४१. शराब और अन्‍य मादक द्रव्‍य

जैसा कि कहा जाता है, शराब शैतान की ईजाद है। इस्‍लाम की किताबों में कहा गया है कि जब शैतान ने पुरूषों और स्त्रियों को ललचाना शुरू किया, तो उसने उन्‍हें शराब दिखाई थी। मैंने कितने ही मामलों में यह देखा है कि शराब आदमियों से न सिर्फ उनका पैसा छीन लेती है, बल्कि उनकी बुद्धि भी हर लेती है। उसके नशे में वे कुछ क्षणों के लिए उचित और अनुचित का, पुण्‍य और पाप का, यहां तक कि मां और पत्‍नी का भेद भी भूल जाते हैं। मैंने शराब के नशे में मस्‍त बैरिस्‍टरों को नालियों में लोटते और पुलिस के द्वारा घर ले जाये जाते देखा है। दो अवसरों पर मैंने जहाज के कप्‍तानों को शराब के नशे में ऐसा गर्क देखा है कि उनकी हालत जब तक उनका होश वापिस नहीं आया तब तक अपने जहाजों का नियंत्रण करने योग्‍य नहीं रह गयी थी। मांसाहार और शराब, दोनों के बारे में उत्तम नियम तो यह है कि हमें खाने, पीने और अमोद-प्रमोद के लिए नहीं जीना चाहिये, बल्कि इसलिए खाना और पीना चाहिये कि हमारे शरीर ईश्‍वर के मन्दिर बन जायं और हम उनका उपयोग मनुष्‍य की सेवा में कर सकें। औषधि के रूप में कभी-कभी शराब की आवश्‍यकता हो सकती है और मुमकिन है कि जब आदमी मरने के करीब हो तो शराब का घूंट उसकी जिन्‍दगी को थोड़ा और बढ़ा दे। लेकिन शराब के पक्ष में इससे अधिक और कुछ नहीं कहा जा सकता।

आपको ऊपर से ठीक दिखाई देने वाली इस दलील के भुलावे में नहीं आना चाहिये कि शराबबन्‍दी जोर-जबरदस्‍ती के आधार पर नहीं होनी चाहिये और जो लोग शराब पीना चाहते हैं उन्‍हें उसकी सुविधाएं मिलनी ही चाहिये। राज्‍य का यह कोई कर्त्तव्‍य नहीं है कि वह अपनी प्रजा की कुटेवों के लिए अपनी ओर से सुविधायें दे। हम वेश्‍यालयों को अपना व्‍यापार चलाने के लिए अनुमति-पत्र नहीं देते। इसी तरह हम चोरों को अपनी चोरी की प्रवृत्ति पूरी करने की सुविधायें नहीं देते। मैं शराब को चोरी और व्‍यभिचार, दोनों से ज्‍यादा निंद्य मानता हूं। क्‍या वह अक्‍सर इन दोनों बुराईयों की जननी नहीं होती ?

शराब की लत कुटेव तो है ही, लेकिन कुटेव से भी ज्‍यादा वह एक बीमारी है। मैं ऐसे बीसियों आदमियों को जानता हूं, जो यदि छोड़ सकें तो शराब पीना बड़ी खुशी से छोड़ दें। मैं ऐसे भी कुछ लोगों को जानता हूं, जिन्‍होंने यह कहा है कि शराब उनके सामने न लायी जाय। और जब उनके कहने के अनुसार शराब उनके सामने नहीं लायी गयी, तो मैंने उन्‍हें लाचार होकर शराब की चोरी करते हुए देखा है। लेकिन इसलिए मैं यह नहीं मानता कि शराब उनके पास से हटा लेना गलत था। बीमारों को अपने-आपसे यानी अपनी अनुचित इच्‍छाओं से लड़ने में हमें मदद देनी ही चाहिये।

मजदूरों के साथ अपनी आत्‍मीयता के फलस्‍वरूप मैं जानता हूं कि शराब की लत में फंसे हुए मजदूरों के घरों का शराब ने कैसा नाश किया है। मैं जानता हूं कि शराब आसानी से न मिल सकती होती तो वे शराब को छूते भी नहीं। इसके सिवा, हमारे पास हाल के ऐसे प्रमाण मौजूद हैं कि शराबियों में से ही कई खुद शराबबन्दि की मांग कर रहे हैं।

शराब की आदत मनुष्‍य की आत्‍मा का नाश कर देती है और उसे धीर-धीरे पशु बना डालती है, जो पत्‍नी, मां और बहन में भेद करना भूल जाता है। शराब के नशे में यह भेद जाने वाले लोगों को मैंने खुद देखा है।

शराब और अन्‍य मादक द्रव्‍यों से होने वाली हानि कई अशों में मलेरिया आदि बीमारियों से होने वाली हानि की अपेक्षा असंख्‍य गुनी ज्‍यादा है। कारण, बीमारियों से तो केवल शरीर को ही हानि पहुंचती है, जब कि शराब आदि से शरीर और आत्‍मा, दोनों का नाश हो जाता है।

मैं भारत का गरीब होना पसन्‍द करूंगा, लेकिन मैं यह बरदाश्‍त नहीं कर सकता कि हमारे हजारों लोग शराबी हों। अगर भारत में शराबबन्‍दी जारी करने के लिए लोगों को शिक्षा देना बन्‍द करना पड़े तो कोई परवाह नहीं: मैं यह कीमत चुकाकर भी शराब खोरी को बन्‍द करूंगा।

जो राष्‍ट शराब की आदत का शिकार है, कहना च‍ाहिये कि उसने सामने विनाश मुंह बाये खडा़ है। इतिहास में इस बात के कितने ही प्रमाण हैं कि इस बुराई के कारण कई साम्राज्‍य मिट्टी में मिल गये हैं। प्राचीन भारतीय इतिहास में हम जानते हैं कि वह पराक्रमी जाति, जिसमें श्री कृष्‍ण ने जन्‍म लिया था, इसी बुराई के कारण नष्‍ट हो गयी। रोम- साम्राज्‍य के पतन का एक सहायक कारण निस्‍सन्‍देह यह बुराई ही थी।

यदि मुझे एक घण्‍टे के लिए भारत का डिक्‍टेटर बना दिया जाय, तो मेरा पहला काम यह होगा कि शराब की दुकानों को बिना मुआवजा दिये बन्‍द करा दिया जाय और कारखानों के मालिकों को अपने मजदूरों के लिए मनुष्‍योचित परिस्थितियों निर्माण करने तथा उनके हित में ऐसे उपाहार- गृह और मनोरंजन- गृह खोलने के लिए मजबूर किया जाय, जहां मजदूरों को ताजगी देने वाले निर्दोष पेय और उतने ही निर्दोष मनोरंजन प्राप्‍त हो सकें।

ताडी़

एक पक्ष ऐसा है कि निश्चित(मर्यादित) मात्रा में शराब पीने का समर्थन करता है और कहता है कि इससे फायदा होता है। मुझे इस दलील में कुछ सार नहीं लगता। पर घडी़ भर के लिए इस दलील को मान लें, तो भी अनेक ऐसे लोगों के खातिर, जो कि मर्यादा में रह ही नहीं सकते, इस चीज का त्‍याग करना चाहिये।

पारसी भाइयों ने ताडी़ का बहुत समर्थन किया है। वे कहते हैं कि ताडी़ में मादकता तो है, मगर ताडी़ ऐ खुराक है और दूसरी खुराक को हजम करने में मदद पहुंचाती है। इस दलील पर मैंने खूब विचार किया है और इस बारे में काफी पढा़ भी है। मगर ताडी़ पीने वाले बहुत से गरीबों की मैंने जो दुर्दशा देखी है, उस पर से मैं इस निर्णय पर पहुंचा हूं कि ताडी़ को मनुष्‍य की खुराक में स्‍थान देने की कोई आवश्‍यकता नहीं है।

ताडी़ में जो गुण माने गये हैं वे सब हमें दूसरी खुराक में मिल जाते हैं। ताडी़ खजूरी के रस से बनती है। खजूरी के शुद्ध रस में मादकता बिलकुल नहीं होती। उसे नीरा कहते हैं। ताजी नीराको ऐसी- की- ऐसी पीने से कई लागों को दस्‍त साफ आता है। मैंने खुद नीरा पीकर देखी है। मुझ पर उसका ऐसा असर नहीं हुआ। परन्‍तु वह खुराक का काम तो अच्‍छी तरह से देती है। चाय इत्‍यादि के बदले मनुष्‍य सबेरे नीरा पी ले, तो दूसरा कुछ पीने या खाने की आवश्‍यकता नहीं रहनी चाहिये।

नीरा को गन्‍ने के रस की तरह पकाया जाय, तो उससे बहुत अच्‍छा गुड़ तैयार होता है। खजूरी ताड़ की एक किस्‍म है। हमारे देश में अनेक प्रकार के ताड़ कुदरती तौर पर उगते हैं। उन पर सबमें से नीरा निकल सकती है। नीरा ऐसी चीज है जिसे निकालने की जगह पर ही तुरन्‍त पीना अच्‍छा है। नीरा में मादकता जल्‍दी पैदा हो जाती है। इसलिए जहां उसका तुरंत उपयोग न हो सके वहां उसका गुड़ बना लिया जाय, तो वह गन्‍ने के गुड़ की जगह ले सकता है। कई लोग मानते हैं कि ताड़-गुड़ गन्‍ने के गुड़ के अधिक गुणकारी है। उसमें मिठास कम होती है, इसलिए वह गन्‍ने के गुड़ की अपेक्षा अधिक मात्रा में खाया जा सकता है। जिन ताडों के रस से ताडी़ बनाई जाती है उन्‍हीं से गुड़ बनाया जाय, तो हिन्‍दुस्‍तान में गुड़ और खांड़ की कभी पैदा न हो और गरीबों को सस्‍ते दाम में अच्‍छा गुड़ मिल सके।

ताड़- गुड़ की मिश्री और शक्‍कर भी बनाई जा सकती है। मगर गुड़ शक्‍कर या चीनी से बहुत अधिक गुणकारी है। गुड़ में जो क्षार होते हैं वे शक्‍कर या चीनी में नहीं होते। जैसे बिना भूसी का आटा और बिना भूसी का चावल होता है, वैसे ही बिना क्षार की शक्‍कर को समझना चाहिये। अर्थात यह कहा जा सकता है कि खुराक जितनी अधिक स्‍वाभाविक स्थिति में खाई जाय, उतना ही अधिक पोषण उसमें से हमें मिलता है।

शराब की तरह बीडी़ और सिगरेट के लिए भी मेरे मन में गहना तिरस्‍कार है। बीडी़ और सिगरेट को मैं कुटदेव ही मानता हूं। वह मनुष्‍य की विवेक- बुद्धि को जड़ बना देती है और अक्‍सर शराब से ज्‍यादा बुरी सिद्ध होती है, क्‍योंकि उसका परिणाम अप्रत्‍यक्ष रीति से होता है। यह आदत आदमी को एक बार लग भर जाय,फिर उससे पिंड छुडा़ना बहुत कठिन होता है। इससे सिवा वह खर्चीली भी है। वह मुंह को दुर्गन्‍ध- युक्‍त बनाती है, दांतों का रंग बिगाड़ती है और कभी- कभी कैंसर जैसी भयानक बीमारी को जन्‍म देती है। वह एक गंदी आदत है।

एक दृष्टि से बीडी़ और सिगरेट पीना शराब से ज्‍यादा बडी़ बुराई है, क्‍योंकि इस व्‍यसन का शिकार उससे होने वाली हानि को समय रहते अनुभव नहीं करता। वह जंगलीपन का चिन्‍ह नहीं मानी जाती, बल्कि सभ्‍य लोग तो उसका गुणगान भी करते हैं। मैं इतना कहूंगा कि जो लोग छोड़ सकते हैं वे उसे छोड़ दें और दूसरों के लिए उदाहरण पेश करें।

तम्‍बाकू ने तो गजब ही ढाया है। भाग्‍य से ही कोई इसके पंजे से छूटता है।….. टॉल्‍स्‍टॉय ने इसे व्‍यसनों में सबसे खराब व्‍यसन माना है।

हिन्‍दुस्‍तान में हम लोग तम्‍बाकू केवल पीते ही नहीं, सूंघते भी हैं और जरदे के रूप में खाते भी हैं।…. आरोग्‍य का पुजारी दृढ़ निश्‍चय करके सब व्‍यसनों की गुलामी से छूट जायेगा। बहुतों को इसमें से एक या दो या तीनों व्‍यसन लगे होते हैं। इसलिए उन्‍हें इससे घृणा नहीं होती। मगर शान्‍त चित्‍त से विचार किया जाय तो तम्‍बाकू फूंकने की क्रिया में या लगभग सारा दिन जरदे या पान के बीडे़ से गाल भर रखने में या नसवार की डिबिया खोलकर सूंघते रहने में कोई शोभा नहीं है। ये तीनों व्‍यसन गंदे हैं।

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