३२. गोरक्षा
हिन्दु धर्म की मुख्य वस्तु है गोरक्षा। गोरक्षा मुझे मनुष्य के सारे विकास- क्रम में से सबसे अलौकिक वस्तु मालूम हुई है। गाय का अर्थ मैं मनुष्य के नीचे की सारी गूंगी दुनिया करता हूं। इसमें गाय के बहाने इस तत्व के द्धारा मनुष्य को संपूर्ण चेतन- सृष्टि के साथ आत्मीयता का अनुभव कराने का प्रयत्न है। मुझे यह भी स्प्ष्ट दीखता है कि गाय को ही यह देखभाव क्यों प्रदान किया गया होगा। हिन्दुस्तान में गाय ही मनुष्य का सबसे सच्चा साथी, सबसे बडा़ आधार था। यही हिन्दुस्तान की एक कामधेनु थी। वह वह सिर्फ दूध ही नहीं देती थी, बल्कि सारी खेती का आधार- स्तंभ थी । गाय दया धर्म का मूर्तिमंत कविता है। इस करीब और शरीफ जानवर में हम केवल दया ही उमड़ती देखते हैं। यह लाखों- करोड़ों हिन्दुस्तानियों को पालने वाली माता है। इस गाय की रक्षा करना ईश्वर की सारी मूक सृष्टि की रक्षा करना है। जिस अज्ञात ऋषि या द्रष्टा ने गोपूजा चलाई उसने गाय से शुरूआत की। इसके सिवा और कोई ध्येय हो ही नहीं सकता। इस पशु सृष्टि की फरियाद मूक होने से और भी प्रभावशाली है। गोरक्षा हिन्दु धर्म की दुनिया को दी हुई एक कीमत भेंट है। और हिन्दु धर्म भी तक रहेगा, जब तक गाय की रक्षा करने वाले हिन्दु हैं।
हिन्दुओं की परीक्षा तिलक करने, स्वर शुद्ध मंत्र पढ़ने, तीर्थयात्रियों करने या जात- बिरादरी के छोटे-छोटे नियमों को कट्टरता से पालन से नहीं होगी, बल्कि गाय को बचाने की उनकी शक्ति से होगी।
गोमाता जन्म देने वाली मां से कहीं बढ़कर है। मो तो साल दो साल दूध पिलाकर हमसे फिर जीवन भर सेवा की आशा रखती है। पर गोमाता को तो सिवा दाने और घास के काई सेवा की आवश्यकता ही नहीं। मां की तो हमें उसकी बीमारी में सेवा करनी पड़ती है। परन्तू गोमाता केवल जीवन- पर्यन्त ही हमारी अटूट सेवा नहीं करती, बल्कि उसके मरने बाद भी हम उसके मांस, चर्म, हड्डी, सींग आदि से अनेक लाभ उठाये हैं। यह सब मैं जन्म दात्री माता का दरजा कम करने को नहीं करता, बल्कि यह दिखाने के लिए कहता हूं कि गोमाता हमारे लिए कितनी पूज्य है।
हमारे ढोरों की दुर्दशा के लिए अपनी गरीबी का राग भी हम नहीं अलाप सकते। यह हमारी निर्दय लापरवाही के सिवा और किसी भी बात की सूचक नहीं है। हालांकि हमारे पिंजरापोल हमारी दयावृत्ति पर खडी़ हुई संस्थायें हैं, तो भी वे उस वृत्ति का अत्यन्त भद्दा अमल करने वाली संस्थाओं ही है। वे आदर्श गोशालाओं या रेडियों और समृद्ध राष्टिय संस्थाओं के रूप चलने के बजाय केवल लूले- लंगडे़ ढोर रखने के मर्यादा खाते बन गये हैं। गोरक्षा के धर्म का दावा करते हुए भी हमने गाय और उसकी संतान को गुलाम बनाया है और हम खुद भी गुलाम बन गये हैं।
लेकिन मैं फिर से इस बात पर देता हूं कि…. कानून बनाकर गोवध बन्द करने से गोरक्षा नहीं हा जाती। वह तो गोरक्षा के काम का छोटे- से- छोटा भाग है।…. लाग ऐसा मानते हैं कि किसी भी बुराई के विरूद्ध कोई कानून बना कि तुरन्त वह किसी झंझट के बिना मिट जायेगी। ऐसी भंयकर आत्म- वंचना और कोई नहीं हो सकती। किसी दुष्ट बुद्धि वाले अज्ञानी या छोटे से सामाज के खिलाप कानून बनाया जाता है और उसका असर भी होता है। लेकिन जिस कानून के विरूद्ध समझदार और संगठित लोकमत हो, या धर्मके बहाने छोटे- से- छोटे मंडल का भी विरोध हो, वह कानून सफल नहीं होता। गोरक्षा के प्रश्न का जैसे- जैसे मैं अधिक अध्ययन करता जाता हूं, वैसे- वैसे मेरा यह मत दृढ़ होता जाता है कि गांवो और उनकी जनता की रक्षा तभी हो सकती है, जब मेरे उपर बताई हुई दिशा में निरन्तर प्रयत्न किया जाय।
अब सवाल यह है कि जब गाय अपना पालन- पोषण से खर्च से भी कम दूध देने लगती है या दूसरी तरफ से नुकसान पहुंचाने वाला बोझ बन जाती है, तब बिना मारे उसे कैसे बचाया जा सकता है?
इस सवाल का जवाब थोडे़ में इस तरह दिया जा सकता है:
1. हिन्दु गाय और उसकी संतान की तरफ अपना फर्ज पूरा करके उसे बचा सकता हैं। अगर वे ऐसा करे तो हमारे जानवर हिन्दुस्तान और दुनिया के गौरव बन सकते हैं। आज बिल्कुल उल्टा हो रहा है।
2. जानवरों के पालन- पोषण का शास्त्र सीखकर गाय की रक्षा की जा सकती है। आज तो इस काम में पूरी अन्धा धून्धी चलती है।
3. हिन्दुस्तान में आज जिस बेरहम तरीके से बैंलो को बधिया बनाया जाता है, उसकी जगह पश्चिम के हमदर्दी भरे और नरम तरीके काम में लाकर उसे कष्ट से बचाया जा सकता है।
4. हिन्दुस्तान के सारे पिंजरापोलों का पूरा- पूरा सुधार किया जाना चाहिये। आज तो हर तरह पिंजरापोल का इन्तजाम ऐसे लोग करते हैं, जिनके पास तो कोई योजना होती है और न वे अपने काम की जानकारी ही न रखते हैं।
5. जब ये महत्व के काम कर लिये जायेंगे, तो मुसलमान खुद दूसरे किसी कारण से नहीं तो अपने हिन्दु भाइयों के खातिर ही मांस या दूसरे मतलब के लिए गाय को न मारने की जरूरत को समझ लेंगे।
पाठक यह देखेंगे कि उपर बताई हुई जरूरतों के पिछे एक खास चीज है। वह है अंहिसा जिसे दूसरे शब्दों में प्राणिमात्र पर दया कहा जाता है। अगर इस सबसे बड़े महत्व की बात को समझ लिया जाय, तो दूसरी सब बातें आसान बन जाती हैं। जहां अहिंसा है वहां अपार धीरज, भीतरी शान्ति, भले-बुरे का ज्ञान, आत्मात्याग और सच्ची जानकारी भी है। गोरक्षा कोई आसान काम नहीं है। उसके नाम पर देश में बहुत पैसा बरबाद किया जाता है। फिर भी अहिंसा के न होने से हिन्दू गाय के रक्षक बनने के बजाय उसके नाश करने वाले बन गये हैं। गोरक्षा का काम हिन्दुस्तान से विदेशी हुकूमत को हटाने के काम से भी ज्यादा कठिन है।
[ नोट : कहा जाता है कि हिन्दुस्तान की गाय रोजाना लगभग 2 पौण्ड दूध देती है, जब कि न्यूजीलैण्ड की 14 पौण्ड, इंग्लैण्ड की 15 पौण्ड और हालैण्ड की गाय रोजाना 20 पौण्ड दूध देती है। जैसे-जैसे दूध की पैदावार बढ़ती है वैसे-वैसे तन्दुरूस्ती के आंकड़े भी बढ़ते हैं। ]
मुझे यह देखकर आश्चर्य होता है कि हम लोग भैंस के दूध-घी का कितना पक्षपात करते हैं। असल में हम निकट का स्वार्थ देखते हैं, दूर के लाभ का विचार नहीं करते। नहीं तो यह साफ है कि अन्त में गाय ही ज्यादा उपयोगी है। गाय के घी और मक्खन में एक खास तरह का पीला रंग होता है, जिसमें भैंस के मक्खन से कहीं अधिक केरोटीन यानी विटामिन ‘ए’ रहता है। उसमें एक खास तरह का स्वाद भी है। मुझसे मिलने आने वाले विदेशी यात्री सेवाग्राम में गाय का शुद्ध दूध पीकर खुश हो जाते हैं। और यूरोप में तो भैंस के घी और मक्खन के बारे में कोई जानता ही नहीं। हिन्दुस्तान ही एक ऐसा देश है, जहां भैंस का घी-दूध इतना पसन्द किया जाता है। इससे गाय की बरबादी हुई है। इसीलिए मैं कहता हूं कि हम सिर्फ गाय पर ही जोर न देंगे तो गाय नहीं बच सकेगी।
अनुक्रमणिका
- १. मेरे सपनो का भारत
- २. स्वराज्य का अर्थ
- ३. राष्ट्रवाद का सच्चा स्वरूप
- ४. भारतीय लोकतंत्र
- ५. भारत और समाजवाद
- ६. भारत और साम्यवाद
- ७. उद्योगवाद का अभिशाप
- ८. वर्गयुध्द
- ९. हड़ताल
- १०. मज़दूर क्या चुनेंगे?
- ११. अधिकार या कर्तव्य ?
- १२. बेकारी का सवाल
- १३. दरिद्र-नारायण
- १४. शरीर-श्रम
- १५. सर्वोदय
- १६. संरक्षता का सिद्धांत
- १७. अहिंसक अर्थ-व्यवस्था
- १८. सामान वितरण का रास्ता
- १९. भारत में अहिंसा की उपासना
- २०. सर्वोदयी राज्य
- २१. सत्याग्रह और दुराग्रह
- २२. किसान
- २३. गांवों की ओर
- २४. ग्राम-स्वराज्य
- २५. पंचायत राज
- २६. ग्रामोद्योग
- २७. सरकार क्या कर सकती है?
- २८. ग्राम-प्रदर्शनियां
- २९. चरखे का संगीत
- ३०. मिल-उद्योग
- ३१. स्वदेशी
- ३२. गोरक्षा
- ३३. सहकारी गो पालन
- ३४. गांवों की सफाई
- ३५. गांव का आरोग्य
- ३६. गांवों का आहार
- ३७. ग्राम सेवक
- ३८. समग्र ग्राम सेवा
- ३९. युवकों को आह्वान
- ४०. राष्ट्र का आरोग्य, स्वच्छता और आहार
- ४१. शराब और अन्य मादक द्रव्य
- ४२. शहरों की सफाई
- ४३. विदेशी माध्यम की बुराई
- ४४. मेरा अपना अनुभव
- ४५. भारत की सांस्कृतिक विरासत
- ४६. नई तालीम
- ४७. बुनियादी शिक्षा
- ४८. उच्च शिक्षा
- ४९. शिक्षा का आश्रमी आदर्श
- ५०. राष्ट्रभाषा और लिपि
- ५१. प्रान्तीय भाषायें
- ५२. दक्षिण में हिन्दी
- ५३. विद्यार्थियों के लिए अनुशासन के नियम
- ५४. भारतीय स्त्रियों का पुनरूत्थान
- ५५. स्त्रियों की शिक्षा
- ५६. संतति-नियमन
- ५७. काम-विज्ञान की शिक्षा
- ५८ (……..)
- ५९. साम्प्रदायिक एकता
- ६०. वर्णाश्रम धर्म
- ६१. अस्पृश्यता का अभिशाप
- ६२. भारत में धार्मिक सहिष्णुता
- ६३. धर्म – परिवर्तन
- ६४. (…)
- ६५. प्रान्तों का पुनर्गठन
- ६६. अल्पसंख्यकों की समस्यायें
- ६७. भारतीय गवर्नर
- ६८. समाचार-पत्र
- ६९. शान्ति सेना
- ७०. भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस
- ७१. भारत पाकिस्तान और काश्मीर
- ७२. भारत में विदेशी बस्तियां
- ७३. भारत और विश्वशांति
- ७४. पूर्व का संदेश
- ७५. स्फूट वचन
