४२. शहरों की सफाई

पश्चिम से हम एक चीज जरूर सीख सकते हैं और वह हमें सीखनी ही चाहिये- वह है शहरों की सफाई का शास्‍त्र । पश्चिम के लोगों ने समुदायिक आरोग्‍य और सफाई का एक शास्‍त्र ही तैयार कर लिया है, जिससे हमें बहुत-कुछ सीखना है । बेशक, सफाई का पश्चिम की पद्धतियों को हम अपनी आवश्‍यकताओं के अनुसार बदल सकते है ।

‘भगवान के प्रेम के बाद महत्‍व के दृष्टि से दूसरा स्‍थान स्‍वच्‍छता के प्रेम का ही है।’ जिस तरह हमारा मन मलिन हो तो हम भगवान का प्रेम सम्‍पादित नही कर सकते, उसी तरह हमारा शरीर मलिन हो तो भी हम उसका आशिर्वाद नही पा सकते । और शहर अस्‍वच्‍छ हो तो शरीर स्‍वच्‍छ रहना संभव नही है ।

कोई भी म्‍युनिसिपैलिटी शहर की अस्‍व्‍च्‍छता और आबादी की संघनता का सवाल महज टैक्‍स वसूल करके और सफाई का काम करने वाले नौकरों को रखकर हल करने की आशा नही कर सकती । यह जरूरी सुधार तो अमीर और गरीब, सब लोगों के संपूर्ण और स्‍वेच्‍छापूर्ण सहयोग द्वारा ही शक्‍य है ।

हम अछूत भाईयों की बस्‍ती वाले गांवों की सफाई करते है यह अच्‍छा है । पर वह काफी नही है । अछूत लोग समझाने-बुझाने से समझ जाते हैं । क्‍या हमें यह कहना पड़ेगा कि तथाकथित उच्‍च जातियों के लोग समझाने-बुझाने से नही समझते; या कि शहर की जीवन बिताने के लिए आरोग्‍य और सफाई के जिन नियमों का पालन करना जरूरी है वे उन पर लागू नही होते ? गांवों में तो हम कई बाते किसी किस्‍म का खतरा उठाये बिना कर सकते हैं । लेकिन शहरों की घनी आबादी वाले तंग गलियों में, जहां सांस लेने के लिए साफ हवा भी मुश्किल से मिलती है, हम ऐसा नही कर सकते । वह का जीवन दूसरे प्रकार है और वहां हमें सफाई के ज्‍यादा बारिक नियमों का पालन करना चाहिये । क्‍या हम ऐसा कर सकते हैं ? भारत के हर एक शहर के मध्‍यवर्ती भागों में सफाई की जो दयनीय स्थिति दिखाई देती है, उसकी जिम्‍मेदारी हम म्‍यूनिसिपैलिटी पर नहीं डाल सकते । और मेरा ख्‍याल है दुनिया कोई भी म्‍यूनिसिपैलिटी लोगों के अमूक वर्ग की उन आदतों का प्रतिकार नहीं कर सकती, जो उन्‍हें पीढि़यों की परम्‍परा से मिली है । …. इसलिये मैं कहना चाहता हूं कि अगर हम अपनी म्‍यूनिसिपैलिटी से यह उम्‍मीद करते हो कि इन बड़े शहरों में जो सफाई-संबंधी सुधार का सवाल पेश है उसे वे इस स्‍वेच्‍छापूर्ण सहयोग की मदद के बिना ही हल कर लेगी तो यह अशक्‍य है । अलबत्‍ता, मेरा मतलब यह बिल्‍कुल नही है कि म्‍यून‍िसिपैलिटीयों की इस सम्‍बन्‍ध में कोई जिम्‍मेदार नही है ।

मुझे म्‍यूनिसिपैलिटी की प्रवृत्तियों में बहुत दिलचस्‍पी है । म्‍यूनिसिपैलिटी का सदस्‍य होना सचमूच बड़ा सौभाग्‍य है । लेकिन सार्वजनिक जीवन का अनुभव रखने वाले व्‍यक्ति के नाते मैं आपसे यह भी कह दूं कि इस सौभाग्‍यपूर्ण अधिकार के उचित निर्वाह की एक अनिवार्य शर्त यह है कि इन सदस्‍यों को इस पद से कोई निजी स्‍वार्थ साधने की इच्‍छा न रखनी चाहिये । उन्‍हें अपना कार्य सेवा भाव से ही करना चाहिये । तभी उसकी पवित्रता कायम रहेगी । उन्‍हें अपने को शहर की सफाई का काम करने वाले भंगी कहने से गौरव का अनुभव करना चाहिये । मेरी मातृभाषा में म्‍यूनिसिपैलिटी का एक सार्थक नाम है; लोग उसे ‘कचरा-पट्टी’ कहते हैं, जिसका मतलब है भंगियों का विभाग । सचमूच म्‍यूनिसिपैलिटी को सफाई-काम करने वाले एक प्रमुख संस्‍था होना ही चाहिये और उसमें न सिर्फ शहर की बाहरी स फाई का बल्कि सामाजिक और सार्वजनिक जीवन की भी‍तरी सफाई का भी समावेश होना चाहिये ।

यदि मैं किसी म्‍यूनिसिपैलिटी या लोकल बोर्ड की सीमा में रहने वाला उसका करदाता होता, तो जब तक करके रूप में हम संस्‍थाओं को जो पैसा देते हैं वह उससे चौगुनी सेवाओं के रूप में न लौटाया जाता तब तक अतिरिक्‍त कर के रूप में एक पाई ज्‍यादा देने से मैं इनकार कर देता और दूसरों को भी ऐसा ही करने का सलाह देता । जो लोग लोकल बोर्डों या म्‍यूनिसिपैलिटी में प्रतिनिधियों की हैसियत से जाते हैं, वे वहां प्रतिष्‍ठा के लालच से या आपस में लड़ने-झगड़ने के लिए नहीं जाते, बल्कि नागरिकों के प्रेमपूर्ण सेवा करने के लिए जाते हैं । यह सेवा पैसे पर आधार नहीं रखती । हमारा देश गरीब है । अगर म्‍यूनिसिपैलिटीयों में भी जाने वाले सदस्‍य में सेवा की भावना हो, तो वे अवैतनिक मेहतर, भंगी और सड़के बनाने वाले बन जायेंगे और उसमें गौरव का अनुभव करेंगे । वे दूसरे सदस्‍यों को, जो कांग्रेस के टिकिट पर न चूने गये हों, अपने काम में शरीक होने का न्‍यौता देंगे; और अपने में और अपने कार्य में उन्‍हें श्रद्धा होगी, तो उनके उदाहरण का दूसरों पर अवश्‍य ही अनूकूल प्रभाव पड़ेगा इसका अर्थ यह है कि म्‍यूनिसिपल संस्‍था के सदस्‍य को अपना सारा समय उसी काम में लगाने वाला होना चाहिये । उसका अपना स्‍वार्थ नही होना चाहिये । उसका दूसरा कदम यह होगा कि म्‍यू‍निसिपैलिटी या लोकल बोर्ड की सीमा के अन्‍दर रहने वाली सारी वयस्‍क आबादी की गणना कर ली जाये और उन सबसे म्‍यूनिसिपैलिटी की प्रवृत्तियों में योग देने के लिए कहा जाय । इसका एक व्‍यवस्थित रजिस्‍टर रखा जाना चाहिये। जो लोग ज्‍यादा गरीब हैं और पैसे की मदद नही दे सकते उनसे, अगर वे सशक्‍त हों तो, श्रमदान करने लिए कहा जा सकता है ।

अगर मैले का ठीक-ठीक उपयोग किया जाय, तो हमें लाखों रूपयों की कीमत का खाद मिलें और साथ ही कितनी बिमारियों से मुक्ति मिल जाय । अपनी गंदी आदतों से हम अपनी पवित्र नदियों के किनारे बिगाड़ते हैं और मक्खियों की पैदाइश्‍ा के लिए बढि़या जमीन तैयार करते हैं । परिणाम यह होता है कि हमारी दण्‍डनीय लापरवाही के कारण जो मक्खियां खुले मैदान पर बैठती हैं, वे ही हमारे नहाने के बाद हमारे शरीर पर बैठती हैं और उसे गंदा बनाती है । इस भयंकर गंदगी से बचने के लिए कोई बड़ा साधन नहीं चाहिये; मात्र मामूली फावड़े का उपयोग करने की जरूरत हैं । जहां-तहां शौच के लिए जाना, नाक साफ करना या सड़क पर थूकना ईश्‍वर और मानव-‍जाति के खिलाफ अपराध है और दूसरों के प्रति लिहाज की दयनीय कमी प्रकट करता है । जो आदमी अपनी गंदगी को ढकता नहीं है वह भारी सजा का पात्र है, फिर चाहे वह जंगल में ही क्‍यों न रहता हो ।

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मेरे सपनों का भारत (कापीराइट नवजीवन ट्रस्ट, अहमदाबाद)