४६. नई तालीम

अन्‍य देशों के बारे में कुछ भी सही हो, कम- से- कम भारत में तो- जहां अस्‍सी फीसदी आबादी खेती करने वाली है और दूसरी दस फीसदी उद्योगों में काम करने वाली है- शिक्षा को निरी साहित्यिक बना देन तथा लड़को और लड़कियों को उत्‍तर – जीवन में हाथ के काम के लिए अयोग्‍य बना देना गुनाह है। मेरी तो राय है कि चूंकि हमारा अधिकांश समय अपनी रोजी कमाने में लगता है, इसलिए हमारे बच्‍चों को बचपन से ही इस प्रकार के परिश्रम का गौरव सिखाना चाहिये। हमारे बालकों कर पढा़ई ऐसी नहीं कि क्‍यों एक किसान का बेटा किसी स्‍कूल में जाने के बाद खेती के मजदूर के रूप में आज कल की तरह निकम्‍मा बन जाय। यह अफसोस की बात है कि हमारी पाठशालाओं के लड़के शारीरिक श्रम को तिरस्‍कार की दृष्टि से चाहे न देखते हों, पर नापसन्‍दगी की नजर से तो जरूर देखते हैं।

मेरी राय में तो इस देश में, जहां लाखों आदमी भूखों मरते हैं, बुद्धिपूर्वक किया जाने वाला श्रम ही सच्‍ची प्राथमिक शिक्षा या प्रौढ़शिक्षा है।… अक्षर- ज्ञान हाथ्‍ा की शिक्षा के बाद आना चाहिये। हाथ से काम करने की क्ष्‍मता- हस्‍त- कौशल ही तो वह चीज है, जो मनुष्‍य को पशु से अलग करती है। लिखना- पढ़ना जाने बिना मनुष्‍य का सम्‍पूर्ण विकास नहीं हो सकता, ऐसा मानना एक वहम ही है। इसमें कोई शक नहीं कि अक्षर- ज्ञान से जीवन का सौन्‍दर्य बढ़ जाता है, लेकिन यह बात गलत है कि उसके बिना मनुष्‍य का नैतिक, शारीरिक और आर्थिक विकास हो ही नहीं सकता।

मेरा मत है कि बुद्धि की सच्‍ची शिक्षा हाथ, पैर, आंख, कान, नाक आदि शरीर के अंगों के ठीक अभ्‍यास और शिक्षण से ही हो सकती है। दूसरों शब्‍दों में, इन्द्रियों के बुद्धिपूर्वक उपयोग से बालक की बुद्धि के विकास का उत्‍तम और शीघ्रतम मार्ग मिलता है। परन्‍तु जब तक मस्तिष्‍क और का शरीर का विकास साथ- साथ न हो और उसी प्रमाण में आत्‍मा का जागृति न होती रहे,तब तक केवल बुद्धि के एकांगी विकास से कुछ विशेष लाभ नहीं होगा। आध्‍यात्मिक शिक्षा से मेरा आशय हृदय की तालीम से है। इसलिए मस्तिष्‍क का ठीक और चतुर्मुखी विकास तभी हो सकता है, जब वह बच्‍चे की शारीरिक और आध्‍यात्मिक शक्तियों की तालीम के साथ- साथ होता हो। ये सब बातें एक और अविभज्‍य हैं। इसलिए इस सिद्धान्‍त के अनुसार यह मान बैठना बिलकुल गलत होगा कि उनका विकास टुकड़े- टुकडे़ करके या एक- दूसरे से स्‍वतंत्र रूप में किया जा सकता है।

शरीर, मन और आत्‍मा की विविध्‍ा शक्तियों में ठीक- ठीक सहकार और सुमेल न होने के दुष्‍परिणाम स्‍पष्‍ट हैं। वे हमारे चारों ओर विद्यमान हैं; इतना है कि वर्तमान विकृत संस्‍कारों के कारण वे हमें दिखाई नहीं देते।

मनुष्‍य न तो कोरी बुद्धि है, न स्‍थूल शरीर है और न केवल हृदय या आत्‍मा ही है। संपूर्ण मनुष्‍य के निर्माण के लिए तीनों के उचित और एक रस मेल की जरूरत होती है और यही शिक्षा की सच्‍ची व्‍यवस्‍था है।

शिक्षा से मेरा अभिप्राय यह है कि बालक की या प्रौढ़ की शरीर, मन तथा आत्‍मा की उत्‍तम क्षमताओं को उद् घाटित किया जाय और बाहर प्रकाश में लाया जाय। अक्षर- ज्ञान न तो शिक्षा का अन्तिम लक्ष्‍य है और न उसका आरम्‍भ। वह तो मनुष्‍य की शिक्षा के कई साधनों में से केवल एक साधन है। अक्षर- ज्ञान अपने- आप में शिक्षा नहीं है। इसलिए मैं बच्‍चे की शिक्षा का श्रीगणेश उसे कोई उपयोगी दस्‍तकारी सिखाकर और जिस क्षण से वह अपनी शिक्षा का आरम्‍भ करे उसी क्षण से उसे उत्‍पादन के योग्‍य बनाकर करूंगा। मेरा मत है कि इस प्रकार की शिक्षा- प्रणाली में मस्तिष्‍क और आत्‍मा का उच्‍चतम विकास संभव है। अलबत्‍ता, प्रत्‍येक दस्‍तकारी आजकल की तरह निरे यांत्रिक ढंग से न सिखाकर वैज्ञानिक तरीके पर सिखानी पड़ेगी, अर्थात बालक को प्रत्‍येक क्रिया का क्‍यों और कैसे बताना होगा।

शिक्षा की मेरी योजना में हाथ अक्षर लिखना सीखने के पहले औजार चलाना सीखेंगे। आंखे जिस तरह दूसरी चीजों को तस्‍वीरों के रूप में देखती और उन्‍हें पहिचानना सीखती हैं, उसी तरह वे अक्षरों और शब्‍दों को तस्‍वीरों की तरह देखकर उन्‍हें पढ़ना सीखेंगी और कान चीजों के नाम और वाक्‍यों का आशय पकड़ना सीखेंगे। गरज यह कि सारी तालीम स्‍वाभाविक होगी। बालकों पर वह लादी नहीं जायेगी, बल्कि वे उसमें स्‍वत: दिलचस्‍पी लेंगे। और इसलिए यह तालीम दुनिया की दूसरी तमाम शिक्षा- पद्धतियों से जल्‍दी फल देने वाली और सस्‍ती होगी।

हाथ का काम इस सारी योजना का केन्‍द्रबिन्‍दु होगा।… हाथ की तालीम का मतलब यह नहीं होगा कि विद्यार्थी पाठशाला के संग्रहालय में रखने लायक वस्‍तुयें बनायें या ऐसे खिलौने बनायें जिनका कोई मूल्‍य नहीं। उन्‍हें ऐसी वस्‍तुयें बनाना चाहिये, जो बाजार में बेची जा सकें। कारखानों के प्रारंभिक काल में जिस तरह बच्‍चे मार के भय से काम करते थे, उस तरह हमारे बच्‍चे यह काम नहीं करेंगे। वे उसे इसलिए करेंगे कि इससे उन्‍हें आनन्‍द मिलता है और उनकी बुद्धि को स्‍फूर्ति मिलती है।

मैं भारत के लिए नि:शुल्‍क औश्र अनिवार्य प्राथमिक शिक्षा के सिद्धान्‍त में दृढ़तापूर्वक मानता हूं। मैं यह भी मानता हूं कि इस लक्ष्‍य को पाने का सिर्फ यही एक रास्‍ता है कि हम बच्‍चों को कोई उपयोगी उद्योग सिखायें और उसके द्धारा उनकी शारीरिक, मानसिक तथा आध्‍यात्मिक शक्तियों का विकास सिद्ध करें। ऐसा किया जाय तो हमारे गांवों के लगातार बढ़ रहे नाश की प्रक्रिया रूकेगी और ऐसी न्‍यायपूर्ण समाज- व्‍यवस्‍था की नींव पडे़गी, जिसमें अमीरों और गरीबों के अस्‍वाभाविक विभेद की गुंजाइश नहीं होगी और हर एक को जीवन- मजदूरी और स्‍वतंत्रता के अधिकारों का आश्‍वासन दिया जा सकेगा।

ओटाई और कताई आदि गांवों में चलने योग्‍य हाथ- उद्योगों के द्धारा प्राथमिक शिक्षण की मेरी योजना की कल्‍पना चुपचाप चलने वाली ऐसी सामाजिक क्रांति के रूप में की गयी है, जिसके अत्‍यन्‍त दूरगामी परिणाम होंगे। वह शहरों और गांवों में स्‍वथ्‍य और नैतिक सम्‍बंधों की स्‍थापना के लिए सुदृढ़ आधार पेश करेगी और इस तरह मौजूदा सामाजिक अरक्षितता और वर्गों के पारस्‍परिक सम्‍बंधों की मौजूदा कटुता की बुराइयां बडी़ हद तक दूर होंगी।

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