२१. सत्याग्रह और दुराग्रह
मेंरी यह दृढ़ धारणा है कि सविनय कानून-भंग वैधानिक आन्दोलन का शुद्धतम रूप है। बेशक, उसमें विनय और अहिंसा की जिस विशिष्टता का दावा किया जाता है वह यदि दूसरों को धोखा देने के लिए ओढ़ लिया गया झूठा आवरण-मात्र हो, तो वह लोगों को गिराता है और निंदनीय बन जाता है। (1)
कानून की अवज्ञा सच्चे भाव से और आदरपूर्वक की जाय, उसमें किसी प्रकार की उद्धतता न हो और वह किसी ठोस सिद्धान्त पर आधारित हो तथा उसके पीछे द्वेष या तिरस्कार का लेश्ा भी न हो-यह आखिरी कसौटी सबसे ज्यादा महत्व की है-तो ही उसे शुद्ध सत्याग्रह कहा जा सकता है। (2)
कानून की सविनय अवज्ञा में केवल वे लोग ही हिस्सा ले सकते हैं, जो राज्य द्वारा लादे गये कष्टप्रद कानूनों का-अगर वे उनकी धर्मबुद्धि या अन्त:करण को चोट न पहुंचाते हों तो-स्वेच्छापूर्वक पालन करते हैं और जो इस तरह की गयी अवज्ञा का दण्ड भी उतनी ही खुशी से भोगने के लिए तैयार हों। कानून की अवज्ञा सविनय तभी कही जा सकती है, जब वह पूरी तरह अहिंसक हो। सविनय अवज्ञा के पीछे सिद्धांत यह है कि प्रतिपक्षी को खुद कष्ट सहकर यानी प्रेम के द्वारा जीता जाय। (3)
सविनय अवज्ञा नागरिक का जन्मसिद्ध अधिकार है। वह अपने इस अधिकार को अपना मनुष्यत्व खोकर ही छोड़ सकता है। सविनय अवज्ञा का परिणाम कभी भी अराजकता में नहीं आ सकता। दुष्ट हेतु से की गयी अवज्ञा से ही अराजकता पैदा हो सकती है। दुष्ट हेतु से की जाने वाली अवज्ञा को हर एक राज्य बलपूर्वक अवश्य दबायेगा। यदि वह उसे नहीं दबायेगा तो वह खुद नष्ट हो जायेगा। किंतु सविनय अवज्ञा को दबाने का अर्थ तो अन्तरात्मा की आवाज को दबाने की कोशिश करना है। (4)
चूंकि सत्याग्रह सीधी कार्रवाई के अत्यंत बलशाली उपायों में से एक है, इसलिए सत्याग्रही सत्याग्रह का आश्रय लेने से पहले और सब उपाय आजमा कर देख लेता है। इसके लिए वह सदा और निरन्तर सत्ताधारियों के पास जायेगा, लोकमत को प्रभावित और शिक्षित करेगा, जो उसकी सुनना चाहते हैं उन सबके सामने अपना मामला शांति और ठंडे दिमाग से रखेगा और जब ये सब उपाय वह आजमा चुकेगा तभी सत्याग्रह का आश्रय लेगा। परन्तु जब उसे अन्तर्नाद की प्रेरक पुकार सुनाई देती है और सत्याग्रह छेड़ देता है, तब वह अपना सब-कुछ दांव पर लगा देता है और पीछे कदम नहीं हटाता। (5)
सत्याग्रह का उपयोग अक्सर बहुत शिथिलतापूर्वक किया जाता है और छिपी हुई हिंसा को भी यह नाम दे दिया जाता है। लेकिन इस शब्द के रचयिता के नाते मुझे यह कहने की अनुमति मिलनी चाहिये कि उसमें छिपी हुई अथवा प्रकट सभी प्रकार की हिंसा का, फिर वह कर्म की हो या मन और वाणी की हो, पूरा बहिष्कार है। प्रतिपक्षी का बुरा चाहना या उसे हानि पहुंचाने के इरादे से उससे या उसके बारे में बुरा बोलना सत्याग्रह का उल्लंघन है। सत्याग्रह एक सौम्य वस्तु है, वह कभी चोट नहीं पहुंचाता। उसके पीछे क्रोध या द्वेष नहीं होना चाहिये। उसमें शोरगुल, प्रदर्शन या उतावली नहीं होती। वह जबरदस्ती से बिलकुल उलटी चीज है। उसकी कल्पना हिंसा से उल्ाटी परंतु हिंसा का स्थान पूरी तरह भर सकने वाली चीज के रूप में की गई है। (6)
दुराग्रह
[ अप्रैल 1919 में पंजाब जाते हुए जब गांधी जी को गिरफ्तार कर लिया गया, उस समय उनकी गिरफ्तारी की खबर फैलते ही बम्बई में और दूसरी जगहों में हिंसात्मक उपद्रव शुरू हो गये थे। बाद में जब पुलिस की निगरानी में उन्हें बम्बई वापिस लाया गया और 11 अप्रैल को छोड़ा गया, तब उन्होंने एक संदेश दिया था जो शाम को होने वाली सभाओं में पढ़ा जाना था। इस संदेश का एक अंश इस प्रकार था:]
मेरी गिरफ्तारी पर इतना क्षोभ और इतनी गड़बड़ क्यों हुई, इसका कारण मैं नहीं समझ सका हूं। यह सत्याग्रह तो नहीं है; इतना ही नहीं, यह दुराग्रहों से भी बुरा है। जो लोग सत्याग्रह से सम्बन्धित प्रदर्शनों में भाग लेते हैं, वे-उन्हें खतरा हो तो भी-हिंसा न करने के लिए, पत्थर आदि न फेंकने के लिए, किसी को किसी भी तरह चोट न पहुंचाने के लिए बंधे हुए हैं। लेकिन बम्बई में हमने पत्थर फेंके हैं और रास्तों में रूकावटें डालकर ट्राम-गाडि़यां रोकी हैं। यह सत्याग्रह नहीं है। हमने हिंसक प्रवृत्तियों के कारण गिरफ्तार किये गये पचास आदमियों के छोड़े जाने की मांग भी की है। हमारा कर्त्तव्य तो मुख्यत: अपने को गिरफ्तार करवाना है। जिन्होंने हिंसा की प्रवृत्तियां की हैं उन्हें छुड़वाने की कोशिश करना धार्मिक कर्तव्य का उलंघन है ।7
मैंने असंख्य बार कहा है कि सत्याग्रह में हिंसा, लूटमार, आगजनी आदि के लिए कोई स्थान नही है; लेकिन इसके बावजूद हमने मकान जलाये हैं, बलपूर्वक हथियार छीने हैं, लोगों को डरा-धमकाकर उनसे पैसा लिया है, रेलगाडियां रोकी हैं तार काटे हैं, निर्दोष आदमियों की हत्या की है और दुकानें तथा लोगों के निजी घरों में लूटपाट की है । इस तरह के कामों से मुझे जेल या फांसी के तख्ते से बचाया जा सकता हो तो भी मैं इस तरह बचाया जाना पसन्द नही करूंगा ।8
हिंसा के उपायों के प्रयोग से मुझे तो भारत के नाश के सिवा कुछ नजर नहीं आता। अगर मजदूर लोग अपना गुस्सा देश में प्रचलित कानून को दुष्ट भाव से तोडकर प्रगट करें, तो मैं कहूंगा कि वे आत्मघात कर रहे हैं और भारत को उसके फलस्वरूप अवर्णनीय कष्ट भोगने पडेंगे । जब मैंने सत्याग्रह और सविनय अवज्ञा का प्रचार शुरू किया, तो उसका यह उददेश्य कदापि नहीं था कि उसमें कानूनों की दुष्ट भाव से की जाने वाली उद्धत अवज्ञा का भी समावेश होगा । मेरा अनुभव मुझे सिखाता है कि सत्य का प्रचार हिंसा के द्वारा कभी नही किया जा सकता। जिन्हे अपने ध्येय के औचित्य में विश्वास है, उनमें असीम धीरज होना चाहिए । और कानून की सविनय अवज्ञा के लिए केवल वे ही व्यक्िति योग्य माने जा सकते है, जो अविनय अवज्ञा ( क्रिमिनल डिसओबीडिन्स ) या हिंसा किसी तरह कर ही न सकते हो। जिस तरह कोई आदमी एक ही समय में संयत और कुपित नही हो सकता, उसी तरह कोई सविनय अवज्ञा और अविनय अवज्ञा, दोनों एक साथ नही कर सकता। और जिस तरह आत्म-संयम की शक्ति अपनें मनोविकारों पर पूरा नियंत्रण पा चुकने के बाद ही आती है उस समय जब हम देश के कानूनों का खुशी से और पूरा-पूरा पालन करना सीख चुके हों, तभी हम उनकी सविनय अवज्ञा करने की योग्यता प्राप्त करते हैं । फिर, जिस तरह किसी आदमी को हम प्रलोभनों की पहुंच के उपर तभी कह सकते हैं जब कि वह प्रलोभनों से घिरा हुआ हो और फिर भी उनका निवारण कर सका हो, उसी तरह हमने क्रोध को जीत लिया है ऐसा तभी कहा जा सकता है जब क्रोध का काफी कारण होने पर भी हम अपने उपर काबू रखने में कामयाब सिद्ध हों।9
कुछ विद्यार्थीयों ने धरना देने के पुराने जंगलीपन को फिर से जिंदा किया है|
अनुक्रमणिका
- १. मेरे सपनो का भारत
- २. स्वराज्य का अर्थ
- ३. राष्ट्रवाद का सच्चा स्वरूप
- ४. भारतीय लोकतंत्र
- ५. भारत और समाजवाद
- ६. भारत और साम्यवाद
- ७. उद्योगवाद का अभिशाप
- ८. वर्गयुध्द
- ९. हड़ताल
- १०. मज़दूर क्या चुनेंगे?
- ११. अधिकार या कर्तव्य ?
- १२. बेकारी का सवाल
- १३. दरिद्र-नारायण
- १४. शरीर-श्रम
- १५. सर्वोदय
- १६. संरक्षता का सिद्धांत
- १७. अहिंसक अर्थ-व्यवस्था
- १८. सामान वितरण का रास्ता
- १९. भारत में अहिंसा की उपासना
- २०. सर्वोदयी राज्य
- २१. सत्याग्रह और दुराग्रह
- २२. किसान
- २३. गांवों की ओर
- २४. ग्राम-स्वराज्य
- २५. पंचायत राज
- २६. ग्रामोद्योग
- २७. सरकार क्या कर सकती है?
- २८. ग्राम-प्रदर्शनियां
- २९. चरखे का संगीत
- ३०. मिल-उद्योग
- ३१. स्वदेशी
- ३२. गोरक्षा
- ३३. सहकारी गो पालन
- ३४. गांवों की सफाई
- ३५. गांव का आरोग्य
- ३६. गांवों का आहार
- ३७. ग्राम सेवक
- ३८. समग्र ग्राम सेवा
- ३९. युवकों को आह्वान
- ४०. राष्ट्र का आरोग्य, स्वच्छता और आहार
- ४१. शराब और अन्य मादक द्रव्य
- ४२. शहरों की सफाई
- ४३. विदेशी माध्यम की बुराई
- ४४. मेरा अपना अनुभव
- ४५. भारत की सांस्कृतिक विरासत
- ४६. नई तालीम
- ४७. बुनियादी शिक्षा
- ४८. उच्च शिक्षा
- ४९. शिक्षा का आश्रमी आदर्श
- ५०. राष्ट्रभाषा और लिपि
- ५१. प्रान्तीय भाषायें
- ५२. दक्षिण में हिन्दी
- ५३. विद्यार्थियों के लिए अनुशासन के नियम
- ५४. भारतीय स्त्रियों का पुनरूत्थान
- ५५. स्त्रियों की शिक्षा
- ५६. संतति-नियमन
- ५७. काम-विज्ञान की शिक्षा
- ५८ (……..)
- ५९. साम्प्रदायिक एकता
- ६०. वर्णाश्रम धर्म
- ६१. अस्पृश्यता का अभिशाप
- ६२. भारत में धार्मिक सहिष्णुता
- ६३. धर्म – परिवर्तन
- ६४. (…)
- ६५. प्रान्तों का पुनर्गठन
- ६६. अल्पसंख्यकों की समस्यायें
- ६७. भारतीय गवर्नर
- ६८. समाचार-पत्र
- ६९. शान्ति सेना
- ७०. भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस
- ७१. भारत पाकिस्तान और काश्मीर
- ७२. भारत में विदेशी बस्तियां
- ७३. भारत और विश्वशांति
- ७४. पूर्व का संदेश
- ७५. स्फूट वचन
