२७. सरकार क्या कर सकती है?
यह पूछना जायज है कि कांग्रेसी मंत्री, जो अब ओहदों पर आ गये हैं, खद्दर और दूसरे देहाती धंधों के लिए क्या करेंगे? मैं तो इस सवाल को और भी फैलाना चाहता हूं, ताकि यह हिन्दुस्तान के तमाम सूबों की सरकारों पर लागू हो। गरीबी तो हिन्दुस्तान के तमाम सूबों में फैली हुई है। इसी तरह आम जनता के उद्धार के जरिये भी वहां हैं। अखिल भारत चरखा-संघ और ग्रामोद्योग-संघ का ऐसा ही अनभव है। एक यह तजबीज भी आयी है कि इस काम के लिए एक अलग मंत्री होना चाहिये। क्योंकि इसके ठीक संगठन में एक मंत्री का पूरा समय लग जायेगा। मैं तो इस तजबीज से डरता हूं, क्योंकि अभी तक हम अपने खर्च के नाप में से अग्रेजी पैमाने को छोड़ नहीं सके हैं। चाहे अलग मंत्री रखा जाय या न रखा जाय, इस काम के लिए एक महकमा को बेशक जरूरी है। आजकल खाने और पहनने के संकट के जमाने में यह महकमा बड़ी मदद कर सकता है। अखिल भारत चरखा-संघ और अखिल भारत ग्रामोद्दोग-संघ के विशेषज्ञ मंत्रियों से मिल सकते हैं। आज यह संभव है कि थोड़े समय में थोड़ी-से-थोड़ी रकम लगाकर सारे हिन्दुस्तान को खादी पहना दी जाय। हर प्रान्त की सरकार को गांववालों से कहना होगा कि उनको अपने उपयोग के लिए अपनी खादी आप तैयार कर लेनी चाहिये। इस तरह अपने-आप स्थानीय उत्पादन और बटवारा हो जायेगा। और बेशक शहरों के लिए कम-से-कम कुछ जरूर बच रहेगा, जिससे स्थानीय मिलों पर दबाव कम हो जायेगा। तब ये मिले दुनिया के दूसरे हिस्सों में कपड़े की जरूरत पूरी करने में हिस्सा लेने योग्य हो जायेगी। यह नतीजा कैसे पैदा किया जा सकता है?
सरकारों को चाहिये कि गांव वालों को यह सूचना कर दें कि उनसे यह आशा रखी जायेगी कि वें अपने गांव की जरूरतों के लिए एक निश्चित तारीख के अंदर खादी तैयार करें। इसके बाद उनको कोई कपड़ा नहीं दिया जायेगा। सरकार अपनी तरफ से गावंवालों को बिनौले या रूई (जिसकी भी जरूरत हो) दाम के दाम देगी और उत्पादन के औजार भी ऐसे दामों पर देगी, जो आसानी से वसूल होने वाली किस्तों में लगभग पांच साल या इससे भी ज्यादा में अदा हो सकें। सरकार जहां कही जरूरी हो उन्हें सिखाने वाले भी दे और यह जिम्मा ले कि अगर गांववालों के पास उनकी तैयार की हुई खादी से उनकी जरूरतें पूरी हो जायं, तो फालतू खादी सरकार खरीद लेगी। इस तरह बिना हलचल के और बहुत थोड़े ऊपरी खर्च के साथ कपड़े की कमी दूर हो जायेगी।
गांवों की जांच-पड़ताल की जायेगी और ऐसी चीजों की एक यादी तैयार ही जायेगी जो किसी मदद के बिना या बहुत थोड़ी मदद से स्थानीय स्तर पर तैयार हो सकती हैं और जिनकी जरूरत गांव में बरतनें के लिए या बाहर बेचने के लिए हो। जैसे, घानी का तेल, घानी की खली, घानी से निकला हुआ जलाने का तेल, हाथ का कूटा हुआ चावल, ताड़ी का गुड़, शहद, खिलौने, मिठाइया, चटाइयां, हाथ से बना हुआ कागज, गांव का साबुन वगैरा चीजें। अगर इस तरह काफी ध्यान दिया जाय तो उन गांवों में, जिनमें से ज्यादातर उजड़ चुके हैं या उजड़ रहे हैं, जीवन की चहल-पहल पैदा हो जाय और उनमें अपनी और हिन्दुस्तान के शहरों और कस्बों की बहुत ज्यादा जरूरतें पूरी करने की जो ज्यादा-से-ज्यादा शक्ति है वह दिखाई पड़ने लगे।
फिर हिन्दुस्तान में अनगिनत पशुधन है, जिसकी तरु हमने ध्यान न देकर गुनाह किया है। गोसेवा-संघ को अभी ठीक अनुभव नहीं है, फिर भी वह कीमती मदद दे सकता है।
बुनियादी तालीम के बिना गांववाले विद्या से वंचित रहते हैं। यह जरूरी बात हिन्दुस्तानी तालीमी संघ पूरी कर सकता हैं।
अनुक्रमणिका
- १. मेरे सपनो का भारत
- २. स्वराज्य का अर्थ
- ३. राष्ट्रवाद का सच्चा स्वरूप
- ४. भारतीय लोकतंत्र
- ५. भारत और समाजवाद
- ६. भारत और साम्यवाद
- ७. उद्योगवाद का अभिशाप
- ८. वर्गयुध्द
- ९. हड़ताल
- १०. मज़दूर क्या चुनेंगे?
- ११. अधिकार या कर्तव्य ?
- १२. बेकारी का सवाल
- १३. दरिद्र-नारायण
- १४. शरीर-श्रम
- १५. सर्वोदय
- १६. संरक्षता का सिद्धांत
- १७. अहिंसक अर्थ-व्यवस्था
- १८. सामान वितरण का रास्ता
- १९. भारत में अहिंसा की उपासना
- २०. सर्वोदयी राज्य
- २१. सत्याग्रह और दुराग्रह
- २२. किसान
- २३. गांवों की ओर
- २४. ग्राम-स्वराज्य
- २५. पंचायत राज
- २६. ग्रामोद्योग
- २७. सरकार क्या कर सकती है?
- २८. ग्राम-प्रदर्शनियां
- २९. चरखे का संगीत
- ३०. मिल-उद्योग
- ३१. स्वदेशी
- ३२. गोरक्षा
- ३३. सहकारी गो पालन
- ३४. गांवों की सफाई
- ३५. गांव का आरोग्य
- ३६. गांवों का आहार
- ३७. ग्राम सेवक
- ३८. समग्र ग्राम सेवा
- ३९. युवकों को आह्वान
- ४०. राष्ट्र का आरोग्य, स्वच्छता और आहार
- ४१. शराब और अन्य मादक द्रव्य
- ४२. शहरों की सफाई
- ४३. विदेशी माध्यम की बुराई
- ४४. मेरा अपना अनुभव
- ४५. भारत की सांस्कृतिक विरासत
- ४६. नई तालीम
- ४७. बुनियादी शिक्षा
- ४८. उच्च शिक्षा
- ४९. शिक्षा का आश्रमी आदर्श
- ५०. राष्ट्रभाषा और लिपि
- ५१. प्रान्तीय भाषायें
- ५२. दक्षिण में हिन्दी
- ५३. विद्यार्थियों के लिए अनुशासन के नियम
- ५४. भारतीय स्त्रियों का पुनरूत्थान
- ५५. स्त्रियों की शिक्षा
- ५६. संतति-नियमन
- ५७. काम-विज्ञान की शिक्षा
- ५८ (……..)
- ५९. साम्प्रदायिक एकता
- ६०. वर्णाश्रम धर्म
- ६१. अस्पृश्यता का अभिशाप
- ६२. भारत में धार्मिक सहिष्णुता
- ६३. धर्म – परिवर्तन
- ६४. (…)
- ६५. प्रान्तों का पुनर्गठन
- ६६. अल्पसंख्यकों की समस्यायें
- ६७. भारतीय गवर्नर
- ६८. समाचार-पत्र
- ६९. शान्ति सेना
- ७०. भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस
- ७१. भारत पाकिस्तान और काश्मीर
- ७२. भारत में विदेशी बस्तियां
- ७३. भारत और विश्वशांति
- ७४. पूर्व का संदेश
- ७५. स्फूट वचन
