३०. मिल-उद्योग

हमारी मिलें अभी इतना सूत पैदा नहीं कर सकतीं कि कपड़े की हमारी सारी जरूरत उनसे पूरी हो जाय, और यदि वे करती होतीं तो भी जब तक उन्‍हें बाध्‍य न किया जाता वे कीमत कम करने के लिए तैयार न होतीं । उनका उद्देश्‍य जाहिरा तौर पर जैसे कमाया है और इसलिए यह तो हो नही सकता कि वे राष्‍ट्र की आवश्‍यकताओं का ख्‍याल करके अपनी कीमतों का नियमन करें । अत: हाथ-कताई ही एक ऐसा साधन हैं, जिसके द्वारा गरीब देहातियों के हाथों में करोड़ो रूपये रखें जा सकते है । हर एक कृषि-प्रधान देश को ऐसे एक पूरक उद्योग की जरूरत होती है जिससे किसान अपने अवकाश के समय का उपयोग कर सकें । भारत में यह पूरक उद्योग हमेशा कताई रहा है । जिस उद्योग के नाश के फलस्‍वरूप गुलामी और गरीबी आई और उस अनुपम कला-प्रतिभा का लोप हो गया, जो किसी समय चमात्‍कारपूर्ण भारतीय वस्‍त्रों में दिखाई देती थी और जो दुनिया की ईर्ष्‍या का विषय बन गयी थी, उस प्राचीन उद्योग को पुनर्जीवित करने के प्रयत्‍न को स्‍वप्‍न-सेवियों का आदर्श कहा जा सकता है ?

आम तौर यह दावा जरूर किया जा सकता है कि बड़ा मिल-उद्योग हिन्‍दुस्‍तानी उद्योग है । पर जापान और लंकाशायर के साथ टक्‍कर लेने की शक्ति होते हुए भी यह उद्योग जितने अंशों में खादी के ऊपर विजय प्राप्‍त करता है, उतने ही अंशों में जन-साधारण का शोषण करता है और उसकी दरिद्रता को बढ़ाता है । सारे देश में भारी-भारी यांत्रिक उद्योग खड़े कर देने की इस जमाने की धुन में मेरे इस विचार को यद्यपि बिलकुल ठुकरा नही दिया गया है, तो भी इसके विषय में कुछ लोगों में शंका तो उठाई ही है । इसके विरोध में यह कहा गया है कि यांत्रिक उद्योगों की प्रगति के कारण जन-साधारण की दरिद्रता जो बढ़ती जाती है वह अनिवार्य है, और इसलिए उसको सहन करना ही चाहिये । इस अनिष्‍ट को सहन करना तो दूर, मैं तो यह भी नही मानता कि वह अनिवार्य है । अखिल भारत चरखा-संग ने सफलता पूर्वक यह बता दिया है कि लोगों के फुरसत के समय का उपयोग अगर कातने और उसके पूर्व की किया जाय, तो इतने ही गांवों में हिन्‍दुस्‍तान की जरूरत के लायक कपड़ा पैदा हो सकता है । कठिनाई तो जनता से मिल का कपड़ा छुड़वाने में है ।

मिल-मालिक कुछ परोपकारी तो हैं नहीं कि वे हाथ-करघे के बुनकरों को तब भी सुत देते रहेंगे जब ये उनके साथ उन्‍हें नुकसान पहुंचाने वाली प्रतिस्‍पर्धा करने लेगेंगे ।

ज्‍यों ही मिल-मालिकों को ऐसा लगेगा की सुत बेचने के बजाय बुनने में ज्‍यादा लाभ है, त्‍यों ही वे उसे बेचना बंद कर देंगे और बुनना शुरू कर देंगे । वे कोई परोपकारी नहीं है । उन्‍होंने मिले पैसा कमाने के लिए ही खड़ी की है । यदि वे देखेंगे कि सुत बुनने में ज्‍यादा लाभ है तो वे उसे हाथ-करघे के बुनकरों को बेचना बंद कर देंगे ।

मिल के सुत का उपयोग हाथ-करघा उद्योग के मार्ग की एक घातक बाधा है । उसकी मुक्ति हाथ-कताई के सूत के उपयोग करने में ही है । अगर चरखा असफल रहा और मिट गया तो, हाथ-करघे का नाश भी निश्चित ही है ।

मैं अनेक कम्‍पनियों के संघबद्ध होकर काम करने या बड़े-बड़े यंत्रों का उपयोग करके उद्योगों का केनद्रीयकरण करने के खिलाफ हूं । अगर भारत खादी को और खादी फलितार्थो को अपनाये तो मैं ऐसी आशा करता हूं कि भारत आधुनिक यंत्रों में से केवल उतनों का ही उपयोग करेगा, जो जीवन की सुख-सुविधा बढ़ाने और श्रम की बचत के लिए आवश्‍यक माने जावें ।

चन्‍द लोगों के हाथ में धन और सत्‍ता का केन्‍द्रीयकरण करने के लिए यंत्रों का संगठन को मैं बिलकुल गलत समझता हूं। आजकल यंत्रों अधिकांश योजनाओं का यही उद्देश्‍य होता है । चरखे का आंदोलन यंत्रों द्वारा होने वाला शोषण और धन तथा सत्‍ता का यह केन्‍द्रीयकरण रोकने के लिए किया जा रहा संगठित प्रयत्‍न है । इसलिए मेरी योजना में यंत्रों के अधिकारी अपने लाभ की या अपने देश के लाभ की बात नही सोचेंगे, बल्कि सारी मानव जा‍ती के लाभ की बात सोचेंगे । उदाहरण के लिए लंकाशायर के लोग अपने यंत्रों का उपयोग भारत के या दूसरे देशों के शोषण के लिए नही करेंगे; उलटे, वे ऐसे साधन ढूढ़ेंगे जिनसे भारत अपने कपास को अपने गांव में ही कपड़े का रूप देने में समर्थ हो जाये । इसी तरह मेरी योजना में अमेरिका के लोग भी अपनी अविष्‍कारक प्रतिभा के द्वारा दुनिया की दूसरी जातियों का शोषण करने की कोशिश नहीं करेंगे ।

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