३९. युवकों को आह्वान
मेरी आशा देश के युवकों पर है। उनमें से जो बुरी आदतों के शिकार हैं, वे स्वभाव से बुरे नहीं हैं। वे उनमें लाचारी से और बिना सोचे-समझे फंस जाते हैं। उन्हें समझना चाहिये कि इससे उनका और देश के युवकों का कितना नुकसान हुआ हैं। उन्हें यह भी समझना चाहिये कि कठोर अनुशासन द्वारा नियमित जीवन ही उन्हें और राष्ट्र को सम्पूर्ण विनाश से बचा सकता है, कोई दूसरी चीज नहीं।
सबसे बड़ी बात यह है कि उन्हें ईश्वर की खोज करनी चाहिये और प्रलोभनों से बचने के लिए उसकी मदद मांगनी चाहिये। उसके बिना यं त्र की तरह केवल अनुशासन का पालन करने से विशेष लाभ नहीं होगा। ईश्वर की खोज का, उसके ध्यान और दर्शन का अर्थ यह है कि जिस तरह बालक बिना किसी प्रदर्शन की आवश्कता के अपनी मां के प्रेम को महसूस करता हैं, उसी तरह हम भी यह महसूस करें कि ईश्वर हमारे हृदयों में विराजमान है।
युवकों को, जो भविष्य के विधाता होने का दावा करते है, राष्ट्र का नमक-रक्षक तत्व-होना चाहिये। यदि यह नमक ही अपना खारापन छोड़ दे, तो उसे खारा कैसे बनाया जाय ?
युवक तो सर्वत्र भावना के प्रभाव में बह जाने वाले होते हैं। इसीलिए अध्ययन-काल में, यानी कम-से-कम 25 वर्ष की आयु तक, प्रतिज्ञापूर्वक ब्रम्हाचर्य का पालन करन की आवश्यकता है।
युवावस्था की निर्दोष पवित्रता एक अमूल्य निधि है। इन्द्रियों की क्षणिक तृप्ति के लिए, जिसे भूल से सुख का नाम दिया जाता है, उसे खोना नहीं चाहिये।
अपना सारा ज्ञान और पांडित्य तराजू के एक पलडे़ पर और सत्य तथा पवित्रता को दुसरे पलडे़ पर रखकर देखो। सत्य और पवित्रता वाला पलडा़ पहले पलडे़ से कहीं भारी पडे़गा। नैतिक अपवित्रता की विषैली हवा आज हमारे विद्यार्थियों में भी जा पहुंची है और किसी छिपी हुई महामारी की तरह उनकी भयंकर बरबादी कर रही है। इसलिए मैं तुम लागों से, लड़को से और लड़कियों से, अनुरोध करता हूं कि तुम अपने मन और शरीर को पवित्र रखो । तुम्हारा सारा पांडित्य और शास्त्रों का तुम्हारा सारा अध्ययन बिलकुल बेकार होगा, यदि तुम उनकी शिक्षाओं को अपने दैनिक जीवन में न उतार सको। मैं जानता हूं कि कुछ शिक्षक भी ऐसे हैं, जो पवित्र और स्वच्छ जीवन नहीं बिताते। उनसे मैं कहूंगा कि वे अपने छात्रों को दुनिया का सारा ज्ञान सिखा दें, परन्तु यदि वे उनमें सत्य और पवित्रता की लगन पैदा न करें, तो यही कहना होगा कि उन्होंने अपने छात्रों का द्रोह किया है और उन्हें उपर उठाने के बजाय आत्मनाश के मार्ग की ओर प्रवृत्त किया है। चरित्र के अभाव में ज्ञान बुराई को ही बढा़ने वाली शक्ति है, जैसा की हम उपर से भले दिखाई देने वाले किन्तु भीतर से चोरी और बेईमानी का धंधा करने वाले अनेक लोगों के मामले में देखते हैं।
मैं चाहता हूं कि तुम (नवयुवक) गांवों में जाओ और वहां जमकर बैठ जाओ- उनके मालिकों या उपकारकर्ताओं की तरह नहीं, बल्कि उनके विनम्र सेवकों की तरह। तुम्हारी दैनिक चर्या से और तुम्हारे रहन-सहन से उन्हें समझने दो कि उन्हें खुद क्या करना है और अपना रहने का ढंग किस तरह बदलना है; महज भावना का कोई उपयोग नहीं है, ठीक उसी तरह जैसे कि भाप का अपने-आप में कोई उपयोग नहीं। भाप को उचित नियंत्रण में रखा जाय तभी उसमें प्रचंड शक्ति पैदा होती है। यही बात भावना की है। मैं चाहता हूं कि तुम भारत की आहत आत्मा के लिए शान्तिदायी लेप लेकर जाने वाले भगवान के दूतों की तरह उनके बीच में जा पहुंचो।
अनेक लड़कों और लड़कियों के या तुम चाहो तो कह सकते हो कि हजारों लड़कों और लड़कियों के पिता के नाते मैं तुमसे कहना चाहता हूं कि आखिर तुम्हारा भाग्य तुम्हारें ही हाथों में है। यदि तुम केवल दो शर्तों का पालन करो तो तुम पाठशाला में क्या सीखते हो या क्या नहीं सीखते, इसकी मैं बिलकुल परवाह नहीं करूगा। एक शर्त तो यह कि परिस्थिति कुछ भी क्यों न हो, तुम्हें भारी-से-भारी कठिनाइयों में भी पूरी निर्भयता के साथ सत्य का ही पालन करना चाहिये। सत्यनिष्ठ लड़का-सच्चा वीर अपने मन में कभी किसी चींटी को भी चोट पहुंचाने का खयाल नहीं आने देगा। वह आपनी पाठशाला के सारे कमजोर लड़कों का रक्षक बनकर रहेगा और पाटशाला के भीतर या बाहर उन सब लोगों की मदद करेगा जिन्हें उसकी मदद की आवश्यकता है। जो लड़का मन, शरीर और कार्य की पवित्रा की रक्षा नहीं करता, उसका पाठशाला में कोई काम नहीं उसे पाठशाला से निकाल देना चाहिये। शूरवीर लड़का हमेशा अपना मन पवित्र रखेगा, अपनी आंखे पवित्र रखेगा और अपने हाथ पवित्र रखेगा। जीवन के इन बुनियादी उसूलों को सीखने के लिए तुम्हें किसी स्कूल में जाने की आवश्यकता नहीं है। और यदि तुमने इस त्रिविध पवित्रता को प्राप्त कर लिया, तो तुम यह मान लो कि तुम्हारे जीवन का निर्माण सुदृढ़ नींव पर होगा।
हम एक ऊंची ग्राम-सभ्यता के उत्तराधिकारी हैं। हमारे देश की विशालता, आबादी की विशालता और हमारे भूमि की स्थिति तथा आबहवा ने, मेरी राय में, मानो यह तय कर दिया है कि उसकी सभ्यता ग्राम-सभ्यता ही होगी। उसके दोष तो मशहूर हैं, लेकिन उनमें कोई ऐसा नहीं हैं जिसका इलाज न हो सकता हो। इस सभ्यता को मिटाकर दसकी जगह दूसरी सभ्यता को जमाना मुझे तो अशक्य मालूम होता है। हां, हम लोग किन्हीं कठोर उपायों के द्वारा अपनी आबादी 30 करोड़ से घटकर 3 करोड़ या 30 लाख तक करने को तैयार हो जायं तो दूसरी बात हैं। इसलिए यह मानकर कि हम लोगों को मौजूदा ग्राम-सभ्यता ही कायम रखना है और उसके माने हुए दोषों को दूर करने का प्रयत्न करना है, मैं उन दोषों के इलाज सुझा सकता हूं। लेकिन इन इलाजों का उपयोग तभी हो सकता है जब कि देश का युवक-वर्ग ग्राम-जीवन को अपना ले। और अगर वे ऐसा करना चाहते हों, तो उन्हें अपने जीवन का तौर-तरीका बदलना चाहिये और अपनी छुट्टियों का हर एक दिन अपने कालेज या हाईस्कूल के आस-पास वाले गांवों में बिताना चाहियें; और जो लोग अपनी शिक्षा पूरी कर चुके हों या जो शिक्षा ले ही न रहे हों, उन्हें गांवों में बसने का इरादा कर लेना चाहिये।
शारीरिक श्रम के साथ अकारण ही जो शर्म की भावना जुड़ गयी है वह अगर दूर की जा सके, तो सामान्य बुद्धि वाले हर एक युवक और युवती के लिए उन्हें जितना चाहिये उससे कहीं अधिक काम पड़ा हुआ है।
जो आदमी अपनी जीविका ईमानदारी से कमाना चाहता है, वह किसी भी श्रम को छोटा यानी अपनी प्रतिष्ठा को घटाने वाला नहीं मानेगा। महत्व की बात यह है कि भगवान ने हमें जो हाथ-पांव दिये हैं, उनका उपयोग करने के लिए हम तैयार रहें।
अनुक्रमणिका
- १. मेरे सपनो का भारत
- २. स्वराज्य का अर्थ
- ३. राष्ट्रवाद का सच्चा स्वरूप
- ४. भारतीय लोकतंत्र
- ५. भारत और समाजवाद
- ६. भारत और साम्यवाद
- ७. उद्योगवाद का अभिशाप
- ८. वर्गयुध्द
- ९. हड़ताल
- १०. मज़दूर क्या चुनेंगे?
- ११. अधिकार या कर्तव्य ?
- १२. बेकारी का सवाल
- १३. दरिद्र-नारायण
- १४. शरीर-श्रम
- १५. सर्वोदय
- १६. संरक्षता का सिद्धांत
- १७. अहिंसक अर्थ-व्यवस्था
- १८. सामान वितरण का रास्ता
- १९. भारत में अहिंसा की उपासना
- २०. सर्वोदयी राज्य
- २१. सत्याग्रह और दुराग्रह
- २२. किसान
- २३. गांवों की ओर
- २४. ग्राम-स्वराज्य
- २५. पंचायत राज
- २६. ग्रामोद्योग
- २७. सरकार क्या कर सकती है?
- २८. ग्राम-प्रदर्शनियां
- २९. चरखे का संगीत
- ३०. मिल-उद्योग
- ३१. स्वदेशी
- ३२. गोरक्षा
- ३३. सहकारी गो पालन
- ३४. गांवों की सफाई
- ३५. गांव का आरोग्य
- ३६. गांवों का आहार
- ३७. ग्राम सेवक
- ३८. समग्र ग्राम सेवा
- ३९. युवकों को आह्वान
- ४०. राष्ट्र का आरोग्य, स्वच्छता और आहार
- ४१. शराब और अन्य मादक द्रव्य
- ४२. शहरों की सफाई
- ४३. विदेशी माध्यम की बुराई
- ४४. मेरा अपना अनुभव
- ४५. भारत की सांस्कृतिक विरासत
- ४६. नई तालीम
- ४७. बुनियादी शिक्षा
- ४८. उच्च शिक्षा
- ४९. शिक्षा का आश्रमी आदर्श
- ५०. राष्ट्रभाषा और लिपि
- ५१. प्रान्तीय भाषायें
- ५२. दक्षिण में हिन्दी
- ५३. विद्यार्थियों के लिए अनुशासन के नियम
- ५४. भारतीय स्त्रियों का पुनरूत्थान
- ५५. स्त्रियों की शिक्षा
- ५६. संतति-नियमन
- ५७. काम-विज्ञान की शिक्षा
- ५८ (……..)
- ५९. साम्प्रदायिक एकता
- ६०. वर्णाश्रम धर्म
- ६१. अस्पृश्यता का अभिशाप
- ६२. भारत में धार्मिक सहिष्णुता
- ६३. धर्म – परिवर्तन
- ६४. (…)
- ६५. प्रान्तों का पुनर्गठन
- ६६. अल्पसंख्यकों की समस्यायें
- ६७. भारतीय गवर्नर
- ६८. समाचार-पत्र
- ६९. शान्ति सेना
- ७०. भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस
- ७१. भारत पाकिस्तान और काश्मीर
- ७२. भारत में विदेशी बस्तियां
- ७३. भारत और विश्वशांति
- ७४. पूर्व का संदेश
- ७५. स्फूट वचन
