२६. ग्रामोद्योग

ग्रामोद्योगों का यदि लोप हो गया, तो भारत के 7 लाख गांवों का सर्वनाश ही समझिये ।

ग्रामोद्योग- सम्‍बंधी मेरी प्रस्‍तावित योजना पर इधर दैनिक पत्रों में जो टीकायें हुई हैं उन्‍हें मैंने पढ़ा है। कई पत्रों ने तो मुझे यह सलाह दी है कि मनुष्‍य की अन्‍वेषण-बुद्धि ने प्रकृति की जिन शक्तियों को अपने वंश में कर लिया है, उनका उपयोग करने से ही गांवों की मुक्ति होगी। उन आलोचकों का यह कहना है कि प्रगतिशील पश्चिम में लिस तरह पानी, हवा, तेल और बिजली का पूरा-पूरा उपयोग हो रहा है, उसी तरह हमें भी इन चीजों को काम में लाना चाहिये। वे कहते है कि इन गुप्‍त प्राकृतिक शक्तियों पर कब्‍जा कर लेने से प्रत्‍ये‍क अमेरिका-वासी 33 गुलामों को रख सकता हैं, अर्थात 33 गुलामों का काम वह इन शक्तियों के द्वारा ले सकता है।

इस रास्‍ते अगर हम हिन्‍दुस्‍तान में चले, तो मैं यह बेधड़क कह सकता हूं कि प्रत्‍येक मनुष्‍य को 33 गुलाम मिलने के बजाय इस मुल्‍क के एक-एक मनुष्‍य की गुलामी 33 गुनी बढ़ जायेगी।

यंत्रो काम लेना उसी अवस्‍था में अच्‍छा होता है, जब कि किसी निर्धारित काम को पूरा करने के लिए आदमी बहुत ही कम हों या नपे-तुले हों । पर यह बात हिन्‍दुस्‍तान में तो है नहीं । यहां काम के लिए जितने आदमी चाहिये, उनसे कहीं अधिक बेकार पड़े हुए हैं । इसलिए उद्योगों के यंत्रीकरण से यहां की बेकारी घटेगा या बढ़ेगी ? कुछ वर्गगज जमीन खोदने के लिए मैं हल का उपयोग नहीं करूंगा । हमारे यहां सवाल यह नहीं है कि हमारे गांवों में जो लाखों-करोड़ों आदमी पड़े हैं उन्‍हें परिश्रम की चक्‍की से निकालकर किस तरह छुट्टी दिलाई जाय, बल्कि यह है कि उन्‍हें साल में जो कुछ महीनों का समय यों ही बैठे-बैठे आलस में बिताना पड़ता है उसका उपयोग कैसे किया जाय । कुछ लोगों को मेरी यह बात शायद विचित्र लगेगी, पर दरअसल बात यह है कि उनकी रोजी पर ये मायविनी मिले छापा मार रही हैं । मैंने बारीकी से आंकड़े एकत्र नहीं किये हैं, पर इतना तो मैं कह ही सकता हूं कि गांवों में बैठकर कम-से-कम दस मजदूर तिजना काम करते हैं उतना ही काम मिल का एक मजदूर करता हैं । इसे यों भी कह सकते हैं कि दस आदमियों की रोजी छीनकर यह एक आदमी गांव में जितना कमाता था उससे कहीं अधिक कमा रहा है । इस तरह कताई और बुनाई की मिलों ने गांवों के लोगों की जीविका क एक बड़ा भारी साधन छीन लिया हैं ।

ऊपर की दलील का यह कोई जवाब नहीं है कि ये मिलें जो कपड़ा तैयार करती हैं वह अधिक अच्‍छा और काफी सस्‍ता होता है । कारण यह है कि इन मिलों ने अगर हजारों मजदूरों का धंधा छीनकर उन्‍हें बेकार बना दिया है, तो सस्‍ते-से-सस्‍ता मिल का कपड़ा गांवों की बनी हुई महंगी-से-महंगी खादी से भी ज्‍यादा महंगा है । कोयले की खान में काम करने वाले मजदूर जहां रहते हैं वही वे कोयले का उपयोग कर सकते है, इसलिए उन्‍हें कोयला महंगा नहीं पड़ता । इसी तरह जो ग्रामवासी अपनी जरूरत भर के लिए खुद खादी बना लेता है, उसे वह महंगी नहीं पड़ती। पर मिलों का बना कपड़ा अगर गांवों के लोगों को बेकार बना रहा है, तो चावल कुटने और आटा पीसने की मिलें हजारों स्त्रियों की न केवल रोजी ही छीन रही हैं, बल्कि बदले में तमाम जनता के स्‍वास्‍थ्‍य को हानि भी पहुंचा रही हं। जहां लोगों को मांस खाने में कोई आपत्ति न हो और जहां मांसाहार परसाता हो, वहां मैदा और पॉलिशदार चावल से शायद हानि न होती हो। लेकिन हमारे देश में, जहां करोड़ो आदमी ऐसे हैं जो मांस मिले तो खाने में आपत्ति नहीं करेंगे, पर जिन्‍हें मांश मितला ही नहीं, उन्‍हें हाथ की चक्‍की के पिसे हुए गेहूं के आटे और हाथ-कुटे चावल के पौष्टिक तथा जीवनप्रद तत्‍वों से वंचित रखना एक प्रकार का पाप है। इसलिए डॉक्‍टरों तथा दूसरे आहार-विशेषज्ञों को चाहिये कि मैदे और मिल के कुटे पॉलिशदार चावल से लोगों के स्‍वास्‍थ्‍य की जो हानि हो रही है उससे वे जनता को अगाह कर दें।

मैंने सहज ही नजर में आने वाली जो कुछ मोटी-मोटी बातों की तरफ यहां ध्‍यान खींचा है, उसका उद्देश्‍य यही है कि अगर ग्रामवासीयों को कुछ काम देना है तो वह यंत्रो के द्वारा संभव नहीं। उनके उद्धार का सच्‍चा मार्ग तो यही है कि जिन उद्दोग-धंधों को वे अब तक किसी कदर करते चले आ रहें हैं, उन्‍हीं को भलीभांति जीवित किया जाय। (1)

ग्रामोद्दोगों की योजना के पीछे मेरी कल्‍पना तो यह है कि हमें अपनी रोजमर्रा की आवश्‍यकतायें गांवों की बनी चीजों से ही पूरी करनी चाहिये; और जहां यह मालूम हो कि अमुक चीजें गांवों में मिलती ही नहीं, वहां हमे यह देखना चाहिये कि उन चीजों को थोड़े परिश्रम और संगठन से बनाकर गांव वाले उनसे कुछ मुनाफा उठा सकते हैं या नहीं। मुनाफे का अंदाज लगाने में हमें अपना नहीं किन्‍तु गांवा वालों का खयाल रखना चाहिये। संभव है कि शुरू में हमें साधारण भाव से कुछ अधिक देना पड़े और चीज हल्‍की मिले। पर अगर हम उन चीजों के बनाने वालों के काम में रस लें और यह आग्रह रखें कि वे बढि़या-से-बढि़या चीजें तैयार करें, और सिर्फ आग्रह ही नहीं रखें बल्कि उन लोगों को पूरी मदद भी दें, तो यह हो न‍हीं सकता कि गांवों की बनी चीजों में दिन-दिन तरक्‍की न होती जाय। (2)

मैं कहूंगा कि अगर गांवों का नाश होता है तो भारत का भी नाश हो जायेगा। उस हालत में भारत भारत नहीं रहेगा। दुनिया को उसे जो संदेश देना है उस संदेश को वह खो देगा।

गांवों में फिर से जान तभी आ सकती है, जब वहां कि लूट-खसोट रूक जाय। बड़े पैमाने पर माल की पैदावार जरूर ही व्‍यापारिक प्रतिस्‍पर्धा तथा माल निकालने की धुन के साथ-सा‍थ गांवों की प्रत्‍यक्ष अथवा अप्रत्‍यक्ष रूप से होने वाली लूट के जिम्‍मेवार है। इसलिए हमें इस बात की सबसे ज्‍यादा कोशिश करनी चाहिये कि गांव हर बात में स्‍वावलम्‍बी और स्‍वयंपूर्ण हो जायं। वे अपनी जरूरतें पूरी करने भर के लिए चीजें तैयार करें। ग्रामोद्दोग के इस अंग की अगर अच्‍छी तरह रक्षा की जाय, तो फिर भले ही देहाती लोग आजकल के उन यंत्रों और औजारों से भी काम ले सकते हैं, जिन्‍हें वे बना और खरीद सकते हैं। शर्त सिर्फ यही है कि दूसरों को लूटने के लिए उनका उपयोग नहीं होना चाहिये। (3)

सच तो य‍ह कि हमें गांवों वाला भारत और शहरों वाला भारत, इन दो में से एक को चुन लेना है। गांव उतने ही पुराने है जितना कि यह भारत पुराना है। शाहरों को विदेशी आधिपत्‍य ने बनाया है। जब यह आधिपत्‍य मिट जायेगा, तब शहरों को गांवों के मातहत होकर रहना पड़ेगा। आज तो शहरों का बोलबाला है और वे गांवों की सारी दौलत खींच लेते हैं। इससे गांवों का हा्स और नाश हो रहा है। गांवों का शोषण खुद एक संगठित हिंसा है। अगर हमें स्‍वराज्‍य की रचना अहिंसा के पाये पर करनी है, तो गांवों को उनका उचित स्‍थान देना होगा। (4)

खादी

मेरे विचार में खादी हिस्‍दुस्‍तान की समस्‍त जनता की एकता की, उनकी आर्थिक स्‍वतंत्रता और समानता की प्रतीक है, और इसलिए जवाहरलाल के काव्‍यमय शब्‍दों में कहूं तो वह ‘हिन्‍दुस्‍तान की आजादी की पोशाक’ है।

इसके सिवा, खादीवृत्ति का अर्थ है, जीवन के लिए जरूरी चीजों की उत्‍पत्ति और उनके बंटवारे का विकेन्‍द्रीकरण। इसलिए अब तक जो सिद्धांत बना है वह यह है कि हर एक गांव को अपनी जरूरत की सब चीजें खुद पैदा कर चाहियें, और शहरों की जरूरतें पूरी करने के लिए कुछ अधिक उत्‍पत्ति करनी चाहिये।

अलबत्‍ता, बड़े-बड़े उद्दोग-धंधों को तो एक जगह केन्द्रित करके राष्‍ट्र के अधीन रखना होगा। लेकिन समूचा देश मिलकर गांवों में जिन बड़े-बड़े आर्थिक उद्दोगों को चलायेगा, उनके सामने ये कोई चीज न रहेंगे।

खादी के उत्‍पादन में ये काम शामिल हैं- कपास बोना, कपास चुनना, उसे झाड़-झटक कर साफ करना और ओटना, रूई पींजना, पूनी बनाना, सूत कातना, सूत को मांड़ लगाना, सूत रंगना, उसका ताना भरना और बाना तैयार करना, सूत बुनना और कपड़ा धोना। इनमें से रंगसाजी को छोड़कर बाकी के सारे काम खादी के सिलसिले में जरूरी और महत्‍व के हैं, और उन्‍हें किये बिना काम नहीं चल सकता। इनमें से हर एक काम गांवों में अच्‍छी तरह हो सकता है; और सच तो यह है कि अखिल भारत चरखा-संघ समूचे हिन्‍दुस्‍तान के जिन कई गांवों में काम कर रहा है, वहां ये सारे काम आज हो रहे हैं।

जब से गांवों में चलने वाले अनेक उद्दोगों में से इस मुख्‍य उद्दोगों का और इसके आस-पास जुड़ी हुई कई दस्‍तकारियों का बिना सोचे-समझे, मनमाने तरीके से और बेरहमी के साथ नाश किया गया है, तब से हमारे गांवों की बुद्धि और तेज नष्‍ट हो गया है। वे सब निस्‍तेज और निष्‍प्राण बन गये हैं, और उनकी हालत उनके अपने भूखों मरने वाले मरियल ढोरों की-सी हो गई है। (5)

दूसरे ग्रामोद्योग

खादी के मुकाबले देहात में चलने वाले और देहात के लिए जरूरी दूसरें धन्‍धों की बात अलग है। उन सब धन्‍धों में अपनी राजी-खुशी से मजदूरी करने की बात उपयोगी होने जैसी नहीं है। फिर उनमें से हर एक धन्‍धा या उद्दोग ऐसा है, जिसमें एक खास तादात में ही लोगों को मजदूरी मिल सकती है। इसलिए ये उद्दोग खादी के मुख्‍य काम में सहायक हो सकते हैं। खादी के अभाव में उनकी कोई हस्‍ती नहीं, और उनके बिना खादी का गौरव सा शोभा नहीं है। हाथ से पीसना, हाथ से कूटना और पछोरना, साबुन बनाना, कागज बनाना, चमड़ा कमाना, तेल पेरना और इस तरह के साजाजिक जीवन के लिए जरूरी और महत्‍व के दूसरे धन्‍धों के बिना गांवों की आर्थिक रचना संपूर्ण नहीं हो सकती, यानी गांव स्‍वयंपूर्ण घटक नहीं बन सकते। कांग्रेसी इन सब धन्‍धों में दिलचस्‍पी लेगा, और अगर वह गांव का बाशिन्‍दा होगा या गांव में जाकर रहता होगा, तो इन धन्‍धों में नयी जान फूंकेगा और इन्‍हें नये रास्‍ते ले जायेगा। हर एक आदमी को, हर हिन्‍दुस्‍तानी को, इसे अपना धर्म समझना चाहिये कि जब-जब और जहां-जहां मिले, वहां वह हमेशा गांवों की बनी चीजें ही बरते। अगर ऐसी चीजों की मांग पैदा हो जाय, तो इसमें जरा भी शक नहीं कि हमारी ज्‍यादातर जरूरतें गांवों से पूरी हो सकती हैं। जब हम गांवों के लिए सहानुभूति से सोचने लगेंगे और गांवों की बनी चीजें हमें पसन्‍द आने लगेंगी, तो पश्चिम की नकल के रूप में यंत्रों की बनी चीजें हमें नहीं जंचेंगी; और हम ऐसी राष्‍ट्रीय अभिरूचि का विकास करेंगे, जो गरीबी, भुखमरी और आलस्‍य या बेकारी से मुक्‍त नये हिन्‍दुस्‍तान के आदर्श के साथ मेल खाती होगी।

मिश्र खाद

भारत की जनता इस प्रयत्‍न में खुशी से सहयोग करे, तो यह देश न सिर्फ अनाज की कमी को पुरा कर सकता है, बल्कि हमें जितना चाहिये उससे कहीं ज्‍यादा अनाज पैदा कर सकता है। यह जीवित खाद (आरगेनिक मैन्‍युर) जमीन के उपजाऊपन को हमेशा बढ़ाता ही है, कभी कम नहीं करता। हर दिन जो कूड़ा-कचरा इकठ्टा होता है उसे ठीक विधि के अनुसार गठ्डों में इकठ्टा किया जाय, तो उसका सुनहला खाद बन जाता है; और तब उसे खेत की जमीन में मिला दिया जाय तो उससे अनाज की उपज कई गुनी बढ़ जाती है और फलत: हमें करोड़ों रूपयों की बचत होती है। इसके सिवा कूड़े-कचरे का इस तरह खाद बनाने के लिए उपयोग कर लिया जाय, तो आस-पास की जगह साफ रहती है। और स्‍वच्‍छता एक सदगुण होने के साथ-साथ स्‍वास्‍थ्‍य की पोषक भी है।

गांवों में चमड़े का धन्‍धा

हमारे गांवों का चमड़े का धन्‍धा उतना ही प्राचीन है जितना कि स्‍वयं भारतवर्ष। यह कोई न‍हीं बतला सकता कि चमड़ा कमाने का यह धंधा कब अनादर की चीज समझा जाने लगा। प्राचीन काल में तो यह बात हुई नहीं होगी। लेकिन हमजानते है कि आज हमारे यहां के इस अत्‍यन्‍त जरूरी और उपयोगी उद्दोग ने संभवत: दस लाख आदमियों की पुश्‍तैनी अछूत बना दिया है। वह कुदिन ही होगा जिस दिन से इस अभागे देश में परिश्रम को लोग घृणा की दृष्टि से देखने लगे होंगे और इस प्रकार उसकी उपेक्षा करने लगे होंगे। लाखों-करोड़ों मनुष्‍य, जो दुनिया के हीरे थे और जिनके उद्दोध पर यह देश जी रहा था, नीच समझे जाने लग। और ऊपर से बड़े दिखने वाले थोड़े से अहदी आदमियों का वर्ग प्रतिष्ठित समझा जाने लगा। इसका दु:खद परिणाम यह हुआ कि भारत को नैतिक और आर्थिक दोनों ही प्रकार की भारी क्षति पहुंची। यह हिसाब लगाना असंभव नहीं तो कठिन जरूर है कि इन दोनों में से कौन-सी हानि बड़ी थ‍ी। किन्‍तु किसानों और कारीगरों के प्रति बताई गई इस अपराध पूर्ण लपरवाही ने हमें दरिद्र, मूढ़ और काहिल बनाकर ही छोड़ा। भारत के पास कौन से साधन नहीं हैं? उसका सुन्‍दर जलवायु, उसके गगनचुम्‍बी पर्वत, उसकी विशाल नदियां और उसका विस्‍तृत समुद्र-ये सब ऐसे असीम साधन हैं कि अगर इन सबका पूरा-पूरा उपयोग किया जाय, तो इस स्‍वर्ण देश में दारिद्र्य और रोग आयें ही क्‍यों? पर जब से हमने शारीरिक श्रम से बुद्धि का सम्‍बन्‍ध छुड़ाया, तब से हमारी कौम का सब तरह से पतन हो गया; दुनिया में आज हम सबसे अल्‍पजीवी, निपट साधनहीन और अत्‍यन्‍त पराजित प्रजा माने जाते हैं। चमड़े के देशी धंधे की आज जो हालत है, वह शायद मेरे इस कथन का सबसे अच्‍छा सबूत है।

हिसाब लगाकर देखा गया है कि नौ करोड़ रूपये का कच्‍चा चमड़ा हर साल हिन्‍दुस्‍तान से बाहर जाता है और वह सबका सब बनी-बनाई चीजों के रूप में फिर यहां वापस आ जाता है। यह देश का सिर्फ आर्थिक ही नहीं बौद्धिक शोषण भी है। चमड़ा कमाने और अपने नित्‍य के उपयोग में आने वाली उसकी अनगिनत चीजें बनाने की शिक्ष हमें आज कहां मिल रही है ?

यहां शत-प्रतिशत स्‍वदेशी-प्रेमी के लिए काफी काम पड़ा हुआ है। साथ ही एक बहुत बड़े सवाल को हल करने में जिस वैज्ञानिक ज्ञान की आवश्‍यकता है उसे काम में लाने का क्षेत्र भी मौजुद है। इस एक से तीन अर्थ सधते हैं। एक तो इससे हरिजनों की सेवा होती है; दूसरे ग्रामवासियों की सेवा होती है; और तीसरे मध्‍यमवर्ग के जो बुद्धिशाली लोग रोजगार-धन्‍धे की खोज में बेकार फिरते हैं, उन्‍हें जीविका का एक प्रतिष्ठित साधन मिल जाता है। और यह लाभ तो जुदा ही है कि गांव की जनता के सीधे संसर्ग में आने का भी उन्‍हें सुन्‍दर अवसर मिलता है।

आरंभ कैसे करे ?

बहुत से सज्‍जन तो पत्र लिख-लिखकर और अनेक मित्र खुद मुझसे मिलकर यह प्रश्‍न पूछ रहें हैं कि किस प्रकार हम ग्रामोद्दोग-कार्य का आरंभ करें और सबसे पहले किस चीज को हाथ में लें।

इसका स्‍पष्‍ट उत्‍तर तो यही है कि ” इस कार्य का श्रीगणेश आप खुद ही करें, और सबसे पहले उसी काम को हाथ में लें, जो आपको आसान-से-आसान जान पड़े।”

पर इस सूत्रात्‍मक उत्‍तर से पूछताछ करने वालों को संतोष थोड़े ही होता है। इसलिए इसे मैं जरा और स्‍पष्‍ट कर दूं।

हममें से हर एक आदमी खाने-पीने, पहनने-ओढ़ने और अपने नित्‍य के उपयोग की चीजों को जांच-परख सकता है, और विलायती अथवा शहर की बनी चीजों की जगह ग्रामवासियों की बनाई हुई उन चीजों को काम में ला सकता है, जिन्‍हें कि वे अपनी मढ़ैया में या खेत-खलिहान में चार-छह पैसे के मामूली औजारों से सहज ही तैयार कर सकते हैं। इन औजारों को वे लोग आसानी से चला सकते हैं और बिगड़ जाये तो उन्‍हें सुधार भी सकते हैं। विदेशी या शहर की बनी चीजों की जगह गांवों की बनी चीजों को आप काम में लाने लगें, तो ग्रामोद्दोग-कार्य का यह बड़ा अच्‍छा आरंभ होगा, और आपके लिए यह खुद ही एक बड़े महत्‍व की चीज होगी। इसके बाद फिर क्‍या करना होगा, यह तो आप ही मालूम हो जायेगा। मान लीजिये कि आज तक कोई आदमी बंबई के किसी कल-कारखाने में बने टूथब्रश से दांत साफ करता आ रहा है। अब उसकी जगह वह गांव का बना टूथब्रश चाहता है। तो उसे बबूल या नीम की दातौन से दांत साफ करने की सलाह दें। अगर उसके दांत कमजोर है या दांत हैं ही नहीं, तो वह दातौन का एक सिरा तो लोढ़ी या हथैड़ी से कुचल ले और दूसरे सिरे को चीरकर उसकी फांको से जीभी का काम ले। दातौन का यह ब्रश सस्‍ता भी काफी पड़ेगा और कारखानों के बने हुए अस्‍वच्‍छ ब्रशों से स्‍वच्‍छ भी अधिक होगा। शहरों के बने दंत-मंजनों को वह छुएगा ही नहीं। वह तो लकड़ी के कोयले को खूब महीन पीसकर और उसमें थोड़ा-सा साफ नमक मिलाकर अपने घर में ही बढि़या मंजन तैयार कर लेगा। मिल के बने कपड़े के बजाय वह गांव की बुनी खादी पहनेगा, मिल के दले चावल की जगह हाथ के दले बिना पॉलिस किये चावल का और सफेद शक्‍कर के स्‍थान पर गांव के बने गुड़ का उपयोग करेगा। इन चीजों को मैंने यहां बतौर नमूने के ही दिया है और इनकी चर्चा यद्यपि मैं ‘हरिजन सेवक’ में पहले कर चुका हूं, तो भी इस विषय पर मेरे साथ जिन लोगों की लिखा-पढ़ी या बातचीत चल रही है, उनकी बताई हुई कठिनाइयों को दृष्टि में रखकर मैंने पुन: खादी, चावल और गुड़ का यहां उल्‍लेख किया है।

ईमेल से पढ़ें(सब्सक्राइब करें):

Web Designing and Development

अनुक्रमणिका

हमारे बारे में

"मेरे सपनों का भारत" विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में महात्मा गांधी द्वारा लिखे गए लेखों का संकलन है। इस पुस्तक को आनलाइन लाने का उद्देश्य नई पीढ़ी को महात्मा गांधी के विचारों से अवगत कराना है।
पुस्तक को आनलाइन लाने का कार्य अभी जारी है। यदि आपको इसमें कोई त्रुटि दिखाई पड़े या कोई सुझाव हों तो हमें ईमेल द्वारा सूचित कर सकते हैं।

हम और भी पुस्तकों को आनलाइन लाना चाहते हैं। अत:जो लेखक/प्रकाशक/ट्रस्ट/संस्थाएं इस कार्य में सहयोग प्रदान करना चाहें हमसे इस पते पर संपर्क कर सकते हैं:

ईमेल : admin (at) antarjaal (dot) in

मेरे सपनों का भारत (कापीराइट नवजीवन ट्रस्ट, अहमदाबाद)