३१. स्‍वदेशी

स्‍वदेशी की भावना का अर्थ है हमारी वह भावना, जो हमें दूर को छोड़कर अपने समीपवर्ती प्रदेश का ही उपयोग और सेवा करना सिखाती है। उदाहरण के लिए इस परिभाषा के अनुसार धर्म के सम्‍बन्‍ध में यह कहा जायेगा कि मुझे अपने पूर्वजों से प्राप्‍त धर्म का ही पालन करना चाहिये। अपने समीपवर्ती धार्मिक परिवेष्‍टन का उपयोग इसी तरह हो सकेगा। यदि मैं उसमें दोष पाऊं तो मुझे उन दोषों को दूर करके उसकी सेवा करना चाहिये। इसी तरह राजनीति के क्षेत्र में मुझे स्‍थानीय संस्‍थाओं का उपयोग करना चाहिये और उनके जाने-माने दोषों को दूर करके उनकी सेवा करनी चाहिये। अर्थ के क्षेत्र में मुझे अपने पड़ोसियों द्वारा बनायी गयी वस्‍तुओं का ही उपयोग करना चाहिये और उन उद्योगों की कमियां दूर करके, उन्‍हें ज्‍यादा सम्‍पूर्ण और सक्षम बनाकर उनकी सेवा करनी चाहिये। मुझे लगता है कि यदि स्‍वदेशी को व्‍यवहार में उतारा जाय, तो मानवता के स्‍वर्णयुग की अवतारणा की जा सकती है।…

ऊपर स्‍वदेशी की जिन तीन शाखाओं का उल्‍लेख हुआ है, उन पर अब हम थोड़ा विचार करें। हिन्‍दू धर्म उसकी बुनियाद में निहित इस स्‍वदेशी की भावना के कारण ही स्थितिशील और फलस्‍वरूप अत्‍यंत शक्तिशाली बन गया। चूंकि वह दूसरे धर्मों के अनुयायियों को अपने दायरे में खींचने की न तो इच्‍छा ही रखता है और न प्रयत्‍न ही करता है, इसलिए वह सबसे ज्‍यादा सहिष्‍णु है और आज भी वह अपना विस्‍तार करने की वैसी ही योग्‍यता रखता है जैसी कि वह भूतकाल में दिखा चुका है। कुछ लोग ऐसा मानते हैं कि उसने बौद्ध धर्म को खदेड़कर भारत के बाहर भगा दिया। यह धारणा गलत है। उलटे उसने बौद्ध धर्म का आत्‍मसात् कर लिया है। स्‍वदेशी की भावना के ही कारण हिन्‍दू अपने धर्म का परिवर्तन करने से इनकार करता है। इसका यह अर्थ नहीं कि वह उसे सर्वश्रेष्‍ठ मानता है, लेकिन वह जानता है कि वह उसमें जरूरी सुधार दाखिल कर सकता है और उसे सम्‍पूर्ण बना सकता है। और जो कुछ मैंने हिन्‍दू धर्म के बारे में कहा है, मेरा खयाल है वह सब दुनिया के दूसरे बड़े धर्मों के लिए भी सही है। अन्‍तर केवल यह है कि हिन्‍दू धर्म के लिए यह विशेष रूप से सही है। यहां मुझे एक बात कहनी है। भारत में काम करने वाली मिशनरी संस्‍थाओं ने भारत के लिए बहुत-कुछ किया है और अभी भी कर रही हैं और भारत इसके लिए उनका कृतज्ञ है। लेकिन यदि मैंने जो कुछ कहा है उसमें कोई सत्‍य है, तो क्‍या यह ज्‍यादा अच्‍छा न होगा कि वे धर्म-परिवर्तन का कार्य छोड़ दें और केवल परोपकार की ही प्रवृत्तियां जारी रखें ? क्‍या इस तरह वे ईसाई धर्म के आन्‍तरिक तत्‍व की अधिक सेवा नहीं करेंगी ?

स्‍वदेशी की भावना की खोज करते हुए जब मैं देश की संख्‍याओं पर नजर डालता हूं, तो मुझे ग्राम-पंचायतें बहुत ज्‍यादा आ‍कर्षित करती हैं। भारत वस्‍तुत: प्रजातंत्र का उपासक देश है; और वह प्रजातं त्र का उपासक है इसलिए वह उन सब चोटों को सह सका है, जो आज तक उस पर की गयी हैं। राजाओं और नवाबों ने, वे भारतीय रहे हों या विदेशी, प्रजा से सिर्फ कर वसूल किया है; उसके सिवा प्रजा से उनका कोई सम्‍पर्क शायद ही रहा है। और प्रजा ने राजा को उसका प्राप्‍य देकर अपना बाकी जीवन-व्‍यवहार अपनी इच्‍छा के अनुसार चलाया है। वर्ण और जातियों का विशाल संघटन न केवल समाज की धार्मिक आवश्‍यकतायें पूरी करता था, बल्कि उसकी राजनीतिक आवश्‍यकताओं की पूर्ति भी करता था। गांववाले अपना आंतरिक कामकाज जाति-संघटन के द्वारा चलाते थे और उसी के द्वारा वे राजकीय शक्ति के अत्‍याचारों का भी मुकाबला करते थ‍े। जाति-संघटन के द्वारा अपनी संघटन-शक्ति का ऐसा अच्‍छा परिचय जिस राष्‍ट्र ने दिया है, उसकी संघटन-शक्ति की क्षमता से इनकार नहीं किया जा सकता। आप हरिद्वार के कुम्‍भ-मेले को देखें।… आपको पता चल जायेगा कि जो संघटन लगभग अनायास ही लाखों तीर्थयात्रियों की व्‍यवस्‍था कर सकता है, वह कितना कौशलपूर्ण न होगा ? फिर भी यह कहने की फैशन हो गयी है कि हम लोगों में संघटन की योग्‍यता नहीं है। हां, यह बात उनके बारे में अमुक हद तक सही हो सकती है, जो नयी परंपराओं में पले और बड़े हुए हैं।

स्‍वदेशी की भावना से हट जाने के कारण हमें भयंकर विघ्‍न -बाधाओं से गुजरना पड़ा है। हम शिक्षित वर्ग के लोगों को हमारी शिक्षा विदेशी भाषा के माध्‍यम से मिली है। इसलिए आम जनता को हम तनिक भी प्रभावित नहीं कर सके हैं। हम जनता का प्रतिनिधित्‍व करना चाहते है, पर हम उसमें असफल सिद्ध होते हैं। वे किसी अंग्रेज अधिकारी को जितना जानते- पहिचानते हैं, उससे अधिक हमें नहीं जानते पहिचानते । उनके दिल में क्‍या है, इसे न अंग्रेज शासक जानते हैं, न हम लोग। उनकी आकांक्षायें हमारी आकांक्षायें नहीं हैं। इसलिए हमारा और उनका सम्‍बंध- सूत्र- सा गया है। हम प्रजा का संघटन करने में असफल सिद्ध हुए हैं: सच बात यह है कि प्रतिनिधियों में प्रजा में आपस का नाता नहीं है। अगर पिछले पचास वर्षों में हमें अपनी ही भाषाओं के माध्‍यम से शिक्षा मिली होती, तो हमारे बड़े- बूढ़े, घर के नौकर और पडो़सी, सब हमारे उस ज्ञान में हिस्‍सा लेते। बोस और राय जैसे वैज्ञानिकों के आविष्‍कार रामायण और महाभारत की तरह हर एक घर में प्रवेश कर जाते। अभी तो स्थि‍ति ऐसी है कि जनता के लिए ये आविष्‍कार विदेशी वैज्ञानिकों द्धारा किये गये आविष्‍कारों जैसे ही हैं। यदि विविध पाठ्य- विषयों की शिक्षा देशी भाषायों द्धारा दी गयी होती, तो मैं यह कहने का साहस करता हूँ कि हमारी इन भाषायों की आश्‍चर्यजनक समृद्धि हुई होती। गांवों की स्‍वच्‍छता आदि के सवाल वर्षों पहले हल हो गये होते। ग्राम-पंचायतें जीवित शक्ति के रूप में काम कर रही होतीं, भारत को जैसा स्‍वराज्‍य चाहिये वैसा स्‍वराज्‍य वह भोगता होता और उसे अपनी पुनीत भूमि पर संघटित हत्‍या का अपमानकारी दृश्‍य न देखना पड़ता। खैर, अभी भी अवसर है कि हम अपनी भूलें सुधार लें।

अब हम स्‍वदेशी की अंतिम शाखा पर विचार करें। यहां भी जनता की अधिकांश गरीबी का कारण यह है कि आर्थिक और औद्योगिक जीवन में हमने स्‍वदेशी के नियम का भंग किया है। अगर भारत में व्‍यापार की कोई भी वस्‍तु विदेशों से न लायी गयी होती, तो हमारी भूमि में दूध और मधु की नदियां बहती होतीं। लेकिन यह तो होना नहीं था। हमें लोभ था और इंग्‍लैण्‍ड को भी लोभ था। इंग्‍लैण्‍ड और भारत का सम्‍बन्‍ध स्‍पष्‍टतया गलती पर कायम था। लेकिन यहां रहने में वह गलती नहीं कर रहा है। यहां रहने में उसकी घोषित नीति यह है कि वह भारत को अपनी सम्‍पत्ति नहीं मानता; वह उसे जनता की धरोहर के रूप में उसी के भले के लिए अपने पास रख रहा है। अगर यह सही है तो लंकाशायर को भारत में व्‍यापार करने का लालच छोड़ देना चाहिये। और यदि स्‍वदेशी का सिद्धांत सही है तो इससे लंकाशायर की कोई हानि नहीं होगी। अलबत्‍ता, शुरू में कुछ समय के लिए उसे कुछ अटपटा-सा लगेगा। मैं स्‍वदेशी को बदला लेने के लिए चलाया गया बहिष्‍कार का आन्‍दोलन नहीं मानता। मैं उसे ऐसा धार्मिक सिद्धांत मानता हूं, जिसका पालन सब लोगों को करना चाहिये। मैं अर्थशास्‍त्री नहीं हूं लेकिन मैंने कुछ किताबें पढ़ी हैं, जिनमें बतलाया गया है कि इंग्‍लैण्‍ड असानी से अपनी सारी जरूरतें खुद पैदा करने वाला आत्‍मा-निर्भर देश बन सकता था। हो सकता है यह बात हास्‍यास्‍पद हो; और वह सच नहीं हो सकती, इसका सबसे बड़ा प्रमाण यह है कि इंग्‍लैण्‍ड दुनिया के उन देशों में है जो बाहर से सबसे ज्‍यादा माल आयात करते हैं। लेकिन जब तक भारत अपने जीवन का उत्‍तम निर्वाह करने योग्‍य नहीं हो जाता है, तब तक उससे यह आशा नहीं की जा सकती कि यह लंकाशायर के अथवा किसी दूसरे देश के लिए जिये। और वह अपने जीवन का उत्‍तम निर्वाह तभी कर सकता है जब वह-अपने प्रयत्‍न से या दूसरों की मदद लेकर-अपनी आवश्‍यकता की सारी वस्‍तुएं अपनी ही सीमा में उत्‍पन्‍न करने लगे। उसे नाशकारी प्रतिस्‍पर्धा के उस चक्‍कर में नहीं पड़ना चाहिये, जो आपसी लाड़ाई-झगड़ों, ईष्‍या और अन्‍य अनेक बुराईयों को जन्‍म देता है। लेकिन उसके बड़े सेठों और करोड़पतियों की इस विश्‍वव्‍यापी प्रतिस्‍पर्धा में पड़ने से कौन रोकेगा ? कानून तो निश्‍चय ही ऐसा नहीं कर सकता। लेकिन लोकमत का बल और समुचित शिक्षा अवश्‍य इस दिशा में बहुत कुछ कर सकती है। हाथ-करघा उद्योग लगभग मरने की‍ स्थिति में है। अपनी यात्राओं में… मैंने भरसक ज्‍यादा-से-ज्‍यादा बुनकरों से मिलने और उनकी कठिनाइयां समझने की कोशिश की और मुझे यह देखकर हार्दिक दु:ख हुआ कि किस तरह अनेक बुनकर परिवारों को यह उद्योग-जो किसी समय तरक्‍की पर था और सम्‍मानास्‍पद माना जाता था-छोड़ देना पड़ा है।

अगर हम स्‍वदेशी के सिद्धांत का पालन करें, तो हमारा और आपका यह कर्तव्‍य होगा कि हम उन बेरोजगार पड़ोसियों को ढूंढ़े, जो हमारी आवश्‍यकता की वस्‍तुएं, हमें दे सकते हों और यदि वे इन वस्‍तुओं को बनाना न जानते हों तो उन्‍हें उसकी प्रक्रिया सिखायें। ऐसा हो तो भारत का हर एक गांव लगभग एक स्‍वाश्रयी और स्‍वयंपूर्ण इकाई बन जाय। दूसरे गांव के साथ्‍ा वह उन चंद वस्‍तुओं का आदान-पदान जरूर करेगा, जिन्‍हें वह खुद अपनी सीमा में पैदा नहीं कर सकता। मुमकिन है कुछ लोगों को यह बात व्‍यर्थ मालूम हो। उन लोगों से मैं कहूंगा कि भारत एक विचित्र देश है। कोई दयालु मुसलमान शुद्ध पानी पिलाने के लिए तैयार हो, तो भी हजारों परम्‍परावादी हिन्‍दू ऐसे हैं जो प्‍यास से अपना गला सूखने देंगे, लेकिन मुसलमान के हाथ का पानी नहीं पियेंगे। यह बात अर्थहीन तो है, लेकिन इस देश में वह होती है। इसी तरह इन लोगों को एक बार इस बात का निश्‍चय करा दिया जाय कि धर्म के अनुसार उन्‍हें भारत में ही बने हुए कपड़े पहनना चाहिये और भारत में ही पैदा हुआ अन्‍न खाना चाहिये, तो फिर वे कोई दूसरे कपड़े पहनने या दूसरा अन्‍न खाने से इनकार कर देंगे।

भगवद्गीता का एक श्‍लोक है, जिसमें कहा गया है कि सामान्‍य जन श्रेष्‍ठ जनों का अनुकरण करते हैं। स्‍वदेशी व्रत लेने पर कुछ समय तक असुविधायें तो भोगनी पड़ेंगीश्‍ लेकिन उन असुविधाओं के बावजूद यदि समाज के विचारशील व्‍यक्ति स्‍वदेशी का व्रत अपना लें, तो हम उन अनेक बुराईयों का निवारण कर सकते हैं जिनसे हम पीडि़त हैं। मैं कानून द्वारा किये जाने वाले हस्‍तक्षेप को, वह जीवन के किसी भी विभाग में क्‍यों न किया जाय, बिलकुल नापसन्‍द करता हूं। उसके समर्थन में ज्‍यादा-से-ज्‍यादा यही कहा जा सकता है कि दूसरी बुराई की तुलना में वह कम बुरी है। लेकिन अपनी इस नापसन्‍दगी के बावजूद मैं विदेशी माल पर सख्‍त आयात-कर लगाना न सिर्फ यह लूंगा, बल्कि मैं चाहूंगा कि ऐसा किया जाय। नेटाल एक ब्रिटिश उपनिवेश है, किन्‍तु उसने एक दूसरें ब्रिटिश मारीशस से आने वाली शक्‍कर पर काफी कर लागाया था और इस तरह अपनी शक्‍कर की रक्षा की थी। इंग्‍लैण्‍ड ने भारत पर स्‍वतंत्र व्‍यापार की नीति लादकर भारत के प्रति बड़ा अन्‍याय किया है। यह नीति इंग्‍लैण्‍ड के लिए आहार की तरह पोषक सिद्ध हुई होगी, किन्‍तु भारत के लिए तो वह जहर साबित हुई है।

कहा जाता है कि भारत-से-कम आर्थिक जीवन में तो स्‍वदेशी के नियम का आचरण नहीं कर सकता। जो लोग यह दलील देते है वे रूवदेशी को जीवन के एक अनिवार्य सिद्धांत के रूप में नहीं मानते। उनके लिए वह महज देश-सेवा का कार्य है, जो अगर उसने ज्‍यादा आत्‍म्‍-निग्रह करना पड़ता हो तो छोड़ा भी जा सकता है। जैसा कि ऊपर बताया गया है, स्‍वदेशी एक धार्मिक नियम है जिसका पालन उससे होने वाले शारीरिक कष्‍टों के बावजूद भी होना ही चाहिये। स्‍वदेशी का सच्‍चा प्रेम हो तो सुई या पिन जैसी चीजों का अभाव-क्‍योंकि वे भारत में नहीं बनती हैं-भय का कारण नहीं होना चाहिए। स्‍वदेशी का व्रत लेने वाला ऐसी सैकडो़ चीजों के बिना ही अपना काम चलाना सीख लेगा, जिन्‍हें आज जरूरी समझता है। फिर यह बात भी तो है कि जो लोग स्‍वदेशी को असंभव कहकर टाल देना चाहते हैं, वे यह भूल जाते हैं कि स्‍वदेशी एक आदर्श है जिसे लगाता कोशिश करके क्रमश: प्राप्‍त करना है। और यदि फिलहाल हम इस नियम को अमु‍क वस्‍तुओं तक ही मर्यादित रखें और जो वस्‍तुएं देश में प्राप्‍य नहीं हैं उनका उपयोग जारी रखें, तो भी आदर्श की दिशा में बढ़ते रह सकते हैं।

अन्‍त में मुझे स्‍वदेशी के खिलाप उठाये जाने वाले एक अन्‍य आक्षेप पर और विचार करना है। आक्षेपकारों का कहना है कि वह एक अत्‍यन्‍त स्‍वार्थ पूर्ण सिद्धान्‍त है और सभ्‍यजनों की मानी हुई नीति में उसे कोई स्‍थान नहीं हो सकता। वे समझते हैं कि स्‍वदेशी का पालन तो असभ्‍यता के युग की ओर लौटने जैसा होगा। मैं यहां इस कथन का विस्‍तृत विश्‍लेषण नहीं कर सकता। किन्‍तु मैं यह कहूंगा कि नम्रता और प्रेम के नियमों के साथ्‍ा एकमात्र स्‍वदेशी का ही मेल बैठ सकता है। यदि मैं अपने परिवार की भी यथोचित सेवा नहीं कर पाता हूं, तो उस हालत में मेरा सम्‍पूर्ण भारत की सेवा का विचार करना दुरभियान ही कहा जायेगा। उस हालत में तो यही अच्‍छा होगा कि मैं अपना प्रयत्‍न परिवार सेवा पर ही केन्द्रित करूं और ऐसा समझूं कि परिवार की सेवा द्धारा मैं पूरे देश की या यों कहो कि पूरी मानव- जाति की सेवा कर रहा हूं। नम्रता और प्रेम इसी में है। कार्य का मूल्‍य उसके प्रेरक हेतु से निश्चित होता है। परिवार की सेवा मैं उससे दूसरों से होने वाले कष्‍टों की परवाह किये बिना भी कर सकता हूं। उदाहरण के लिए, हम लोगों से जबरदस्‍ती उनका पैसा छीनने का पेशा अख्तियार कर सकते हैं। उसके द्वारा हम धनवान बनकर परिवार की अनेक अनुचित मांगों को पूरा कर सकते हैं। लेकिन यदि हम ऐसा करें तो उससे न तो परिवार की सेवा होगी और न राज्‍य की। परिवार की सेवा का दूसरा तरीका यह होगा कि मैं इस बात को पहिचान लूं कि भगवान ने मुझे अपने आश्रितों के पोषण के लिए हाथ-पांव दिये हैं, और मुझे उनसे काम लेना चाहिये। ऐसा हो तो मैं एकदम अपना और जिनसे मेरा सीधा सम्‍बन्‍ध है उनका जीवन सादा बनाने में लग जाऊंगा। यदि मैं ऐसा करूं तो अपने परिवार की भी सेवा करूंगा और किसी दूसरे की कोई हानि भी नहीं करूंगा। अगर हर एक आदमी यह जीवन-पद्धति अपना ले, तो एकदम आदर्श स्थि‍ति का निर्माण हो जाय। सब लोग उस स्थिति को एक साथ नहीं प्राप्‍त करेंगे। लेकिन जिन लोगों ने इस बात को समझ लिया है और इसलिए जो उसे अपने आचरण में उतारेंगे, वे स्‍पष्‍टत: उस शुभ दिन को पास लाने में बड़ी मदद करेंगे। जीवन की इस योजना मे मैं केवल भारत की ही सेवा करता दिखता हूं, फिर भी मैं किसी दूसरे देश को हानि नहीं पहुंचाता। मेरी देशभक्ति वर्जनशील भी है और ग्रहणशील है। वह वर्जनशील इस अर्थ में है कि मैं अत्‍यंत नम्रतापूर्वक अपना ध्‍यान अपनी जन्‍मभूमि पर ही देता हूं और ग्रहणशील इस अर्थ में है कि मेरी सेवा में स्‍पर्धा या विरोध की भावना बिलकुल नहीं है। ‘अपनी सम्‍पत्ति का उपयोग इस तरह करो कि उससे तुम्‍हारे पड़ोसी को कोई कष्‍ट न हो’ -यह केवल कानून का सिद्धान्‍त नहीं, परन्‍तु एक महान जीवन-सिद्धान्‍त भी है। वह अहिंसा या प्रेम के समुचित पालन की कुंजी है।

लेकिन जो लोग चरखे से जैसे-तैसे सूत कातकर खादी पहन-पहनाकर स्‍वदेशी-धर्म का पूरा पालन हुआ मान लेते हैं, वे बड़े मोह में डूबे हुए हैं। खादी सामाजिक स्‍वदेशी की सीढी़ है, वह स्‍वदेशी- धर्म की आखिर हद नहीं है। ऐसे खातिरदारी देखे गये हैं, जो और सब चीजें परदेशी खरीदते हैं। वे स्‍वदेशी- धर्म का पालन नहीं करते। वे तो सिर्फ चालू बहाव में बह रहे हैं। स्‍वदेशी-व्रत का पालन करने वाला हमेशा अपने आस- पास निरीक्षण करेगा और जहां- जहां पडो़सियों की सेवा की जा सके, यानी जहां-जहां उनके हाथ का तैयार किया हुआ जरूरत का माल होगा, वहां दूसरा छोड़कर उसे लेगा। फिर भले ही स्‍वदेशी चीज पहले- पहल मंहगी और कम दरजे की हो। व्रतधारी उसको सुधारने की कोशिश करेगा। स्‍वदेशी खराब है, इसलिए कायर बनकर वह परदेशी का इस्‍तेमाल करने नहीं लग जायेगा।

लेकिन धर्म- जानने वाला अपने कुएं में डूब नहीं जायेगा। जो चीज स्‍वदेश में नहीं बनती हो या बडी़ तकलीप से बनती सकती हो, वह परदेश के द्धेष के कारण अपने देश में बनाने लग जाय तो उसमें स्‍वदेशी धर्म नहीं है। स्‍वदेशी- धर्म पालने वाला परदेशी का द्धेष कभी नहीं करेगा। इसलिए पूर्ण स्‍वदेशी- में किसी का द्धेष नहीं है। वह संकुचित धर्म न‍हीं है। वह प्रेम में से- अहिंसा में से- निकला हुआ सुंदर धर्म है।

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