४४. मेरा अपना अनुभव
12 बरस की उमर तक मैंने जो भी शिक्षा पाई वह अपनी मातृभाषा गुजराती में ही पाई थी । उस समय गणित, इतिहास और भूगोल का मुझे थोड़ा-थोड़ा ज्ञान था । इसके बाद मैं एक हाईस्कूल में दाखिल हुआ। इसमें भी पहले तीन साल तक तो मातृभाषा ही शिक्षा का माध्यम रही। लेकिन स्कूल- मास्टर का काम तो विद्यार्थियों के दिमाग में जबरदस्ती अंग्रेजी ठूंसना था। इसलिए हमारा आधे से अधिक समय अंग्रेजी और उसके मनमाने हिज्जों तथा उच्चारण्ा पर काबू पाने में लगाया जाता था। ऐसी भाषा का पढ़ना हमारे लिए एक कष्टपूर्ण अनुभव था, जिसका उच्चारण ठीक उसी तरह नहीं होता जैसी कि वह लिखी जाती है। हिज्जों को कण्ठस्थ कारता एक अजीब- सा अनुभव था। लेकिन यह तो मैं प्रसंगवश कह गया, वस्तुत: मेरी दलील से इसका कोई संबंध नहीं है। मगर पहले तीन साल तो तुलना में ठीक ही निकल गये।
जिल्लत तो चौथे साल से शुरू हुई। अलजबरा (बीजगणित), केमिस्ट्री (रसायन शास्त्र), एस्टानॉमी (ज्योतिष), हिस्ट्री (इतिहास), ज्यॉग्राफी (भूगोल) हर एक विषय मातृभाषा के बजाय अंग्रेजी में ही पढ़ना पडा़। कक्षा में अगर कोई विद्यार्थी गुजराती, जिसे कि वह समझता था, बोलता तो उसे सजा दी जाती थी। हां, अंग्रेजी को, जिसे न तो वह बुरी तरह बोलता तो भी शिक्षक को काई आपति नहीं होती थी। शिक्षक भला इस बात की फिक्र क्यों ? क्योंकि खुद उसकी ही अंग्रेजी निर्दोष नहीं थी। इसके सिवा और हो भी क्या सकता ? क्योंकि अंग्रेजी उसके लिए भी उसी तरह विदेशी भाषा थी, जिस तरह की उसके विद्यार्थियों के लिए थी। इससे बडी़ गड़बड़ होती थी। हम विद्यार्थियों को अनेक बातें कण्ठस्थ करनी पड़तीं, हालांकि हम उन्हें पूरी तरह समझ नहीं सकते थे और कभी- कभी तो बिलकुल ही नहीं समझते थे। शिक्षक के हमें ज्यॉमेटरी (रेखागणित) समझाने की भरपूर कोशिश करने पर मेरा सिर धूमने लगता था। सच तो यह है कि युक्लिड (रेखागणित) की पहली पुस्तक के 13वें साध्य तक हम न पहुंच गये, तब तक मेरी समझ में ज्यॉमेटरी बिलकुल नहीं आई। और पाठकों के सामने मुझे यह मंजूर करना ही चाहिये कि मातृभाषा के अपने सारे प्रेम के बावजूद आज भी मैं यह नहीं जानता कि ज्यॉमेटरी, अलजबरा आदि की परिभाषिक बातों को गुजराती में क्या कहते हैं। हां, यह अब मैं जरूर देखता हूं कि जितना गणित, रेखागणित, बीजगणित, रसायनशास्त्र और ज्योतिष सीखने में मुझे चार साल लगे, अगर अंग्रेजी के बजाय गुजराती में उन्हें पढा़ होता तो उतना मैने एक ही साल में आसानी से सीख लिया होता। उस हालत में मैं आसानी और स्पष्टता के साथ इन विषयों को समझ लेता। गुजराती का मेरा शब्दज्ञान कहीं ज्यादा समृद्ध हो गया होता, और उस ज्ञान का मैंने अपने घर में अपयोग किया होता । लेकिन इस अंग्रेजी के माध्यम ने तो मेरे और मेरे कुटुम्बियों के बीच, जो कि अंग्रेजी स्कूलों में नहीं पढ़े थे, एक अगम्य खाई खडी़ कर दी। मेरे पिता को कुछ पता न था कि मैं क्या कर रहा हूं। मैं चाहता तो भी अपने पिता की इस बात में दिलचस्पी पैदा नहीं कर सकता था कि मैं क्या पढ़ रहा हूं। क्योंकि यद्यपि बुद्धि की उनमें कोई कमी नहीं थी, मगर वे अंग्रेजी नहीं जानते थे। इस प्रकार मैं अपने ही घर में बडी़ तेजी के साथ अजनबी बनता जा रहा था। निश्चय ही मैं औंरों से उंचा आदमी बन गया था। यहां तक की मेरी पोशाक भी अपने- आप बदलने लगी। लेकिन मेरा जो हाल हुआ वह कोई असाधारण अनुभव नहीं था, बल्कि अधिकांश लोगों का यही हाल होता है।
हाई स्कूल के प्रथम तीन वर्षों में मेरे सामान्य ज्ञान में बहुत कम वृद्धि हुई। यह समय तो लड़को को हर चीज अंग्रेजी के जरिये सीखने की तैयारी का था। हाई स्कूल तो अंग्रेजी की सांस्कृतिक विजय के लिए थे। मेरे हाई स्कूल के तीन सौ विद्यार्थियों ने जो ज्ञान प्राप्त्ा किया वह तो हमीं तक सीमित रहा, वह सर्व- साधारण जक पहुंचाने के लिए ही नहीं था।
एक- दो शब्द साहित्य के बारे में भी। अंग्रेजी गद्य और पद्य की हमें कई किताबें पढ़नी पडी़ थीं। इसमें शक नहीं कि यह बढि़या साहित्य था। लेकिन सर्व- साधारण की सेवा या उसमें सम्पर्क में आने में उस ज्ञान का मेरे लिए कोई उपयोग नहीं हुआ है। मैं कहने में असमर्थ हूं कि मैंने अंग्रेजी गद्य और पद्य पढा़ होता तो मैं एक बेशकीमती खजाने से वंजित रह जाता। इसके बजाय सच तो यह है कि अगर वे सात साल मैंने गुजराती पर प्रभुत्व प्राप्त्ा करने में लगाये होते और गणित, विज्ञान तथा संस्कृत आदि विषयों को गुजराती में पढा़ होता, तो इस तरह प्राप्त किये हुए ज्ञान में अपने अडो़सी- पडो़सियों को आसानी से हिस्सेदार बनाया होता। उस हालत में मैंने गुजराती साहित्य को समृद्ध किया होता, और कौन कह सकता है कि अमल में उतारने की अपनी आदत तथा देश और मातृभाषा के प्रति अपने बेहद प्रेम के कारण सर्व- साधारण की सेवा में मैं और भी अधिक अपनी देन क्यों न दे पाता?
यह हरगिज नहीं समझना चाहिये कि अंग्रेजी या उसके श्रेष्ठ साहित्य का मैं विरोधी हूं। ‘हरिजन’ मेरे अंग्रेजी- प्रेम का पर्याप्त्ा प्रमाण है। लेकिन उसके साहित्य की महिमा भारतीय राष्ट्र के लिए उससे अधिक उपयोगी नहीं, जितना कि इंग्लैंण्ड का समशीतोष्ण जलवायु या वहां के सुन्दर दृष्य हो सकते हैं। भारत को तो अपने ही जलवायु, दृश्यों और साहित्य में जरक्की करनी होगी, फिर चाहे वे अंग्रेजी जलवायु, दृश्यों और साहित्य से घटिया दरजे के ही क्यों न हों। हमें और हमारे बच्चों को तो अपनी ही विरासत बनानी चाहिये। सच तो यह है कि विदेशी सामाग्री पर हम कभी उन्नति नहीं कर सकते। मैं तो चाहता हूं कि राष्ट्र अपनी ही भाषा का भंडार भरे और इसके लिए संसार की अन्य भाषाओं का भंडार भी अपनी ही देशी भाषाओं में सेचित करें। रवीन्द्रनाथ की अनुपम कृतियों का सौंदर्य जानने के लिए मुझे बंगाली पढ़ने की कोई जरूरत नहीं, क्योंकि सुन्दर अनुवादों के द्धारा मैं उसे पा लेता हूं। इसी तरह टॉल्स्टॉय की संक्षिप्त कहानियों की कदर करने के लिए गुजराती लड़के- लड़कियों को रूसी भाषा पढ़ने की कोई जरूरत नहीं, क्योंकि अच्छे अनुवादों के जरिये वे उन्हें पढ़ लेते हैं। अंग्रेजों को इस बात का गर्व है कि संसार की सर्वोत्तम साहित्यिक रचनायें प्रकाशित होने के एक सप्ताह के अन्दर- अन्दर सरल अंग्रेजी में उनके हाथों में आ पहुंचती हैं। ऐसी हालत में शेक्सपियर और मिल्टन के सर्वोत्तम विचारों और रचनाओं के लिए मुझे अंग्रेजी पढ़ने की जरूरत क्यों ?
यह एक तरह की अच्छी मितव्ययिता होगी कि ऐसे विद्यार्थियों का अलग ही एक वर्ग कर दिया जाय, जिनका काम यह हो कि संसार की विभिन्न भाषाओं में पढ़ने लायक जो सर्वोत्तम सामाग्री हो उसको पढ़ें और देशी भाषाओं में उसका अनुवाद करें। हमारे प्रभुओं ने तो हमारे लिए गलत ही रास्ता चुना है और आदत पड़ जाने के कारण गलती ही हमें ठीक मालूम पड़ने लगी है ।
हमारी इस झूठी अभारतीय शिक्षा से लाखों आदमियों का दिन-दिन जो अधिकाधिक नुकसान हो रहा है, उसके प्रमाण में रोज ही पा रहा हूं । जो ग्रेज्युएट मेरे आदरणीय साथी है, उन्हें जब अपने आन्तरिक विचारों को व्यक्त करना पड़ता है तब वे खुद ही परेशान हो जाते हैं । वे तो अपने घरों में अजनबी बन गये हैं । अपनी मातृभाषा के शब्दों का उनका ज्ञान इतना सीमित है कि अंग्रेजी शब्दों और वाक्यों तक का सहारा लिये बगैर वे अपने भाषण को समाप्त नहीं कर सकते । और अंग्रेजी किताबों के बगैर वे रह सकते हैं। आपस में भी वे अक्सर अंग्रेजी में ही लिखा- पढी़ करते हैं। अपने साथियों का उदाहरण मैं यह बताने के लिए दे रहा हूं कि इस बुराई ने कितनी गहरी जड़ जमा ली है। क्यों कि हम लोगों ने अपने को सुधारने का खुद जान- बुझकर प्रयत्न किया है।
हमारे कॉलेजों में जो समय की बरबादी होती है, उसके पक्ष में दलील यह दी जाती है कि कॉलाजों में पढ़ने के कारण इतने विद्याथियों में से अगर एक जगदीश बसु भी पैदा हो सके, तो हमें इस बरबादी की चिन्ता करने की जरूरत नहीं। अगर यह बरबादी अनिवार्य होती तो मैं जरूर इस दलील का समर्थन करता। लेकिन मैं आशा करता हूं कि मैंने यह बतला दिया है कि यह न तो पहले अनिवार्य थी और न आज ही अनिवार्य है। क्योंकि जगदीश बसु कोई वर्तमान शिक्षा की उपज नहीं थे। वे तो भयंकर कठिनाइयों और बाधाओं के बावजूद अपने परिश्रम की बदौलत उंचे उठे, और उनका ज्ञान लगभग ऐसा बन गया जो सर्व- साधारण तक नहीं पहुंच सकता। बल्कि मालूम ऐसा पड़ता है कि हम यह सोचने लगे हैं कि जब तक कोई अंग्रेजी न जाने तब तक वह बसु के सदृश महान वैज्ञानिक होने की आशा नहीं कर सकता। यह ऐसी मिथ्या धारणा है जिससे अधिक बडी़ की मैं कल्पना ही नहीं कर सकता । जिस तरह हम अपने को लाचार समझते मालूम पड़ते हैं, उस तरह एक भी जापानी अपने को नहीं समझता।
शिक्षा का माध्यम तो एकदम और हर हालत में बदला जाना चाहिये और प्रान्तीय भाषाओं को उनका न्यायसंगत स्थान मिलना चाहिये। यह जो दंडनीय बरबादी रोज- बरोज हो रही है इसके बजाय तो मैं अस्थायी रूप से अव्यवस्था हो जाना भी ज्यादा पसन्द करूंगा।
प्रान्तीय भाषाओं का दरजा और व्यावहारिक मूल्य बढा़ने के लिए मैं चाहूंगा कि अदालतों की कार्रवाई अपने- अपने प्रान्त्ा की भाषा में हो। प्रान्तीय धारासभाओं की कार्रवाई भी प्रान्तीय भाषा में या जहां एक से अधिक भाषायें प्रचलित हों वहां उनमें होनी चाहिये। धारासभाओं के सदस्यों से मैं कहना चाहता हूं कि वे चाहें तो एक महीने के अन्दर- अन्दर अपने प्रान्तों की भाषायें भलीभांति समझ सकते हैं। तामिल- भाषी के लिए ऐसी कोई रूकावट नहीं कि वह तेलगू, मलयालम और कन्नड़ का, जो कि सब तालिम से मिलती- जुलती ही हैं, मामूली व्याकरण और कुछ सौ शब्द आसानी से न साख सके । केन्द्र में हिन्दुस्तानी का प्रमुख स्थान रहना चाहिये।
मेरी सम्मति में यह कोई ऐसा प्रश्न नहीं है, जिसका निर्णय साहित्यज्ञों के द्धारा हो। वे इस बात का निर्णय नहीं कर सकते कि किस स्थान के लड़के- लड़कियों की पढा़ई किस भाषा में हो। क्योंकि इस प्रश्न का निर्णय तो हर एक देश में पहले से ही हो चुका है। न वे यही निर्णय कर सकते हैं कि किन विषयों की पढा़ई हो। क्यों यह उस देश की आवश्यकताओं पर निर्भय करता है, जिस देश के बालकों को शिक्षा देनी हो। उन्हें तो बस यही सुविधा प्राप्त है कि राष्ट्र की इच्छा को यथासंभव सर्वोत्तम रूप में अमल में लायें। अत: जब हमारा देश वस्तुत: स्वतंत्र होगा तब शिक्षा के माध्यम का प्रश्न केवल एक ही तरह से हल होगा। साहित्यिक लोग पाठयक्रम बनायेंगे और फिर उसके अनुसार पाठ्य- पुस्तकें तैयार करेंगे। और स्वतंत्र भारत की शिक्षा पाने वाले लोग देश की जरूरतें उसी तरह पूरी करेंगे, जिस तरह आज वे विदेशी शासकों का जरूरतें पूरी करते हैं। जब तक हम शिक्षित वर्ग इस प्रश्न के साथ्ा खिलवाड़ करते रहेंगे तब तक मुझे इस बात का बहुत भय है कि हम जिस स्वतंत्र और स्वथ्य भारत का स्वप्न देखते हैं उसका निर्माण नहीं कर पायेंगे । हमें जी- तोड़ प्रयत्न करके अपने बन्धन से मुक्त होनी चाहिये, चाहे वह शिक्षणात्मक हो, सामाजिक हो, या राजनीतिक हो। हमारी तीन- चौथाई लडा़ई तो वह प्रयत्न होगा जो कि इसके लिए किया जायगा।
अनुक्रमणिका
- १. मेरे सपनो का भारत
- २. स्वराज्य का अर्थ
- ३. राष्ट्रवाद का सच्चा स्वरूप
- ४. भारतीय लोकतंत्र
- ५. भारत और समाजवाद
- ६. भारत और साम्यवाद
- ७. उद्योगवाद का अभिशाप
- ८. वर्गयुध्द
- ९. हड़ताल
- १०. मज़दूर क्या चुनेंगे?
- ११. अधिकार या कर्तव्य ?
- १२. बेकारी का सवाल
- १३. दरिद्र-नारायण
- १४. शरीर-श्रम
- १५. सर्वोदय
- १६. संरक्षता का सिद्धांत
- १७. अहिंसक अर्थ-व्यवस्था
- १८. सामान वितरण का रास्ता
- १९. भारत में अहिंसा की उपासना
- २०. सर्वोदयी राज्य
- २१. सत्याग्रह और दुराग्रह
- २२. किसान
- २३. गांवों की ओर
- २४. ग्राम-स्वराज्य
- २५. पंचायत राज
- २६. ग्रामोद्योग
- २७. सरकार क्या कर सकती है?
- २८. ग्राम-प्रदर्शनियां
- २९. चरखे का संगीत
- ३०. मिल-उद्योग
- ३१. स्वदेशी
- ३२. गोरक्षा
- ३३. सहकारी गो पालन
- ३४. गांवों की सफाई
- ३५. गांव का आरोग्य
- ३६. गांवों का आहार
- ३७. ग्राम सेवक
- ३८. समग्र ग्राम सेवा
- ३९. युवकों को आह्वान
- ४०. राष्ट्र का आरोग्य, स्वच्छता और आहार
- ४१. शराब और अन्य मादक द्रव्य
- ४२. शहरों की सफाई
- ४३. विदेशी माध्यम की बुराई
- ४४. मेरा अपना अनुभव
- ४५. भारत की सांस्कृतिक विरासत
- ४६. नई तालीम
- ४७. बुनियादी शिक्षा
- ४८. उच्च शिक्षा
- ४९. शिक्षा का आश्रमी आदर्श
- ५०. राष्ट्रभाषा और लिपि
- ५१. प्रान्तीय भाषायें
- ५२. दक्षिण में हिन्दी
- ५३. विद्यार्थियों के लिए अनुशासन के नियम
- ५४. भारतीय स्त्रियों का पुनरूत्थान
- ५५. स्त्रियों की शिक्षा
- ५६. संतति-नियमन
- ५७. काम-विज्ञान की शिक्षा
- ५८ (……..)
- ५९. साम्प्रदायिक एकता
- ६०. वर्णाश्रम धर्म
- ६१. अस्पृश्यता का अभिशाप
- ६२. भारत में धार्मिक सहिष्णुता
- ६३. धर्म – परिवर्तन
- ६४. (…)
- ६५. प्रान्तों का पुनर्गठन
- ६६. अल्पसंख्यकों की समस्यायें
- ६७. भारतीय गवर्नर
- ६८. समाचार-पत्र
- ६९. शान्ति सेना
- ७०. भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस
- ७१. भारत पाकिस्तान और काश्मीर
- ७२. भारत में विदेशी बस्तियां
- ७३. भारत और विश्वशांति
- ७४. पूर्व का संदेश
- ७५. स्फूट वचन
