५२. दक्षिण में हिन्दी
मुझे पक्का विश्वास है कि किसी दिन द्रविड़ भाई-बहन भाव से हिन्दी का अभ्यास करने लग जायेंगे । आज अंग्रेजी पर प्रभुत्व प्राप्त करने के लिए वे जितनी मेहनत करते है उसका आठवां हिस्सा भी हिन्दी सीखने में करें, तो बाकी हिन्दुस्तान के जो दरवाजे आज उनके लिए बंद है वे खुल जायं और वे इस तरह हमारे साथ एक हो जाये जैसे पहले कभी न थे । मैं जानता हूं कि इस पर कुछ लोग यह करेंगे कि यह दलील तो दोनों ओर लागू होती है । द्रविड़ लोगों की संख्या कम है इसलिए राष्ट्र की शक्ति मितव्यय की दृष्टि से यह जरूरी है कि हिन्दुस्तान की बाकि सब लोगों को द्रविड़ भारत के साथ बातचीत करने के लिए तामिल, तेलगू, कन्नड़ और मलयालम सीखने के बदले द्रविड़ भारत वालों को शेष हिन्दुस्तान की आम भाषा सीख लेनी चाहिये । यही कारण है कि मद्रास प्रदेश में हिन्दी प्रचार का कार्य किया जा रहा है ।
कोई भी द्रविड़ यह न सोचे कि हिन्दी सीखना जरा भी मुश्किल है । अगर रोज के मनोरंजन के समय में से नियम पूर्वक थोड़ा समय निकाला जाय, तो साधारण आदमी एक साल में हिन्दी सीख सकता है मैं तो यह भी सुझाने की हिम्मत करता हूं कि अब बड़ी-बड़ी म्यूनीसिपैलिटियां अपने मद्रासों में हिन्दी कि पढ़ाई को वैकल्पिक बना दे । मैं अनुभव से यह कह सकता हूं की द्रविड़ बालक अद्भूत सरलता से हिन्दी सीख लेते है । शायद कुछ ही लोग यह जानते होंगे कि दक्षिण अफ्रीका में रहने वाले लगभग सभी तामिल, तेलगू भाषी लोग हिन्दी को समझते है, और उसमें बातचीत कर सकते है । इसलिए मैं यह आशा करता हूं कि उदार मारवाडि़या ने मुफ्त हिन्दी सीखने की जो सहूलियत पैदा कर दी है, मद्रास के नौजवान उनकी कदर करेंगे-यानी वे इस सहूलियत से लाभ उठायेंगे ।
हिन्दुस्तान की दूसरी कोई भाषा न सीखने के बारे में बंगाल का अपना जो पूर्वग्रह है और द्रविड़ लोगों को हिन्दुस्तानी सीखने में जो कठिनाई मालूम होती है, उनकी वजह से हिन्दुस्तानी न जानने के कारण शेष हिन्दुस्तानी से अलग कर जाने वाले दो प्रान्त है-बंगाल और मद्रास । अगर कोई साधारण बंगाली हिन्दुस्तानी सीखने में रोज तीन घंटे खर्च करें, तो सचमूच ही दो महीनों में वह उसे सीख लेगा और इसी रफ्तार में सीखने में द्रविड़ को छह महीनों लगेगें । कोई बंगाली यह द्रविड़ इतने समय में अंग्रेजी सीख लेने आशा नही कर सकता । हिन्दुस्तानी जानने वालों के मुकाबले अंग्रेजी जानने वाले हिन्दुस्तानियों की संख्या कम है । अंग्रेजी जानने से इन थोड़े से लोगों के विचार-विनिमय के द्वार खुलते है । इसके विपरीत हिन्दुस्तानी का कामचलाऊ ज्ञान के अपने देश के बहुत ही ज्यादा भाई-बहनों के साथ बातचीत करने की शक्ति प्रदान करता है । … मैं द्रविड़ भाईयों की कठिनाई को समझता हूं; लेकिन मातृभूमि के प्रति उनके प्रेम और उद्यम के सामने कोई भी चीज कठिन नही है ।
अंग्रेजी अन्तर-राष्ट्रीय व्यापार की भाषा है, कुटनीति की भाषा है, उसमें अनेक बढि़या साहित्यिक रत्न भरे है और उसके द्वारा हमें पाश्चात्य विचार और संस्कृति का परिचय होता है । इसलिए हममे से कुछ लोगों के लिए अंग्रेजी जानना जरूरी है । वे राष्ट्रीय व्यापार और अन्तर-राष्ट्रीय कुटनीति के विभाग चला सकते हैं और राष्ट्र को पश्चिम का उत्तम साहित्य, विचार और विज्ञान दे सकते है । यह अंग्रेजी का उचित उपयोग होगा । आजकल तो अंग्रेजी ने हमारे ह्रदयों के प्रिय-से-प्रिय स्थान पर जबरन अधिकार कर लिया है और हमारी मातृभाषा भाषाओं को वहां से सिहांसन-च्यूत कर दिया है । अंग्रेजी के साथ हमारे बराबरी के संबंध न होने के कारण इस अस्वाभाविक स्थान पर बैठ गई है । अंग्रेजी के ज्ञान के बिना ही भारतीय मस्तिष्क का उच्च-से-उच्च विकास संभव होना चाहिये हमारे लड़को और लड़कियों को यह सोचने का प्रोत्साहन देना कि अंग्रेजी जाने बिना उत्तम समाज में प्रवेश करना असंभव है, भारत के पुरूष-समाज के और खास तौर पर नारी-समाज के प्रति हिंसा करना है । यह विचार इतना अपमानजनक है यह इसे सहन नही किय जा सकता । अंग्रेजी के मोह के छुटकारा पाना स्वराज्य के लिए एक जरूरी शर्त है ।
अगर हम बनावटी वातावरण में न रहने होते, तो दक्षिणवासी लोगों को न तो हिन्दी सीखने में कोई कष्ट मालूम होती, और न उसकी व्यर्थता का अनुभव ही होता । हिन्दी-भाषी लोगों को दक्षिण की भाषा सीखने की जितनी जरूरत है, उनकी अपेक्षा दक्षिण वालों को हिन्दी सीखने की आवश्यकता अवश्य ही अधिक है । सारे हिन्दुस्तान में हिन्दी बोलने और समझने वालों की संख्या दक्षिण की भाषा बोलने वालों से दुगुनी है प्रान्तीय भाषा या भाषाओं के बदले में नही, बल्कि उनके अलावा एक प्रान्त से दूसरे प्रान्त से संबंध जोड़ने के लिए एक सर्व-सामान्य भाषा की आवश्यकता है । ऐसी भाषा तो हिन्दी-हिन्दुस्तानी ही हो सकती है ।
कुछ लोग, जो अपने मन से सर्व-साधारण का खयाल ही भूला देते है, अंग्रेजी को हिन्दी की बराबरी चलने वाली ही नही, बल्कि एकमात्र शक्य राष्ट्र भाषा मानते है परदेशी जूए की मोहिनी न हो होती, तो इस बात की कोई कल्पना न करता । दक्षिण-भारत की सर्व-साधारण जनता के लिए, जिसे राष्ट्रीय कार्य में ज्यादा-से-ज्यादा हाथ बांटना होगा, कौन-सी- भाषा सीखना आसान है-जिस भाषा में अपनी भाषाओं के बहुतेरे शब्द एक से है जो उन्हे एकदम लगभग सारे उत्तरी हिन्दुस्तान के संपर्क में लगी है वह हिन्दी, या मुठ्ठी भर लोगों द्वारा बोले जाने वाली सब तरह से विदेशी अंग्रेजी ?
इस पसंद का सच्चा आधार हमारी स्वराज्य-विषयक कल्पना पर निर्भर है । अगर स्वराज्य अंग्रेजी बोलने वाले भारतीयों का और उन्हीं के लिए होने वाला हो, तो निस्सन्देह अंग्रेजी ही राष्ट्रभाषा होगी । लेकिन अगर स्वराज्य करोड़ों भूखों मरने वालों का, करोड़ों निरक्षरों का, निरक्षर बहनों का और दलितों ओर अन्त्यजों का हो और इन सबके लिए हो, तो हिन्दी ही एकमात्र राष्ट्रभाषा हो सकती है ।
यद्यपि मैं इन दक्षिण की भाषाओं को संस्कृत की पुत्रियां मानता हूं, तो भी ये हिन्दी, उडि़या, बंगला, आसामी, पंजाबी, सिन्धी, मराठी और गुजराती से भिन्न हैं । इनका व्याकरण हिन्दी से भिन्न है । इनको संस्कृत की पुत्रियां कहने से मेरा अभिप्राय इतना ही है कि इन सब में संस्कृत शब्द काफी हैं, और जब संकट आ पड़ता है तब ये संस्कृत-माता को पुकारती हैं और नये शब्दों के रूप में उसका दूध पीती हैं । प्राचीन काल में भले ये स्वतंत्र भाषायें रही हों, पर अब तो ये संस्कृत से शब्द लेकर अपना गौरव बढ़ा रही हैं । उसके अतिरिक्त और भी तो कई कारण इनको संस्कृत की पुत्रियां कहने के हैं, पर उन्हें इस समय जाने दीजिये ।
मैं हमेशा से यह मानता रहा हूं कि हम किसी भी हालत में प्रांतीय भाषाओं को नुकसान पहुंचाना या मिटाना नहीं चाहते । हमारा मतलब तो सिर्फ यह है कि विभिन्न प्रान्तों के पारस्परिक सम्बन्ध के लिए हम हिन्दी भाषा सीखें । ऐसा कहने से हिन्दी के प्रति हमारा कोई पक्षपात प्रकट नहीं होता । हिन्दी को हम राष्ट्रभाषा मानते हैं । वह राष्ट्रीय होने के लायक है । वही भाषा राष्ट्रीय बन सकती है, जिसे अधिक संख्या में लोग जानते-बोलते हों और जो सीखने में सुगम हो । और इसका कोई ध्यान देने लायक विरोध आज तक सुनने में नहीं आया है ।
यदि हिन्दी अंग्रेजी का स्थान ले, तो कम-से-कम मुझे तो अच्छा ही लगेगा । लेकिन अंग्रेजी भाषा के महत्व को हम अच्छी तरह जानते है । आधुनिक ज्ञान की प्राप्ति, आधुनिक साहित्य के अध्ययन, सारे जगत के परिचय, अर्थप्राप्ति तथा राज्याअधिकारी के साथ सम्पर्क रखने और ऐस ही अन्य कार्यो के लिए हमें अंग्रेजी के ज्ञान की आवश्यकता है । इच्छा न रहते हुए भी हमकों अंग्रेजी पढ़नी होगी । यही हो भी रहा है । अंग्रेजी अन्तर-राष्ट्रीय भाषा है ।
लेकिन अंग्रेजी राष्ट्रभाषा कभी नही बन सकती । आज उसका साम्राज्य-सा जरूर दिखाई देता हैं। इसके प्रभुत्व से बचने के लिए काफी प्रयन्त करते हुए भी हमारे राष्ट्रीय कार्यो में अंग्रेजी ने बहुत बड़ा स्थान ले रखा है । लेकिन इससे हमें इस भ्रम में कभी न पड़ना चाहिये कि अंग्रेजी राष्ट्रभाषा बन रही है ।
इसकी परीक्षा प्रत्येक प्रान्त में हम आसानी से कर सकते है । बंगाल अथवा दक्षिण-भारत को ही ले लिजिये, जहां अंग्रेजी का प्रभाव सबसे अधिक है । यदि वहां जनता के मारफत हम कुछ भी काम करना चाहते हैं, तो वह आज हिन्दी द्वारा भले ही न कर सकें, पर अंग्रेजी द्वारा तो कर ही नहीं सकते । हिन्दी के दो-चार शब्दों से हम अपना भाव कुछ तो प्रगट कर ही देंगे । पर अंग्रेजी से तो इतना भी नहीं कर सकते ।
हां, यह अवश्य माना जा सकता है कि अब तक हमारे यहां एक भी भाषा राष्ट्रभाषा नहीं बन पाई है। अंग्रेजी राजभाषा है। ऐसा होना स्वाभाविक भी है। अंग्रेजी का इससे आगे बढ़ना मैं असंभव समझता हूं, चाहे कितना भी प्रयत्न क्यों न किया जाय। अगर हिन्दुस्तान को हमें सचमुच एक राष्ट्र बनाना है, तो चाहे कोई माने या न माने, राष्ट्रभाषा तो हिन्दीं ही बन सकती है; क्योंकि जो स्थान हि न्दीं को प्राप्त है, वह किसी दूसरी भाषा को कभी नहीं मिल सकता। हिन्दू- मुसलमान दोनों को मिलाकर करीब बाईस करोड़ मनुष्यों की भाषा थोडे़- बहुत फेर फार से हिन्दीं हिन्दुस्तानी ही है।
इसलिए उचित और संभव तो यही है कि प्रत्येक प्रान्त में उस प्रान्त की भाषा का, सारे देश के पारस्परिक व्यवकार के लिए हिन्दीं का अन्तर- राष्ट्रीय उपयोग के लिए अंग्रेजी का व्यवहार हो। हिन्दीं बोलने वालों की संक्ष्या करोंड़ों की रहेगी, किन्तु अंग्रेजी बोलने वालों की संख्या कुछ लाख से आगे कभी नहीं बढ़ सकेगी। इसका प्रयत्न भी करना जनता के साथ अन्याय करना होगा।
(इन्दौर में सन् 1935 में हुए हिन्दीं- साहित्य- सम्मेलन के 24 वें अधिवेशन में अध्यक्ष- पद से दिये गये गांधीजी के मूल हिन्दीं भाषण से।)
हिन्दुस्तानी हमारी राष्ट्रभाषा है या होगी, ऐसी धोषणायें यदि हमने सच्चाई के साथ की हैं, तो फिर हिन्दुस्तानी की पढा़ई अनिवार्य करने में कोई बुराइ नहीं है। इण्लैंड के स्कूलों में लैटिन सीखना अनिवार्य था और शायद अब भी है। उसके अध्ययन से अंग्रेजी के अध्ययन में कोई बाधा नहीं पडी़। उलटे, इस सुसंस्कृत भाषा के ज्ञान से अंग्रेजी की समृद्धि ही हुई है। ‘ मातृभाषा खतरे में है ‘ ऐसा जो शोर मचाया जाता है, वह या तो अज्ञानवश मचाया जाता है या उसमें पाखण्ड है। और जो लोग ईमानदारी से ऐसा सोचते हैं, उनकी देशभक्ति पर-यह देखकर कि वे बच्चों द्धारा हिन्दुस्तानी सीखने के लिए रोज एक घण्डा दिया जाना भी पसन्द नहीं करते – हमें तरस आता है। अगर हमें आखिल भारतीय राष्ट्रीयता प्राप्त करनी है, तो हमें इस प्रान्तीयता की दीवार को तोड़ना ही होगा। सवाल यह है कि हिन्दुस्तान एक देश और एक राष्ट्र है या अनेक देशों और राष्ट्रों का समूह हैं ?
अनुक्रमणिका
- १. मेरे सपनो का भारत
- २. स्वराज्य का अर्थ
- ३. राष्ट्रवाद का सच्चा स्वरूप
- ४. भारतीय लोकतंत्र
- ५. भारत और समाजवाद
- ६. भारत और साम्यवाद
- ७. उद्योगवाद का अभिशाप
- ८. वर्गयुध्द
- ९. हड़ताल
- १०. मज़दूर क्या चुनेंगे?
- ११. अधिकार या कर्तव्य ?
- १२. बेकारी का सवाल
- १३. दरिद्र-नारायण
- १४. शरीर-श्रम
- १५. सर्वोदय
- १६. संरक्षता का सिद्धांत
- १७. अहिंसक अर्थ-व्यवस्था
- १८. सामान वितरण का रास्ता
- १९. भारत में अहिंसा की उपासना
- २०. सर्वोदयी राज्य
- २१. सत्याग्रह और दुराग्रह
- २२. किसान
- २३. गांवों की ओर
- २४. ग्राम-स्वराज्य
- २५. पंचायत राज
- २६. ग्रामोद्योग
- २७. सरकार क्या कर सकती है?
- २८. ग्राम-प्रदर्शनियां
- २९. चरखे का संगीत
- ३०. मिल-उद्योग
- ३१. स्वदेशी
- ३२. गोरक्षा
- ३३. सहकारी गो पालन
- ३४. गांवों की सफाई
- ३५. गांव का आरोग्य
- ३६. गांवों का आहार
- ३७. ग्राम सेवक
- ३८. समग्र ग्राम सेवा
- ३९. युवकों को आह्वान
- ४०. राष्ट्र का आरोग्य, स्वच्छता और आहार
- ४१. शराब और अन्य मादक द्रव्य
- ४२. शहरों की सफाई
- ४३. विदेशी माध्यम की बुराई
- ४४. मेरा अपना अनुभव
- ४५. भारत की सांस्कृतिक विरासत
- ४६. नई तालीम
- ४७. बुनियादी शिक्षा
- ४८. उच्च शिक्षा
- ४९. शिक्षा का आश्रमी आदर्श
- ५०. राष्ट्रभाषा और लिपि
- ५१. प्रान्तीय भाषायें
- ५२. दक्षिण में हिन्दी
- ५३. विद्यार्थियों के लिए अनुशासन के नियम
- ५४. भारतीय स्त्रियों का पुनरूत्थान
- ५५. स्त्रियों की शिक्षा
- ५६. संतति-नियमन
- ५७. काम-विज्ञान की शिक्षा
- ५८ (……..)
- ५९. साम्प्रदायिक एकता
- ६०. वर्णाश्रम धर्म
- ६१. अस्पृश्यता का अभिशाप
- ६२. भारत में धार्मिक सहिष्णुता
- ६३. धर्म – परिवर्तन
- ६४. (…)
- ६५. प्रान्तों का पुनर्गठन
- ६६. अल्पसंख्यकों की समस्यायें
- ६७. भारतीय गवर्नर
- ६८. समाचार-पत्र
- ६९. शान्ति सेना
- ७०. भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस
- ७१. भारत पाकिस्तान और काश्मीर
- ७२. भारत में विदेशी बस्तियां
- ७३. भारत और विश्वशांति
- ७४. पूर्व का संदेश
- ७५. स्फूट वचन
