लेखक/प्रकाशक/ट्रस्ट/संस्थाएं इस कार्य में सहयोग प्रदान करना चाहें हमसे इस पते पर संपर्क कर सकते हैं:

ईमेल : admin (at) antarjaal (dot) in

मेरे सपनों का भारत (कापीराइट नवजीवन ट्रस्ट, अहमदाबाद)