४८. उच्च शिक्षा
मैं कॉलेज की शिक्षा में कायापलट करके उसे राष्ट्रीय आवश्यकताओं के अनुकूल बनाऊंगा । यंत्र विद्या के तथा अन्य इंजीनियरों के लिए डिग्रियां होंगी । वे भिन्न-भिन्न उद्योगों के साथ जोड़ दिये जायेंगे और उन उद्योगों को जिन स्नातकों की जरूरत होगी उनके प्रशिक्षण का खर्च वे उद्योग ही देगें । इस प्रकार टाटा वालों से आशा की जायेगी कि वे राज्य की देखरेख में इंजीनियरों को तालीम देने के लिए एक कॉलेज चलायें । इसी तरह मिलों के संघ अपनी जरूरतों के स्नातकों को तालीम देने के लिए अपना कॉलेज चलायेंगे ।
इसी तरह और उद्योगों के नाम लिय जा सकते हैं । वाणिज्य-व्यवसाय वालों का अपना कॉलेज होगा । अब रह जाते हैं कला, औषधि और खेती । कई खानगी कला-कॉलेज आज भी स्वावलंबी हैं । इसलिए राज्य ऐसे कॉलेज चलाना बंद कर देगा । डॉक्टरी के कॉलेज प्रामाणिक अस्पतालों के साथ जोड़ दिये जायेंगे । चूंकि ये धनवानों में लोकप्रिय हैं, इसलिए उनसे आशा रखी जाती है कि वे स्वेच्छा से दान देकर डॉक्टरी के कॉलेजों को चलायेंगे। और कृषि- कॉलेज तो अपने नाम को सार्थक करने के लिए स्वावलम्बी होने ही चाहिये। मुझे कुछ कृषि- स्नातकों का दु:खद अनुभव है। उनका ज्ञान उपरी होता है। उसमें व्यावहारिक अनुभव की कमी होती है। परन्तु यदि वे देश की जरूरतें वूरी करने वाले और स्वावलम्बी खेतों पर तालीम लें, तो उन्हें अपनी डिग्रियां लेने के बाद और मालिकों के खर्च पर तजूरबा हासिल नहीं करना पडे़गा।
राज्य के विश्वविद्यालय खालिस परीक्षा लेने वाली संस्थायें रहें और वे अपना खर्च परीक्षा- शुल्क से ही निकाल लिया करें।
विश्वविद्यालय शिक्षा के सारे क्षेत्र की देखरेख रखेंगे और शिक्षा के विभिन्न विभागों के पाठयक्रम से पूर्व- स्वीकृति लिये बिना नहीं चलायें जाने चाहिये। विश्वविद्यालय के स्वीकृति- पत्र प्रमाणित योग्यता वाले और प्रामाणिक व्यक्तियों की किसी भी संस्था को उदारतापूर्वक दिये जाने चाहिये। और हमेशा यह समझकर चला जायेगा कि विश्वविद्यालयों का राज्य पर कोई खर्च नहीं पडे़गा। उसे सिर्फ एक केन्द्रीय शिक्षा- विभाग का खर्च ही उठाना होगा।
नये विश्वविद्यालय
प्रान्तों में नये विश्वविद्यालय कायम करने की लोगों पर सनक- सी सवार हो गई मालूम होती है। गुजरात गुजराती के लिए, महाराष्ट्र मराठी के लिए, कर्नाटक कन्नड़ के लिए, उडी़सा उडि़या के लिए और आसाम आसामी के लिए विश्वविद्यालय चाहता है। मैं अवश्य मानता हूं कि अगर इन सपन्न प्रांतीय भाषाओं और उन्हें बोलने वाले लोगों की पूरी उन्नति करनी हो, तो ये विश्वविद्यालय होने चाहिये।
साथ ही मुझे डर है कि इस लक्ष्य को पूरा करने में हम अनुचित जल्दबाजी कर रहे हैं। इसके लिए पहला कदम प्रान्तों का भाषावार राजनीतिक बंटवारा होना चाहिये। उनका शासन अलग हो जायेगा तो स्वाभाविक तौर पर जहां विश्वविद्यालय नहीं हैं वहां वे कायम हो जायेंगे।
नये विश्वविद्यालय के लिए उचित पृष्ठभूमि होनी चाहिये। विश्वविद्यालय हों उसके पहले उनका पोषण करने वाले स्कूल और कॉलेज होने चाहिये, जहां अपनी- अपनी प्रान्तीय भाषाओं के माध्यम से शिक्षा दी जाय। तभी विश्वविद्यालयों का आवश्यक वातावरण खडा़ हुआ माना जा सकता है। विश्वविद्यालय चोटी पर होता है। शानदार चोटी तभी कायम रह सकती है जब बुनियाद अच्छी हो।
हम राजनीतिक दृष्टि से तो स्वतं त्र हो गये, परन्तु पश्चिम के सूक्ष्म प्रभाव से मुक्त नहीं हुए हैं। मुझे उस विचार धारा के राजनीतिज्ञों से कुछ नहीं कहना है, जो यह मानते हैं कि ज्ञान पश्चिम से ही आ सकता है। मैं इस विश्वास से भी सहमत नहीं हूं कि पश्चिम से कोई अच्छी बात नहीं मिल सकती। मगर मुझे यह डर जरूर है कि अभी तक इस मामलें में हम किसी निर्णय पर नहीं पहुंच सके हैं। आशा है कोई यह दावा नहीं करेगा कि चूंकि हमें विदेशी प्रभुता से राजनीतिक मुक्ति मिल गयी मालूम होती है, सिर्फ इसलिए हम विदेशी भाषा और विदेशी विचारों के प्रभाव से भी मुक्त हो गये हैं। क्या यह बुद्धिमानी नहीं है, क्या देश के प्रति हमारे कर्त्तव्य की यह मांग नहीं है कि नये विश्वविद्यालय खड़े करने से पहले हम जरा सुस्ता कर अपनी नवप्राप्त स्वतंत्रता के प्राणवायु से अपने फेफड़ों को भर लें? विश्वविद्यालय को बहुत- सी शानदार इमारतों और सोने- चांदी के खजाने की कभी आवश्यकता नहीं होती। उसे सबसे ज्यादा जरूरत लोकमत द्धारा समझ कर दिये गये सहारे की रहती है। उसके पास शिक्षकों का एक बडा़ भण्डार होना चाहिये। उसके संस्थापक दूरदर्शी होने चाहिये।
मेरी राय में विश्वविद्यालयों की स्थापना के लिए रूपया जुटाना लोकतांत्रिक राज्य का काम नहीं है। लोगों को उनकी जरूरत होगी तो वे आवश्यक पैसा खुद जुटा लेंगे। इस प्रकार स्थापित विश्वविद्यालय देश के भूषण होंगे। जहां शासन विदेशियों के हाथों में होता है, वहां लोगों को जो कुछ मिलता है वह यब उपर से आता है और इस प्रकार वे अधिकाधिक पराधीन हो जाते हैं। जहां उसका आधार जनता की इच्छा पर होता है और इसलिए व्यापक होता है, वहां हर चीज नीचे से उठती है और इसलिए टिकती है। वह दीखने में भी अच्छी होती है और लोगों को शक्ति देती है। ऐसी लोकतांत्रिक योजना में विद्या- प्रचार में लगाया हुआ रूपया लोगों को दस गुना लाभ पहुंचाता है, जैसी अच्छी जमीन में बोया हुआ बीज बढ़िया फसल देता है। विदेशी प्रभुता के अधीन कायम किये गये विश्वविद्यालय उलटी दिशा में चले हैं। शायद कोई परिणाम हो भी नहीं सकता था। इसलिए जब तक भारत वर्ष अपनी नवप्राप्त स्वतंत्रता को पचा न ले, विश्वविद्यालय कायम करने के बारे में हर दृष्टि से सावधान रहना चाहिये।
प्रौढ़शिक्षा
अगर बडी़ उमर के स्त्री- पुरूषों को तालीम देने या पढा़ने का काम मेरे जिम्मे हो, तो मैं अपने विद्यार्थियों को अपने देश के विस्तार और उसकी महत्ता का बोध कराकर उनकी पढा़ई शुरू करूं। हमारे देहातियों के खयाल में उनका गांव ही उनका समूचा देश होता है। जब वे किसी दुसरे गांव को जाते हैं तो इस तरह बात करते हैं, मानो उनका अपना गांव ही उनका समूचा देश या वतन हो। ‘हिन्दुस्तान ‘ तो उनके खयाल से भूगोल की किताबों में बरता जाने वाला एक शब्द मात्र है। हमारे गांवों में कितना घोर अज्ञान घुसा हुआ है, इसका हमें अंदाज भी नहीं है। हमारे देहाती भाई और बहन नहीं जानते कि इस देश में जो विदेशी हुकूमत चला रही है, उसका देश पर कितना बुरा असर हुआ है।…. वे नहीं जानते कि इस हुकूमत के पंजे से, इसकी बला से, कैसे छूटा जाय। फिर, उन्हें इस बात का भी तो खयाल नहीं है कि विदेशियों की जो हुकूमत यहां कायम है, उसका एक कारण उनकी अपनी कमजोरियां और खामियां भी है; और दूसरे, वे यह भी नहीं जानते कि इस परदेशी हुकूमत की बला को दूर करने की ताकत खुद उनमें है। इसलिए बडी़ उमर के अपने देशवासियों की शिक्षा का सबसे पहला अर्थ मैं यह करता हूं कि उन्हें जबानी तौर पर यानी सीधी बातचीत के जरिये सच्ची राजनीतिक तालीम दी जाय।… इस जबानी तालीम के साथ ही साथ लिखने- पढ़ने की तालीम भी चलेगी। इसके लिए खास लियाकत की जरूरत है। इस सिलसिले में पढा़ई के वक्त को भरसक कम करने के खयाल से कई तरीके आजमाये जा रहे हैं।
जन- साधारण में फैली हुई व्यापक निरक्षरता भारत का कलंक है। वह मिटना ही चाहिये। बेशक, साक्षरता की मुहिम का आरम्भ और अंत वर्णमाला के ज्ञान के साथ ही नहीं हो जाना चाहिये। वह उपयोगी ज्ञान के प्रचार के साथ- साथ चलनी चाहिये। लिखने- पढ़ने और अंकगणित का शुष्क ज्ञान देहातियों के जीवन का स्थायी अंग न आज है और न कभी हो सकता है। उन्हें ऐसा ज्ञान देना चाहिये जिसका उन्हें रोज उपयोग करना पडे़। वह उन पर थोपा नहीं जाना चाहिये। उसकी उन्हें भूख होनी चाहिये। आजकल उन्हें जो कुछ मिलता है वह ऐसा है, जिसकी न तो उन्हें आवश्यकता है और न कदर है। ग्रामवासियों को गांव का गणित, गांव का भूगोल, गांव का इतिहास और साहित्य का वह ज्ञान सिखाइये जिसे उन्हें रोज काम में लेना पड़े, अर्थात चिठ्ठी- पत्री लिखना और पढ़ना बताइये। वे इस ज्ञान को जुटाकर रखेंगे और आगे की मंजिलों की तरफ बढेंगे। जिन पुस्तकों से उन्हें दैनिक उपयोग की कोई सामाग्री नहीं मिलती, वे उनके लिए किसी काम की नहीं।
धार्मिक शिक्षा
….इसमें कोई शक नहीं कि सरकारी स्कूल- कॉलेजों से निकले हुए अधिकतर लड़के धार्मिक शिक्षण से कोरे ही होते हैं।… मैं जानता हूं कि इस विचार वाले लोग भी हैं कि सार्वजनिक स्कूलों में सिर्फ अपने- अपने विष्ायों की ही शिक्षा देना चाहिये। मैं यह भी जानता हूं कि हिन्दुस्तान जैसे देश में, जहां पर संसार के अधिकतर धर्मों के अनुयायी मिलते हैं और जहां एक ही धर्म के इतने भेद और उपभेद हैं, धार्मिक शिक्षण का प्रबन्ध करना कठिन होगा। लकिन अगर हिन्दुस्तान को आध्यात्मिकता का दिवाला नहीं निकालना है, तो उसे धार्मिक शिक्षा को भी विषयों के शिक्षण के बराबर ही महत्व देना पडे़गा। यह सच है कि धार्मिक पुस्तकों के ज्ञान की तुलना धर्म से नहीं की जा सकती। मगर जब हमें धर्म नहीं मिल सकता तो हमें अपने लड़को और लड़कियों को उससे दूसरे नम्बर की वस्तु देने में ही संतोष मानना पडे़गा। और फिर स्कूलों में ऐसी शिक्षा दी जाय सा नहीं, मगर सयाने लड़कों को तो जैसे और विषयों में वैसे धार्मिक विषय में भी स्वावलम्बन की आदत डालनी ही पड़ेगी। जैसे आज उनकी वाद- विवाद या चरखा- समितियां हैं, वैसे ही वे धार्मिक वर्ग भी खोलें।
मैं नहीं मानता कि सरकार मजहबी तालीम से सम्बंध रख सकती है या उस तालीम को निभा सकती है। मेरा विश्वास है कि मजहबी तालीम पूरी तरह से सिर्फ मजहबी अंजुमनों का ही विषय होनी चाहिये। धर्म और नीति को मिलाना नहीं चाहिये। मेरे विश्वास के मुताबिक मुनियादी नीति सब धर्मों में एक ही है। बुनियादी नीति की तालीम देना बेशक सरकार का नाम है। धर्म से मेरा मतलब बुनियादी नीति नहीं बल्कि वह है, जिसका सिक्का लगाकर अलग- अलग जमातें बनाई जाती हैं। हमने सरकारी मदद पाने वाले मजहब और सरकारी मजहब के बहुत नतीजे सहे हैं। जो समाज या समूह अपने धर्म की हिफाजत के लिए किसी हद तक या पूरी तौर पर सरकारी मदद पर निर्भय रहता है, वह धर्म जैसी कोई चीज रखने का अधिकारी नहीं है, यह कह कहना ज्यादा ठीक होगा कि उसका कोई धर्म नहीं होता।
धार्मिक शिक्षा के पाठ्यक्रम में अपने सिवा दूसरे धर्मों के सिद्धान्तों का अध्ययन भी शामिल होना चाहिये। इसके लिए विद्यार्थीयों को ऐसी तालीम दी जानी चाहिये, जिससे वे संसार के विभिन्न महान धर्मों के सिद्धान्तों को आदर और उदारतापूर्वक सहनशीलता की भावना रखकर समझने और उनकी कदर करने की आदत डालें। यह काम ठीक ढंग से किया जाय तो इससे उनकी आध्यात्मिक निष्ठा दृढ़ होगी और स्वयं अपने धर्म की अधिक अच्छी समझ प्राप्त करने में मदद मिलेगी। परन्तु एक नियम ऐसा है जिसे सब महान धर्मों का अध्ययन करते समय हमेशा ध्यान में रखना चाहिये; और वह यह है कि अलग- अलग धर्मों का अध्ययन उनके माने हुए भक्तों की रचनाओं के द्धारा ही करना चाहिये।
पाठ्य- पुस्तकें
इसमें कोई सन्देह नहीं है कि आम स्कूलों में जो पुस्तकें खास तौर पर बच्चें के लिए इस्तेमाल की जाती हैं, वे जब हानिकारक नहीं होती हैं तो अधिकांश में निकम्मी अवश्य होती हैं। इससे इन्कार नहीं किया जा सकता कि उनमें से बहुत- सी होशियारी के साथ लिखी जाती हैं, उनके लिए वे सबसे अच्छी भी हो सकती हैं। परन्तु वे भारतीय लड़को और लड़कियों के लिए भारतीय परिस्थतियों के लिए नहीं लिखी जा जातीं। जब वे इस तरह लिखी जाती हैं तो वे आम तौर पर अधिकचरी नकल होती हैं और उनसे विद्यार्थियों की आवश्यकताएं पूरी नहीं होतीं।
इसलिए मैं इस नतीजे पर पहुंचा हूं कि पुस्तकों की आवश्यकता विद्यार्थियों की अपेक्षा शिक्षकों के लिए अधिक है। और प्रत्येक शिक्षक को, यदि अपने विद्यार्थियों के प्रति वह पूरा न्याय करना चाहता है, उपलब्ध सामाग्री से अपना दैनिक पाठ खुद तैयार करना होगा। इसे भी उसे अपनी कक्षा की विशेष आवश्यकताओं के अनुकूल बनाना होगा। सच्ची शिक्षा का काम शिक्षा पाने वाले लड़कों और लड़कियों के उत्तम गुणों को बाहर लाना है। यह काम विद्यार्थियों के दिमाग अनाप- शनाप और अनचाही जानकारी ठुंस देने से कभी नहीं हो सकता। इस तरह की जानकारी एक जड़ बोझ बन जाती है, जो उनकी सारी मौलिकता को कुचल डालती है और उन्हें निरी मशीनें बना देती है।
अध्यापक
अध्यापक कैसे हों इस सम्बंध में मैं इस पुराने विचार को मानने वाला हूं कि उन्हें अध्यापन, अध्यापन- कार्य के लिए अपने अनिवार्य प्रेम के करण ही करना चाहिये और इस कार्य से अपने जीवन- निर्वाय के लिए जितना आवश्यक हो उतना ही लेकर संतुष्ट रहना चाहिये। रोमन कैथलिकों में यह विचार अभी तक बचा रहा है और वे दुनिया की कुछ सर्वोत्तम संस्थायें चला रहे हैं। प्राचीन भारतीय ऋषियों ने तो और भी उंचा आदर्श स्वीकार किया था। वे विद्यार्थियों को अपने परिवार में ही शामिल कर लेते थे। लेकिन जो शिक्षा वे उन दिनों दिया करते थे, वह सामान्य जनता के लिए नहीं थी। उन्होंने तो मनुष्य- जाति के स च्चे शिक्षकों की ऐ पूरी जाति का ही निर्माण कर दिया। सामान्य जनता को उसकी तालीम घरों में और अपने परम्परागत उद्योग- धंधों में मिलती थी। उन दिनों के लिए वह काफी अच्छी व्यवस्था थी। अब परिस्थितियां बदल गयी हैं। साहित्यिक तालीम के लिए आम मांग है और यह मांग जोरदार भी है। विशिष्ट वर्गों की शिक्षा पर जैसा ध्यान दिया जाता है, सामान्य लोग भी अब अपनी शिक्षा पर वैसा ही ध्यान चाहते हैं। यह बात कहां तक सम्भव है और मनुष्य- जाति के लिए कहां तक कल्याणकारी है, इस प्रश्न की चर्चा यहां नहीं हो सकती। लोगों में ज्ञान की इच्छा पैदा हो और वे उसकी मांग करें, उसमें कोई बुराई नहीं है। अगर इस इच्छा को उचित दिशा में मोडा़ गया तो उससे लाभ ही होगा। इसलिए अब हमें जो अनिवार्य है उसे टालने के उपाय ढूंढ़ना छोड़कर इस स्िथति का अच्छे- से- अच्छा उपयोग करना चाहिये। इस काम के लिए हजारों शिक्षकों की आवश्यकताओं होगी और वे महज कहने से नहीं मिल जायेंगे। और न वे अपना जीवन- निर्वाह भीख मांग कर करेंगे। हमें उन्हें एक निश्चित वेतन देने की पूरी व्यवस्था करनी होगी। हमें शिक्षकों की मानो एक पूरी सेना ही लगेगी। उनके कार्य के महत्व और मूल्य के अनुसार उन्हें पैसा दिया जाय यह तो अशक्य है। राष्ट्र अपनी आर्थिक क्षमता के अनुसार ही उन्हें यथा शक्ति देगा। अलबत्ता यह आशा रखी जा सकती है कि ज्यों- ज्यों लोग दूसरे धंधों के मुकाबले में इस कार्य के महत्व को समझेंगे, त्यों- त्यों वे उन्हें ज्यादा पैसा देने को भी तैसार होंगे। लेकिन यथा सम्भव है उनकी आय में यह अपेक्षित वृद्धि बहुत धीरे- धीरे हो। इसलिए ऐसेअनेक पुरूषों और स्त्रियों को आगे आना चाहिये, जो आर्थिक लाभ की परवाह न करके शुद्ध देश- सेवा के भाव से अध्यापन का धंधा अपनायें। यदि ऐसा हो तो राष्ट्र शिक्षक के धंधे को छोटा नहीं समझेगा, बल्कि इन त्यागी स्त्रियों और पुरूषों को अपना प्रेम और आदर प्रदान करेगा। और इस तरह विचार करने पर हम इस नतीजे पर पहुंचते हैं कि जिस तरह स्वराज्य हमें मुख्यत: अपने ही प्रयत्नों से मिलेगा, उसी तरह शिक्ष्ाकों के दर्जे की वृद्धि भी मुख्यत: उनके ही प्रयत्नों से सम्भव होगी। उन्हें सफलता तक पहुंचने के लिए मार्ग की कठिनाइयों से वरितापूर्वक जूझना चाहिये और धीरज रखकर आगे बढ़ते जाना चाहिये।
स्वावलम्बी शिक्षा
यह सुझाव अक्सर किया गया है…. कि यदि शिक्षा अनिवार्य करनी हो या शिक्षा- प्राप्ति की इच्छा रखने वाले सब लड़के- लड़कियों के लिए उसे सुलभ बनाना हो, तो हमारे स्कूल और कॉलेज पूरे नहीं तो करीब- करीब स्वावलम्बी हो जाने चाहिये। दान, राजकीय सहायता अथवा विद्यार्थियों से ली जाने वाली फीस के द्धारा भी उन्हें स्वावलम्बी अनाया जा सकता है, लकिन यहां वैसा स्वावलम्बन इष्ट नहीं है। विद्यार्थियों को खुद कुछ ऐसा काम करते रहना चाहिये, जिससे आर्थिक प्राप्ति हो और इस तरह स्कूल तथा कॉलेज स्वावलम्बी बनें। औद्योगिक तालीम को अनिवार्य बनाकर ही ऐसा किया जा सकता है। विद्याथियों को साहित्यिक तालीम के साथ- साथ औद्योगिक तालीम भी मिलनी चाहिये, इस आवश्यकता के सिवा- और आजकल इस बात का महत्व अधिकाधिक स्वीकार किया जा रहा है- हमारे देश में तो औद्योगिक तालीम की आवश्यकता शिक्षा को स्वावलम्बी बनाने के लिए भी है। लेकिन यह तभी हो सकता है जब हमारे विद्यार्थी श्रम का गौरव अनुभव करना सीखें और हाथ- उद्योग के अज्ञान को
समाज में अप्रतिष्ठा का चिन्हृ समझने का रिवाज पड़े। अमेरिका में, जो कि दुनिया का सबसे धनी देश है और इसलिए जहां शिक्षा को स्वावलम्बी बनाने की आवश्यकता कम- से- कम है, विद्यार्थी प्राय: अपनी पढा़ई का पूरा अथवा आंशिक खर्च खुद कोई उद्योग करके निकालते हैं।… अगर अमेरिका अपने स्कूल और कॉलेज इस तरह चलाता है कि विद्यार्थी अपनी पढा़ई का खर्च खुद निकाल लिया करें, तो हमारे स्कूलों और कॉलेजों में तो इस बात की आवश्यकता और अधिक मानी जानी चाहिये। हम गरीब विद्यार्थियों को फीस की माफी आदि की सुविधा दें, उससे क्या यह ज्यादा अच्छा नहीं होगा कि हम उनके लिए ऐसा कोई काम दें, जिसे करके वे अपना खर्च खुद निकाल ? भारतीय युवकों के मन में यह वहम भरकर कि अपनी जीविका कमाने अथवा पढा़ई का खर्च निकालने के लिए हाथ- पांव की मेहनत करना भद्रोचित नहीं है, हम उनका अपार अहित करते हैं। यह अहित नैतिक भी है और भौतिक की अपेक्षा नैतिक ज्यादा है। फीस आदि की माफी धर्मबुद्धि रखने वाले विद्यार्थी के मन पर आजीवन बोझ की तरह पडी़ रहती है, और ऐसा होना भी चाहिये। अपने उत्तर- जीवन में कोई इस बात का स्मरण कराना पसन्द नहीं करता कि उसे अपनी शिक्षा के लिए दान का आधार लेना पडा़ था। लेकिन उसने अपनी शिक्षा के लिए परिश्रम पूर्वक उद्योग किया हो और इस तरह अपनी पढा़ई का खर्च निकालने के साथ- साथ अपनी बुद्धि, शरीर और आत्मा का विकास भी सिद्ध किया हो, तो ऐसा कौन है जो अपने उन दिनों को गर्व से याद न करेगा ?
अनुक्रमणिका
- १. मेरे सपनो का भारत
- २. स्वराज्य का अर्थ
- ३. राष्ट्रवाद का सच्चा स्वरूप
- ४. भारतीय लोकतंत्र
- ५. भारत और समाजवाद
- ६. भारत और साम्यवाद
- ७. उद्योगवाद का अभिशाप
- ८. वर्गयुध्द
- ९. हड़ताल
- १०. मज़दूर क्या चुनेंगे?
- ११. अधिकार या कर्तव्य ?
- १२. बेकारी का सवाल
- १३. दरिद्र-नारायण
- १४. शरीर-श्रम
- १५. सर्वोदय
- १६. संरक्षता का सिद्धांत
- १७. अहिंसक अर्थ-व्यवस्था
- १८. सामान वितरण का रास्ता
- १९. भारत में अहिंसा की उपासना
- २०. सर्वोदयी राज्य
- २१. सत्याग्रह और दुराग्रह
- २२. किसान
- २३. गांवों की ओर
- २४. ग्राम-स्वराज्य
- २५. पंचायत राज
- २६. ग्रामोद्योग
- २७. सरकार क्या कर सकती है?
- २८. ग्राम-प्रदर्शनियां
- २९. चरखे का संगीत
- ३०. मिल-उद्योग
- ३१. स्वदेशी
- ३२. गोरक्षा
- ३३. सहकारी गो पालन
- ३४. गांवों की सफाई
- ३५. गांव का आरोग्य
- ३६. गांवों का आहार
- ३७. ग्राम सेवक
- ३८. समग्र ग्राम सेवा
- ३९. युवकों को आह्वान
- ४०. राष्ट्र का आरोग्य, स्वच्छता और आहार
- ४१. शराब और अन्य मादक द्रव्य
- ४२. शहरों की सफाई
- ४३. विदेशी माध्यम की बुराई
- ४४. मेरा अपना अनुभव
- ४५. भारत की सांस्कृतिक विरासत
- ४६. नई तालीम
- ४७. बुनियादी शिक्षा
- ४८. उच्च शिक्षा
- ४९. शिक्षा का आश्रमी आदर्श
- ५०. राष्ट्रभाषा और लिपि
- ५१. प्रान्तीय भाषायें
- ५२. दक्षिण में हिन्दी
- ५३. विद्यार्थियों के लिए अनुशासन के नियम
- ५४. भारतीय स्त्रियों का पुनरूत्थान
- ५५. स्त्रियों की शिक्षा
- ५६. संतति-नियमन
- ५७. काम-विज्ञान की शिक्षा
- ५८ (……..)
- ५९. साम्प्रदायिक एकता
- ६०. वर्णाश्रम धर्म
- ६१. अस्पृश्यता का अभिशाप
- ६२. भारत में धार्मिक सहिष्णुता
- ६३. धर्म – परिवर्तन
- ६४. (…)
- ६५. प्रान्तों का पुनर्गठन
- ६६. अल्पसंख्यकों की समस्यायें
- ६७. भारतीय गवर्नर
- ६८. समाचार-पत्र
- ६९. शान्ति सेना
- ७०. भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस
- ७१. भारत पाकिस्तान और काश्मीर
- ७२. भारत में विदेशी बस्तियां
- ७३. भारत और विश्वशांति
- ७४. पूर्व का संदेश
- ७५. स्फूट वचन
