५५. स्त्रियों की शिक्षा
मैंने समय- समय पर यह बताया है कि स्त्री में विद्या का अभाव इस बात का कारण नहीं होना चाहिये कि पुरूष स्द्धी से मनुष्य- समाज के स्वाभाविक अधिकार छीन ले या उसे वे अधिकार न दे। किन्तु इन स्वाभाविक अधिकारों को काम में लाने के लिए, उनकी शोभा बढा़ने के लिए और उनका प्रचार करने के लिए स्त्रियों में विद्या की जरूरत अवश्य है। साथ ही, विद्या के बिना लाखों को शुद्ध आत्मज्ञान भी नहीं मिल सकता।
स्त्री और पुरूष समान दरजे के हैं, परन्तु एक नहीं; उनकी अनोखी जोडी़ है। वे एक- दूसरे की कमी पूरी करने वाले हैं और दोनों एक- दूसरे का सहारा हैं। यहां तक कि एक के बिना दूसरा रह नहीं सकता। किन्तु यह सिद्धान्त उपर की स्थिति में से ही निकाल आता है कि पुरूष या स्त्री कोई एक अपनी जगह से गिर जाय तो दोनों का नाश हो जाता है । इसलिए स्त्री- शिक्षा की योजना बनाने वालों को यह बात हमेशा याद रखनी चाहिये। दम्पती के बाहरी कामों में पुरूष सर्वोपरि है। बाहरी कामों का विशेष ज्ञान होना चाहिये। भीतरी कामों में स्त्री की प्रधानता है। इसलिए गृह- व्यवस्था, बच्चों की देखभाल, उनकी शिक्षा वगैरा के बारे में स्त्री को विशेष ज्ञान होना चाहिये। यहां किसी को कोई भी ज्ञान प्राप्त करने से रोकने की कल्पना नहीं है। किन्तु शिक्षा का क्रम इन विचारों को ध्यान में रखकर न बनाया गया हो, तो स्त्री- पुरूष दोनों को अपने- अपने क्षेत्र में पूर्णता प्राप्त करने का मौका नहीं मिलता।
मुझे ऐसा लगा कि हमारी मामूली पढा़ई में स्त्री या पुरूष किसी के लिए भी अंग्रेजी जरूरी नहीं है। कमाई के खातिर या राजनीतिक कामों के लिए ही पुरूषों को अंग्रेजी भाषा जानने की जरूरत हो सकती है। मैं नहीं मानता कि स्त्रियों को नौकरी ढूंढ़ने या व्यापार करने की झंझट में पड़ना चाहिये। अंग्रेजी भाषा थोडी़ ही स्त्रियां सीखेंगी। और जिन्हें सीखना होगा वे पुरूषों के लिए खोली हुई शालाओं में ही सींख सकेंगी। स्त्रियों के लिए खोली हुई शाला में अंग्रेजी जारी करना हमारी गुलामी की उमर बढा़ने का कारण बन जायेगा। यह वाक्य मैंने बहुतों के मुंह से सुना है और बहुत जगह सुना है कि अंग्रेजी भाषा में भरा हुआ खजाना पुरूषों की तरह स्त्रियों को भी मिलना चाहिये। मैं नम्रता के साथ कहूंगा कि इसमें कहीं- न- कहीं भूल है। यह तो कोई नहीं कहता कि पुरूषों को अंग्रेजी का खजाना दिया जाय और स्त्रियों को न दिया जाय।
जिसे साहित्य का शौक है वह अगर सारी दुनिया का साहित्य समझना जाहे, तो उसे रोककर रखने वाला इस दुनिया में कोई पैदा नहीं हुआ है। परन्तु जहां आम लोगों की जरूरतें समझकर शिक्षा का क्रम तैयार किया गया हो, वहां उपर बताये हुए साहित्य- प्रेमियों के लिए योजना तैयार नहीं की जा सकती। स्त्री या पुरूष को अंग्रेजी भाषा सीखने में अपना समय नहीं लगाना चाहिये। यह बात मैं उनका आनन्द कम करने के लिए नहीं कहता, बल्कि इसलिए कहता हूं कि जो आनन्द अंग्रेजी शिक्षा पाने वाले बडे़ कष्ट से लेते हैं वह हमें आसानी से मिले। पृथ्वी अमूल्य रत्नों से भरी है। सो साहित्य- रत्न अंग्रेजी भाषा में ही नहीं है। दूसरी भाषायें भी रत्नों से भरी हैं। मुझे ये सारे रत्न आम जनता के लिए चाहिये। ऐसा करने के लिए एक ही उपाय है और वह यह कि हममें से कुछ ऐसी शक्ति वाले लोग ये भाषायें सीखें और उनके रत्न हमें अपनी भाषा में दें।
मैं स्त्रियों की समुचित शिक्षा का हिमायती हूं, लेकिन यह भी मानता हूंकि स्त्री दुनिया की प्रगति में अपना योग पुरूष की नकल करके या उसकी प्रतिस्पर्धा करके नहीं दे सकती। वह चाहे तो प्रतिस्पर्धा कर सकती है। लेकिन पुरूष की नकल करके वह उस उंचाई तक नहीं उठ सकती, जिस उंचाई तक उठना उसके लिए सम्भव है। उसे पुरूष की पूरक बनाना चाहिये।
सहशिक्षा
मैं अभी तक निश्चय पूर्वक यह नहीं कह सकता कि सहशिक्षा सफल होगी या नहीं होगी। पश्चिम में वह सफल हुई हो ऐसा नहीं लगता। वर्षों पहले मैंने खुद उसका प्रयोग किया था और वह भी इस हद तक कि लड़के और लड़कियां उसी बरामदे में सोते थे। उनके बीच में कोई आड़ नहीं होती थी; अलबत्ता, मैं और श्री मती गांधी भी उनके साथ उसी बरामदे में सोते थे। मुझे कहना चाहिये कि इस प्रयोग के परिणाम अच्छें नहीं आये।
… सहशिक्षा अभी प्रयोग की ही अवस्था में है और उसके परिणाम के बारे में पक्ष अथवा विपक्ष में निश्चयपूर्वक हम कुछ नहीं कह सकते। मेरा खयाल है कि इस दिशा में हमें आरम्भ परिवार सक कहना चाहिये। परिवार में लड़के- लड़कियों को साथ- साथ स्वाभाविक तौर पर और आजादी के वातावरण में बढ़ने देना चाहिये। सहशिक्षा इस तरह अपने- आप आयेगी।
अगर आप स्कूलों में इकठ्ठी तालीम दें और ट्रेंनिंग स्कूलों में न दें, तो बच्चे समझेंगे कि कहीं कुछ- न- कुछ गड़बड़ है।
मेरे बच्चे अगर बुरे भी हैं तो भी मैं उन्हें खतरे में पड़ने दूंगा। एक दिन हमें काम- प्रवृत्ति को छोड़ना होगा। हमें हिन्दुस्तान के लिए पश्चिम की मिसालें नहीं ढूंढ़नी चाहिये। ट्रेनिंग स्कूलों में अगर सिखाने वाले शिक्षक लायक और पवित्र हों, नयी तालीम की भावना से भरे हों, तो कोई खतरा नहीं। दुर्भाग्य से कुछ घटनायें ऐसी हो भी जायें तो कोई परवाह नहीं। वे तो हर जगह होंगी। मैं यह बात साहसपूर्वक कहता तो हूं, लेकिन मैं इसके खतरों से बेखबर नहीं हूं।
अनुक्रमणिका
- १. मेरे सपनो का भारत
- २. स्वराज्य का अर्थ
- ३. राष्ट्रवाद का सच्चा स्वरूप
- ४. भारतीय लोकतंत्र
- ५. भारत और समाजवाद
- ६. भारत और साम्यवाद
- ७. उद्योगवाद का अभिशाप
- ८. वर्गयुध्द
- ९. हड़ताल
- १०. मज़दूर क्या चुनेंगे?
- ११. अधिकार या कर्तव्य ?
- १२. बेकारी का सवाल
- १३. दरिद्र-नारायण
- १४. शरीर-श्रम
- १५. सर्वोदय
- १६. संरक्षता का सिद्धांत
- १७. अहिंसक अर्थ-व्यवस्था
- १८. सामान वितरण का रास्ता
- १९. भारत में अहिंसा की उपासना
- २०. सर्वोदयी राज्य
- २१. सत्याग्रह और दुराग्रह
- २२. किसान
- २३. गांवों की ओर
- २४. ग्राम-स्वराज्य
- २५. पंचायत राज
- २६. ग्रामोद्योग
- २७. सरकार क्या कर सकती है?
- २८. ग्राम-प्रदर्शनियां
- २९. चरखे का संगीत
- ३०. मिल-उद्योग
- ३१. स्वदेशी
- ३२. गोरक्षा
- ३३. सहकारी गो पालन
- ३४. गांवों की सफाई
- ३५. गांव का आरोग्य
- ३६. गांवों का आहार
- ३७. ग्राम सेवक
- ३८. समग्र ग्राम सेवा
- ३९. युवकों को आह्वान
- ४०. राष्ट्र का आरोग्य, स्वच्छता और आहार
- ४१. शराब और अन्य मादक द्रव्य
- ४२. शहरों की सफाई
- ४३. विदेशी माध्यम की बुराई
- ४४. मेरा अपना अनुभव
- ४५. भारत की सांस्कृतिक विरासत
- ४६. नई तालीम
- ४७. बुनियादी शिक्षा
- ४८. उच्च शिक्षा
- ४९. शिक्षा का आश्रमी आदर्श
- ५०. राष्ट्रभाषा और लिपि
- ५१. प्रान्तीय भाषायें
- ५२. दक्षिण में हिन्दी
- ५३. विद्यार्थियों के लिए अनुशासन के नियम
- ५४. भारतीय स्त्रियों का पुनरूत्थान
- ५५. स्त्रियों की शिक्षा
- ५६. संतति-नियमन
- ५७. काम-विज्ञान की शिक्षा
- ५८ (……..)
- ५९. साम्प्रदायिक एकता
- ६०. वर्णाश्रम धर्म
- ६१. अस्पृश्यता का अभिशाप
- ६२. भारत में धार्मिक सहिष्णुता
- ६३. धर्म – परिवर्तन
- ६४. (…)
- ६५. प्रान्तों का पुनर्गठन
- ६६. अल्पसंख्यकों की समस्यायें
- ६७. भारतीय गवर्नर
- ६८. समाचार-पत्र
- ६९. शान्ति सेना
- ७०. भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस
- ७१. भारत पाकिस्तान और काश्मीर
- ७२. भारत में विदेशी बस्तियां
- ७३. भारत और विश्वशांति
- ७४. पूर्व का संदेश
- ७५. स्फूट वचन
