३७. ग्राम सेवक
गांवों में जाकर काम करने से हम चौंकते हैं। हम शहरी लोगों को देहाती जीवन अपनाना बहुत मुश्किल मालूम होता है। बहुतों के शरीर ही गांव की कठिन चर्या को सहने से इनकार कर देते हैं। परन्तु यदि हम स्वराज्य की स्थापना जनता की भलाई के लिए करना चाहते हैं, तथा सिर्फ शासकों के मौजुदा दल की जगह उनके जैसे ही कोई दूसरा दल-जो शायद उनसे भी बुरा सिद्ध हो-नहीं बिठाना चाहते, तो इस कठिनाई का मुकाबला हमें साहस के साथ ही नहीं बल्कि वीरता के साथ, अपने प्राणों की बाजी लगाकर करना होगा। आज तक देहाती लोग हजारों और लाखों की संख्या में, हमारे जीवन का पोषण्ा करने के लिए मरते आये है; अब उनके जीवन का पोषण करने के लिए हमें मरना होगा। बेशक उनके मरने में और हमारे मरने में बुनियादी फर्क होगा। वे बिन-जाने और अनिच्छापूर्वक मरे हैं। उनके इस विवश बलिदान में गिराया है। अब यदि हम ज्ञानपूर्वक और इच्छापूर्वक मरेंगे, तो हमारा बलिदान हमें और हमारे साथ समूचे राष्ट्र को ऊपर उठायेगा। यदि हम एक आजाद और स्वावलम्बी देश की तरह जीना चाहते हैं, तो इस आवश्यक बलिदान से हमें अपना कदम पीछे नहीं हटाना चाहिये।
सुसंस्कृत घर जैसी कोई पाठशाला नहीं और ईमानदारी तथा सदाचारी माता-पिता जैसे कोई शिक्षक नहीं। स्कूलों में मिलने वाली प्रचलित शिक्षा गांववालों पर एक व्यर्थ का बोझ है, जिसका उनके लिए कोई उपयोग नहीं है। उनके बच्चे उसे पाने की आशा नहीं कर सकते। और भगवान को धन्यवाद है कि यदि उन्हें सुसंस्कृत घर की तालीम मिल सके, तो उन्हें कभी भी उसकी कमी खटकेगी नहीं। अगर ग्रामसेवक संस्कारवान नहीं है, अगर वह अपने घर में सुसंस्कृत वातावरण पैदा करने की क्षमता नहीं रखता, तो उसे ग्रामसेवक बनने की, ग्रामसेवक होने का सम्मान और अधिकार पाने की, आकांक्षा छोड़ देना चाहिये।… उन्हें लिखने पढ़ने के ज्ञान की नहीं, अपनी आर्थिक स्थिति के और उसे सुधारने के उपायों के ज्ञान की जरूरत है। आज तो वे यंत्रों की तरह जड़वत् काम करते हैं; न तो उनमें अपने आस-पास की परिस्थितियों के प्रति अपनी जिम्मेदारी का भान है और न उन्हें अपने काम में कोई आनन्द ही आता है।
गांवों की ऐसी बुरी हालत का कारण यह है कि जिन्हें शिक्षा का सौभाग्य प्राप्त हुआ है, उन्होंने गांवों की बहुत उपेक्षा की है। उन्होंने अपने लिए शहरी जीवन चुना है। ग्राम-आन्दोलन तो इसी बात का एक प्रयत्न है कि जो लोग सेवा की भावना रखते हैं, उन्हें गांवों में बसकर ग्रामवासियों की सेवा में लग जाने के लिए प्रेरित करके गांवों के साथ स्वास्थ्यप्रद संपर्क स्थापित किया जाय। जो लोग सेवाभाव से ग्रामों में बसे हैं, वे अपने सामने कठिनाइयां देखकर हतोत्साह नहीं होते। वे तो इस बात को जानकार ही वहां जाते हैं कि अनेक कठिनाइयों में, यहां तक कि गांववालों की उदासीनता के होते हुए भी, उन्हें वहां काम करना है। जिन्हें अपने मिशन में और खुद अपने-आप में विश्वास हैश् वे ही गांववालों की सेवा करके उनके जीवन पर कुछ असर डाल सकेंगे। सच्चा जीवन बिताना खुद ऐसा सबक है, जिसका आस-पास के लोगों पर जरूर असर पड़ता है। लेकिन इस नवयुवक के साथ कठिनाई यह है कि वह किसी सेवाभाव से नहीं, बल्िक सिर्फ अपने जीवन-निर्वाह के लिए रोजी कमाने को गांव में गया है। और जो सिर्फ कमाई के लिए ही वहां जाते हैं, उनके लिए ग्राम-जीवन में कोई आकर्षण नहीं है, यह मैं स्वीकार करता हूं। सेवाभाव के बगैर जो लोग गांवों में जाते हैं, उनके लिए तो उसकी नवीनता नष्ट होते ही ग्राम-जीवन नीरस हो जायेगा ।
अत: गांवों में जरने वाले किसी नवयुवक को कठिनाइयों से घबराकर तो कभी अपना रास्ता नहीं छोड़ना चाहिये। सब्र के साथ प्रयत्न जारी रखा जाय, तो मालूम पड़ेगा कि गांव वाले शहरवालों से बहुत भिन्न नहीं हैं। और उन पर दया करने और ध्यान देने से वे भी साथ देंगे। यह निस्सन्देह सच है कि गांवों में देश के बड़े आदमियों के सम्पर्क का अवसर नहीं मिलता है। हां, ग्राम-मनोवृत्ति की वृद्धि होने पर नेताओं के लिए जरूरी हो जायेगा कि वे गांवों में दौरा करके उनके साथ जीवित सम्पर्क स्थापित करें। मगर चैतन्य, रामकृष्ण, तुलसीदास, कबीर, नानक, दादू, तुकाराम, तिरूवल्लुर जैसे सन्तों के ग्रन्थों के रूप में महान और श्रेष्ठ जनों का सत्संग तो सबको आज भी प्राप्त है। कठिनाई यही है कि मन को इन स्थायी महत्व की बातों को ग्रहण करने लायक कैसे बनाया जाय। अगर आधुनिक विचारों का राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक और वैज्ञानिक साहित्य प्राप्त करने से यहां आशय हो, तो कुतूहल शांत करने के लिए ऐसा साहित्य मिल सकता है। लेकिन मैं यह मंजूर करता हूं कि जिस आसनी से धार्मिक साहित्य मिल जाता है वैसे यह साहित्य नहीं मिलता। सन्तों ने तो सर्व-साधारण के ही लिए लिखा और कहा है। पर आधुनिक विचारों को सर्व-साधारण के ग्रहण करने योग्य रूप में अनूदित करने का शौक अभी पुरे रूप में सामने नहीं आया है। यह जरूर है कि समय रहते ऐसा होना चाहिये। अतएव नवयुवकों को मेरी सलाह है कि… वे अपना प्रयत्न छोड़ न दें, बल्कि उसमें लगे रहें और अपनी उपास्थिति से गांवों को अधिक प्रिय और रहने योग्य बना दें। लेकिन यह वे करेंगे ऐसी सेवा के ही द्वारा, जो गांववालों के अनुकूल हो। अपने ही परिश्रम से गांवों को अधिक साफ-सुथरा बनाकर और अपनी योग्यतानुसार गांवों की निरक्षरता दूर करके हर एक व्यक्ति इसकी शुरूआत कर सकता है। और अगर उनके जीवन साफ, सुघड़ और परिश्रमी हों, तो इसमें कोई शक नहीं कि जिन गांवों में वे काम कर रहे होंगे, उनमें भी उसकी छूत फैलेगी और गाववाले भी साफ, सुघड़ और परिश्रमी बनेंगे।
ग्राम सेवा के आवश्यक अंग
गाम-उद्धार में अगर सफाई न आवे, तो हमारे गांव कचरे के घूरे जैसे ही रहेंगे। ग्राम-सफाई का सवाल प्रजा के जीवन का अविभाज्य अंग है। यह प्रश्न जितना आवश्यक उतना ही कठिन भी है। दीर्घ काल में जिस अस्वच्छता की आदत हमें पड़ गई है, उसे दूर करने के लिए महान पराक्रम की आवश्यकता है। जो सेवक ग्राम-सफाई का शास्त्र नहीं जानता, खुद भंगी का काम नहीं करता, वह ग्राम सेवक के लायक नहीं बन सकता।
नई तालीम के बिना हिन्दुस्तान के करोड़ो बालकों को शिक्षण देना लगभग असंभव है, यह चीज सर्वमान्य हो गई कही जा सकती है। इसलिए ग्रामसेवक को उसका ज्ञान होना ही चाहिये। उसे नई तालीम का शिक्षक होना चाहिये। इस तालीम के पीछे पौढ़-शिक्षण तो अपने-आप चला आयेगा। जहां नई तालीम ने घर कर लिया होगा, वहां बच्चे ही माता-पिता के शिक्षक बन जाने वाले हैं। कुछ भी हो, ग्रामसेवक के मन में पौढ़-शिक्षण देने की लगन होनी चाहिये।
स्त्री को अर्धांगिनी माना गया है। जब तक कानून से स्त्री और पुरूष के हक समान नहीं माने जाते, जब तक लड़की के जन्म का लड़के के जन्म जितना ही स्वागत नहीं किया जाता, तब तक समझना चाहिये कि हिन्दुस्तान लकवे के रोग से ग्रस्त है। स्त्री का अवगणना अहिंसा की विरोधी है। इसलिए ग्रामसेवक को चाहिये कि वह हर स्त्री को मां, बहन या बेटी के समान समझे और उसके प्रति आदर-भाव रखे। ऐसा ग्रामसेवक ही ग्रामवासियों का विश्वास प्राप्त कर सकेगा।
रोगी प्रजा के लिए स्वराज्य प्राप्त करना मैं असंभव मानता हूं। इसलिए हम लोग आरोग्य-शास्त्र की जो अवगणना करते हैं वह दूर होनी चाहिये। अत: ग्रामसेवक को आरोग्य-शास्त्र का सामान्य ज्ञान होना चाहिये।
राष्ट्रभाषा के बिना राष्ट्र नहीं बन सकता। ‘हिन्दी-हिन्दुस्तानी-उर्दू’ के झगड़े में न पड़कर ग्रामसेवक, अगर वह राष्ट्रभाषा नहीं जानता, उसका ज्ञान हासिल करे। उसकी बोली ऐसी होनी चाहिए, जिसे हिन्दू-मुसलमान सब समझ सकें।
हमने अंग्रेजी के मोह में फंसकर मातृभाषा का द्रोह किया है। इस द्रोह के प्रायश्चित के तौर पर भी ग्रामसेवक मातृभाषा के प्रति लोगों के मन में प्रेम उत्पन्न करेगा। उसके मन में हिन्दुस्तान की सब भाषाओं के लिए आदर होगा। उसकी अपनी मातृभाषा जो भी हो, जिस प्रदेश में वह बसेगा वहां कह मातृभाषा वह स्वयं सीखकर अपनी मातृभाषा के प्रति वहां के लोगों की भावना बढ़ायेगा।
अगर इस सबके साथ-साथ आर्थिक समानता का प्रचार न किया गया, तो यह सब निकम्मा समझना चाहिये। आर्थिक समानता का यह अर्थ हरगिज नहीं कि हर एक के पास धन की समान राशि होगी। मगर यह अर्थ जरूर है कि हर एक पास ऐसा घर-बार, वस्त्र और खाने-पीने का समान होगा कि जिससे वह सुख से रह सके। और जो घातक असमानता आज मौजुदा है, वह केवल अहिंसक उपायों से ही नष्ट होगी।
आवश्यक योग्यतायें
[ नीचे दी गई कुछ आवश्यक योग्यतायें गांधीजी ने सत्याग्रहियों के लिए आवश्यक बतलाई थीं। लेकिन चूंकि उनके मतानुसार एक ग्रामसेवक को भी सच्चा सत्याग्रही होना चाहिये, इसलिए ये योग्यतायें ग्रामसेवक पर भी लागू होने वाली मानी जा सकती हैं। ]
1. ईश्वर में उसकी सजीव श्रद्धा होनी चाहिये, क्योंकि वही उसका आधार है।
2. वह सत्य और अहिंसा को धर्म मानता हो और इसलिए उसे मनुष्य-स्वीभाव की सुप्त सात्विकता में विश्वास होना चाहिये। अपनी तपश्चर्या के रूप में प्रदर्शित सत्य और प्रेम के द्वारा वह उस सात्विकता को जाग्रत करना चाहता है।
3. वह चरित्र्यवान हो और अपने लक्ष्य के लिए जान और माल को कुरबान करने के लिए तैयार हो।
4. वह आदतन खादीधारी हो और कातता हो। हिन्दुस्तान के लिए यह लाजिमी है।
5. वह निर्व्यसनी हो, जिससें की उसकी बुद्धि हमेशा स्वच्छ और स्थिर रहे।
6. अनुशासन के नियमों का पालन करने में हमेशा तत्पर रहता हो:
यह न समझना चाहिये कि इन शर्तों में ही सत्याग्रही की योग्यताओं की परिसमाप्ति हो जाती है। ये तो केवल दिशा-दर्शक हैं।
अनुक्रमणिका
- १. मेरे सपनो का भारत
- २. स्वराज्य का अर्थ
- ३. राष्ट्रवाद का सच्चा स्वरूप
- ४. भारतीय लोकतंत्र
- ५. भारत और समाजवाद
- ६. भारत और साम्यवाद
- ७. उद्योगवाद का अभिशाप
- ८. वर्गयुध्द
- ९. हड़ताल
- १०. मज़दूर क्या चुनेंगे?
- ११. अधिकार या कर्तव्य ?
- १२. बेकारी का सवाल
- १३. दरिद्र-नारायण
- १४. शरीर-श्रम
- १५. सर्वोदय
- १६. संरक्षता का सिद्धांत
- १७. अहिंसक अर्थ-व्यवस्था
- १८. सामान वितरण का रास्ता
- १९. भारत में अहिंसा की उपासना
- २०. सर्वोदयी राज्य
- २१. सत्याग्रह और दुराग्रह
- २२. किसान
- २३. गांवों की ओर
- २४. ग्राम-स्वराज्य
- २५. पंचायत राज
- २६. ग्रामोद्योग
- २७. सरकार क्या कर सकती है?
- २८. ग्राम-प्रदर्शनियां
- २९. चरखे का संगीत
- ३०. मिल-उद्योग
- ३१. स्वदेशी
- ३२. गोरक्षा
- ३३. सहकारी गो पालन
- ३४. गांवों की सफाई
- ३५. गांव का आरोग्य
- ३६. गांवों का आहार
- ३७. ग्राम सेवक
- ३८. समग्र ग्राम सेवा
- ३९. युवकों को आह्वान
- ४०. राष्ट्र का आरोग्य, स्वच्छता और आहार
- ४१. शराब और अन्य मादक द्रव्य
- ४२. शहरों की सफाई
- ४३. विदेशी माध्यम की बुराई
- ४४. मेरा अपना अनुभव
- ४५. भारत की सांस्कृतिक विरासत
- ४६. नई तालीम
- ४७. बुनियादी शिक्षा
- ४८. उच्च शिक्षा
- ४९. शिक्षा का आश्रमी आदर्श
- ५०. राष्ट्रभाषा और लिपि
- ५१. प्रान्तीय भाषायें
- ५२. दक्षिण में हिन्दी
- ५३. विद्यार्थियों के लिए अनुशासन के नियम
- ५४. भारतीय स्त्रियों का पुनरूत्थान
- ५५. स्त्रियों की शिक्षा
- ५६. संतति-नियमन
- ५७. काम-विज्ञान की शिक्षा
- ५८ (……..)
- ५९. साम्प्रदायिक एकता
- ६०. वर्णाश्रम धर्म
- ६१. अस्पृश्यता का अभिशाप
- ६२. भारत में धार्मिक सहिष्णुता
- ६३. धर्म – परिवर्तन
- ६४. (…)
- ६५. प्रान्तों का पुनर्गठन
- ६६. अल्पसंख्यकों की समस्यायें
- ६७. भारतीय गवर्नर
- ६८. समाचार-पत्र
- ६९. शान्ति सेना
- ७०. भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस
- ७१. भारत पाकिस्तान और काश्मीर
- ७२. भारत में विदेशी बस्तियां
- ७३. भारत और विश्वशांति
- ७४. पूर्व का संदेश
- ७५. स्फूट वचन
