५६. संतति-नियमन

सन्‍तति के जन्‍म को मर्यादित करने की आवश्‍यकता के बारे में दो मत हो ही नहीं सकते । परन्‍तु इसका एकमात्र उपाय हैं, आत्‍म-संयम या ब्रम्‍हाचर्य, जो कि युगों से हमें प्राप्‍त हैं । यह रामबाण और सर्वोपरि उपाय है, और जो इसका सेवन करते है उन्‍हें लाभ-ही-लाभ होता है । डॉक्‍टर लोगों का मानव-जाति पर बड़ा उपकार होगा, यदि वे सन्‍तति-नियमन के लिए कृत्रिम साधनों की तजवीन करने के बजाय आत्‍म-यंयम के साधन निर्माण करें ।

कृत्रिम साधनों की सलाह देना मानों बुराई का हौसला बढ़ाना हैं । उससे पुरूष और स्‍त्री दोनों उच्‍छृंखल हो जाते हैं । और इन कृत्रिम साधनों को जो प्रतिष्‍ठा दी जा रही हैं, उससे उस संयम के ह्रास की गति बढ़े बिना न रहेगी, जो कि लोकमत के कारण हम पर पड़ता है । कृत्रिम साधनों के अवलंबन का कुफल होगा नसुंसकता और क्षीणवीर्यता । यह दवा रोग से भी ज्‍यादा बदतर साबित हुए बिना न रहेगी ।

अपने कर्म के फल को भोगने से दुम दबाना दोष है, अनीतिपूर्ण है । जो शख्‍त जरूरत से ज्‍यादा खा लेता है, उसके लिए यही अच्‍छा है कि उसके पेट में दर्द हो और फिर बलवर्धक या दूसरी दवाइयां खकर उसके नतीजे से बचना बुरा है । पशु की तरह विषय-भोग में गर्क रहकर अपने इस कृत्‍य के फल से बचना और भी बुरा है । प्रकृति बड़ी कठोर शासक है । वह अपने कानून-भंग का पूरा बदला बिना आगा-पीछा देखे चुकाती है । केवल नैतिक संयम के द्वारा ही हमें नैतिक फल मिल सकता है । संयम के दूसरे तमाम साधन अपने हेतु के ही विनाशक सिद्ध होंगे ।

विषय-भोग करते हुए भी कृत्रिम उपायों के द्वारा प्रजोत्‍पत्ति रोकने की प्रथा पुरानी है । मगर पूर्वकाल में वह गुप्‍त रूप से चलती थी । आधुनिकत सभ्‍यता के इस जमाने में उसे ऊंचा स्‍थान मिल गया है, और कृत्रिम उपायों की रचना भी व्‍यवस्थित तरीके से की गयी है । इस प्रथा की परमार्थ का जामा पहनाया गया है । इन उपायों के हिमायती कहते है कि भोगेच्‍छा स्‍वाभाविक वस्‍तु है, शायद उसे ईश्‍वर का वरदान भी कहा जा सकता है । उसे निकाल फेंकना अशक्‍य है । उस पर संयम का अंकुश रखना कठिन है । और अगय संयम के‍ सिवा दूसरा कोई उपाय न ढूंढ़ा जाय, तो असंख्‍य स्त्रियों के लिए प्रजोत्‍‍पत्ति बोझरूप हो जायेगी; और भोग से उत्‍पन्‍न होने वाली प्रजा इतनी बढ़ जायेगी कि मनुष्‍य-जाति के लिए पूरी खुराक ही नहीं मिल सकेगी । इन दो आपत्तियों को रोकने के लिए कृत्रिम उपायों की योजना करना मनुष्‍य का धर्म हो जाता है ।

मुझ पर इस दलील का असर नहीं हुआ है । क्‍योंकि इन उपायों के द्वारा मनुष्‍य अनेक दूसरी मुसीबतें मोल लेता है । मगर सबसे बड़ा नुकसान तो यह है कि कृत्रिम उपायों के प्रचार से संयम-धर्म का लोप हो जाने का भय पैदा होगा । इस रत्‍न को बेचकर चाहे जैसा तात्‍कालिक लाभ मिले, तो भी यह सौदा करने योग्‍य नहीं है ।… कठिनाई आत्‍म-वंचना से पैदा होती है । इसमें त्‍याग का आरम्‍भ विचार-शुद्धि से नहीं होता, केवल बाह्राचार को रोकने के निष्‍फल प्रयन्‍त से होता है । विचार की दृढ़ता के साथ आचार का संयम शुरू हो, तो सफलता मिले बिना रह ही नहीं सकती । स्‍त्री-पुरूष की जोड़ी विषय-सेवन के लिए हरगिज नहीं बनी है ।

मुझे मालूम है कि गुप्‍त पाप ने पाठशाला के लड़के-लड़कियों का कैसा भयंकर विनाश किया है। विज्ञान के ना पर कृत्रिम साधनों के प्रचलित होने और समाज के प्रसिद्ध नेताओं की उस पर मुहर लग जाने से समस्‍या और बढ़ गई है; और जो सुधारक सामाजिक जीवन की शुद्धि का काम करते हैं, उनका कार्य आज असंभव-सा हो गया है । मैं पाठकों को यह सूचना देते हुए कोई विश्‍वासघात नहीं कर रहा हूं कि ऐसी कुवांरी लड़कियां है, जिन पर आसानी से किसी भी बात का प्रभाव पड़ सकता है और जो स्‍कूल-कॉलेजों में पढ़ती है, परन्‍तु जो बड़ी उत्‍सुकता से सं‍तति-निग्रह के साहित्‍य और पित्रकाओं का अध्‍ययन करती है और जिनके पास उसके साधन भी मौजूद हैं । इन साधनों के प्रयोग को विवाहित स्त्रियों तक सीमित रखना असंभव है । जब विवाह के उद्देश्‍य और उच्‍चतम उपयोग की कल्‍पना ही पाशविक विकार की तृप्ति हो और यह विचार तक न किया जाय कि इस प्रकार की तृप्ति का कुदरती नतीजा क्‍या होगा, तब विवाह की सारी पवित्रता नष्‍ट हो जाती है ।

मुझे इसमें जरा भी शक नहीं कि जो विद्वान पुरूष और स्त्रियां मिशनरी उत्‍साह के साथ कृत्रिम साधनों के पक्ष में आन्‍दोलन कर रहे हैं, वे देश के युवकों की अपार हानि कर रहे हैं । उनका यह विश्‍वास झूठा है कि ऐसा करके वे उन गरीब स्त्रियों को संकट से बचा लेंगे, जिन्‍हें अपनी इच्‍छा के विरूद्ध मजबूरन बच्‍चे पैदा करने पड़ते है । जिन्‍हें बच्‍चों की संख्‍या मर्यादित करने की जरूरत है, उनके पास तो इनकी आसानी से पहुंच नही होगी । हमारी गरीब औरतों के पास न तो वह ज्ञान होता है और न वह तालीम होती है, जो पश्चिम की स्त्रियों के पास होती है । अवश्‍य ही यह आंदोलन मध्‍यम श्रेणी की स्त्रियों की तरु से नही किया जा रहा हैं, क्‍योंकि उन्‍हें इस ज्ञान की उतनी जरूरत नहीं है जितनी निर्धन वर्गो की स्त्रियों को है ।

परन्‍तु सबसे बड़ी हानि, जो यह आन्‍दोलन कर रहा है, यह है कि पुराना आदर्श छोड़कर यह उसके स्‍थान पर एक ऐसा आदर्श स्‍थापित कर रहा है, जिस पर अमल हुआ तो मानव-जाति का नैतिक और शारिरिक विनाश निश्चित है । वीर्य के व्‍‍यर्थ व्‍यय को प्राचीन साहित्‍य में जो इनता भयंकर कृत्‍य माना गया है, वह कोई अज्ञानजन्‍य अंधविश्‍वास नहीं था । कोई किसान अगर अपने पास का बढि़या-से-बढि़या बीज पथरीली जमीन में बोये या कोई खेत का मालिक बढि़या जमीन वाले अपने खेत में ऐसी परिस्थितियों में अच्‍छा बीज डाले जिसमें उगना असंभव है तो उनके लिए क्‍या कहा जायेगा, भगवान ने पुरूष को ऊंची-से-ऊंची शक्ति वाला बीज प्रदान किया है और स्‍त्री को ऐसा खेल दिया है जिसके बराबर उपजाउ धरती इस दुनिया और कही नही है । अश्‍वय ही पुरूष की यह भयंकर मूर्खता है कि वह अपनी इस सबसे कीमती संपत्‍ित को व्‍यर्थ जाने देता है । उसे अपना अत्‍यन्‍त मूल्‍यवान जवाहरात और मोतियों से भी अधिक सावधानी के साथ उसकी रक्षा करनी चाहिये । इसी तरह वह स्‍त्री भी अक्षम्‍य मूर्खता करती है, जो अपने जीवोत्‍पादक क्षेत्र में बीज को नष्‍ट होने देने के इरादे से ही ग्रहण करती है । वे दोनों ईश्‍वर-प्रदत्‍त प्रतिभा के दुरूपयोग के अपराधी माने जायेंगे और जो बीज उन्‍हें दी गई है वह उनसे छीन ली जायेगी । काम को पूर्णता एक सुन्‍दर और उदात्‍त वस्‍तु है। उसमें लज्जित होने की कोई बात नहीं है। परन्‍तु वह संतोनोत्‍पति के लिए ही बनाई गई है। उसका और कोई उपयोग करना ईश्‍वर और मानवता दोनों के प्रति पाप है। सन्‍तति- निग्रह के कृत्रिम साधन पहले भी थे और आगे भी रहेंगे। परन्‍तु पहले उन्‍हें काम में लेना पाप समझा जाता था। पाप को पुण्‍य कहकर उसका गौरव बढा़ना हमारी पीढ़ी के ही भाग्‍य में बदा है। मेरे खयाल से कृत्रिम साधनों के हिमायती भारत के युवकों की सबसे बडी़ कुसेवा यह कर रहे हैं कि उनके दिमागों में वे गलत विचारधारा भर रहे हैं1 भारत के युवा स्‍त्री- पुरूषों को, जिनके हाथ में देश का भाग्‍य है, इस झूठे देवता से सावधान रहना चाहिये,ईश्‍वर ने उन्‍हें जो खजाना दिया है उसकी रक्षा करनी चाहिये और इच्‍छा हो तो उसका उसी काम में उपयोग करना चाहिये जिसके लिए वह बनाया गया है।

मैं यह नहीं मानता कि स्‍त्री काम- विकार की उतनी ही शिकार बनती है जितना पुरूष। पुरूष के बनिस्‍बत स्‍त्री के लिए आत्‍म-संयम पालना ज्‍यादा आसान होता है। मैं मानता हूं कि इस देश में स्‍त्री को दी जाने लायक सही शिक्षा यह होगी कि उसे अपने पति को भी ‘ नहीं ‘ कहने की कला सिखाई जाय; उसे यह सिखाया जाय कि पति के हाथों में केवल विषय- भोग का साधन या गुडिया बनकर रहना उसका कर्त्‍तव्‍य बिलकुल नहीं है। यदि स्‍त्री के कर्त्‍तव्‍य हैं तो उसके अधिकार भी हैं।

पहली बात है उसे मानसिक गुलामी से मुक्‍त करना, उसे अपने शरीर को पवित्र मानने की शिक्षा देना और राष्‍ट्र तथा मावन – जाति की सेवा की प्रतिष्‍ठा और गौरव सिखाना। यह मान लेना अनुचित होगा कि भारत की स्त्रियां इस गुलामी से कभी छूत ही नहीं स‍कतीं और इसलिए प्रजोत्‍पत्ति को रोकने तथा अपनी बची- खुची तन्‍दुरूस्‍ती की रक्षा करने के लिए उन्‍हें कृत्रिम साधनों का उपयोग सिखाने के सिवा दूसरा कोई रास्‍ता नहीं है।

जिन बहनों का पुण्‍य- प्रकोप ऐसी स्त्रियों के कष्‍टों को देखकर, जिन्‍हें इच्‍छा या अनिच्‍छा से बच्‍चे पैदा करने पड़ते हैं- जाग्रत हुआ है, वे उतावली न बनें। कृत्रिम साधनों के पक्ष में किया जाने वाला प्रचार भी वांछित हेतु को एक दिन में सिद्ध नहीं कर देगा। हर पद्धति के लिए लोगों को शिक्षा देना जरूरी होगा। मेरा कहना इतना ही है कि यह शिक्षा सही रास्‍ते ले जाने वाली होनी चाहिये।
बन्‍ध्‍यीकरण

लोगों पर बंध्‍यीकरण ( वह क्रिया जिससे पुरूष के वीर्य में निहित प्रजनन- शक्ति का नाश कर दिया जाता है) का कानून लादने को मैं अमानुषिक मानता हूं। परन्‍तु जो व्‍यक्ति पुराने रोगों के मरीज हों, वे यदि स्‍वीकार कर लें तो उनका बंध्‍यीकरण वांछनीय होगा। बंध्‍यीकरण एक प्रकार का कृत्रिम साधन है। यद्यपि मैं स्त्रियों के संबंध में कृत्रिम साधनों के उपयोग के खिलाप हूं, फिर भी मैं पुरूष के संबंध में स्‍वेच्‍छा से किये जाने वाले बंध्‍यीकरण के खिलाफ नहीं हूं, क्‍योंकि पुरूष आक्रामक है।
अधिक जनसंख्‍या का हौवा

यदि कहा जाय कि जनसंख्‍या की अतिवृद्धि के कारण्‍ा कृत्रिम साधनों द्धारा सन्‍तति- नियमन की राष्‍ट्र के लिए आवश्‍यकता है, तो मुझे इस बात में पूरा शक है। यह बात अब तक साबित ही नहीं की गई है। मेरा राय में तो यदि जमीन- सम्‍बंधी कानूनों में समुचित सुधार कर दिया जाय, खेती की दशा सुधारी जाय और एक सहायक धंधे की तजवीज कर दी जाय, तो हमारा यह देश अपनी जनसंख्‍या से दूने लोगों का भरण- पोषण कर सकता है।

हमारा यह छोटा- सा पृथ्‍वी- मंडल कुछ समय का बना हुआ खिलौना नहीं है। अनगिनत युगों से यह ऐसा ही चला आ रहा है। जनसंख्‍या की वृद्धि के भार से उसने कभी कष्‍ट का अनुभव नहीं किया। तब कुछ लोगों के मन में एकाएक इस सत्‍य का उदय कहां से हो गया कि यदि सन्‍तति- नियमन के कृत्रिम साधनों से जनसंख्‍या की वृद्धि को रोका न गया, तो अन्‍न न मिलने से पृथ्‍वी- मंडल का नाश हो जायेगा ?

बढ़ती हुई जनसंख्‍या का हौवा कोई नई चीज नहीं है। अक्‍सर वह हमारे सामने खडा़ किया गया है। जनसंख्‍या की वृद्धि कोई टालने लाय‍क संकट नहीं है; न होना चाहिये । उसे कृत्रिम उपायों से रोकना एक महान संकट है, फिर चाहे हम उसे जानते हों या न जानते हों। अगर कृत्रिम उपायों का उपयोग आम तौर पर होने लगे, तो वह समूचे राष्‍ट्र को पतन की ओर ले जायेगा। खुशी इस बात की है कि इसकी कोई सम्‍भावना नहीं है। एक ओर हम विषय- भोग से पैदा होने वाली अनचाही सन्‍तति का पाप अपने सिर ओढ़ते हैं, और दूसरी ओर ईश्‍वर उस पाप को मिटाने के लिए हमें अनाज की तंगी, महामारी और लडा़ई के जरिये सजा करता है। अगर इस तिहरे शाप से बचना हो, तो संयम- रूपी कारगर उपाय के जरिये अनचाही सन्‍तति को रोकना चाहिये। देखने वालों को आज भी यह दिखाई पड़ता है कि कृत्रिम उपायों के कैसे बुरे नतीजे होते हैं। नीति की चर्चा में पडे़ बिना मैं यही कहा चाहता हूं कि कुत्‍ते – बिल्‍ली की तरह होने वाली इस सन्‍तान- वृद्धि को जरूर रोकना चाहिये । लेकिन इस बात का खयाल रखना होगा। कि ऐसा करने से उसका ज्‍यादा बुरा नतीजा न निकले । इस बढ़ती हुई प्रजोत्‍पत्ति को ऐसे उपायों से रोकना चाहिये जिनसे जनता उपर उठे; यानी इसके लिए जनता को उसके जीवन से सम्‍बंध रखने वाली तालीम मिलनी चाहिये, जिससे एक शाप के मिटते ही दूसरे सब शाप अपने – आप मिट जायं। यह सोचकर कि रास्‍ता पहाडी़ है और उसमें चढा़इयां हैं, हमें उससे दूर नहीं भागना चाहिये । मनुष्‍य की प्रगति का मार्ग कठिनाइयों से भरा पडा़ है। उनसे डरना क्‍या ? उनका तो स्‍वागत करना चाहिये ।

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