२८. ग्राम-प्रदर्शनियां

अगर हम यह चाहते हैं और मानते हैं कि गांवों को न केवल जीवित रहना चाहिये, बल्कि उन्‍हें बलवान तथा समृद्ध बनाना चाहिये, तो हमारे दृष्टिकोण में गांव की ही प्रधानता होनी चाहिये। और यदि यह सही हो तो फिर हमारी प्रदर्शनियों में शहरों की तड़क-भड़क के लिए कोई जगह न‍हीं हो सकती। शहरी खेलों या मनोरंजनों की भी कोई जरूरत नहीं। हम अपनी प्रदर्शनी को ‘तमाशे’ का रूप नहीं दे सकते, और न उसे आय का साधन ही बना सकते हैं। उसे व्‍यापारियों के लिए उनके माल का विज्ञापन करने वाला साधन भी नहीं बनने देना चाहिये। वहां किसी तरह की बिक्री नहीं होनी चाहिये। खादी और ग्रामोद्योगों की बनी चीजें भी वहां नहीं बिकनी चाहिये। प्रदशनी को शिक्षा का माध्‍यम होना चाहिये, उसे आकर्षक होना चाहिये और ऐसा होना चाहिये जिसे देखकर गांववालों को कोई ग्रामोद्योग सीखने और चलाने की प्रेरणा मिले। उसे मौजुदा ग्राम-जीवन की त्रुटियां और कमियां दिखानी चाहिये और उन्‍हें सुधारने के उपाय बताने चाहिये। उसे यह भी बताना चाहिये कि जब ग्राम-सुधार के इस आन्‍दोलन का आरम्‍भ हुआ तब से आज तक इस दिशा में क्‍या-क्‍या किया जा चुका है। उसे यह भी सिखाना चाहिये कि ग्राम-जीवन को सुन्‍दर और कलामय कैसे बनाया जा सकता है।

अब हम देखें कि यदि ये सब शर्ते पूरी की जायें तो प्रदर्शनी का रूप क्‍या होगा:

1. गांवों के दो तरह के नमूने दिखाये जायं- एक तो जैसे वे आज हैं उसका और दूसरा सुधरा हुआ, जैसा कि हम उसे बनाना चाहते हैं। सुधरा हुआ गांव एकदम साफ-सुथरा होगा। उसके घर, गलियां और सड़कें, आस-पास की जमीन और खेत, सब स्‍वच्‍छ होंगे। मवेशियों की हालत भी आज से बेहतर होगी। किताबों, नक्‍शों और तरूवीरों के द्वारा यह दिखाना चाहिये कि किन उद्योगों से ज्‍यादा आय हो सकती है और कैसे।

2. उसे यह जरूर बताना चाहिये कि विविध ग्रामोद्योग कैसे चलाये जायें, उनके जरूरी औजार कहां से मिल सकते हैं, और उन्‍हें कैसे बनाया जा सकता है। हर एक उद्योग की कार्य-प्रणाली प्रत्‍यद्वा करके दिखाई जानी चाहिये। इनके सिवा नीचे लिखी बातें भी रहनी चाहिये:

(क) आदर्श ग्राम-आहार
(ख) ग्रामोद्योगों और यंत्र-उद्योगों की तुलना
(ग) पशु-पालन की आदर्श शिक्षा
(घ) कला-विभाग
(ड) ग्रामीण पाखाने का आदर्श नमूना
(च) खेतों से मिलने वाले, यानी कूड़ा-कचरा और गोबर के योग से बनने वाले, खाद और रासायनिक खाद की तुलना
(छ) मवेशियों के चमड़े और उनकी हड्डियों आदि का उपयोग
(ज) ग्रामीण संगीत, ग्रामीण वाद्य और ग्रामीण नाटक
(झ) ग्रामीण खेल, अखाड़े और शारीरिक व्‍यायाम के प्रकार
(झ) नयी तालीम
(ट) ग्रामीण दवाइयां
(ठ) ग्रामीण प्रसूति-गृह

लेख के आरंभ में बताई गई नीति को ध्‍यान में रखकर इस सूचि में रखकर इस सूची में और वृद्धि की जा सकती है। मैंने जो कुछ बताया है वह केवल मार्ग-दर्शन के लिए है। उसमें सब आ गया है, ऐसी बात नहीं है। मैंने चरखे की और दूसरे ग्रामोद्योगों की चर्चा नहीं की है, क्‍योंकि उनकी आवश्‍यकता तो अब एक जानी-मानी चीज़ हो गयी है। उनके बिना प्रदर्शनी एकदम व्‍यर्थ होगी। (1)

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"मेरे सपनों का भारत" विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में महात्मा गांधी द्वारा लिखे गए लेखों का संकलन है। इस पुस्तक को आनलाइन लाने का उद्देश्य नई पीढ़ी को महात्मा गांधी के विचारों से अवगत कराना है।
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