२०. सर्वोदयी राज्‍य

मुझसे कितने ही लोगों में संदेह से सिर डुलाते हुए कहा है: ”लेकिन आप सामान्‍य जनता को अहिंसा नहीं सिखा सकते । अहिंसा का पालन केवल व्‍यक्ति ही कर सकते है। और सो भी विरले व्‍यक्ति।” मेरी राय में यह धारण एक मोटी भूल हैं । यदि‍ मनुष्‍य-जाति आदतन अहिंसक न होती, तो उसने यूगों पहले अपने हाथों अपना नाश कर लिया होता। लेकिन हिंसा और अहिंसा के पारस्‍परिक संघर्ष में अंत में अहिंसा ही सदा विजयी सिद्ध हुई है। सच तो यह है कि हमनें राजनीतिक उद्देश्‍य की प्राप्ति के लिये लोगों में अहिंसा की शिक्षा के प्रसार की कोशिश करने जितना धीरज ही कभी प्रकट नहीं किया ।

मेरी दृष्टि से राजनीतिक सत्‍ता कोई साध्‍य नहीं है, परन्‍तु जीवन के प्रत्‍येक विभाग में लोगों के लिए अपनी हालत सुधार सकने का एक साधन है। राजनीतिक सत्‍ता का अर्थ है राष्‍ट्रीय प्रतिन‍िधियों द्वारा राष्‍ट्रीय जीवन का नियमन करने की शक्ति। अगर राष्‍ट्रीय जीवन इतना पूर्ण हो जाता है कि वह स्‍वयं आत्‍मा-नियमन कर लें, तो किसी प्रतिनिधित्‍व की आवश्‍यकता नहीं रह जाती । उस समय ज्ञान पूर्वक अराजकता की स्थिति हो जाती है। ऐसी स्थिति में हर एक अपना राजा होता है। वह इस ढ़ग से अपने पर शासन करता है कि अपने पड़ोसियों के लिए कभी बाधक नहीं बनता। इसलिए आदर्श अवस्‍था में कोई राजनीतिक सत्‍ता नहीं होती, क्‍योंकि कोई राज्‍य नहीं होता। परन्‍तु जीवन में आदर्श की पूरी सिद्धि कभी नहीं होती । इसीलिए थोरों ने कहा है कि जो सबसे कम शासन करें वही उत्‍तम सरकार है ।

मैं राज्‍य की सत्‍ता की वृद्धि को बड़े-से-बड़े भय की दृष्टि से देखता हूं। क्‍योंकि जाहिरा तौर तो वह शोषण्‍ा को कम-से-कम करके लाभ पहुंचाती है; परन्‍तु व्‍यक्त्वि को-जो सब प्रकार की उन्‍नति की जड़ है- नष्‍ट करके वह मानव-जाति को बड़ी-से-बड़ी हानि पहुंचाती है।

राज्‍य केन्‍द्रीत और संगठित रूप में हिंसा का प्रतीक है। व्‍यक्ति के आत्‍मा होती हैं, परन्‍तु चूंकि राज्‍य एक आत्‍मा-रहित जड़ मशीन होता है, इसलिए उससे हिंसा कभी नहीं छुड़वायी जा सकती; उसका अस्तित्‍व ही हिंसा पर निर्भर है ।

मेरा यह पक्‍का विश्‍वास है कि अगर राज्‍य हिंसा से पूंजीवाद को दबा देगा, तो वह स्‍वयं हिंसा की लपेट में फंस जायेगा और किसी भी समय अहिंसा का विकास नहीं कर सकेगा।

मैं स्‍वयं तो यह अधिक पसंद करूंगा कि राज्‍य के हाथों में सत्‍ता केन्द्रित न करके ट्रस्‍टीशिप की भावना का विस्‍तार किया जाय। क्‍योंकि मेरी राय में व्‍यक्तिगत स्‍वामित्‍व की हिंसा राज्‍य की हिंसा से कम हानिकारक है। किन्‍तु अगर यह अनिवार्य हो तो मैं कम-से-कम राजकीय स्‍वामित्‍व का समर्थन करूंगा।

मुझे जो बात नापसंद है वह है बल के आधार पर बना हुआ संगठन; और राज्‍य ऐसा ही संगठन है। स्‍वेच्‍छापूर्वक संगठन जरूर होना चाहये।

अब यह सवाल यह है कि आदर्श समाज में कोई राजसत्‍ता रहेगी या वह एक बिलकुल अराजक समाज बनेगा ? मेरे खयाल में ऐसा सवाल पूछने से कुछ भी फायदा नहीं हो सकता । अगर हम ऐसे समजा के लिए मेहनत करते रहें, तो वह किसी हद तक बनता रहेगा, और उस हद तक लोगों को उससे फायदा पहुंचेगा। युक्लिड ने कहा है कि लाइन नहीं हो सकती है जिसमें चौड़ाई न हो । लेकिन ऐसी लाइन या लकीर न तो आज तक कोई बना पाया, न बना पायेगा। फिर भी ऐसी लाइन को खयाल में रखने से ही प्रगति हो सकती है। और हर एक आदर्श के बारे में यही सच है।

हां इतना याद रखना चाहिये कि आज दुनिया में कहीं भी अराजक समाज मौजूद नहीं है । अगर कभी कहीं बन सकता है, तो उसका आरम्‍भ हिन्‍दुस्‍तान में ही हो सकता है। क्‍योंकि हिन्‍दुस्‍तान में ऐसा समाज बनाने की कोशिश हुई है। आज तक हम आखिरी दरजे की बहादुरी नहीं दिखा सके; मगर उसे दिखाने का एक ही रास्‍ता है, और वह यह है कि जो लोग उसे मानते हैं वे उसे दिखायें । ऐसा कर दिखाने के लिए, जिस तरह हमने जेलों का डर छोड़ दिया है, उसी तरह हमें मृत्‍यु का डर भी छोड़ देना होगा।

पुलिस-बल

अहिंसक राज्‍य में भी पुलिस की जरूरत हो सकती है। मैं स्‍वीकार करता हूं कि यह मेरी अपूर्ण अहिंसा का चिन्‍ह् है। मुझमें फौज की तरह पुलिस के बारे में भी यह घोषणा करने का साहस नहीं हैं कि हम पुलिस की ताकत के बिना काम चला सकते हैं। अवश्‍य ही मैं ऐसे राज्‍य की कल्‍पना कर सकता हूं जिसमें पुलिस की जरूरत नहीं होगी; परन्‍तु यह कल्‍पना सफल होगी या नहीं, यह तो भविष्‍य ही बतायेगा।

परन्‍तु मेरी कल्‍पना की पुलिस आजकल की पुलिस से बिल्‍कुल भिन्‍न होगी । उसमें सभी सिपाही अहिंसा में मानने वाले होंगे। वे जनता के मालिक नहीं, सेवक होंगे। लोग स्‍वा‍भाविक रूप में ही उन्‍हें हर प्रकार की सहायता देंगे और आपस के सहयोग से दिन-दिन घटने वाले दंगों का आसानी से सामना कर लेंगे। पुलिस के पास किसी-न-किसी प्रकार के हथियार तो होंगे, परन्‍तु उन्‍हें क्‍वचित् ही काम में लिया जायेगा। असल में तो पुलिस वाले सुधारक बन जायेंगे। उनका काम मुख्‍यत: चोर-डाकुओं तक सीमित रह जायेगा। मजदूरों और पूंजी‍पतियों के झगड़े और हड़ताले अहिंसक राज्‍य में यदा-कदा ही होंगी, क्‍योंकि अहिंसक बहुमत का असर इतना अधिक रहेगा कि समाज के मुख्‍य तत्‍व उसका आदर करेंगे। इसी तरह साम्‍प्रदायिक की भ गुंजाइश नहीं रहेगी।

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