५४. भारतीय स्त्रियों का पुनरूत्‍थान

जिस रूढि़ और कानून के बनाने में स्‍त्री का कोई हाथ नहीं था और जिसके लिए सिर्फ पुरूष ही जिम्‍मेदार है, उस कानून और रूढि़ के जुल्‍मों ने स्‍त्री को लगातार कुचला है। अहिंसा की नींव पर रचे गये जीवन की योजना में जितना और जैसा अधिकार पुरूष को अपने भविष्‍य की रचना का है, उतना और वैसा ही अधिकार स्‍त्री को भी अपना भविष्‍य तय करने का है। लेकिन अहिंसक समाज की व्‍यवस्‍था में जो अधिकार मिलते हैं, वे किसी- न- किसी कर्त्‍तव्‍य या धर्म के पालन से प्राप्‍त होते हैं। इसलिए यह भी मानना चाहिये कि सामाजिक आचार- व्‍यवहार के नियम स्‍त्री और पुरूष दोनों आपस में मिलकर और राजी- खुशी से तक करें। इन नियमों का पालन करने के लिए बाहर की किसी सत्‍ता या हुकूमत की जबरदस्‍ती काम न देगी। स्त्रियों के साथ अपने व्‍यवहार और बरताव में पुरूषों ने इस सत्‍य को पूरी तरह पहचाना नहीं है। स्‍त्री को अपना मित्र या साथी मानने के बदले पुरूष ने अपने को उसका ज्ञवामी माना है। कांग्रेसवालों का यह खास हक है कि वे हिन्‍दुस्‍तान की स्त्रियों को उनकी स गिरी हुई हालत से हाथ पकड़कर उपर उठावें। पुराने जमाने का गुलाम नहीं जानता था कि उसे आजाद होना है, या कि वह आजाद हो सकता है। औरतों की हालत भी आज कुछ ऐसी ही है। जब उस गुलाम को आजादी मिली तो कुछ समय तक उसे ऐसा मालूम हुआ, मानों उसका सहारा ही जाता रहा। औरतों को यह सिखाया गया है कि वे अपने को पुरूषों की दासी समझें। इसलिए कांग्रेस वालों का यह फर्ज है कि वे स्त्रियों को उनकी मौलिक स्‍िथति का पूरा बोध करावें और उन्‍हें इस तरह का तालीम दें, जिससे वे जीवन में पुरूषों के साथ बराबरी के दरजे से हाथ बंटाने लायक बनें।

एक बार मन का निश्‍चय हो जाने के बाद इस क्रान्ति का काम आसान है। इसलिए कांग्रेस वाले इसकी शुरूआत अपने घर से करें। वे अपनी पत्नियों को मप बहलाने की की गुडिया या भोग- विकास का साधन मानने के बदले उनको सेवा के समान कार्य में अपना सम्‍मान्‍य साथी समझें। इसके लिए जिन स्त्रियों को स्‍कूल या कॉलेज की शिक्षा नहीं मिली है, वे अपने पतियों से जिपना बन पडे़ सीखें। जो बात पत्नियों के लिए कही गई है, वही जरूरी परिवर्तन के साथ माताओं और बेटियों के लिए समझनी चाहिये।

यह कहने की जरूरत नहीं कि हिन्‍दुस्‍तान की स्त्रियों की लाचारी का यह एकतरफा चित्र ही मैंने यहां दिया है। मैं भलीभांति जानता हूं कि गांवों में औरतें अपने मर्दों के साथ बराबरी से टक्‍कर लेती हैं; कुछ मामलों में वे उनसे बढी़- चढी़ हैं और उन पर हुकूमत भी चलाती हैं। लेकिन हमें बाहर से देखने वाला कोई भी तटस्‍थ आदमी यह कहेगा कि हमारे समूचे समाज में कानून और रूढ़‍ि की रू से औरतों को जो दरजा मिला है, उसमें कई खामियां हैं और उन्‍हें जड़मूल से सुधारने की जरूरत है।

कानून की रचना ज्‍यादातर पुरूषों के द्धारा हुई है। और इस काम को करने में, जिसे करने का जिम्‍मा मनुष्‍य ने अपने उपर खुद ही उठा लिया है, उसने हमेशा न्‍याय और विवेक का पालन नहीं किया है। स्त्रियों में नये जीवन का संचार करने के हमारे प्रयत्‍न का अधिकांश्‍ा भाग उन दूषणों को दूर करने में खर्च होना चाहिये, जिनका हमारे शास्‍त्रों ने स्त्रियों के जन्‍मजात और अनिवार्य लक्षण कहकर वर्णन किया है। इस काम को कौन करेगा और कैसे ? मेरी नम्र राय में इस प्रयत्‍न की सिद्धि के लिए हमें सीता, दमयन्‍ती और द्रौपदी जैसी पवित्र और दृढ़ता तथा संयम आदि गुणों से युक्‍त स्त्रियां प्रकट करनी होंगी। यदि हम अपने बीच में ऐसी स्त्रियां प्रकट कर सके, तो इन आधुनिक देवियों को वही मान्‍यता मिलेगी जो अभी हमारे शास्‍त्रों को प्राप्‍त है। उस हालत में हमारी स्‍मृतियों में स्‍त्री- जाति के सम्‍बंध में यहां- वहां जो असम्‍मान- सूचक उक्तियां मिलती हैं उन पर हम लज्जित होंगे। ऐसी क्रांतियां हिन्‍दु धर्म में प्राचीन काल में हो चूकी हैं और भविष्‍य में भी होंगी और वे हमारे धर्म को ज्‍यादा स्‍थायी बनायेंगी।

स्‍त्री पुरूष की साथिन है, जिसकी बौ‍द्धिक क्षमतायें पुरूष की बौद्धिक क्षमताओं से किसी तरह कम नहीं हैं। पुरूष की प्रवृत्तियों में, उन प्रवृत्तियों के प्रत्‍येक अंग और उपांग में भाग लेने का उसे अधिकार है; और आजादी तथा स्‍वाधीनता का उसे उतना ही अधिकार है जितना पुरूष को है। जिस तरह मनुष्‍य अपनी प्रवूत्ति के क्षेत्र में सर्वोच्‍च स्‍थान का अधिकारी माना गया है, उसी तरह स्‍त्री भी अपनी प्रवृत्ति के क्षेत्र में मानी जानी चाहिये। स्त्रियां पढ़ना- लिखना सीखें और उसके परिणामस्‍वरूप यह स्थिति आये, ऐसा नहीं होना चाहिये। यह तो हमारी सामाजिक व्‍यवस्‍था की सहज अवस्‍था ही होनी चाहिये। महज एक दूषित रूढ़‍ि और रिवाज के कारण बिलकुल ही मूर्ख और नालायक पुरूष भी स्त्रियों से बडे़ माने जाते हैं, यद्यपि वे इस बड़प्‍पन के पात्र नहीं होते और न वह उन्‍हें मिलना चाहिये। हमारे कई आन्‍दोंलनों की प्रगति हमारे स्‍त्री- समाज की पिछडी़ हुई हालत के करण बीच में ही रूक जाती है। इसी तरह हमारे किये हुए काम का जैसा और जितना फल आना चाहिये, वैसा और उतना नहीं आता। हमारी दशा उस कुजूस व्‍यापारी के जैसी है, जो अपने व्‍यापार में पर्याप्‍त पूंजी नहीं लगाता और इसलिए नुकसान उठाता है।

पुरूष की समानता

स्त्रियों के अधिकारों के सवाल पर मैं किसी तरह का समझौता स्‍वीकार नहीं कर सकता। मेरी राय में उन पर ऐसा कोई कानूनी प्रतिबंध नहीं लगाया जाना चाहिये, जो पुरूषों पर न लगाया गया हो। पुत्रों और कन्‍याओं में किसी तरह का भेद नहीं होना चाहिये। उनके साथ पूरी समानता का व्‍यवहार होना चाहिये।

पुरूष और स्‍त्री की समानता का यह अर्थ नहीं कि वे समान धन्‍धें भी करें। स्‍त्री के शस्‍त्र धारण करने या शिकार करने के खिलाफ कोई कानूनी बाधा न होनी चाहिये। लेकिन जो काम पुरूष के करने के हैं, उनसे वह स्‍वभावत: विरत होगी। प्रकृति ने स्‍त्री और पुरूष को एक- दूसरे के पुरक के रूप में सिरजा है। जिस तरह उन‍के आकार में भेद है, उसी तरह उनके कार्य भी मर्यादित हैं।


विवाह- संस्‍कार

यदि हम स्‍त्री- पुरूष के सम्‍बंधों के सवाल को स्‍वस्‍थ और शुद्ध मन से देखें और अपने को भावी पीढ़ि‍यों के कल्‍याण का ट्रस्‍टी मानें, तो आज इस क्षेत्र में जो दु:ख नतर आते हैं, उनमें से अधिकांश दु:ख टाले जा सकते हैं।

विवाह जीवन की एक स्‍वाभाविक घटना है और उसे किसी भी तरह दुषित या कुत्सित मानना गलत है।… आदर्श यह है कि विवाह को एक पवित्र संस्‍कार समझा जाय और तदनुसार विवाहित अवस्‍था में संयम का पालन किया जाय।

परदा- प्रथा

पवित्रता स्त्रियों को बाहरी मर्यादाओं में जकड़कर रखने से उत्‍पन्‍न होने वाली चीज नहीं है। उसकी रक्षा उन्‍हें परदे की दीवाल से घेरकर कर नहीं की जा सकती। उसकी उत्‍पत्ति और उसका विकास भीतर से होना चाहिये। और उसकी कटौती यह है कि वह पवित्रता किसी भी प्रलोभन से डिगे नहीं। इस कसौटी पर वह खरी सिद्ध हो तभी उसका कोई मूल्‍य माना जा सकता है।

ओर स्त्रियों की पवित्रता के विषय में पुरूष मानसिक अस्‍वस्‍थता की सुचक इतनी चिन्‍ता क्‍यों दिखाते हैं ? क्‍या पुरूषों की पवित्रता के विषय में स्त्रियों को कुछ कहने का अधिकार हैं? पुरूषों के शील की पवित्रता के विषय में हम स्त्रियों को तो कोई चिन्‍ता करते हुए नहीं सुनते। स्त्रियों के शील की पवि त्रता के नियमन का अधिकार अपने हाथों में लेने की इच्‍छा पुरूषों को क्‍यों करनी चाहिये? पवित्रता कोई ऐसी चीज नहीं है, जो उपर से लादी जा सके। वह तो भीतर से विकसित होने वाली और इसलिए प्रयत्‍न से सिद्ध होने वाली चीज है।

दहेज की प्रथा

यह प्रथा नष्‍ट होनी चाहिये। विवह लड़के- लड़की के माता- पिताओं द्धारा पैसे ले- देकर किया हुआ सौदा नहीं होना चाहिये। इस प्रथा का जातिप्रथा से गहरा सम्‍बंध है। जब तक चुनाव का क्षेत्र अमुक जाति के इने- गिने लड़कों या लड़कियों तक ही मर्यादित रहेगा तब तक यह प्रथा भी रहेगी, भले इसके खिलाफ जो भी कहा जाय। यदि इस बुराई का उच्‍छेद करना हो तो लड़कियों को या लड़कों को या उनके माता- पिताओं को जाति के बंधन तोड़ने पड़ेंगे। इस सबका मतलब है चरित्र की ऐसी शिक्षा, जो देश के युवकों और युवतियों के मानस में आमूल परिवर्तन कर दे।

कोई भी ऐसा युवक, जो दहेज को विवाह की शर्त बनाता है, अपनी शिक्षा को कलंकित करता है, अपने देश को कलंकित करता है और नारी- जाति का अपमान करता है। देश में आजकल बहुतेरे युवक- आन्‍दोलन चल रहे हैं। मैं चाहता हूं कि ये आन्‍दोलन इस किस्‍म के सवालों को अपने हाथ में लें। ऐसे संघटनों को किसी ठोस सुधार- कार्य का प्रतिनिधि होना चाहिये और यह सुधार- कार्य उन्‍हें अपने अन्‍दर से ही शुरू करना चाहिये। लेकिन देखा गया है कि इस तरह के सुधार- कार्य के प्रतिनिधि होने के बजाय वे अक्‍सर आत्‍म- प्रशंसा करने वाली समितियों का रूप ले लेते हैं।… दहेज की इस नीचे गिराने वाली प्रथा के खिलाफ बलवान लोकमत पैदा करना चाहिये; और जो युवक इस पाप के सोने से अपने हाथ गंदे करते हैं, उनका समाज से बहिष्‍कार किया जाना चाहिये। लड़कियों के माता- पिताओं को अंग्रेजी डिग्रियों का मोह छोड़ देना चाहिये, और अपनी कन्‍याओं के लिए सच्‍चे ओर स्‍त्री- जाति के प्रति सम्‍मान की भावना रखने वाले सुयोग्‍य वरों की खोज में अपनी जाति या प्रान्‍त के भी तंग दायरे के बाहर जाने में संकोच नहीं करना चाहिये।

विधवाओं का पुनर्विवाह

जिस स्‍त्री ने अपने पति के प्रेम का अनुभव किया हो, उसके द्धारा स्‍वेच्‍छा से और समझ- बूझकर स्‍वीकार किया गया वैधव्‍य जीवन को सौन्‍दर्य और गौरव प्रदान करता है, घर को पवित्र बनाता है और धर्म को उपर उठाता है। लेकिन धर्म या रिवाज के द्धारा उपर से लादा हुआ वैधव्‍य एक असहृ बोझ है; वह गुप्‍त पापाचार के द्धारा घर को अपवित्र करात है और धर्म को गिराता है।

यदि हम पावित्र्य की और हिन्‍दु धर्म की रक्षा करना चाहते हैं, तो इस जबरस्‍ती लादे जाने वाले वैधव्‍य के विष से हमें मुक्‍त होना ही होगा। इस सुधार की शुरूआत उन लोगों को करनी चाहिये, जिनके यहां बाल- विधवायें हों। उन्‍हें साहसपूर्वक इन बाल- विधवाओं का योग्‍य लड़कों से विवाह करा देना चाहिये। बाल- विधवाओं के इस विवाह को मैं पुनर्विवाह का नाम नहीं देना चाहता, क्‍योंकि मैं मानता हूं कि उनका विवाह तो कभी हुआ ही नहीं था।

तलाक

विवाह विवाह- सूत्र से बंधे हुए दोनों साथियों को एक- दूसरे के साथ शरीर- सम्‍बंध का अधिकार देता है। लेकिन इस अधिकार की एक मर्यादा है। इस अधिकार का उपयोग तभी हो जब दोनों साथी इस सम्‍बंध की इच्‍छा रखते हों। एक साथी दूसरे से उसकी अनिच्‍छा होते हुए भी इस सम्‍बंध की मांग करे, ऐसा अधिकार विवाह नहीं देता। तब इनमें से कोई भी एक साथी नैतिक अथवा अन्‍य किसी कारण से दूसरे की ऐसी इच्‍छा का पालन करने में असमर्थ हो तब क्‍या करना चाहिये, यह एक अलग सवाल है। व्‍यक्तिगत तौर पर यदि तलाक ही इस सवाल का एकमात्र उपाय हो, तो अपनी नैतिक प्रगति को रोकने के बजाय मैं इस उपाय को ही स्‍वीकार कर लूंगा- बशर्ते कि मेरे संयम का कारण नैतिक ही हो।

मैं विवाहित अवस्‍था को भी जीवन के दूसरे हिस्‍सों की जरह साधना की ही अवस्‍था मानता हूं। जीवन कर्त्‍तव्‍य- पालन है, एक लगातार चलने वाली परीक्षा है। विवाहित जीवन का लक्ष्‍य दोनों साथियों का पारस्‍परिक कल्‍याण साधना है- यहां इस जीवन में और इस जीवन के बाद भी। यह संस्‍था मानव – जाति के हित के लिए है। दो में कोई एक साथी विवाह के अनुशासन को तोड़े, तो दूसरे को विवाह- सम्‍बंध भंग करने का अधिकार हो जाता है। यहां विवाह- सम्‍बंध का भंग नैतिक है, शारीरिक नहीं; लेकिन इसमें तलाक की बात नहीं है। स्‍त्री या पुरूष अपने साथी से अलग हो जायेगा, लेकिन उसी उद्देश्‍य की सिद्धि के लिए जिसके लिए वे विवाह- सूत्र में बंधे थे। हिन्‍दु धर्म स्त्री- पुरूष दोनों को एक- दूसरे का समकक्ष मानता है; कोई किसी से न तो कम है, न ज्‍यादा। बेशक, न जाने कब से स्‍त्री को छोटा और पुरूष को बडा़ मानने वाला एक भिन्‍न रिवाज चल पडा़ है। लेकिन ऐसी तो और कितनी ही बुराइयां समाज में घुस आयी हैं। जो भी हो, मैं यह जरूर जानता हूं कि हिन्‍दु धर्म व्‍यक्ति को इस बात की पूरी आजादी देता है कि वह आत्‍म- साक्षात्‍कार के लिए जो कुछ करना आवश्‍यक हो सो करे, क्‍योंकि वही मावन- जन्‍म का सच्‍चा उद्देश्‍य है।

स्त्रियों के शील की रक्षा

मैंने हमेशा यह माना है कि किसी स्‍त्री की इच्‍छा के खिलाफ उसका शील भंग नहीं किया जा सकता। इस अत्‍याचार की शिकार वह तब होती है जब उसके मन पर डर छा जाता है या जब उसे अपने नैतिक बल की प्रतीति नहीं होती। अगर वह आक्रमणकारी के शारीरिक बल का मुकाबला नहीं कर सकती, तो उसकी पवित्रता उसे, आक्रमणकारी उसके शील का भंग कर सके उसके पहले ही, मरने का इच्‍छाबल अवश्‍य दे सकती है। सीता का उदाहरण लीजिये। शारीरिक दृष्टि से रावण की तुलना में वे कुछ भी नहीं थीं, किन्‍तु उनकी पवित्रता रावण के अपार राक्षसी बल से भी ज्‍यादा शक्तिशाली सिद्ध हुई। रावण ने उन्‍हें अनेक तरह के प्रलोभन देकर जीतना चाहा, लेकिन उन्‍हें वासना- पूर्ति के लिए छूने की हिम्‍मत वह नहीं कर सका। दूसरी ओर, यदि स्‍त्री अपने शारीरिक बल पर या हथियार पर भरोसा करे, तो अपनी शक्ति के चुके जाने पर वह निश्‍चय ही हार जायेगी।

केसी स्‍त्री पर जब आक्रमण हो उस समय उसे हिन्‍सा और अहिंसा का विचार करने की जरूरत नहीं। उसका पहला कर्त्‍तव्‍य आत्‍मरक्षा करना है। अपने शील की रक्षा के लिए उसे जो भी उपाय सूझे उसका उपयोग करने की उसे पूरी आजादी है। भगवान ने उसे दांत और नाखून तो दिये ही हैं। उसे अपनी पूरी ताकत के साथ उनका उपयोग करना चाहिये और यदि जरूरत पड़ जाय तो प्रयत्‍न करते हुए मर जाना चाहिये। जिस पुरूष श स्‍त्री ने मरने का सारा डर छोड़ दिया है, वह न केवल अपनी ही रक्षा कर सकेगी, बल्कि अपने प्राणों का बलिदान करके दूसरों की रक्षा भी कर सकेगी।

वेश्‍यावृत्ति

वेश्‍यावृत्ति दुनिया में हमेशा रही है यह सही है। लेकिन आज की तरह वह कभी शहरी जीवन का अभिन्‍न अंग भी रही होगी, इसमें मुझे शंका है। जो भी हो, एक समय जरूर आना चाहिये और आयेगा जब कि मावन- जाति इस अभिशाप के खिलाफ उठ खडी़ होगी; और जिस तरह उसने दूसरे अनेक बुरे रिवाजों को, भले वे कितने भी पुराने रहे हों, मिटा दिया है, उसी तरह वेश्‍यावृत्ति को भी वह भूतकाल की चीज बना देगी।

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