५०. राष्‍ट्रभाषा और लिपि

अगर हमें राष्‍ट्र होने का अपना दावा सिद्ध करना हैं, तो हमारी अनेक बातें एक-सी होनी चाहिये । भिन्‍न-भिन्‍न धर्म और सम्‍प्रदायों को एक सूत्र में बांधने वाली हमारी एक सामान्‍य संस्‍कृति है । हमारी त्रुटियां और बाधायें भी एक-सी हैं । मैं यह बताने की कोशिश कर रहा हूं कि हमारी पोशाक के लिए एक ही तरह का कपड़ा न केवल वांछनीय है, बल्कि आवश्‍यक भी है । हमें एक सामान्‍य भाषा की भी जरूरत हैं-देशी भाषाओं की जगह पर नहीं परन्‍तु उनके सिवा । इस बात में साधारण सहमति हैं कि यह माध्‍यम हिन्‍दुस्‍तानी ही होना चाहियें, जो हिन्‍दी और ऊर्दू के मेल से बने और जिसमें न तो संस्‍कृति की ओर न फारसी या अरबी की ही भरमार हो । हमारे रास्‍ते की सबसे बड़ी रूकाव ट हमारी देशी भाषाओं की कई लिपियां है । अगर एक सामान्‍य लिपि अपनाना संभव हो, तो एक सामान्‍य भाषा का हमारा जो स्‍वप्‍न हैं- अभी तो वह स्‍वप्‍न ही हैं-उसे पूरा करने के मार्ग की एक बड़ी बाधा दूर हो जायेगा ।

भिन्‍न-भिन्‍न लिपियों का होना कई तरह से बाधक हैं । वह ज्ञान की प्राप्ति में एक करगर रूकावट हैं । आर्य भाषाओं में इतनी समानता हैं कि अगर भिन्‍न-भिन्‍न लिपियां सीखने में बहुत-सा समय बरबाद न करना पड़े, तो हम सब किसी बड़ी कठिनाई के बिना कई भाषायें जान लें । उदाहरण के लिए, जो लोग संस्‍कृत का थोडा़ भी ज्ञान रखते हैं, उनमें से अधिकांश को रवीन्‍द्रनाथ टागोर की अद्वितीय कृतियों को समझने में कोई कठिनाई न हो, अगर वे सब देवनागरी लिपि में छपें । परन्‍तु बंगला लिपि मानों गैर-बंगालियों के लिए ‘दूर रहो’ की सूचना है । इसी तरह यदि बंगाली लोग देवनागरी लिपि जानते हों तो वे तुलसीदास की रचनाओं की अद्भूत सुन्‍दरता और आध्‍यात्मिकता का तथा अन्‍य अनेक हिन्‍दुस्‍तानी लेखकों का आनन्‍द अनायास लूट सकते है।…. समस्‍त भारत के लिए एक सामान्‍य लिपि एक दूर का आदर्श हैं । परन्‍तु जो भारतीय संस्‍कृत से उत्‍पन्‍न भाषायें और दक्षिण की भाषायें बोलते हैं, उन सबके लिए एक सामान्‍य लिपि‍ एक व्‍यावहारिक आदर्श हैं, अगर हम सिर्फ अपनी-अपनी प्रान्‍तीयता को छोड़ दें । उदाहरण के लिए, किसी गुजराती का गुजराती लिपि से चिपटे रहना अच्‍छी बात नहीं है । प्रान्‍त-प्रेम वहां अच्‍छा है जहां वह अखिल भारतीय प्रेम भी उसी हद तक अच्‍छा हैं, जहां तक वह विश्‍वप्रेम के और भी बड़े लक्ष्‍य की पूर्ति करता है । परन्‍तु जो प्रान्‍तप्रेम यह कहता है कि ”भारत कुछ नहीं, गुजरात ही सर्वस्‍व है”, वह बुरी चीज है ।…. मैं मानता हूं कि इस बात का कोई प्रत्‍यक्ष प्रमाण देने की जरूरत नहीं कि देवनागरी ही सर्व-सामान्‍य लिपि होनी चाहिये, क्‍योंकि उसके पक्ष में निर्णायक बात यह है कि उसे भारत के अधिकांश भाग के लोग जानते हैं । …. जो वृत्ति इतनी वर्जनशील और संकीर्ण हो कि हर बोली को चिरस्‍थायी बनाना और विकसति करना चाहती हो, वह राष्‍ट्र-विरोधी और विश्‍व-विरोधी है । मेरी विनम्र सम्‍मति में तमाम अविकसित और अलिखित बोलियों का बलिदान करके उन्‍हें हिन्‍दुस्‍तानी की बड़ी धारा में मिला देना चाहिये । वह आत्‍मोत्‍कर्ष के लिए की गयी कुरबानी होगी, आत्‍महत्‍या नहीं । अगर हमें सुसंस्‍कृत भारत के लिए एक सामान्‍य भाषा बनानी हो, तो हमें भाषाओं और लिपियों की संख्‍या बढ़ाने वाली या देश की शक्तियों को छिन्‍न-छिन्‍न करने वाली किसी भी क्रिया का बढ़ना रोकना होगा । हमें एक सामान्‍य भाषा की वृद्धि करनी होगी। … अगर मेरी चले तो जमी हुई प्रान्‍तीय लिपि के साथ-साथ मैं सब प्रान्‍तों में देवनागरी लिपि और ऊर्दू लिपि का सीखना अनिवार्य कर दूं और विभिन्‍न देशी भाषाओं की मुख्‍य-मुख्‍य पुस्‍तकों को उनके शब्‍दश: हिन्‍दुस्‍तानी अनुवाद के साथ देवनागरी में छपवा दूं ।

हमें राष्‍ट्रभाषा का भी विचार करना चाहिये । यदि अंग्रेजी राष्‍ट्रभाषा बनने वाली हो, तो उसे हमारे स्‍कूलों में अनिवार्य स्‍थान मिलना चाहिये । तो अब हम पहले यह सोचें कि क्‍या अंग्रेजी हमारी राष्‍ट्रभाषा हो सकती है ?

कुछ स्‍वदेशाभिमानी विद्वान ऐसा कहते हैं कि अंग्रेजी राष्‍ट्रभाषा हो सकती है या नहीं, यह प्रश्‍न ही अज्ञान का द्योतक है । उनकी राय में अंग्रेजी तो राष्‍ट्रभाषा बन ही चुकी है ।

हमारे पढ़े-लिखे लोगों की दशा को देखते हुए ऐसा लगता है कि अंग्रेजी के बिना हमारा कारोबार बंद हो जायेगा । ऐसा होने पर भी जरा गहरे जाकर देखेंगे, तो पता चलेगा कि अंग्रेजी राष्‍ट्रभाषा न तो हो सकती है, और न होनी चाहिये ।

तब फिर हम यह देखें कि राष्‍ट्रभाषा के क्‍या लक्षण होने चाहिये :

1. वह भाषा सरकारी नौकरों के लिए आसान होनी चाहिये ।
2. उस भाषा के द्वारा भारत का आपसी धार्मिक, आर्थिक और राजनीतिक कामकाज हो सकना चाहिये ।
3. उस भाषा को भारत के ज्‍यादातर लोग बोलते हों ।
4. वह भाषा राष्‍ट्र के लिए आसान हो ।
5. उस भाषा का विचार करते समय क्षणिक या कुछ समय तक रहने वाली स्थिति पर जोर न दिया जाय ।

अंग्रेजी भाषा में इनमें से एक भी लक्षण नहीं है ।

पहला लक्षण मुझे अन्‍त में रखना चाहिये था । परन्‍तु मैंने उसे पहले इसलिए रखा हैं कि वह लक्षण अंग्रेजी भाषा में दिखाई पड़ सकता है । ज्‍यादा सोचने पर हम देखेंगे कि आज भी राज्‍य के नौकरो के लिए वह भाषा आसान नहीं है। यहां के शासन का ढ़ांचा इस रह सोचा गया है कि उसमें अंग्रेज कम होंगे, यहां तक कि अन्‍त में वाइसरॉय और दूसरे अंगुलियों पर गिनने लायक अंग्रेज ही उसमें रहेंगे । अधिकतर कर्मचारी आज भी भारतीय हैं और वे दिन-दिन बढते ही जायेंगे । यह तो सभी मानेंगे कि इस वर्ग के लिए भारत की किसी भी भाषा से अंग्रेजी ज्‍यादा कठिन है ।

दूसरा लक्षण विचारते समय हम देखते है कि जब तक आम लोग अंग्रेजी बोलने वाले न हो जायं, तब तक हमारा धार्मिक व्‍यवहार अंग्रेजी में नहीं हो सकता । इस हद तक अंग्रेजी भाषा का समाज में फैल जाना असंभव मालूम होता है ।

तीसरा लक्षण भी अंग्रेजी में नहीं हो सकता, क्‍योंकि वह भारत के अधिकतर लोगों की भाष नही है।

चौथा लक्षण पर विचार करते समय हम देखते हैं कि अंग्रेजी भाषा की आज की सत्‍ता क्षणिक हैं । सदा बनी रहने वाली स्थिति तो यह है कि भारत में जनता के राष्‍ट्रीय काम में अंग्रेजी भाषा की जरूरत थोड़ी ही रहेगी । अंग्रेजी साम्राज्‍य के कामकाज में उसकी जरूरत रहेगी । यह दूसरी बात है कि वह साम्राज्‍य के राजनीतिक कामकाज (डिप्‍लोमेसी) की भाषा होगी । उस काम के लिए अंग्रेजी की जरूरत रहेगी । हमें अंग्रेजी भाषा से कुछ भी वैर नहीं हैं । हमारा आग्रह तो इतना ही है कि उसे हद से बाहर न जाने दिया जाय । साम्राज्‍य की भाषा तो अंग्रेजी ही होगी और इसलिए हम अपने मालवीजयी, शास्‍त्रीजी, बेनर्जी आदि को यह भाषा सीखने के लिए मजबूर करेंगे और यह विश्‍वास रखें कि वे लोग भारत की कीर्ति विदेशों में फैलायेंगे । परन्‍तु राष्‍ट्र की भाषा अंग्रेजी नहीं हो सकती । अंग्रेजी को राष्‍ट्रभाषा बनाना ‘एस्‍पेरेण्‍टो’ दाखिल करने जैसी बात है यह कल्‍पना ही हमारी कमजोरी को प्रकट करती है कि अंग्रेजी राष्‍ट्रभाषा हो सकती है । ‘एस्‍पेरेण्‍टो’ के लिए प्रयन्‍त करना हमारी अज्ञानता का और निर्बलता का सूचक होगा ।

तो‍ फिर कौन-सी भाषा इन पांच लक्षणों वाली है ? यह माने बिना काम नहीं चल सकता कि हिन्‍दी भाषा में ये सरे लक्षण मौजूद हैं ।

ये पांच लक्षण रखने में हिन्‍दी की होड़ करने वाली और कोई भाषा नहीं है । हिन्‍दी के बाद दूसरा दर्जा बंगला का है । फिर भी बंगाली लोग बंगाल के बाहर हिन्‍दी का ही उपयोग करते है । हिन्‍दी बोलने वाले जहां जाते हैं वहां हिन्‍दी का ही उपयोग करते हैं और इससे किसी को अचम्‍भा नहीं होता । हिन्‍दी के धर्मोपदेशक और ऊर्दू के मौलवी सारे भारत में अपने भाषण हिन्‍दी में ही देते हैं और अपढ़ जनता उन्‍हें समझ लेती है । जहां अपढ़ गुजराती भी उत्‍तर में जाकर थोड़ी-बहुत हिन्‍दी का उपयोग कर लेता है, वहां उत्‍तर का ‘भैया’ बम्‍बई के सेठ की नौकरी करते हुए भी गुजराती बोलने से इनकार करता है और सेठ ‘भैया’ के साथ टूटी-फूटी हिन्‍दी बोल लेता है । मैंने देखा है कि ठेठ द्राविड़ प्रान्‍त में भी हिन्‍दी की आवाज सुनाई देती है । यह कहना ठीक नहीं कि मद्रास में तो अंग्रेजी से ही काम चलता है । वहां भी मैंने अपना सारा काम हिन्‍दी से चलाया है । सैंकड़ों मद्रासी मुसाफिरों को मैंने दूसरे लोगों के साथ हिन्‍दी बोलना जानते हैं । यहां यह ध्‍यान में रखना चाहिये कि सारे भारत के मुसलमान ऊर्दू बोलते हैं और उनकी संख्‍या सारे प्रान्‍तों में कुछ कम नहीं है ।

इस तरह हिन्‍दी भाषा पहले से ही राष्‍ट्रभाषा बन चुकी है । हमने वर्षो पहले उसका राष्‍ट्रभाषा के रूप में उपयोग किया है । ऊर्दू भी हिन्‍दी की इस शक्ति से ही पैदा हुई है ।

मुसलमान बादशाह भारत में फारसी-अरबी को राष्‍ट्रभाषा नहीं बना सके । उन्‍होंने हिन्‍दी के व्‍याकरण को मानकर ऊर्दू लिपि काम में ली और फारसी शब्‍दों का ज्‍यादा उपयोग किया । परन्‍तु आम लोगों के साथ अपना व्‍यवहार वे विदेशी भाषा के द्वारा नहीं चला सकें । यह हालत अंग्रेज अधिकारियों से छिपी हुई नहीं है । जिन्‍हें लड़ाकू वर्गो का अनुभव है, वे जानते हैं कि सैनिकों के लिए चीजों के नाम हिन्‍दी या ऊर्दू में रखने पड़ते है ।

इस तरह हम देखते हैं कि हिन्‍दी ही राष्‍ट्रभाषा हो सकती है । फिर भी मद्रास के पढ़े-लिखों के लिए यह सवाल कठिन है । लेकिन दक्षिणी, बंगाली, सिंधी और गुजराती लोगों के लिए तो वह बड़ा आसान है । कुछ महीनों में वे हिन्‍दी पर अच्‍छा काबू करके राष्‍ट्रीय कामकाज उसमें चला सकते हैं । तामिल भाईयों के बारे में यह उतना आसान नहीं । तामिल आदि द्राविड़ी हिस्‍सों की अपनी भाषायें हैं और उनकी बनावट और उनका व्‍याकरण संस्‍कृत से अलग है । शब्‍दों की एकता के सिवा और कोई एकता संस्‍कृत भाषाओं और द्राविड़ भाषाओं में नही पाई जाती ।

परन्‍तु यह कठिनाई सिर्फ आज के पढ़-लिखे लोगों के लिए ही है । उनके स्‍वदेशाभिमान पर भरोसा करने और विशेष प्रयन्‍त करके हिन्‍दी सीख लेने की आशा रखने का हमें अधिकार है । भविष्‍य में यदि हिन्‍दी को उसका राष्‍ट्रभाषा का पद मिले, तो हर मद्रासी स्‍कूल में हिन्‍दी पढ़ाई जायेगी और मद्रास तथा दूसरे प्रान्‍तों के बीच विशेष परचिय होने की संभावाना बढ़ जायेगी । अंग्रेजी भाषा द्राविड़ जनता में नहीं घुस सकी । पर हिन्‍दी को घुसने में देर नहीं लगेगी । तेलगू जाति तो आज भी यह प्रयन्‍त कर रही है ।

(20 अक्‍तूबर, 1917 को भड़ौच में हुई दूसरी गुजरात शिक्षा-परिषद के अध्‍यक्ष-पद से दिये गये भाषण से ।)

जितने साल हम अंग्रेजर सीखने में बरबाद करते हैं, उतने महीने भी अगर हम हिन्‍दुस्‍तानी सीखने को तकलीफ न उठायें, तो सचमुच कहना होगा कि जन-साधारण के प्रति अपने प्रेम की जो डींगें हम हांका करते हैं वे निरी डींगें ही है ।

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