२. स्वराज्य का अर्थ

स्वराज्य एक पवित्र शब्द है; वह एक वैदिक शब्द है, जिसका अर्थ आत्म-शासन और आत्म-संयम है। अंग्रेजी शब्द ‘ इंडिपेंडेन्स ‘ अक्सर सब प्रकार की मर्यादाओं से मुक्त निरंकुश आजादी का या स्वच्छंदता का अर्थ देता है; वह अर्थ स्वराज्य शब्द में नही है।1

स्वराज्य से मेरा अभिप्राय है लोक-सम्मति के अनुसार होने वाला भारतवर्ष का शासन। लोक-सम्मति का निश्चय देश के बालिग लोगों की बडी-से-बडी तादाद के मत के जरिये हो, फिर वो चाहे स्त्रियां हो या पुरूष, इसी देश के हो या इस देश में आकर बस गये हों। वे लोग ऐसे हों जिन्होने अपने शारीरिक श्रम के द्वारा राज्य की कुछ सेवा की हो और जिन्होने मतदाताओं की सूची में अपना नाम लिखवा लिया हो।…… सच्चा स्वराज्य थोड़े लोगो के द्वारा सत्ता प्राप्त कर लेने से नही, बल्कि जब सत्ता का दुरूपयोग होता हो तब सब लोों के द्वारा उसका प्रतिकार करने की क्षमता प्राप्त करके हासिल किया जा सकता है। दूसरे शब्दों में, स्वराज्य जनता में इस बात का ज्ञान पैदा करके प्राप्त किया जा सकता है कि सत्ता पर कब्जा करने और उसका नियमन करने की क्षमता उसमें है।2

आखिर स्वराज्य निर्भर करता है हमारी आंतरिक शक्ति पर, बडी-से-बडी कठिनाइ्रयों से जूझने की हमारी ताकत पर। सच पूछो तो वह स्वराज्य, जिसे पाने के लिए अनवरत प्रयत्न और बचाये रखने के लिए सतत् जागृति नही चाहिये, स्वराज्य कहलाने के लायक ही नही है। जैसा कि आपको मालूम है, मैने वचन और कार्य से यह दिखलाने की कोशिश् की है कि स्त्री-पुरूषो के विशाल समूह का राजनीतिक स्वराज्य एक-एक शख्स के अलग-अलग स्वराज्य से कोई ज्यादा अच्छी चीज नही है, और इसलिए उसे पाने का तरीका वही है जो एक-एक आदमी के आत्म-स्वराज्य या आत्म-संयम का है।3

स्वराज्य का अर्थ है सरकारी नियंत्रण से मुक्त होने के लिए लगातार प्रयत्न करना, फिर वह नियंत्रण विदेशी का हो या स्वदेशी का। यदि स्वराज्य हो जाने पर लोग अपने जीवन की हर छोटी बात के नियमन के लिए सरकार का मुंह ताकना शुरू कर दें तो वह स्वराज्य-सरकार किसी काम की नहीं होगी।4

मेरा स्वराज्य तो हमारी सभ्यता की आत्मा को अक्षुण्ण रखना है। मैं बहुतसी नई चीजें लिखना चाहता हूं, परंतु वे तमाम हिंदुस्तान की स्लेट पर लिखी जानी चाहिये। हां, मैं पश्चिम से भी खुशी से उधार लूंगा, पर तभी जब कि मैं उसे अच्छे सूद के साथ वापस कर सकूं।5

स्वराज्य की रक्षा केवल वहीं हो सकती है, जहां देशवासियों की ज्यादा बड़ी संख्या ऐसे देशभक्तों की हो, जिनके लिए दूसरी सब चीजांे से-अपने निजी लाभ से भी -देश की भलाई का ज्यादा महत्व हो। स्वराज्य का अर्थ है देश की बहुसंख्यक जनता का शासन। जाहिर है कि जहां बहुसंख्यक जनता नीति-भ्रष्ट हो या स्वार्थी हो, वहां उसकी सरकार अराजकता की ही स्थिति पैदा कर सकती है, दूसरा कुछ नहीं।6

मेरे…….हमारे……..सपनों के स्वराज्य में जाति (रेस) या धर्म के भेदों का कोई स्थान नहीं हो सकता। उस पर शिक्षितों या धनवानों का एकाधिपत्य नहीं होगा। वह स्वराज्य सबके लिए-सबके कल्याण के लिए होगा। सबकी गिनती में किसान तो आते ही हैं किंतु लूले, लंगड़े, अंधे और भूख से मरने वाले लाखों-करोड़ों मेहनतकश मजदूर भी अवश्य आते हैं।7

कुछ लोग ऐसा कहते हैं कि भारतीय स्वराज्य तो ज्यादा संख्या वाले समाज का यानी हिंदुओं का ही राज्य होगा। इस मान्यता से ज्यादा बड़ी कोई दूसरी गलती नहीं हो सकती। अगर यह सही सिद्धऋ हो तो अपने लिए मैं ऐसा कह सकता हूं कि उसे स्वराज्य मानने से इनकार कर दूंगा और अपनी सारी शक्ति लगाकर उसका विरोध करूंगा। मेरे लिए हिन्द स्वराज्य का अर्थ सब लोगों का राज्य, न्याय का राज्य है।8
अगर स्वराज्य का अर्थ हमें सभ्य बनाना और हमारी सभ्यता को अधिक शुद्ध तथा मजबूत बनाना न हो, तो वह किसी कीमत का नहीं होगा। हमारी सभ्यता का मूल तत्व ही यह है कि हम अपने सब कामों में, फिर वे निजी हों या सार्वजनिक, नीति के पालन को सर्वोच्च स्थान देते हैं। 9

पूर्ण स्वराज्य……. कहने में आशय यह है कि वह जितना किसी राजा के लिए होगा उतना ही किसान के लिए, जितना किसी धनवान जमींदार के लिए होगा उतना ही भूमिहीन खेतिहर के लिए, जितना हिंदुओं के लिए होगा उतना ही पारसियों और ईसाइयों के लिए। हमें जाति-पाति, धर्म अथवा दरजे के भेदभाव के लिए कोई स्थान नहीं होगा। 10

स्वराज्य शब्द का अर्थ स्वयं और उसकी प्राप्ति के साधन यानी सत्य और अहिंसा-जिनका पालन करने के लिए हम प्रतिज्ञाब; हैं- ऐसी किसी संभावना को असंभव सिद्ध करते हैं कि हमारा स्वराज्य किसीके लिए तो अधिक होगा और किसी के लिए कम, किसी के लिए लाभकारी होगा और किसी के लिए हानिकारी या कम लाभकारी। 11

मेरे सपने का स्वराज्य तो गरीबों का स्वराज्य होगा। जीवन की जिन आवश्यकताओं का उपभोग राजा और अमीर लोग करते हैं, वही तुम्हंे भी सुलभ होनी चाहिये, इसमें फर्क के लिए स्थान नहीं हो सकता। लेकिन इसका यह अर्थ नहीं कि हमारे पास उनके जैसे महल होने चाहिये। सुखी जीवन के लिए महलों की आवश्यकता नहीं। हमें महलांे में रख दिया जाये तो हम घबरा जायें। लेकिन तुम्हें जीवन की वे सामान्य सुविधाएं अवश्य मिलनी चाहिये, जिनका उपभोग अमीर आदमी करता है। मुझे इस बात में बिल्कुल भी संदेह नहीं है कि हमारा स्व्राज्य तब तक पूर्ण स्वराज्य नहीं होगा, जब तक वह तुम्हें ये सारी सुविधाएं देने की पूरी व्यवस्था नहीं कर देता। 12

पूर्ण स्वराज्य की कल्पना दूसरे देशों से कोई नाता न रखने वाली स्वतंत्रता की नही, बल्कि स्वस्थ और गम्भीर किस्म की स्वतंत्रता की है। मेरा राष्ट्रप्रेम उग्र तो है, पर वह वर्जनशील नही हे; उसमें किसी दूसरे राष्ट्र या व्यक्ति को नुकसान पहुंचाने की भावना नही है। कानूनी सिद्धांत असल मे नैतिक सिद्धांत ही है। ‘ अपनी संपत्ति का उपयोग इस तरह करो कि पड़ोसी की सम्पत्ति को कोई हानि नही पहुंचे।‘- यह कानूनी सिद्धांत एक सनातन सत्य को प्रकट करता है और उसमें मेरा पूरा विश्वास है।13

यह सब इस बात पर निर्भर है कि पूर्ण स्वराज्य से हमारा आशय है और उसके द्वारा हम पाना क्या चाहते है। अगर हमारा आशय यह है कि जनता में जागृति होनी चाहिये, उसे अपने सच्चे हित का ज्ञान होना चाहिये और सारी दुनिया के विरोध का सामना करके भी उस हित की सिद्धि के लिए कोशिश करने की योग्यता होनी चाहिये; और यदि पूर्ण स्वराज्य के द्वार हम सुमेल, भीतरी या बाहरी आक्रमण से रक्षा और जनता की आर्थिक स्थिति में उत्तरोत्तर सुधार चाहते हो, तो हम अपना उद्धेश्य राजनीतिक सत्त के बिना ही सत्ता में हो उन पर अपना सीधा प्रभाव डालकर, सिद्ध कर सकते है।14

स्वराज्य की मेरी कल्पना के विषय में किसी को कोई गलतफहमी नही होनी चाहिये। उसका अर्थ विदेशी नियंत्रण से पूरी मुक्ति और पूर्ण आर्थिक स्वतंत्रता है। उसके दो दूसरे उद्धेश्य भी है; एक छोर पर है नैतिक और सामाजिक उद्धेश्य और दूसरे छोर पर इसी कक्षा का दूसरा उद्धेश्य है धर्म। यहां धर्म शब्द का सर्वोच्च अर्थ अभीष्ट है। उसमें हिंदु धर्म, इस्लाम,ईसाई धर्म ंआदि सबका समावेश होता है, लेकिन वह इन सबसे ऊंचा है।… इसे हम स्वराज्य का सम-चतुभुर्ज कह सकते है; यदि उसका एक भी कोण विषम हुआ तो उसका रूप विकृत हो जायेगा।15

मेरे कल्पना का स्वराज्य तभी आयेगा जब हमारे मन में यह बात अच्छी तरह जम जाय कि हमें अपने स्वराज्य सत्य और अहिंसा के शुद्ध साधनों द्वारा ही हासिल करना है, उन्ही के द्वारा हमें उसे कायम रखना है। सच्ची लोकसत्ता या जनता का स्वराज्य कभी भी असत्यमय और हिंसक उपयों का प्रयोग किया गया, तो उसका स्वाभाविक परिणाम यह होगा कि सारा विरोध या तो विरोधियों को दबाकर या उनका नाश करके खत्म कर दिया जायेगा। ऐसी स्थ्तिी में वैयक्तिक स्वतंत्रता की रक्षा नही हो सकती। वैयक्ति स्वतंत्रता को प्रकट होन का पूरा अवकाश केवल विशुद्ध अहिंसा पर आधारित शासन में ही मिल सकता है।16
अहिंसा पर आधारित स्वराज्य में लोगो को अपने अधिकारो का ज्ञान न हो तो कोई बात नही, लेकिन उन्हे अपने कत्तर्वयो के साथ उसकी तौल का अधिकार जुड़ा हुआ होता ही है, और सच्चे अधिकार तो वे ही है जो अपने कत्र्तव्यो का योग्य पालन करके प्राप्त किये गये हों। इसलिए नागरिकता के अधिकार सिर्फ उन्ही को मिल सकते है, जो जिस राज्य में वे रहते हों उसकी सेवा करता हों। और सिर्फ वे ही इन अधिकारा के साथ पूरा न्याय कर सकते है। हर एक आदमी को झूठ बोलने ओर गुंडागिरी करने का अधिकार है, किन्तु इस अधिकार का प्रयोग उस आदमी और समाज, दोनो के लिए हानिकारक है। लेकिन जो व्यक्ति सत्य और अहिंसा का पालन करता है, उसे प्रतिष्ठा मिलती है और इस प्रतिष्ठा के फलस्वरूप उसे अधिकार मिल जाते है। और जिन लोगो को अधिकार अपने कत्र्तव्यो के पालन के फलस्वरूप मिलते है, वे उनका उपयोग समाज की सेवा के लिए ही करते है, अपने लिए कभी नही। किसी राष्ट्रीय समाज के स्वराज्य का अर्थ उस समाज के विभिन्न व्यक्तियों के स्वराज्य (अर्थात आत्म-शासन) का योग ही है। और ऐसा स्वराज्य व्यक्तियों के द्वारा नागरिकों के रूप में अपने कत्र्तव्य के पालन से ही आता है। उसमें कोई अपने अधिकारो की बात नही साचता। जब उनकी आवश्यकता होती है तब वे उन्हे अपने-आप मिल जाते है और इसलिए मिलते है कि वे अपने कत्र्तव्य का सम्पादन ज्यादा अच्छी तरह कर सके।17

अहिंसा पर आधारित स्वराज्य में कोई किसी का शत्रु नही होता, सारी जनता की भलाई का सामान्य उद्धेश्य सिद्ध करने में हर एक अपना अभीष्ट योग देता है, सब लिख पढ सकते है और उनका ज्ञान दिन-दिन बढ़ता रहता है। बीमारी और रोग कम -से-कम हो जाएं, ऐसी व्यवस्था की जाती है। कोई कंगाल नही होता और मजदूरी करना चाहने वाले को काम अवश्य मिल जाता है। ऐसी शासन व्यवस्था मे जुआ,शराबखोरी और दुराचार का या वर्ग-विद्वेष का कोई स्थान नही होता। अमीर लोग अपने धन का उपयोग बुद्धिपूर्वक उपयोगी कार्यो में करेंगे; अपनी शान-शौकत बढाने में या शारीरिक सुखों की वृद्धि में उसका अपव्यय नही करेंगे। उसमें ऐसा नही हो सकता, होना नही चाहिये, कि चंद अमीर तो रत्न-जटित महलों में रहे और लाखो-करोडो ऐसी मनहूस झापडियों मे, जिनमे हवा और प्रकाश का प्रवेश न हो। अहिंसक अहिंसक स्वराज्य में न्यायपूूर्ण अधिकारों का किसी के भी द्वारा कोई अतिक्रमण नही हो सकता और इसी तरह किसी को कोई अन्नायपूर्ण अधिकार नही हो सकते। सुसंघटित राज्य में किसी के न्याय अधिकार का किसी दूसरे के द्वारा अन्नायपूर्वक छीना जाना असंभव होना चाहिये और कभी ऐसा हो जाय तो अपहर्ता को अपदस्थ करने के लिए हिंसा का आश्रय लेने की जरूरत नही होनी चाहिये।18

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