४. भारतीय लोकतंत्र
सर्वोच्च कोटि की स्वतंत्रता के साथ सर्वोच्च कोटि का अनुशासन और विनय होता है। अनुशासन और विनय से मिलने वाली स्वतंत्रता को कोई छीन नहीं सकता। संयमहीन स्वच्छंदता संस्कारहीनता की घोतक है, उससे व्यक्ति की अपनी और पड़ोसियों की भी हानि होती है।1
कोई भी मनुष्य की बनाई हुई संस्था ऐसी नहीं है जिसमंे खतरा न हो। संस्था जितनी बड़ी होगी, उसके दुरूपयोग की संभावनायें भी उतनी ही बड़ी होंगी। लोकतंत्र एक बड़ी संस्था है, इसलिए उसका दुरूपयोग भी बहुत हो सकता है। लेकिन उसका इलाज लोकतंत्र से बचना नहीं, बल्कि दुरूपयोग की संभावना को कम-से-कम करना है।2
जनता की राय के अनुसार चलने वाला राज्य जनमत से आगे बढ़कर कोई काम नहीं कर सकता। यदि वह जनमत के खिलाफ जाय तो नष्ट हो जाय। अनुशासन और विवेकयुक्त जनतंत्र दुनिया की सबसे सुंदर वस्तु है। लेकिन राग-द्वेष, अज्ञान और अंध-विश्वास आदि दुर्गुणों से ग्रस्त जनतंत्र अराजकता के गड्ढे में गिरता है और अपना नाश खुद कर डालता है।3
मैंने अक्सर यह कहा है कि अमुक विचार रखने वाला कोई भी पक्ष यह दावा नहीं कर सकता कि प्रस्तुत प्रश्नें के सही निर्णय केवल वही कर सकता है। हम सबसे भूलें होती हैं और हमें अक्सर अपने निर्णयांे में परिवर्तन करने पड़ते हैं। हमारे जैसे विशाल देश में ईमानदारी से विचार करने वाले सभी पक्षांे को स्थान होना चाहिये। इसलिए हमारा अपने प्रति और दूसरों के प्रति कम-से-कम यक कत्र्तव्य तो है ही कि हम प्रतिपक्षी का दृष्टिकोण समझने की कोशिश करें। और यदि हम उसे स्वीकार न कर सकें तो भी जिस तरह हम यह चाहेंगे कि वह हमारे मत का आदर करे, उसी तरह हम भी उसके मत का आदर करें। यह चीज स्वस्थ सार्वजनिक जीवन की और स्व्राज्य की योग्यता की अनिवार्य कसौटियों में से एक है। यदि हममें उदारता और सहिष्णुता नहीं है, तो हम अपने भेद कभी मित्रतापूर्वक नहीं सुलझा सकेंगे और फल यह होगा कि हमें तीसरे पक्ष को अपना पंच मानना पड़ेगा, यानी विदेषी अधीनता स्वीकार करनी पडे़ेगी।4
जब राज्यसत्ता जनता के हाथ में आ जाती है, तब प्रजा की आजादी में होने वाले हस्तक्षेप की मात्रा कम-से-कम हो जाती है। दूसरे शब्दों में, जो राष्ट्र अपना काम राज्य के हस्तक्षेप के बिना ही शांतिपूर्वक और प्रभावपूर्ण ढंग से कर दिखाता है, उसे ही सच्चे अर्थों में लोकतंत्रात्मक कहा जा सकता है। जहां ऐसी स्थिति न हो वहां सरकार का बाहरी रूप लोकतंत्रात्मक भले हो, परंतु वह नाम के लिए ही लोकतंत्रात्मक है।5
लोकतंत्र और हिंसा का मेल नहीं बैठ सकता। जो राज्य आज नाम मात्र के लिए लोकतंत्रात्मक हैं उन्हें या तो स्पष्ट रूप से तानाशाही का हामी हो जाना चाहिये, या अगर उन्हें सचमुच लोकतंत्रात्मक बनना है तो उन्हें साहस के साथ अहिंसक बन जाना चाहिये। यह कहना बिलकुल अविचारपूर्ण है कि अहिंसा का पालन केवल व्यक्ति ही कर सकते हैं, और राष्ट्र-जो व्यक्तियों से ही बनते हैं-हरगिज नहीं।6
प्रजातंत्र का सार ही यह है कि उसमें हर एक व्यक्ति उन विविध स्वार्थों का प्रतिनिधित्व करता है जिनसे राष्ट्र बनता है। यह सच है कि इसका यह मतलब नहीं कि विशेष स्वार्थों के विशेष प्रतिनिधियों को प्रतिनिधित्व करने से रोक दिया जाये, लेकिन ऐसा प्रतिनिधित्व उसकी कसौटी नहीं है। यह उसकी अपूर्णता की एक निशानी है।7
सच्ची लोकसत्ता या जनता का स्वराज्य कभी भी असत्यमतय या हिंसक साधनों से नही आ सकता। कारण स्पष्ट और सीधा है यदि असत्यमय और हिंसक उपायों का प्रयोग किया गया, तो उसका स्वाभाविक परिणाम यह होगा, कि सारा विरोध या तो विरोधियों को दबाकर या उनका नाश करके खतम कर दिया जायेगा। ऐसी स्थिति में वैयक्तिक स्वतंत्रता की रक्षा नहीं हो सकती। वैयक्तिक स्वतंत्रता को प्रगट होने का पूरा अवकाश केवल विशुद्ध अहिंसा पर आधारित शासन में ही मिल सकता है।8
आजाद प्रजातांत्रिक भारत आक्रमण के खिलाफ पारस्परिक रक्षण और आर्थिक सहकार के लिए दूसरे आजाद देशों के साथ खुशी से सहयोग करेगा। वह आजादी और जनतंत्र पर आधारित ऐसी विश्व-व्यवस्था की स्थापना के लिए काम करेगा, जो मानव-जाति की प्रगति और विकास के लिए दुनिया के समूचे ज्ञान और उसकी समूची साधन-संपत्ति का उपयोग करेगी। 9
प्रजातंत्र का अर्थ मैं यह समझा हूं कि इस तंत्र में नीचे-से-नीचे और ऊंचे-से-ऊंचे आदमी को आगे बढ़ने का समान अवसर मिलना चाहिये। लेकिन सिवा अहिंसा के ऐसा कभी हो ही नहीं सकता। संसार में आज कोई भी देश ऐसा नहीं है जहां कमजोरों के हक की रक्षा बतौर फर्ज के होती हो। अगर गरीबांे के लिए कुछ किया भी जाता है, तो वह मेहरबानी के तौर पर किया जाता है।
पश्चिम का आज का प्रजातंत्र ज़रा हलके रंग का नाज़ी और फासिस्ट तंत्र ही है। ज्यादा-से-ज्यादा प्रजातंत्र साम्राज्यवाद की नाजी और फासिस्ट चाल को ढ़कने के लिए एक आडम्बर है। … हिंदुस्तान सच्चा प्रजातंत्र गढ़ने का प्रयत्न कर रहा है, अर्थात् ऐसा प्रजातंत्र जिसमें हिंसा के लिए कोई स्थान न होगा। हमारा हथियार सत्याग्रह है। उसका व्यक्त स्वरूप है चरख, ग्रामोद्योग, उद्योग के जरिये प्राथमिक शिक्षा-प्रणाली, अस्पृश्यता-निवारण, मद्य-निषेध, अहिंसक तरीके से मजदूरों का संगठन, जैसा कि अहमदाबाद में हो रहा है, और सांप्रदायिक ऐक्य। इस कार्यक्रम के लिए जनता को सामुदायिक रूप में प्रयत्न करना पड़ता है, और सामुदायिक रूप से जनता को शिक्षण भी मिल जाता है। इन प्रवृत्तियों को चलाने के लिए हमारे पास बड़े-बड़े संघ है, पर कार्यकत्र्ता पूरी तरह स्वेच्छा से इन कामों में आये हैं। उनके पीछे अगर कोई शक्ति है, तो वह उनकी अत्यंत दीन-दुर्बलांें की सेवा-भावना ही है।10
जन्मजात लोकतंत्रवादी वह होता है, जो जन्म से ही अनुशासन का पालन करने वाला हो। लोकतंत्र स्वाभाविक रूप में उसी को प्राप्त होता है, जो साधारण रूप में अपने को मानवी और दैवी सभी नियमों का स्वेच्छापूर्वक पालन करने का अभ्यस्त बना ले।… जो लोग लोकतंत्र के इच्छुक हैं उन्हंे चाहिये कि पहले वे लोकतंत्र की इस कसौटी पर अपने को परख लें। इसके अलावा, लोकतंत्रवादी को निःस्वार्थ भी होना चाहिये। उसे अपनी या अपने दल की दृष्टि से नहीं बल्कि एकमात्र लोकतंत्र की ही दृष्टि से सब-कुछ सोचना चाहिये। तभी वह सविनय अवज्ञा का अधिकारी हो सकता है।….. व्यक्तिगत स्वतंत्रता की मैं कदर करता हूं, लेकिन आपको यह हरगिज नहीं भूलना चाहिये कि मनुष्य मूलतः एक सामाजिक प्राणी ही है। सामाजिक प्रगति की आवश्यकताओं के अनुसार अपने व्यक्तित्व को ढालना सीखकर ही वह वर्तमान स्थिति तक पहुंचा है। अबाध व्यक्तिवाद वन्य पशुओं का नियम है। हमें व्यक्तिगत स्वतंत्रता और सामाजिक संयम के बीच समन्वय करना सीखना है। समस्त समाज के हित के खातिर सामाजिक संयम के आगे स्वेच्छापूर्वक सिर झुकाने से व्यक्ति और समाज, जिसका कि वह एक सदस्य है, दोनों का ही कल्याण होता है।11
जो व्यक्ति अपने कर्तव्य का उचित पालन करता है, उसे अधिकार अपने-आप मिल जाते हैं। सच तो यह है कि एकमात्र अपने कर्तव्य के पालन का अधिकार ही ऐसा अधिकार है, जिसके लिए ही मनुष्य को जीना चाहिये और मरना चाहिये। उसमें सब उचित अधिकारोें का समावेश हो जाता है। बाकी सब तो अनधिकार अपहरण जैसा है और उसमें हिंसा के बीज छपे रहते हैं।12
लोकशाही में हर आदमी को समाज की इच्छा यानी राज्य की इच्छा के मुताबिक चलना होता है और उसी के मुताबिक अपनी इच्छाओं की हद बांधनी होती है। स्टेट लोकशाही के द्वारा और लोकशाही के लिए राज्य चलाती है। अगर हर आदमी कानून को अपने हाथ में ले ले तो स्टेट नहीं रह जायेंगी, वह अराजकता हो जायेगी, यानी सामाजिक नियम या स्टेट की हस्ती मिट जायेगी। यह आजादी को मिटा देने वाला रास्ता है। इसलिए आपको अपने गुस्से पर काबू पाना चाहिये और राज्य को न्याय पाने का मौका देना चाहिये।13
प्रजातंत्र में लोगों को चाहिये कि वे सरकार की कोई गलती देखें, तो उसकी तरफ उसका ध्यान खीचें और संतुष्ट हो जाएँ। अगर वे चाहें तो अपनी सरकार को हटा सकते हैं, मगर उसके खिलाफ आंदोलन करके उसके कामों में बाधा न डालें। हमारी सरकार जबरदस्त जल सेना आर थल सेना रखने वाली कोई विदेशी सरकार तो है नहीं। उसका बल तो जनता ही है।14
सच्ची नौकरशाही केंद्र में बैठे हुए बीस आदमी नहीं चला सकते। वह तो नीचे से हर एक गांव के लोगों द्वारा चलायी जानी चाहिये।15
भीड़ का राज्य
मैं खुद तो सरकार की नाराजी की उतनी परवाह नहीं करता जितनी भीड़ की नाराजी की। भीड़ की मनमानी राष्ट्रीय बीमारी का लक्षण है और इसलिए सरकार की नाराजी की -जो कि अल्पकाय संघ तक ही सीमित होती है-तुलना में उससे निपटना ज्यादा मुश्किल है। ऐसी किसी सरकार को, जिसने अपने को शासन के लिए अयोग्य सिद्ध कर दिया हो, अपदस्थ करना आसान है, लेकिन किसी भीड़ में शामिल अनजाने आदमियों का पागलपन दूर करना कठिन है। 16
भीड़ को अनुशासन सिखाने से ज्यादा आसान और कुछ नहीं है। कारण सीधा है। भीड़ कोई काम बुद्धिपूर्वक नहीं करती, उसकी कोई पहले से सोची हुई योजना नहीं होती। भीड़ के लोग जो कुछ करते हैं सो आवेश में करते हैं। अपनी गलती के लिए पश्चाताप भी वे जल्दी करते हैं। मैं असहयोग का उपयोग लोकशाही का विकास करने के लिए कर रहा हूं।17
हमें इन हजारों-लाखों लोगों को,जिनका हृदय सोने का है, जिन्हें देश से प्रेम है, जो सीखना चाहते हैं और यह इच्छा रखते हें कि कोई उनका नेतृत्व करें, सही तालीम देनी चाहिये। केवल थोड़े से बुद्धिमान और निष्ठावान कार्यकत्र्ताओं की जरूरत है। वे मिल जाएं तो सारे राष्ट्र को बुद्धिपूर्वक काम करने के लिए संघटित किया जा सकता है तथा भीड़ की अराजकता की जगह सही प्रजातंत्र का विकास किया जा सकता है।18
सरकार की ओर से या प्रजा की ओर से आतंकवाद चलाया जा रहा हो, तब लोकशाही की भावना की स्थापना करना असंभव है। और कुछ अंशों में सरकारी आतंकवाद की तुलना में प्रजाकीय आतंकवाद लोकशाही की भावना के प्रसार का ज्यादा बड़ा शत्रु है। कारण, सरकारी आतंकवाद से लोकशाही की भावना को बल मिलता है, जब कि प्रजाकीय आतंकवाद तो उसका हनन करता है।19
बहुसंख्यक दल और अल्पसंख्यक दल
अगर हम लोकशाही की सच्ची भावना का विकास करना चाहते हैं, तो हम असहिष्णु नहीं हो सकते। असहिष्णु नहीं हो सकते। असहिष्णुता यह बताती है कि अपने ध्येय की सचाई में हमारा पूरा विश्वास नहीं है।20
हम अपने लिए यदि स्वतंत्रतापूर्वक अपना मत प्रकट करने और कार्य करने के अधिकार का दावा करते हैं, तो यही अधिकार हमें दूसरों को भी देना चाहिये। बहुसंख्यक दल का शासन, जब वह लोगों के साथ जबरदस्ती करने लगता है तब, उतना ही हसहाय हो उठता है जितना किसी अल्पसंख्यक नौकरशाही का। हमें अल्पसंख्यकों को अपने पक्ष में धीरज के साथ, समझा-बुझाकर और दलील करके ही लाने की कोशिश करनी चाहिये।21
बहुसंख्यक दल का शासन अमुक हद तक जरूर माना जाना चाहिये। यानी, ब्यौरे की बातों में हमें बहुसंख्यक दल का निर्णय स्वीकार कर लेना चाहिये। लेकिन उसके निर्णय कुछ भी क्यों न हों, उन्हें हमेशा स्वीकार कर लेना गुलामी का चिन्ह नहीं है। लोकशाही किसी ऐसी स्थिति का नाम नहीं है, जिसमंे लोग भेड़ों की तरह व्यवहार करें। लोकशाही में व्यक्ति के मत-स्वातंत्र्य और कार्य स्वातंत्र्य की रक्षा अत्यंत सावधानी से की जाती है, और की जानी चाहिये। इसलिए मैं यह विश्वास करता हूं कि अल्पसंख्यकों को बहुसंख्यकों से अलग ढंग से चलने का पूरा अधिकार है।22
अगर व्यक्ति का महत्व न रहे, तो समाज में भी क्या सत्व रह जायेगा ? वैयक्तिक स्वतंत्रता ही मनुष्य को समाज की सेवा के लिए स्वेच्छापूर्वक अपना सब-कुछ अर्पण करने की प्रेरणा दे सकती है। यदि उससे यह स्वतंत्रता छीन ली जाय, तो वह एक जड़ यंत्र जैसा हो जाता है और समाज की बरदारी होती है। वैयक्तिक स्वतंत्रता को अस्वीकार करके कोई सभ्य समाज नहीं बनाया जा सकता।23
अनुक्रमणिका
- १. मेरे सपनो का भारत
- २. स्वराज्य का अर्थ
- ३. राष्ट्रवाद का सच्चा स्वरूप
- ४. भारतीय लोकतंत्र
- ५. भारत और समाजवाद
- ६. भारत और साम्यवाद
- ७. उद्योगवाद का अभिशाप
- ८. वर्गयुध्द
- ९. हड़ताल
- १०. मज़दूर क्या चुनेंगे?
- ११. अधिकार या कर्तव्य ?
- १२. बेकारी का सवाल
- १३. दरिद्र-नारायण
- १४. शरीर-श्रम
- १५. सर्वोदय
- १६. संरक्षता का सिद्धांत
- १७. अहिंसक अर्थ-व्यवस्था
- १८. सामान वितरण का रास्ता
- १९. भारत में अहिंसा की उपासना
- २०. सर्वोदयी राज्य
- २१. सत्याग्रह और दुराग्रह
- २२. किसान
- २३. गांवों की ओर
- २४. ग्राम-स्वराज्य
- २५. पंचायत राज
- २६. ग्रामोद्योग
- २७. सरकार क्या कर सकती है?
- २८. ग्राम-प्रदर्शनियां
- २९. चरखे का संगीत
- ३०. मिल-उद्योग
- ३१. स्वदेशी
- ३२. गोरक्षा
- ३३. सहकारी गो पालन
- ३४. गांवों की सफाई
- ३५. गांव का आरोग्य
- ३६. गांवों का आहार
- ३७. ग्राम सेवक
- ३८. समग्र ग्राम सेवा
- ३९. युवकों को आह्वान
- ४०. राष्ट्र का आरोग्य, स्वच्छता और आहार
- ४१. शराब और अन्य मादक द्रव्य
- ४२. शहरों की सफाई
- ४३. विदेशी माध्यम की बुराई
- ४४. मेरा अपना अनुभव
- ४५. भारत की सांस्कृतिक विरासत
- ४६. नई तालीम
- ४७. बुनियादी शिक्षा
- ४८. उच्च शिक्षा
- ४९. शिक्षा का आश्रमी आदर्श
- ५०. राष्ट्रभाषा और लिपि
- ५१. प्रान्तीय भाषायें
- ५२. दक्षिण में हिन्दी
- ५३. विद्यार्थियों के लिए अनुशासन के नियम
- ५४. भारतीय स्त्रियों का पुनरूत्थान
- ५५. स्त्रियों की शिक्षा
- ५६. संतति-नियमन
- ५७. काम-विज्ञान की शिक्षा
- ५८ (……..)
- ५९. साम्प्रदायिक एकता
- ६०. वर्णाश्रम धर्म
- ६१. अस्पृश्यता का अभिशाप
- ६२. भारत में धार्मिक सहिष्णुता
- ६३. धर्म – परिवर्तन
- ६४. (…)
- ६५. प्रान्तों का पुनर्गठन
- ६६. अल्पसंख्यकों की समस्यायें
- ६७. भारतीय गवर्नर
- ६८. समाचार-पत्र
- ६९. शान्ति सेना
- ७०. भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस
- ७१. भारत पाकिस्तान और काश्मीर
- ७२. भारत में विदेशी बस्तियां
- ७३. भारत और विश्वशांति
- ७४. पूर्व का संदेश
- ७५. स्फूट वचन
