४०. राष्ट्र का आरोग्य, स्वच्छता और आहार
अब तो यह बात निर्विवाद सिद्व हो चुकी है कि तन्दुरूस्ती के नियमों को न जानने से और उन नियमों के पालन में लापरवाहर रहने से ही मनुष्य-जाति का जिन-जिन रोगों से परिचय हुआ है, उनमें से ज्यादातर रोग उसे होते हैं। बेशक, हमारे देश की दूसरे देशों से बढ़ी-चढ़ी मृत्युसंख्या का ज्यादातर कारण गरीबी है, जो हमारे देशवासियों के शरीर को कुरेदेर ख रही है; लेकिन अगर उनको तन्दुरूस्ती के नियमों की ठीक-ठीक तालीम दी जाय, तो इसमें बहुत कमी की जा सकती है।
मनुष्य-जाति के लिए साधारणत: पहला नियम यह है कि मन चंगा है तो शरीर भी चंगा है। नीरोग शरीर में निर्विकार मन का वास होता है, यह एक स्वयंसिद्ध सच्चाई है। मन और शरीर के बीच अटूट सम्बन्ध है। अगर हमारे मन निर्विकार यानी नीरोग हों, तो वे हर तरह की हिंसा से मुक्त हो जायं; फिर हमारे हाथों तन्दुरूस्ती के नियमों का सहज भाव से पालन होने लगे और किसी तरह की खास कोशिश के बिना ही हमारे शरीर तन्दुरूस्त रहने लगें। इन करणों से मैं यह आशा रखता हूं कि कोई भी काग्रेसी रचनात्मक कार्यक्रम के इस अंग के बारे में लापरवाह न रहेगा। तन्दुरूस्ती के कायदे और आरोग्यशास्त्र के नियम बिलकुल सरल और सादे हैं, और वे आसानी से सीखे जा सकते हैं। मगर उन पर अमल करना मुश्किल है। नीचे मैं ऐसे कुछ नियम देता हूं:
1. हमेशा शुद्ध विचार करो और तमाम गन्दे व निकम्मे विचारों को मन से निकाल दो।
2. दिन-रात ताजी-से-ताजी हवा का सेवन करो।
3. शरीर और मन के काम का तौल बनाये रखो, यानी दोनों को बेमेल न होने दो।
4. तनकर खड़े रहो, तनकर बैठो और अपने हर काम में साफ-सुथरे रहो; और इन सब आदतों को अपनी आन्तरिक स्वस्थता का प्रतिबिम्ब बनने दो।
5. खाना इसलिए खाओ कि अपने जैसे अपने मानव-बन्धुओं की सेवा के लिए ही जिया जा सके। भोग-भोगने के लिए जीने और खाने का विचार छोड़ दो। अतएव उतना ही खाओ जितने से आपका मन और आपका शरीर अच्छी हालत में रहे और ठीक से काम कर सके। आदमी जैसा खाना खाता, वैसा ही बन जाता है।
6. आप जो पानी पीयें, जो खाना खायें और जिस हवा में सांस लें, वे सब बिलकुल साफ होने चाहिये। आप सिर्फ अपनी निज की सफाई से सन्तोष न मानें, बल्कि हवा, पानी और खुराक की जितनी सफाई आप अपने लिए रखें, उतनी ही सफाई का शौक आप अपने आस-पास के वातावरण में भी फैलायें।
न्यूनतम आहार
एक समय एक ही अनाज इस्तेमाल करना चाहिये। चपाती, दाल-भात, दूध-घी, गुड़ और तेल ये खाद्य-पदार्थ सब्जी-तरकारी और फलों के उपरान्त आम तौर पर हमारे घरों में इस्तेमाल किये जाते हैं। आरोग्य की दृष्टी से यह मेल ठीक नहीं है। जिन लोगों को दूध, पनीर, अंडे या मांश के रूप में ‘स्नायुवर्धक तत्व’ मिल जातें हैं, उन्हें दाल की बिलकुल जरूरत नहीं रहती। गरीब लोगों को तो सिर्फ वनस्पति द्वारा ही स्नायुवर्धक तत्व मिल सकते हैं। अगर धनिक वर्ग दाल और तेल लेना छोड़ दे, तो गरीब को जीवन-निर्वाह के लिए ये आवश्यक पदार्थ मिलने लगें। इन बेचारों को न तो प्राणियों के शरीर से पैदा हुए स्नायुवर्धक तत्व और न चर्बी ही मिल सकती है। अन्न को दलिया की तरह मुलायम बनाकर कभी न खाना चाहिये। अगर उसको किसी रसीली या तरल चीज में डुबोये बगैर सूखा ही खाया जाय, तो आधी मात्रा से ही काम चल जाता है। अन्न को कच्ची सलाद, जैसे कि प्याज, गाजर, मूली, लेटिस, हरी पत्तियां और टमाटर के साथ खाया जाय तो अच्छा होता है। कच्ची हरी सब्जियों को सलाद के एक दो औंस ही आठ औंस पकाई हुई सब्जियों के बराबर होते हैं। चपाती यर डबल रोटी दूध के साथ नहीं लेनी चाहिये। शुरू में एक वक्त चपाती या डबल रोटी और कच्ची सब्जियां, और दूसरे वक्त पकाई हुई सब्जी, दूध या दही के साथ ले सकते हैं। मिष्टान्न भोजन बिलकुल बन्द कर देना चाहिये। इसकी जगह गुड़ या थोड़ी मात्रा में शक्कर अकेले या दूध या डबल रोटी के साथ ले सकते हैं।
ताजे फल खाना अच्छा है, परन्तु शरीर के पोषण के लिए थोड़ा फल-सेवन भी पर्याप्त होता है। यह महंगी वस्तु है और धनिक लोगों के आवश्यकता से अत्यन्त अधिक फल-सेवन के कारण गरीबों और बीमारों को, जिन्हें धनिकों की अपेक्षा अधिक फलों की जरूरत है, फल मिलना दुश्वार हो गया है।
कोई भी वैद्य या डॉक्टर, जिसने भोजन के शास्त्र का अध्ययन किया है प्रमाण के साथ कह सकेगा कि मैंने ऊपर जो बताया है, उससे शरीर को किसी प्रकार का नुकसान नहीं हो सकता। उलटे, तन्दुरूस्ती अधिक अच्छी अवश्य हो सकती है।
मनुष्य को अपनी शक्ति के सर्वोच्च स्तर पर कार्य कर सकने के लिए पूरा पोषण पहुंचाने की वनस्पति- जगत की अपार क्षमता की आधुनिक औषधि- विज्ञान ने अभी तक कोई जांच- पड़ताल नहीं की है। उसने तो बस मांस या बहुत हुआ तो दूध और दूध से प्राप्त दूसरे पदार्थो का ही सहारा पकड़ रखा है। भारतीय चिकित्सकों का, जो परम्परा से शाकाहारी हैं, कर्त्तव्य है कि वे इस कार्य को पूरा करें। विटामिनों की तेजी से हो रही खोजों से, और इस सम्भावना से कि अधिक महत्व के विटामिनों को सूर्य से सीधा पाया जा सकता है, ऐसा प्रकट होता है कि आहार के क्षेत्र में एक बड़ी क्रांति होने जा रही है और उसके विषय में अभी तक जो स्वीकृत सिद्धांत चले आ रहे थे तथा औषधि विज्ञान अभी तक जिन विश्वासों का पोषण करता आ रहा था, उनमें शीघ्र ही परिवर्तन होने वाला है।
मुझे ऐसा दिखाई देता है कि इस रास्ते की विकट कठिनाईयों को पार करने और अपने प्राणों की बाजी लगाकर भी इस विषय के सत्य को ढूंढ़ निकालने का काम निष्णात डॉक्टर लोग नहीं, बल्कि सामान्य परन्तु उत्साही जिज्ञासु ही करने वाले हैं। यदि सत्य के इन विनम्र शोधकों को वैज्ञानिक लोग मदद दें, तो मुझे उससे ही सन्तोष हो जायेगा।
मेरा यह विश्वास है कि मनुष्यों को शायद ही दवा लेने की आवश्यकता रहती है। पथ्य तथा पानी, मिट्टी इत्यादि के घरेलू उपचारों से एक हजार में से 999 रोगी स्वथ्य हो सकते हैं।
शरीर का भगवान के मंदिर की तरह उपयोग करने के बजाय हम उसका उपयोग विषय- भोगों के साधन की तरह करते हैं और इन विषय- सुखों को बढा़ने की कोशिश में डॉक्टरों के पास दौड़े जाने में तथा अपने पार्थिव आवास, इस शरीर का,दुरूपयोग करने में लज्जा का अनुभव नहीं करते।
मनुष्य जैसा आहार करता है वैसा ही वह बनता है- इस कहावत में काफी सत्य है। आहार जितना तामस होगा, शरीर भी उतना तामस होगा।
मैं यह अवश्य महसूस करता हूं कि आध्यामिक प्रगति के क्रम में एक अवस्था ऐसी जरूर आती है, जिसकी यह मांग होती है कि हम अपने शरीर की आवश्याकताओं की पूर्ति के लिए अपने सहजीवी प्राणियों की हत्या करना बन्द कर दें। आपके के साथ शाकाहार के प्रति अपने इस आकर्षण की चर्चा करते हुए मुझ गोल्डस्मिथ की ये सुन्दर पंक्तियां याद आती है:
पहाड़ इस घाटी में आजादी से विचरने वाले
इन प्राणियों की मैं हत्या नहीं करता।
जो परमशक्ति हमें अपनी दया का दान देती है,
उससे मैं दया की सीख लेता हूं:
और उन्हें अपनी दया देता हूं।
किसी भी देश में, किसी भी जलवायु में और किसी भी स्थिति में, जिसमें मनुष्यों का रहना साधारणत: सम्भव हो, मेरी समझ में हम लागों के लिए मांसाहार आवश्यक नहीं है। मेरा विश्वास है कि हमारी नसल(मनुष्य-जाति) के लिए मांसाहार अनुपयुक्त है। अगर हम पशुओं से अपने को उंचा मानते हैं, तो उनकी नकल करने में भूल करते हैं। यह बात अनुभव – सिद्ध है कि जिन्हें आत्म- संयम इष्ट है, उनके लिए मांसाहार अनुपयुक्त है।
किन्तु चरित्र-गठन और आत्म-संयम के लिए भोजन के महत्व का अनुमान करने में अति करना भी भूल है । इस बात को भूलना नहीं होगा कि इसके लिए भोजन एक मुख्य वस्तु है । मगर जिस प्रकार भोजन में किसी तरह का संयम न रखना और मनमाना खाना-पीना अनुचित है, उसी प्रकार सभी धर्म-कर्म का सार भोजन में ही मान बैठना भी, जैसा कि प्राय: हिन्दुस्तान में हुआ करता है, गलत है । हिन्दु धर्म के अमूल्य उपदेशों में शाकाहार भी एक है । इसे हलके मन से छोड़ देना ठीक नहीं होगा । इसलिए इस भूल का संशोधन करना परमावश्यक है कि शाकाहार के कारण दिमाग और देह से हम कमजोर हो गये हैं और कर्मशीलता में आलसी या निराग्रही बन गये हैं । हिन्दू धर्म के बडे़-से-बड़े सुधारक अपने अपने जमाने के सबसे बड़े कर्मठ पुरूष हुए हैं । जैसे, शंकर दयानन्द के जमाने का कौन पुरूष उनसे अधिक कर्मशीलता दिखा सका था ?
उपवास कब किया जाय ?
अपने और अपने ही जैसे दूसरे प्रयोगियों के काफी विस्तृत अनुभव के आधार पर मैं बिना किसी हिचकिचाहट के यह कहता हूं कि नीचे लिखी हालतों में उपवास ज रूर किया जाय :
1. यदि कब्ज की शिकायत हो , 2. यदि शरीर में रक्त का अभाव हो और उसका रंग पीला पड़ गया हो, 3. यदि बुखार मालूम होता हो, 4. यदि अपच हो, 5. यदि सिर में दर्द हो, 6. यदि संधिवात हो, 7. यदि घुटनों में और शरीर के दूसरे जोड़ों में दर्द की बिमारी हो, 8. यदि बेचैनी महसूस हो, 9. यदि मन उदास हो, 10. यदि अतिशय आनंद के कारण मन ठिकाने न हो ।
यदि इन अवसरों पर उपवास का आश्रय लिया जाय, तो डाक्टरों की या कोई दूसरी पेटेण्ट दवाइंया खाने की कोई जरूरत न रहेगी ।
राष्ट्रीय भोजन
मेरा ख्याल है कि हमें ऐसी टेव डालनी चाहिये कि अपने प्रान्त के सिवा दूसरे प्रान्तों में प्रचलित भोजन को भी हम स्वाद से खा सकें । मैं जानता हूं कि यह सवाल उतना आसान नहीं है, जितना वह दिखाई देता है । मैं ऐसे कई दक्षिण-भारतीयों को जानता हूं, जिन्होनें गुजराती भोजन करने की आदत डालने की बेहद कोशिश की, लेकिन जो उसमें कामयाब नहीं हो सकें । दूसरी तरफ, गुजरातियों को दक्षिण-भारतीयों की विधि से बनायी गयी रसोई पसन्द नहीं आती । बंगाल के लोगों की बानगियां दूसरे प्रान्त वालों को आसानी से नहीं रूचतीं । लेकिन यदि हम प्रान्तीयता से ऊपर उठकर अपनी रहन-सहन की आदतों में राष्ट्रीय बनना चाहें, तो हमें अपनी भोजन-सम्बन्धी आदतों में फर्क करने के लिए तथा उनके आदान-प्रदान के लिए तैयार होना पड़ेगा, अपनी रूचियां सादी करनी पड़ेगी और ऐसी बानगियां बनाने और खाने का रिवाज डालना होगा, जो स्वास्थ्यप्रद हों और जिन्हें सब लोग नि:संकोच ले सकें । इसके लिए पहले तो हमें विविध प्रान्तों, जातियों और समुदायों के भोजन का सावधानी से अध्ययन करन होगा । दुर्भाग्य से या सौभाग्य से, न सिर्फ हर एक प्रान्त का अपना विशेष भोजन है, बल्कि एक ही प्रान्त के विविध समुदायों की भोजन की अपनी-अपनी शैलियां हैं । इसलिए राष्ट्रीय कार्यकर्ताओं को चाहिये कि वे विविध प्रान्तों के भोजनों का और उन्हें बनाने की विधियों का अध्ययन करें तथा इन विविध भोजनों में पायी जाने वाली ऐसी सामान्य, सादी और सस्ती बनागियां ढूंढ़ निकालें जिन्हें सब लोग अपने पाचन-यंत्र को बिगाड़ने का खतरा उठाये बिना खा सकें । और जो भी हो, यह तो स्वीकार करना ही चाहिये कि विविध प्रान्तों और जातियों के रीति-रिवाजों और रहन-सहन के तरीकों का ज्ञान हमारे कार्यकर्ताओं को होना ही चाहिये और इस ज्ञान का न होना शर्म की बात मानी जानी चाहिये । इस कोशिश में हमारा उद्देश्य सामान्य लोगों के लिए कुछ समान बानगियां ढूंढ़ निकालने का होना चाहिये । और हमारी इच्छा हो तो यह आसानी से हो सकता है । लेकिन इसे संभव बनाने के कार्यकर्ताओं को स्वेच्छापूर्वक रसोई करने की कला सीखनी पड़ेगी, विविध भोजनों के पोषक मूल्यों का अध्ययन करना होगा और आसानी से बनने वाली सस्ती बानगियां तय करनी पड़ेंगी ।
कोढ़ का रोग
हिन्दुस्तान में लाखों आदमी इस रोग के शिकार हैं। लोग कोढ़ की बीमारी से और कोढि़यों से नफरत करते हैं। मेरी राय में जो लोग गन्दे विचार रखते हैं, वे शरीर के कोढि़यों से ज्यादा बुरे को ढ़ी हैं। किसी दूसरी बीमारी के बजाय कोढ़ की बीमारी के बारे में ही कलंक की बात क्यों समझी जानी चाहिये ?
पहले सिर्फ ईसाई मिशनरी ही कोढि़यों की सेवा का करीब-करीब सारा भार अपने ऊपर लिये हुए थे। मगर बाद में परोपकार की भावना वाले हिन्दुस्तानियों ने भी ( अगरचे बहुत कम तदाद में ) इस सेवा के काम को अपने हाथ में लिया। मैंने ऐसी एक संस्था कलकत्ता में देखी है। इस तरह के दूसरे जनसेवक श्री मनोहर दीवान हैं। वे श्री विनोबा के शिष्य हैं और उनकी प्रेरणा से उन्होंने यह काम अपने हाथ में लिया है। मैं उन्हें सच्चा महात्मा मानता हूं।
खुजली, हैजा, यहां तक कि मामूली जुकाम भी ऐसी छूत की बीमारियां हैं, जिनसे कोढ़ की छूत शायद बहुत कम लगती है। दूसरी छूत की बीमारियों के बजाय कोढ़ के बारे में इतनी नफरत क्यों रहनी चाहिये ? मैं आपसे कह चुका हूं कि सच्चे कोढ़ी तो वे हैं जिनके दिल गन्दे हैं। किसी इन्सान को अपने से नीचा समझना, किसी जाति या फिरके को नफरत की नजर से देखना बीमार दिमाग की निशानी है, जिसे मैं शरीर के कोढ़ से ज्यादा बुरा समझता हूं। ऐसे लोग समाज के असली कोढ़ी हैं। मैं खुद तो शब्दों को ज्यादा महत्व नहीं देता। अगर गुलाब को किसी दूसरे नाम से पुकारा जाय, तो उसकी खुशबू चली नहीं जायेगी।
अनुक्रमणिका
- १. मेरे सपनो का भारत
- २. स्वराज्य का अर्थ
- ३. राष्ट्रवाद का सच्चा स्वरूप
- ४. भारतीय लोकतंत्र
- ५. भारत और समाजवाद
- ६. भारत और साम्यवाद
- ७. उद्योगवाद का अभिशाप
- ८. वर्गयुध्द
- ९. हड़ताल
- १०. मज़दूर क्या चुनेंगे?
- ११. अधिकार या कर्तव्य ?
- १२. बेकारी का सवाल
- १३. दरिद्र-नारायण
- १४. शरीर-श्रम
- १५. सर्वोदय
- १६. संरक्षता का सिद्धांत
- १७. अहिंसक अर्थ-व्यवस्था
- १८. सामान वितरण का रास्ता
- १९. भारत में अहिंसा की उपासना
- २०. सर्वोदयी राज्य
- २१. सत्याग्रह और दुराग्रह
- २२. किसान
- २३. गांवों की ओर
- २४. ग्राम-स्वराज्य
- २५. पंचायत राज
- २६. ग्रामोद्योग
- २७. सरकार क्या कर सकती है?
- २८. ग्राम-प्रदर्शनियां
- २९. चरखे का संगीत
- ३०. मिल-उद्योग
- ३१. स्वदेशी
- ३२. गोरक्षा
- ३३. सहकारी गो पालन
- ३४. गांवों की सफाई
- ३५. गांव का आरोग्य
- ३६. गांवों का आहार
- ३७. ग्राम सेवक
- ३८. समग्र ग्राम सेवा
- ३९. युवकों को आह्वान
- ४०. राष्ट्र का आरोग्य, स्वच्छता और आहार
- ४१. शराब और अन्य मादक द्रव्य
- ४२. शहरों की सफाई
- ४३. विदेशी माध्यम की बुराई
- ४४. मेरा अपना अनुभव
- ४५. भारत की सांस्कृतिक विरासत
- ४६. नई तालीम
- ४७. बुनियादी शिक्षा
- ४८. उच्च शिक्षा
- ४९. शिक्षा का आश्रमी आदर्श
- ५०. राष्ट्रभाषा और लिपि
- ५१. प्रान्तीय भाषायें
- ५२. दक्षिण में हिन्दी
- ५३. विद्यार्थियों के लिए अनुशासन के नियम
- ५४. भारतीय स्त्रियों का पुनरूत्थान
- ५५. स्त्रियों की शिक्षा
- ५६. संतति-नियमन
- ५७. काम-विज्ञान की शिक्षा
- ५८ (……..)
- ५९. साम्प्रदायिक एकता
- ६०. वर्णाश्रम धर्म
- ६१. अस्पृश्यता का अभिशाप
- ६२. भारत में धार्मिक सहिष्णुता
- ६३. धर्म – परिवर्तन
- ६४. (…)
- ६५. प्रान्तों का पुनर्गठन
- ६६. अल्पसंख्यकों की समस्यायें
- ६७. भारतीय गवर्नर
- ६८. समाचार-पत्र
- ६९. शान्ति सेना
- ७०. भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस
- ७१. भारत पाकिस्तान और काश्मीर
- ७२. भारत में विदेशी बस्तियां
- ७३. भारत और विश्वशांति
- ७४. पूर्व का संदेश
- ७५. स्फूट वचन
