४५. भारत की सांस्‍कृतिक विरासत

मेरा यह कहना नहीं है कि हम शेष दुनिया से बचकर रहें याअपने आस- पास दीवालें खडी़ कर लें। यह तो मेरे विचारों से बडी़ दूर भटक जाना है। लेकिन मैं यह जरूर कहता हूं कि पहले हम अपनी संस्‍कृति का सम्‍मान करना सीखें और उसे आत्‍मसात् करें। दूसरी संस्‍कृतियों के सम्‍मान की, उनकी विशेषाओं को समझने और स्‍वीकार करने की बात उसें बाद ही आ सकती है, उसके पहले कभी नहीं। मेरी यह दृढ़ मान्‍यता है कि हमारी संस्‍कृति में जैसी मूल्‍वान निधियां हैं वैसी किसी दूसरी संस्‍कृति में नहीं हैं। हमने उसे पहिचाना नहीं है; हमें उसके अध्‍ययन का तिरस्‍कार करना, उसके गुणों की कम कीमत करना सिखाया गया है। अपने आचरण में उसका व्‍यवहार करना तो हमने लगभग छोड़ ही दिया है। आचार के बिना कोरा बौद्धिक ज्ञान उस निर्जीव देह की तरह है, जिसे मसाला भरकर सुरक्षित रखा जाता है। वह शायद देखने में अच्‍छा लग सकता है, किन्‍तु उसमें प्रेरणा देने की शक्ति नहीं होती। मेरा धर्म मुझे आदेश देता है कि मैं अपनी संस्‍कृति को सीखूं, ग्रहण करूं और उसके अनुसार चलूं; अन्‍यथा अपनी संस्‍कृति से विच्छिन्‍न होकर हम एक सामाज के रूप मानो आत्‍महत्‍या कर लेंगे। किन्‍तु साथ ही वह मुझे दूसरों की संस्‍कृतियों का अनादर करने या उन्‍हें तुच्‍छ समझने से भी रोकता है।

वह उन विविध संस्‍कृतियों के समन्‍वय की पोषण है, जो इस देश में सुस्थिर हो गयी हैं, जिन्‍होंने भारतीय जीवन को प्रभावित किया है और जो खुद भी इस भूमि के वातावरण ये प्रभावित हुई हैं। जैसा कि स्‍वाभाविक है, वह समन्‍वय स्‍वदेशी ढंग का होगा, अर्थात उसमें प्रत्‍येक संस्‍कृति को अपना उचित स्‍थान प्राप्‍त होगा। वह अमेरीकी ढंग का नहीं होगा, जिसमें कोई एक प्रमुख संस्‍कृति बाकी सबको पचा डालती है और जिसका उद्देश्‍य सुमेल साधना नहीं बल्कि कृत्रिम और जबरदस्‍ती लादी जाने वाली एकता निर्माण करना है।

हमारे समय की भारतीय संस्‍कृति अभी निर्माण की अवस्‍था में है। हम लोगों में से कई उन सारी संस्‍कृतियों का एक सुन्‍दर सम्मिश्रण करने का प्रयत्‍न कर रहे हैं, जो आज आपस में पड़ती दिखाई देती हैं। ऐसी कोई भी संस्‍कृति, जो सबसे बचकर रहना चाहती हो, जीवित नहीं रहा सकती। भारत में आज शुद्ध आर्य संस्‍कृति जैसी कोई चीज नहीं है। आर्य लोग भारत के ही रहने वाले थे या यहां बाहर से आये थे और यहां के मूल निवासियों ने उनका विरोध किया था, इस सवाल में मुझे ज्‍यादा दिलचस्‍पी नहीं है। जिस बात में मेरी दिलचस्‍पी है वह यह है कि मेरे अतिप्राचीन पूर्वज एक- दूसरे के साथ पूरी आजादी से घुल- मिल गये थे, और उनकी वर्तमान सन्‍तान उस मेल का ही परिणाम हैं। अपनी जन्‍मभूमि का और इस पृथ्‍वी माता का, जो हमारा पोषण करती है, हम कोई हित कर रहे हैं या उस पर बोझ रूप हैं, यह तो भविष्‍य ही बतायेगा।

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मेरे सपनों का भारत (कापीराइट नवजीवन ट्रस्ट, अहमदाबाद)