२४. ग्राम-स्वराज्य
ग्राम-स्वराज्य की मेरी कल्पना यह है कि वह एक ऐसा पूर्ण प्रजातंत्र होगा, जो अपनी अहम जरूरतों के लिए अपने पड़ोसी पर निर्भर नहीं करेगा; और फिर भी बहुतेरी दूसरी जरूरतों के लिए-जिनमें दूसरों का सहयोग अनिवार्य होगा-वह परस्पर सहयोग से काम लेगा। इस तरह हर एक गांव का पहला काम यह होगा की वह अपनी जरूरत का तमाम अनाज और कपड़े के लिए कपास खुद पैदा कर ले। उसके पास सुरक्षित जमीन होनी चाहिये, जिसमें ढोर चर सकें। और गांव के बड़ों व बच्चों के लिए मनबहलाय के साधन और खेल-खुद के मैदान वगैरा का बन्दोबस्त हो सके। इसके बाद भी जमीन बची तो उसमें वह ऐसी उपयोगी फसलें बोयेगा, जिन्हें बेचकर वह आर्थिक लाभ उठा सके; यों वह गांजा, तम्बाकू, अफीम वगैरा की खेती से बचेगा।
हर एक गांव में गांव की अपनी एक नाटकशाला, पाठशाला और सभा-भवन रहेगा। पानी के लिए उसका अपना इन्तजाम होगा-वाटर वर्क्स होंगे-जिससे गांव के सभी लोगों को शुद्ध पानी मिला करेगा। कुओं और तलाबों पर गांव का पूरा नियंत्रण रखकर यह काम किया जा सकता है। बुनियादी तालीम के आखिरी दरजे तक शिक्षा सब के लिए लाजिमी होगी। जहां तक हो सकेगा, गांव के सारे काम सहयोग के आधार पर किये जायेंगे। जात-पांत और क्रमागत अस्पृश्यता के जैसे भेद आज हमारे समाज में पाये जाते हैं, वैसे इस ग्राम-समाज में बिल्कुल नहीं रहेंगे। (1)
सत्याग्रह और असहयोग के शस्त्र के साथ अहिंसा की सत्ता ही ग्रामीण समाज का शासन-बल होगी। गांव की रक्षा के लिए ग्राम-सैनिकों का एक ऐसा दल रहेगा, जिसे लाजिमी तौर पर बारी-बारी से गांव के चौकी-पहरे का काम करना होगा। इसके लिए गांव में ऐसे लोगों का रजिस्टर रखा जायेगा। गांव का शासन चलाने के लिए हर साल गांव के पांच आदमियों की एक पंचायत चुनी जायेगी। इसके लिए नियमानुसार एक खास निर्धारित योग्यता वाले गांव के बालिग स्त्री-पुरूषों को अधिकार होगा कि वे अपने पंच चुन लें। इन पंचायतो को सब प्रकार की आवश्यक सत्ता और अधिकार रहेंगे। चूंकि इस ग्राम-स्वराज्य में आज के प्रचलित अर्थों में सजा या दंड का कोई रिवाज नहीं रहेगा, इसलिय यह पंचायत अपने एक साल के कार्यकाल में स्वयं ही धारा सभा, न्याय सभा और कार्यकारिणी सभा का सारा काम संयुक्त रूप से करेगी।
आज भी अगर कोई गांव चाहे तो अपने यहां इस तरह का प्रजातंत्र कायम कर सकता है । उसके इस काम में मौजूदा सरकार भी ज्यादा दस्तंदाजी नहीं करेगी । क्योंकि उसका गांव से जो भी कारगर संबंध है, वह सिर्फ मालगुजारी वसूल करने तक ही सीमित है । यहां मैंने इस बात का विचार नहीं किया है कि इस तरह के गांव का अपने पास-पड़ोस के गांवों के साथ या केन्द्रीय सरकार के साथ, अगर वैसी कोई सरकार हुई, क्या संबंध रहेगा । मेरा हेतु तो ग्राम-शासन की एक रूपरेखा पेश करने का ही है । इस ग्राम-शासन में व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर आधार रखने वाला संपूर्ण प्रजातंत्र काम करेगा । व्यक्ति ही अपनी इस सरकार का निर्माता भी होगा । उसकी सरकार और वह दोनों अहिंसा के नियम के वश होकर चलेंगे । अपने गांव के साथ वह सारी दुनिया की शक्ति का मुकाबला कर सकेगा । क्योंकि हर एक देहाती के जीवन का सबसे बड़ा नियम यह होगा कि वह अपनी और अपने गांव की इज्जत की रक्षा के लिए मर मिटे ।
संभव हे ऐसे गांव को तैयार करने में एक आदमी की पूरी दुनिया खतम हो जाय । सच्चे प्रजातंत्र का और ग्राम-जीवन को कोई भी प्रेमी एक गांव को लेकर बैठ सकता है और उसी को अपनी सारी दुनिया मानकर उसके काम में मशगूल रह सकता है। निश्चय ही उसे इसका अच्छा फल मिलेगा। वह गांव में बैठते ही एक साथ गांव के भंगी, कतवैये, चौकीदार, बैद्य और शिक्षक का काम शुरू कर देगा। अगर गांव का कोई आदमी उसके पास न फटके, तो भी वह संतोष के साथ अपने सफाई और कताई के काम में जुटा रहेगा ।
देहात वालों में ऐसी कला और कारीगरी का विकास होना चाहिये, जिससे बाहर उनकी पैदा की हुई चीजों की कीमत की जा सकें । जब गांवों का पूरा-पूरा विकास हो जायेगा, तो देहातियों की बुद्धि और आत्मा को संतुष्ट करने वाली कला-कारीगरों के धनी स्त्री-पुरूषों की गांवों में कमी नहीं रहेगी । गांव में कवि होंगे, चित्रकार होंगे, शिल्पी होंगे, भाषा के पंडित और शोध करने वाले लोग भी होंगे । थोड़े में, जिन्दगी की ऐसी कोई चीज न होगी जो गांव में न मिले । आज हमारे देहात उजड़े हुए और कूड़े-कचरे के ढेर बने हुए हैं । कल वहीं सुन्दर बगीचे होंगे और ग्रामवासियों को उगना या उनका शोषण करना असंभव हो जायेगा ।
इस तरह के गांवों की पुनर्रचना का काम आज से ही शुरू हो जाना चाहिये ।
उद्योग, हुनर, तन्दुरूस्ती और शिक्षा इन चारों का सुन्दर समन्वय करना चाहिये । नई तालीम में उद्योग और शिक्षा, तन्दुरूस्ती और हुनर का सुन्दर समन्वय है । इन सबके मेल से मां के पेट में आने के समय से लेकर बुढ़ापे त का एक खूबसूरत फूल तैयार होता है । यही नई तालीम है । इसलिए मैं शुरू में ग्राम-रचना के टुकड़े नहीं करूंगा, बल्कि यह कोशिश करूंगा कि इन चारों का आपस में मेल बैठे । इसलिए मैं किसी उद्योग और शिक्षा को अलग नहीं मानूंगा, बल्कि उद्योग को शिक्षा का जरिया मानूंगा, और इसीलिए ऐसी योजना में नई तालीम को शामिल करूंगा ।
मेरी कल्पना की ग्राम-इकाई मजबूत-से-मजबूत होगी । मेरी कल्पना के गांव में 1000 आदमी रहेंगे । ऐसे गांव को अगर स्वावलम्बन के आधार पर अच्छी तरह संगठित किया जाय, तो वह बहुत कुछ कर सकता है ।
आदर्श भारतीय ग्राम इस तरह बनाया जायेगा कि उसमें आसानी से स्वच्छता की पूरी-पूरी व्यवस्था रहे । उसकी झोंपडि़यों में पर्याप्त प्रकाश और हवा का प्रबंध होगा, और उनके निर्माण में जिस सामान का उपयोग होगा वह ऐसा होगा, जो गांव के आस-पास पांच मील की त्रिज्या के अन्दर आने वाले प्रदेश में मिल सके । इन झोपडि़यों में आंगन या खुली जगह होगी, जहां उस घर के लोग अपने उपयोग के लिए साग-भाजियां उगा सकें और अपने मवेशियों को रख सकें । गांव की गलियां और सड़के जिस धूल को हटाया जा सकता है उससे मुक्त होंगी । उस गांव में उसकी आवश्यकता के अनुसार कुएं होंगे और वे सबके लिए खुले होंगे । उसमें सब लोगों के लिए पूजा के स्थान होंगे, सबके लिए एक सभा-भवन होगा, मवेशियों के चरने के लिए गांव का चरागाह होगा, सहकारी डेरी होगी, प्राथमिक और माध्यमिक शालायें होंगी जिनमें मुख्यत: औद्योगिक शिक्षा दी जायेगी और झगड़ों के निपटारे के लिए ग्राम-पंचायत होगी । वह अपना अनाज, साग-भाजियां और फल तथा खादी खुद पैदा कर लेगा ।
अनुक्रमणिका
- १. मेरे सपनो का भारत
- २. स्वराज्य का अर्थ
- ३. राष्ट्रवाद का सच्चा स्वरूप
- ४. भारतीय लोकतंत्र
- ५. भारत और समाजवाद
- ६. भारत और साम्यवाद
- ७. उद्योगवाद का अभिशाप
- ८. वर्गयुध्द
- ९. हड़ताल
- १०. मज़दूर क्या चुनेंगे?
- ११. अधिकार या कर्तव्य ?
- १२. बेकारी का सवाल
- १३. दरिद्र-नारायण
- १४. शरीर-श्रम
- १५. सर्वोदय
- १६. संरक्षता का सिद्धांत
- १७. अहिंसक अर्थ-व्यवस्था
- १८. सामान वितरण का रास्ता
- १९. भारत में अहिंसा की उपासना
- २०. सर्वोदयी राज्य
- २१. सत्याग्रह और दुराग्रह
- २२. किसान
- २३. गांवों की ओर
- २४. ग्राम-स्वराज्य
- २५. पंचायत राज
- २६. ग्रामोद्योग
- २७. सरकार क्या कर सकती है?
- २८. ग्राम-प्रदर्शनियां
- २९. चरखे का संगीत
- ३०. मिल-उद्योग
- ३१. स्वदेशी
- ३२. गोरक्षा
- ३३. सहकारी गो पालन
- ३४. गांवों की सफाई
- ३५. गांव का आरोग्य
- ३६. गांवों का आहार
- ३७. ग्राम सेवक
- ३८. समग्र ग्राम सेवा
- ३९. युवकों को आह्वान
- ४०. राष्ट्र का आरोग्य, स्वच्छता और आहार
- ४१. शराब और अन्य मादक द्रव्य
- ४२. शहरों की सफाई
- ४३. विदेशी माध्यम की बुराई
- ४४. मेरा अपना अनुभव
- ४५. भारत की सांस्कृतिक विरासत
- ४६. नई तालीम
- ४७. बुनियादी शिक्षा
- ४८. उच्च शिक्षा
- ४९. शिक्षा का आश्रमी आदर्श
- ५०. राष्ट्रभाषा और लिपि
- ५१. प्रान्तीय भाषायें
- ५२. दक्षिण में हिन्दी
- ५३. विद्यार्थियों के लिए अनुशासन के नियम
- ५४. भारतीय स्त्रियों का पुनरूत्थान
- ५५. स्त्रियों की शिक्षा
- ५६. संतति-नियमन
- ५७. काम-विज्ञान की शिक्षा
- ५८ (……..)
- ५९. साम्प्रदायिक एकता
- ६०. वर्णाश्रम धर्म
- ६१. अस्पृश्यता का अभिशाप
- ६२. भारत में धार्मिक सहिष्णुता
- ६३. धर्म – परिवर्तन
- ६४. (…)
- ६५. प्रान्तों का पुनर्गठन
- ६६. अल्पसंख्यकों की समस्यायें
- ६७. भारतीय गवर्नर
- ६८. समाचार-पत्र
- ६९. शान्ति सेना
- ७०. भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस
- ७१. भारत पाकिस्तान और काश्मीर
- ७२. भारत में विदेशी बस्तियां
- ७३. भारत और विश्वशांति
- ७४. पूर्व का संदेश
- ७५. स्फूट वचन
