५१. प्रान्तीय भाषायें
हमने अपनी मातृभाषाओं के मुकाबले अंग्रेजी से ज्यादा मुहब्बत रखी, जिसका नतीजा यह हुआ कि पढ़े-लिखे और राजनीतिक दृष्टि से जागे हुए ऊंचे तबके के लोगों के साथ आम लोगों का रिश्ता बिलकुल टूट गया और उन दोनों के बीच एक गहरी खाई बन गई । यही वजह है कि हिन्दुस्तान की भाषायें गरीब बन गई हैं, और उन्हें पूरा पोषण नहीं मिला । अपनी मातृभाषा में दुर्बोध और गहरे तात्विक विचारों को प्रकट करने की अपनी व्यर्थ चेष्टा में हम गोते खाते हैं । हमारे पास विज्ञान के निश्चित पारिभाषिक शब्द नहीं है । इस सबका नतीजा खतरनाक हुआ है । हमारी आम जनता आधूनिक मानस से यानी नये जमाने के विचारों से बिलकुल अछूता रही है । हिन्दुस्तान को जो बेहद नुकसान पहुंचा है, उसका कोई अंदाजा या माप आज हम निकाल नहीं सकते, क्योंकि हम इस घटना के बहुत नजदीक हैं। मगर इतनी बात तो आसानी से समझी जा सकती है कि अगर आज तक हुए नुकसान का इलाज नहीं किया गया, यानी जो हानि हो चुकी है उसकी भरपाई करने की कोशिश हमने न की, तो हमारी आम जनता को मानसिक मुक्ति नहीं मिलेगी । वह रूढि़यों और वहमों से घिरी रहेगी । नतीजा यह होगा कि आम जनता स्वराज्य के निर्माण में कोई ठोस मदद नहीं पहुंचा सकेगी । अहिंसा की बुनियाद पर रचे गये स्वाराज्य की चर्चा में यह बात शामिल है कि हमारा हर एक आदमी आजादी की हमारी आम जनता लड़ाई के हर पहलू और उसकी हर सीढ़ी से परिचित न हो और उसके रहस्य को भलीभांति न समझती हो, तो स्वराज्य की रचना में वह अपना हिस्सा किस तरह अदा करेगी ? और जब तक सर्व-साधारण की अपनी बोली में लड़ाई के हर पहलू व कदम को अच्छी तरह समझाया नहीं जाता, तब तक उनसे यह उम्मीद कैसे की जाय कि वे उसमें हाथ बंटायेंगे ?
मेरी मातृभाषा में कितनी ही खामियां क्यो न हों, मैं उससे उसी तरह चिपटा रहूंगा जिस तरह अपनी मां की छाती से । वही मुझे जावनदायी दूध दे सकती है । मैं अंग्रेजी को भी उसकी जगह प्यार करता हूं । लेकिन अगर अंग्रेजी उस जगह को हड़पना चाहती है जिसकी वह हकदार नहीं है, तो मैं उससे सख्त नफरत करूंगा । यह बात मानी हुई है कि अंग्रेजी आज सारी दुनिया की भाषा बन गई है। इसलिए मैं उसे दूसरी जबान के तौर पर जगह दूंगा-लेकिन विश्वविद्यालय के पाठयक्रम में, स्कूलों में नहीं । वह कुछ लोगों के सीखने की चीज हो सकती है, लाखों-करोड़ो की नहीं । आज जब हमारे पास प्राइमरी शिक्षा को भी मुल्क में लाजिमी बनाने के जरिये नहीं हैं, तो हम अंग्रेजी सिखाने के जरिये कहां से जुटा सकते है ? रूस ने बिना अंग्रेजी के विज्ञान में इतनी उन्नति की है । आज अपनी मानसिक गुलामी की वजह से ही हम यह मानने लगे हैं कि अंग्रेजी के बिना हमारा काम चल नहीं सकता । मैं इस चीज को नहीं मानता ।
अगर सरकारें और उनके दफ्तर सावधानी नहीं लेंगे, तो मुमकिन है कि अंग्रेजी भाषा हिन्दुस्तानी की जगह को हड़प ले । इससे हिन्दुस्तान के उन करोड़ों लोगों को बेहद नुकसान होगा, जो कभी भी अंग्रेजी समझ नहीं सकेगें। मेरे खयाल में प्रान्तीय सरकारों के लिए यह बहुत आसान बात होनी चाहिये कि वे अपने यहां ऐसे कर्मचारी रखें, जो सारा काम प्रान्तीय भाषाओं में और अन्तर- प्रान्तीय भाषा में कर सकें। मेरी राय में अन्तर- प्रान्तीय भाषा सिर्फ नागरी या उर्दू लिपि में लिखी जाने वाली हिन्दुस्तानी ही हो सकती है।
यह जरूरी फेर फार करने में एक दिन भी खोना देश को भारी सांस्कृतिक नुकसान पहुंचाना है। सबसे पहली और जरूरी चीज यह है कि हम अपनी उन प्रान्तीय भाषाओं का संशोधन करें, जो हिन्दुस्तान को वरदान की तरह मिली हुई हैं। यह कहना दिमागा आलस के सिवा और कुछ नहीं है कि हमारी अदालतों, हमारे स्कूलों और यहां तक कि हमारे दफतरों में भी यह भाषा- सम्बंधी फेर फार करने के लिए कुछ समय, शायद कुछ बरस चाहिये। हां, जब तक प्रान्तों का भाषा के आधार पर फिर से बंटवारा नहीं होता, तब तक बम्बई और मद्रास जैसे प्रान्तों में, जहां बहुत- सी भाषायें बोली जाती हैं, थोडी़ मुश्किल जरूर होगी। प्रान्तीय सरकारें ऐसा कोई तरीका खोज सकती हैं, जिससे उन प्रान्तों के लोग वहां अपनापन अनुभव कर सकें। जब तक हिन्दुस्तानी संघ इस सवाल को हल न कर ले कि अन्तर- प्रान्तीय भाषा नगरी या उर्दू लिपि में लिखी जाने वाली हिन्दुस्तानी हो, या सिर्फ नागरी लिपि में लिखी जाने वाली हिन्दी, तब तक प्रान्तीय सरकारें ठहरी न रहें। इसकी वजह से उन्हें जरूरी सुधार करने में देर न लगानी चाहिये। भाषा के बारे में यह एक बिलकुल गैर- जरूरी विवाद खडा़ हो गया है, जिसकी वजह से हिन्दुतानी में अंग्रेजी भाषा घुस सकती है। और अगर ऐसा हुआ तो इस देश के लिए वह ऐसे कलंक की बात होगी, जिसे धोना हमेशा के लिए असम्भव होगा। अगर सारे सरकारी दफ्तरों में प्रान्तीय भाषा इस्तेमाल करने का कदम इसी वक्त उठाया जाय, तो अन्तर- प्रान्तीय भाषा का उपयोग तो उसके बाद तुरन्त ही होने लगेगा। प्रान्तों को केन्द्र से सम्बंध रखना ही पड़ेगा। और अगर केन्द्रीय सरकार ने शीघ्र ही यह महसूस करने की समझदारी की कि उन मुठ्ठीभर हिन्दुस्तानियों के लिए हिन्दुस्तान की संस्कृति को नुकसान नहीं पहुंचाना चाहिये, जो इतने आलसी हैं कि जिस भाषा को किसी भी पार्टी या वर्ग का दिल दुखाने बगैर सारे हिन्ुस्तान में आसानी से अपनाया जा सकता है उसे भी नहीं सीख सकते, तो ऐसी हालत में प्रान्तीय सरकारें केन्द्रीय सरकार से अंग्रेजी में अपना व्यवहार रखने का साहस नहीं कर सकेगी। मेरा मतलब यह हैकि जिस तरह हमारी आजादी को जबरदस्ती छीनने वाले अंग्रेजों की सियासी हुकूमत को हमने सफलतापूर्वक इस देश से निकाल दिया, उसी तरह हमारी संस्कृति को दबाने वाली अंग्रेजी भाषा को भी हमें यहां से निकाल बाहर करना चाहिये। हां, व्यापार और राजनीति की अन्तर- राष्ट्रीय भाषा के नाते समृद्ध अंग्रेजी का अपना स्वाभाविक स्थान हमेशा कायम रहेगा।
संस्कृत का स्थान
मेरी राय में धार्मिक बातों में संस्कृत का उपयोग करना छोडा़ नहीं जा सकता। अनुवाद कितना ही शुद्व क्यों न हो, किन्तु वह मूल मंत्रों का स्थान नहीं ले सकता। मूल मंत्रों में अपनी एक विशेषता है, जो अनुवाद में नहीं आ सकती। इसके सिवा यदि हम इन मंत्रों को, जिनका पाठ शताब्दियों तक संस्कृत में ही होता रहा है, अब अपनी देशी भाषाओं में दुहारने लगें, तो इससे उनकी गम्भीरता में कमी आयेगी।लेकिन साथ ही मेरा स्पष्ट मत है कि मंत्र का पाठ और विधि का अनुष्ठान करने वाले को मंत्र का अर्थ और विधि का तात्पर्य अच्छी तरह समझाया जाना चाहिये। हिन्दु बालक की शिक्षा संस्कृत के प्रांरभिक ज्ञान के बिना अधूरी मानी जानी चाहिये। संस्कृत भाषा और संस्कृत के प्रारन्भिक ज्ञान के बिना अधूरी मानी जानी चाहिये। संस्कृत भाषा और संस्कृत साहित्य का अध्ययन यथेष्ट मात्रा में न चलता रहा तो हिन्दु धर्म का नाश हो जायेगा। मौजूदा शिक्षा – पद्धति की कमियों के कारण ही संस्कृत सीखना कठिन मालूम होता है; असल में वह कठिन पहीं है। लेकिन कठिन हो तो भी धर्म का आचरण और ज्यादा कठिन है। इसलिए जो धर्म का आचरण करना चाहता है, उसे अपने मार्ग की तमाम सीढि़यों को, फिर वे कितनी भी कठिन क्यों न दिखाई दें, आसान ही समझना चाहिये।
अनुक्रमणिका
- १. मेरे सपनो का भारत
- २. स्वराज्य का अर्थ
- ३. राष्ट्रवाद का सच्चा स्वरूप
- ४. भारतीय लोकतंत्र
- ५. भारत और समाजवाद
- ६. भारत और साम्यवाद
- ७. उद्योगवाद का अभिशाप
- ८. वर्गयुध्द
- ९. हड़ताल
- १०. मज़दूर क्या चुनेंगे?
- ११. अधिकार या कर्तव्य ?
- १२. बेकारी का सवाल
- १३. दरिद्र-नारायण
- १४. शरीर-श्रम
- १५. सर्वोदय
- १६. संरक्षता का सिद्धांत
- १७. अहिंसक अर्थ-व्यवस्था
- १८. सामान वितरण का रास्ता
- १९. भारत में अहिंसा की उपासना
- २०. सर्वोदयी राज्य
- २१. सत्याग्रह और दुराग्रह
- २२. किसान
- २३. गांवों की ओर
- २४. ग्राम-स्वराज्य
- २५. पंचायत राज
- २६. ग्रामोद्योग
- २७. सरकार क्या कर सकती है?
- २८. ग्राम-प्रदर्शनियां
- २९. चरखे का संगीत
- ३०. मिल-उद्योग
- ३१. स्वदेशी
- ३२. गोरक्षा
- ३३. सहकारी गो पालन
- ३४. गांवों की सफाई
- ३५. गांव का आरोग्य
- ३६. गांवों का आहार
- ३७. ग्राम सेवक
- ३८. समग्र ग्राम सेवा
- ३९. युवकों को आह्वान
- ४०. राष्ट्र का आरोग्य, स्वच्छता और आहार
- ४१. शराब और अन्य मादक द्रव्य
- ४२. शहरों की सफाई
- ४३. विदेशी माध्यम की बुराई
- ४४. मेरा अपना अनुभव
- ४५. भारत की सांस्कृतिक विरासत
- ४६. नई तालीम
- ४७. बुनियादी शिक्षा
- ४८. उच्च शिक्षा
- ४९. शिक्षा का आश्रमी आदर्श
- ५०. राष्ट्रभाषा और लिपि
- ५१. प्रान्तीय भाषायें
- ५२. दक्षिण में हिन्दी
- ५३. विद्यार्थियों के लिए अनुशासन के नियम
- ५४. भारतीय स्त्रियों का पुनरूत्थान
- ५५. स्त्रियों की शिक्षा
- ५६. संतति-नियमन
- ५७. काम-विज्ञान की शिक्षा
- ५८ (……..)
- ५९. साम्प्रदायिक एकता
- ६०. वर्णाश्रम धर्म
- ६१. अस्पृश्यता का अभिशाप
- ६२. भारत में धार्मिक सहिष्णुता
- ६३. धर्म – परिवर्तन
- ६४. (…)
- ६५. प्रान्तों का पुनर्गठन
- ६६. अल्पसंख्यकों की समस्यायें
- ६७. भारतीय गवर्नर
- ६८. समाचार-पत्र
- ६९. शान्ति सेना
- ७०. भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस
- ७१. भारत पाकिस्तान और काश्मीर
- ७२. भारत में विदेशी बस्तियां
- ७३. भारत और विश्वशांति
- ७४. पूर्व का संदेश
- ७५. स्फूट वचन
