२५. पंचायत राज
आजादी नीचे से शुरू होनी चाहिये । हर एक गांव में जमहूरी सल्तनत या पंचायत का राज होगा उसके पास पूरी सत्ता और ताकत होगी । इसका मतलब यह है कि हर एक गांव को अपने पांव पर खडा़ होना होगा – अपनी जरूरतें खुद पुरी लेनी होगी, ताकि वह अपना कारोबार चला सके । यहां तक कि वह सारी दुनिया के खिलाफ अपनी रक्षा खुद कर सके। उसे तालीम देकर इस हद तक तैयार करना होगाकि वह बाहरी हमले के मुकाबले में अपनी रक्षा करते हुए मर -मिटने के लायक बन जाय। इस तरह आखिर हमारी बुनियाद व्यक्ति पर होगी । इसका यह मतलब नहीं कि पडो़सियों पर या दुनिया पर भरोसा न रखा जाय , या उनकी राजी -खुशी से दी हुइ मदद न ली जाय । कल्पना यह है कि सब लोग आजाद होंगे और सब एक- दुसरे पर अपना असर डाल सकेंगे । जिस समाज का हर एक आदमी यह जानता है कि उसे क्या चाहिए और इससे भी बढ़कर जिसमें यह माना जाता है कि बराबरी की मेहनत करके भी दूसरों को जो चीज नही मिलती है वह खुद भी किसी को नहीं लेनी चाहिए, वह समाज जरूर ही बहुत उचें दरजे की सभ्यता वाला होना चाहिए ।
ऐसे समाज की रचना सत्य और अहिंसा पर ही हो सकती हैं। मेरी राय है कि जब तक ईश्वर पर जीता -जाकता विश्वास न हो , तब तक सत्य और अहिंसा पर चलना असंभव है। ईश्वर या खुदा वह जिन्दा ताकत है, जिसमें दुनिया की तमाम ताकतें समा जाती हैं। वह किसी का सहारा नहीं लेती और दुनिया की दुसरी सब ताकतों के खतम हो जाने पर भी कायम रहती हैं।इस जीती -जागती रोशनी पर, जिसने अपने दामन में सब-कुछ लपेट रखा है, मैं यदि विश्वास न रखुं, तो मैं समझ न सकुंगा कि मैं आज किस तरह जिन्दा हुं।
ऐसा समाज अनगिनत गांवों का बना होगा। उसका फैलाव एक के उपर एक के ढ़ग पर नहीं, बल्कि लहरों की तरह एक के बाद एक शकल में होगा। जिन्दगी मीनार की शकल में नहीं होगी, जहां उपर की तंग चोटी को नीचे के चौडे़ पाये पर खडा़ होना पड़ता है। वहां तो समुद्र की लहरों की तरह जिन्दगी एक के बाद एक घेरे की शकल में होगी और व्यक्ति उसका मध्यबिन्दु होगा। गांव अपने इर्दगिर्द के गांवों के लिए मिटने को तैयार होगा। इस तरह आखिर सारा समाज ऐसे लोगो का बन जायेगा, जो उद्वत बनकर कभी किसी पर हमला नही करतें, बल्कि हमेशा नम्र रहतें हैं और अपने में समुद्र की उस शान को महसुस करते हैं जिसके वे एक जरूरी अंग हैं।
इसलिए सबसे बाहर का घेरा या दायरा अपनी ताकत का उपयोग भीतर वालों को कुचलने में नही करेगा, बल्कि उन सबको ताकत देगा और उनसे ताकत पायेगा। मुझे ताना दिया जा सकता है कि यह सब तो खयाली तस्वीर है, इसके बारे में सोचकर वक्त क्यों बिगाड़ा जाय? यूक्लिड की परिभाषा वाला बिन्दु कोई मनुष्य खींच नहीं सकता, फिर भी उनकी कीमत हमेशा रही है और रहेगी। इसी तरह मेरी इस तस्वीर की भी कीमत है। इसके लिए मनुष्य जिन्दा रह सकता है। अगरचे इस तस्वीर को पूरी तरह बनाना या पाना संभव नहीं है तो भी इस तस्वीर को पाना या इस हद तक पहुंचना हिन्दुस्तान की जिन्दगी का मकसद होना चाहिये। जिस चीज को हम चाहते है उसकी सही-सही तस्वीर हमारे सामने होने चाहिये, तभी हम उससे मिलती-जुलती कोई चीज पाने की आशा रख सकते है। अगर हिन्दुस्तान के हर एक गांव में कभी पंचायती राज कायम हुआ, तो मै अपनी दस तस्वीर की सच्चाई कर सकुंगा-जिसमे सबसे पहला और सबसे आखरी दोनों बराबर होंगे या यों कहिये कि न तो कोई पहला होगा, न आखिरी।
इस तस्वीर में हर एक धर्म की अपनी पुरी और बराबरी की जगह होगी। हम सब एक ही आलीशान पेड़ के पत्ते है। इस पेड़ की जड़ हिलाई नहीं जा सकती, क्योंकि वह पाताल तक पहुंची हुई है। जबरदस्त से जबरदस्त आंधी भी उसे हिला नहीं सकती।
इस तस्वीर में उन मशीनों के लिए कोई जगह नहीं होगी। जो मनुष्य की मेहनत की जगह लेकर कुछ लोगों के हाथों में सारी ताकत इकठ्टी कर देती हैं। सभ्य लोगों की दुनिया मेहनत की अपनी अनोखी जगह है। उसमें ऐसी मशीनों की गुजाईस होगी, जो हर आदमी को उसके काम में मदद पहुंचाये। लेकिन मुझे कबूल करना चाहिये कि मैंने कभी बैठ कर यह सोचा नहीं कि इस तरह की मशीन कैसी हो सकती है। सिलाई की सिंगर मशीन का खयाल मुझे आया था। लेकिन उसका जिक्र भी मैंने यों ही कर दिया था। अपनी इस तसवीर को पूर्ण बनाने के लिए मुझे उसकी जरूरत नही।
जब पंचायत राज स्थापित हो जायेगा तब लोकमत एसे भी अनेक काम कर दिखायेगा, जो हिंसा कभी नहीं कर सकती। जमींदारों, पूंजीपतियों और राजाओं की मौजुदा सत्ता तभी तक चल सकती है, जब तक की सामान्य जनता को अपनी शक्ति का भान नहीं होता। अगर लोग जमींदारी और पूंजीवाद की बुराई से सहयोग करना बंद कर दें, तो वह पोषण के आभाव में खुद ही मर जायेगी। पंचायत राज्य में केवल पंचायत की आज्ञा मानी जायेगी और पंचायत अपने बनाये हुए कानून के द्वारा ही अपना कार्य करेगी।
अनुक्रमणिका
- १. मेरे सपनो का भारत
- २. स्वराज्य का अर्थ
- ३. राष्ट्रवाद का सच्चा स्वरूप
- ४. भारतीय लोकतंत्र
- ५. भारत और समाजवाद
- ६. भारत और साम्यवाद
- ७. उद्योगवाद का अभिशाप
- ८. वर्गयुध्द
- ९. हड़ताल
- १०. मज़दूर क्या चुनेंगे?
- ११. अधिकार या कर्तव्य ?
- १२. बेकारी का सवाल
- १३. दरिद्र-नारायण
- १४. शरीर-श्रम
- १५. सर्वोदय
- १६. संरक्षता का सिद्धांत
- १७. अहिंसक अर्थ-व्यवस्था
- १८. सामान वितरण का रास्ता
- १९. भारत में अहिंसा की उपासना
- २०. सर्वोदयी राज्य
- २१. सत्याग्रह और दुराग्रह
- २२. किसान
- २३. गांवों की ओर
- २४. ग्राम-स्वराज्य
- २५. पंचायत राज
- २६. ग्रामोद्योग
- २७. सरकार क्या कर सकती है?
- २८. ग्राम-प्रदर्शनियां
- २९. चरखे का संगीत
- ३०. मिल-उद्योग
- ३१. स्वदेशी
- ३२. गोरक्षा
- ३३. सहकारी गो पालन
- ३४. गांवों की सफाई
- ३५. गांव का आरोग्य
- ३६. गांवों का आहार
- ३७. ग्राम सेवक
- ३८. समग्र ग्राम सेवा
- ३९. युवकों को आह्वान
- ४०. राष्ट्र का आरोग्य, स्वच्छता और आहार
- ४१. शराब और अन्य मादक द्रव्य
- ४२. शहरों की सफाई
- ४३. विदेशी माध्यम की बुराई
- ४४. मेरा अपना अनुभव
- ४५. भारत की सांस्कृतिक विरासत
- ४६. नई तालीम
- ४७. बुनियादी शिक्षा
- ४८. उच्च शिक्षा
- ४९. शिक्षा का आश्रमी आदर्श
- ५०. राष्ट्रभाषा और लिपि
- ५१. प्रान्तीय भाषायें
- ५२. दक्षिण में हिन्दी
- ५३. विद्यार्थियों के लिए अनुशासन के नियम
- ५४. भारतीय स्त्रियों का पुनरूत्थान
- ५५. स्त्रियों की शिक्षा
- ५६. संतति-नियमन
- ५७. काम-विज्ञान की शिक्षा
- ५८ (……..)
- ५९. साम्प्रदायिक एकता
- ६०. वर्णाश्रम धर्म
- ६१. अस्पृश्यता का अभिशाप
- ६२. भारत में धार्मिक सहिष्णुता
- ६३. धर्म – परिवर्तन
- ६४. (…)
- ६५. प्रान्तों का पुनर्गठन
- ६६. अल्पसंख्यकों की समस्यायें
- ६७. भारतीय गवर्नर
- ६८. समाचार-पत्र
- ६९. शान्ति सेना
- ७०. भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस
- ७१. भारत पाकिस्तान और काश्मीर
- ७२. भारत में विदेशी बस्तियां
- ७३. भारत और विश्वशांति
- ७४. पूर्व का संदेश
- ७५. स्फूट वचन
