४७. बुनियादी शिक्षा

इस तालीम की मंशा यह है कि गांव के बच्‍चों को सुधार- संवार कर उन्‍हें गांव का आदर्श बाशिन्‍दा बनाया जाय। इसकी योजना खासकर उन्‍हीं को ध्‍यान में रखकर तैयार की गई है। इस योजना की असल प्रेरणा भी गांवों से ही मिली है। जो कांग्रेसजन स्‍वराज्‍य की इमारत को बिलकुल उसकी नींव या बुनियाद से चुनना चाहते हैं, वे देश के बच्‍चों की उपेक्षा कर ही नहीं सकते। परदेशी हुकूमत चलाने वालों ने, अनजाने ही क्‍यों न हो, शिक्षा के क्षेत्र में अपने काम की शरूआत बिना चूके बिलकुल छोटे बच्‍चों से की है। हमारे यहां जिसे प्राथमिक शिक्षा कहा जाता है वह तो एक मजाक है; उसमें गांवों में बसने वाले हिन्‍दुस्‍तान की जरूरतों और मांगों का जरा भी विचार नहीं किया गया है; और देखा जाय तो उसमें शहरों का भी कोई विचार नहीं हुआ है। बुनियादी तालीम हिन्‍दुस्‍तान के तमाम बच्‍चों को, फिर वे गांवों के रहने वाले हों या शहरों के, हिन्‍दुस्‍तान के सभी श्रेष्‍ठ और स्‍थायी तत्‍वों के साथ जोड़ देती है। यह तालीम बालक के मन और शरीर दोनों का विकास करती है; बालक को अपने वतन के साथ जोडे़ रखती है; और उस चित्र में देखे हुए भविष्‍य के हिन्‍दुस्‍तान का निर्माण करने में बालक या बालिकायें अपने स्‍कूल जाने के दिन से ही हाथ बंटाने लगें, इसका इन्‍ताम करती है।

बुनियादी शिक्षा का उद्देश्‍य दस्‍तकारी के माध्‍यम से बालकों क्‍ज्ञ शारीरिक, बौद्धिक और नैतिक विकास करना है। लेकिन मैं मानता हूं कि कोई भी पद्धति, जो शैक्षणिक दृष्टि से सही हो और जो अच्‍छी तरह चलायी जाय,आर्थिक दृष्टि से भी उपयुक्‍त सिद्ध होगी। उदाहरण के लिए, हम अपने बच्‍चों को मिट्टी के खिलौने बनाना भी सिखा सकते हैं, जो बाद में तोड़कर फेंक दिये जाते हैं। इससे भी उनकी बुद्धि का विकास तो होगा। लेकिन इसमें इस महत्‍वपूर्ण नैतिक सिद्धान्‍त की उपेक्षा होती है कि मनुष्‍य के ज्ञम और साधन- सामाग्री का अपव्‍यय कदापि न होना चाहिये। उनका अनुत्‍पादक उपयोग कभी नहीं करना चाहिये। अपने जीवन के प्रत्‍येक क्षण का सदुपयोग ही होना चाहिये, इस सिद्धान्‍त के पालन का आग्रह नागरिकता के गुण का विकास करने वाली सर्वोत्‍तम शिक्षा है, साथ ही इससे बुनियादी तालीम स्‍वावलम्‍बी भी बनती है।

यहां हम बुनियादी तालीम के खास- खास सिद्धान्‍तों पर विचार करें:

1. पूरी शिक्षा स्‍वावलम्‍बी होनी चाहिये। यानी, आखिर में पूंजी को छोड़कर अपना सारा खर्च उसे खुद देना चाहिये।
2. इसमें आखिरी दरजे तक हाथ का पूरा- पूरा उपयोग किया जाय। यानी, विद्यार्थी अपने हाथों से कोई- न- कोई उद्योग- धंधा आखिरी दरजे तक करें।
3. सारी विद्यार्थियों की प्रान्‍तीय भाषा द्वारा दी जानी चाहिये ।
4. इसमें साम्‍प्रदायिकता धार्मिक शिक्षा के लिए कोई जगह नहीं होगी । लेकिन बुनियादी नैतिक तालिम के लिए काफी गुंजाइश होगी ।
5. यह तालिम, फिर उसे बच्‍चे लें या बड़े, औरतें ले या मर्द, विद्यार्थियों के घरों में पहुंचेगी ।
6. चूंकि इस तालिम को पाने के वाले लाखों-करोड़ों विद्यार्थी अपने-अपको सारे हिन्‍दुस्‍तान के नागरिक समझेंगे, इसलिए उन्‍हें एक आंतर-प्रांतीय भाषा सीखनी होगी । सारे देश की यह एक भाषा नागरी या उर्दू में लिखी जाने वाली हिन्‍दुस्‍तानी ही हो सकती है । इसलिए विद्यार्थियों को दोनों लिपियां अच्‍छी तरह सीखनी होंगी ।

हमारे जैसे गरीब देश में हाथ की तालिम जारी करने से दो हेतु सिद्ध होंगे । उससे हमारे बालकों की शिक्षा का खर्च निकल आयेगा और वे ऐसा धंधा सीख लेंगे, जिसका अगर वे चाहें तो उत्‍तर-जीवन में अपनी जीविका के लिए सहारा ले सकते हैं । इस पद्धति से हमारे बालक आत्‍म-निर्भर अवश्‍य हो जायेंगे । राष्‍ट्र को कोई चीज इतना कमजोर नहीं बनायेगी, जितना यह बात कि हम श्रम का तिरस्‍कार करना सीखें ।

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