४९. शिक्षा का आश्रमी आदर्श
शिक्षा के बारे में मेरी अपनी कुछ मान्यतायें हैं। इन्हें मेरे सहकारियों ने पूरा-पूरा स्वीकार तो नहीं किया, फिर भी यहां देता हूं:
1. लड़कों और लड़कियों को एक साथ शिक्षा देनी चाहिये। यह बाल्यावस्था आठ वर्ष तक मानी जाय।
2. उनका समय मुख्यत: शारीरिक काम में बीतना चाहिये और यह काम भी शिक्षक की देखरेख में होना चाहिये। शारीरिक काम को शिक्षा का अंग माना जाय।
3. हर लड़के और लड़की कर रूचि को पहचानकर उसे काम सौंपना चाहिये।
4. हर एक काम लेते समय उसके कारण की जानकारी करानी चाहिये।
5. लड़का या लड़की समझने लगे, तभी से उसे साधारण ज्ञान देना चाहिये। उसका यह ज्ञान अक्षर- ज्ञान से पहले शुरू होना चाहिये।
6. अक्षर- ज्ञान को सुन्दर लेखन- कला का अंग समझकर पहले बच्चे को भूमिति की आकृतियां खींचना सिखाया जाय; और उसकी अंगुलियों पर उसका काबू हो जाय, तब उसे वर्णमाला लिखना सिखाया जाय। यानी उसे शुरू से ही शुद्ध अक्षर लिखना सिखाया जाय।
7. लिखने से पहले बच्चा पढ़ना सीखे। यानी अक्षरों को चित्र समझकर उन्हें पहचानना सीखे और फिर चित्र खींचे।
8. इस तरह से जो बच्चा शिक्षक के मुंह से ज्ञान पायेगा, वह आठ वर्ष के भीतर अपनी शक्ति के अनुसार काफी ज्ञान पा लेगा।
9. बच्चों को जबरन कुछ न सिखाया जाय।
10. वे जो सीखें उसमें उन्हें रस आना ही चाहिये।
11. बच्चों को शिक्षा खेल जैसी लगनी चाहिये। खेल- कूद भी शिक्षा का अंग है।
12. बच्चों की सारी शिक्षा मातृभाषा द्धारा होनी चाहिये।
13. बच्चों को हिन्दीं- उर्दू का ज्ञान राष्ट्रभाषा के तौर पर दिया जाय। उसका आरम्भ अक्षर- ज्ञान से पहले होना चाहिये।
14. धार्मिक शिक्षा जरूरी मानी जाय। वह पुस्तक द्धारा नहीं बल्कि शिक्षक के आचरण और उसके मुंह से मिलनी चाहिये।
15. नौ से सोलह वर्ष का दूसरा काल है।
16. दूसरे काल में भी अन्त तक लड़के- लड़कियों की शिक्षा साथ- साथ हो तो अच्छा है।
17. दूसरे काल में हिन्दु बालक को संस्कृत का और मुसलमान बालक को अरबी का ज्ञान मिलना चाहिये।
18. इस काल में भी शारीरिक काम तो चालू ही रहेगा। पढा़ई- लिखाई का समय जरूरत के अनुसार बढा़या जाना चाहिये।
19. इस काल में माता- पिता का धंधा यदि निश्चित रूप से मालूम हो, तो बच्चे को उसी धंधे का ज्ञान मिलना चाहिये; और उसे इस तरह तैयार किया जाय कि वह अपने बाप- दादा के धंधे से जीविका चलाना पसन्द करे। यह नियम लड़की पर लागू नहीं होता।
20. सोलह वर्ष तक लड़के- लड़कियों को दुनिया के इतिहास और भूगोल का तथा वनस्ति- शास्त्र, खगोल- विद्या, गणित, भूमिति और बीजगणित का साधारण ज्ञान हो जाना चाहिये।
21. सोलह वर्ष के लड़के- लड़की को सीना- पिरोना और रसोई बनाना आ जाना चाहिये।
22. सोलह से पचीस वर्ष के समय को मैं तीसरा काल मानता हूं इस काल में प्रत्येक युवक और युवती को उसकी इच्छा और स्थिति के अनुसार शिक्षा मिले।
23. नौ वर्ष के बाद आरम्भ होने वाली शिक्षा स्वावलम्बी होनी चाहिये। यानी विद्यार्थी पढ़ते हुए ऐसे उद्योगों में लगे रहें, जिनकी आमदनी से शाला का खर्च चले।
24. शाला में आमदनी तो पहले से ही होने लगनी चाहिये। किन्तु शुरू के वर्षों में खर्च पूरा होने लायक आमदनी नहीं होगी।
25. शिक्षकों को बडी़- बडी़ तनखाहें नहीं मिल सकतीं, किन्तु वे जीविका चलाने लायक तो होनी ही चाहिये।शिक्षकों में सेवा- भावना होनी चाहिये। प्राथमिक शिक्षा के लिए कैसे भी शिक्षक से काम चलाने का रिवाज निन्दनीय है। सभी शिक्षक चरित्रवान होने चाहिये।
26. शिक्षा के लिए बडी़ और खर्चीली इमारतों की जरूरत नहीं है।
27. अंग्रेजी का अभ्यास भाषा के रूप में ही हो सकता है और उसे पाठ्यक्रम में जगह मिलनी चाहिये। जैसे हिन्दीं राष्ट्रभाषा है, वैसे ही अंग्रेजी का उपयोग दूसरें राष्ट्रों के साथ के व्यवहार और व्यापार के लिए है।
स्त्रियों की विशेष शिक्षा कैसी हो और कहां से शुरू हो, इसके विषय में मैं खुद निश्चय नहीं कर सका हूं। लेकिन यह मेरा दृढ़ मत है कि जितनी सुविधा पुरूष को मिलती है उतनी ही स्त्री को भी मिलनी चाहिये और जहां विशेष सुविधा की जरूरत हो वहां विशेष सुविधा भी मिलनी चाहिये।
आश्रम में हमने आज तक जितने प्रयोग किये हैं, उनसे हमें इस एक बात का निश्चय हो गया है कि शिक्षा में उद्योग को और खासकर कताई को बडा़ स्थान मिलना चाहिये। शिक्षा को ज्यादातर स्वावलम्बी देहाती जीवन को ताकत पहुंचाने वाली और उस जीवन के साथ सम्बंध रखने वाली होनी चाहिये।
सच्ची शिक्षा तो स्कूल छोड़ने के बाद शुरू होती है। जिसने उसका महत्व समझा है वह सदा ही विद्यार्थी है। अपना कर्त्तव्य- पालन करते हुए उसे अपना ज्ञान रोज बढा़ना चाहिये। जो सब काम समझकर करता है उसका ज्ञान रोज बढ़ना ही चाहिये।
शिक्षा की प्रगति में एक चीज रूकावट डालती है। शिक्षक के बिना शिक्षा ली ही नहीं जा सकती, यह वहम समाज की बुद्धि को रोक रहा है। मनुष्य का सच्चा शिक्षक वह खुद ही है। आजकल तो अपने- आप शिक्षा प्राप्त करने के साधन खूब बढ़ गये हैं। बहुत- सी बातों का ज्ञान लगन से हर एक को मिल सकता है और जहां शिक्षक ढूंढ़ लेता है। अनुभव बडे़- से- बडा़ स्कूल है। कई धंधों की दुकानों पर या कारखानों में ही सीखे जा सकते हैं। उनका स्कूल में पाया हुआ ज्ञान अक्सर ताते का- सा होता है। इसलिए बडी़ उमर वालों के लिए स्कूल के बजाय इच्छा की, लगन की और आत्म- विश्वास की जरूरत है।
बच्चों की शिक्षा मां- बाप का धर्म है। ऐसा सोचें तो हमें बेशुमार पाठशालाओं की अपेक्षा सच्ची शिक्षा का वायुमण्डल पैदा करने की ज्यादा जरूरत है। वह पैदा हुआ फिर तो जहां पाठशाला चाहिये वहां वह जरूर खडी़ हो जायेगी। आश्रम की शिक्षा इस दृष्टि से होती है और दृष्टि से सोचने पर हमें सफलता भी एक हद तक अच्छी मिली है। आश्रम का हर विभाग ऐ स्कूल है।
अनुक्रमणिका
- १. मेरे सपनो का भारत
- २. स्वराज्य का अर्थ
- ३. राष्ट्रवाद का सच्चा स्वरूप
- ४. भारतीय लोकतंत्र
- ५. भारत और समाजवाद
- ६. भारत और साम्यवाद
- ७. उद्योगवाद का अभिशाप
- ८. वर्गयुध्द
- ९. हड़ताल
- १०. मज़दूर क्या चुनेंगे?
- ११. अधिकार या कर्तव्य ?
- १२. बेकारी का सवाल
- १३. दरिद्र-नारायण
- १४. शरीर-श्रम
- १५. सर्वोदय
- १६. संरक्षता का सिद्धांत
- १७. अहिंसक अर्थ-व्यवस्था
- १८. सामान वितरण का रास्ता
- १९. भारत में अहिंसा की उपासना
- २०. सर्वोदयी राज्य
- २१. सत्याग्रह और दुराग्रह
- २२. किसान
- २३. गांवों की ओर
- २४. ग्राम-स्वराज्य
- २५. पंचायत राज
- २६. ग्रामोद्योग
- २७. सरकार क्या कर सकती है?
- २८. ग्राम-प्रदर्शनियां
- २९. चरखे का संगीत
- ३०. मिल-उद्योग
- ३१. स्वदेशी
- ३२. गोरक्षा
- ३३. सहकारी गो पालन
- ३४. गांवों की सफाई
- ३५. गांव का आरोग्य
- ३६. गांवों का आहार
- ३७. ग्राम सेवक
- ३८. समग्र ग्राम सेवा
- ३९. युवकों को आह्वान
- ४०. राष्ट्र का आरोग्य, स्वच्छता और आहार
- ४१. शराब और अन्य मादक द्रव्य
- ४२. शहरों की सफाई
- ४३. विदेशी माध्यम की बुराई
- ४४. मेरा अपना अनुभव
- ४५. भारत की सांस्कृतिक विरासत
- ४६. नई तालीम
- ४७. बुनियादी शिक्षा
- ४८. उच्च शिक्षा
- ४९. शिक्षा का आश्रमी आदर्श
- ५०. राष्ट्रभाषा और लिपि
- ५१. प्रान्तीय भाषायें
- ५२. दक्षिण में हिन्दी
- ५३. विद्यार्थियों के लिए अनुशासन के नियम
- ५४. भारतीय स्त्रियों का पुनरूत्थान
- ५५. स्त्रियों की शिक्षा
- ५६. संतति-नियमन
- ५७. काम-विज्ञान की शिक्षा
- ५८ (……..)
- ५९. साम्प्रदायिक एकता
- ६०. वर्णाश्रम धर्म
- ६१. अस्पृश्यता का अभिशाप
- ६२. भारत में धार्मिक सहिष्णुता
- ६३. धर्म – परिवर्तन
- ६४. (…)
- ६५. प्रान्तों का पुनर्गठन
- ६६. अल्पसंख्यकों की समस्यायें
- ६७. भारतीय गवर्नर
- ६८. समाचार-पत्र
- ६९. शान्ति सेना
- ७०. भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस
- ७१. भारत पाकिस्तान और काश्मीर
- ७२. भारत में विदेशी बस्तियां
- ७३. भारत और विश्वशांति
- ७४. पूर्व का संदेश
- ७५. स्फूट वचन
