५. भारत और समाजवाद

पूंजीपतियों द्वारा पूंजी के दुरूपयोग की बात लोगों के ध्यान में आयी, तब समाजवाद का जन्म हुआ यह ख्याल गलत है। जैसा कि मैंने पहले भी प्रतिपादित किया है समाजवाद, और उसी तरह साम्यवाद भी, ईशोपनिषद् के पहले श्लोक में स्पष्ट रूप से मिल जाता है। हां, यह बात सही है कि जब कुछ सुधारकों ने हृदय -परिवर्तन की क्रिया द्वारा आदर्श सिद्ध करने की प्रणाली में विश्वास खो दिया, तब जिसे वैज्ञानिक समाजवाद कहा जाता है उसकी पद्धति ढूंढ़ी गयी। मैं उसी समस्या को हल करने में लगा हुआ हूं, जो वैज्ञानिक समाजवादियों के सामने है। अलबत्ता, काम का मेरा ढंग शुद्ध अहिंसा के अनुसार प्रयत्न करने का है। यह हो सकता है कि मैं इस सिद्धांत का, जिसमें मेरा विश्वास प्रतिदिन बढ़ रहा है, अच्छा व्याख्याता न होऊं। अखिल भारत चरखा-संघ और अखिल भारत ग्रामोद्योग-संघ ऐसी संस्थायें हैं, जिनके द्वारा अहिंसा की कार्य-पद्धति का अखिल भारतीय पैमाने पर प्रयोग किया जा रहा है। वे कांग्रेस के द्वारा बनायी ऐसी स्वतंत्र संस्थाएं हैं, जिनका उद्देश्य कांगे्रस जैसी लोकतांत्रिक संस्था की नीति में हमेशा जिन परिवर्तनों के होने की संभावना है उन परिवर्तनों से बंधे बिना मुझे अपने प्रयोग अपनी इच्छा के अनुसार करते रहने का मौका देना है।1

सच्चा समाजवाद तो हमें अपने पूर्वजों से प्राप्त हुआ है, जो हमें यह सिखा गये हैं कि ‘सब भूमि गोपाल की है, इसमें कहीं मेरी और तेरी की सीमायें नहीं है। ये सीमायें तो आदमियों ने बनायी हैं और इसलिए वे इन्हें तोड़ भी सकते हैं। गोपाल यानी कृष्ण यानी भगवान। आधुनिक भाषा मंे गोपाल यानी राज्य यानी जनता। आज ज़मीन जनता की नहीं है, यह बात सही है। पर इसमें दोष उस शिक्षा का नहीं है। दोष तो हमारा है जिन्होंने उस शिक्षा के अनुसार आचरण नहीं किया। मुझे इसमें कोई संदेह नहीं कि इस आदर्श को जिस हद तक रूस या और कोई देश पहुंच सकता है उसी हद तक हम भी पहुंच सकते हैं, और वह भी हिंसा का आश्रय लिये बिना। पंूजीवालों से उनकी पंूजी हिंसापूर्वक छीनी जाय, इसके बजाय यदि चरखा और उसके सारे फलितार्थ स्वीकार कर लिये जायेें तो वही काम हो सकता है। चरखा हिंसक अपहरण की जगह ले सकने वाला अत्यंत प्रभावकारी साधन है। जमीन और दूसरी सारी संपत्ति उसकी है, जो उसके लिए काम करे। दुःख इस बात का है कि किसान और मजदूर या तो इस सरल सत्य को जानते नहीं है, या यों कहो कि उन्हें इसे जानने नहीं दिया गया है।2

मैं सदा से यह मानता आया हूं कि नीचे-से-नीचे और कमजोर-से-कमजोर के प्रति हम जोर-जबरदस्ती से सामाजिक न्याय का पालन नहीं कर सकते। मैं यह भी मानता आया हूं कि पतित-से-पतित लोगों को भी मुनासिब तामील दी जाये, तो अहिंसक साधनों द्वारा सब प्रकार के अत्याचारों का प्रतिकार किया जा सकता है। अहिंसक असहयोग ही उसका मुख्य साधन है। कभी-कभी असहयोग भी उतना ही कर्तव्य-रूप हो जाता है जितना कि सहयोग। अपनी विफलता या गुलामी मे खुद सहायक होने के लिए कोई बंधा हुआ नही है। जो स्वतंत्रता दूसरांे के प्रयत्नों द्वारा-फिर वे कितने ही उदार क्यों न हों-मिलती है, वह उन प्रयत्नों के न रहने पर कायम नहीं रखी जा सकती। दूसरे शब्दों में, ऐसी स्वतंत्रता सच्ची स्वतंत्रता नहीं है। लेकिन जब पतित-से-पतित भी अहिंसक अहसहयोग द्वाा अपनी स्वतंत्रता प्राप्त करने की कला सीख लेते हैं, तो वे उसके प्रकाश का अनुभव किये बिना नहीं रह सकते।

मेरा यह पक्का विश्वास है कि जिस चीज को हिंसा कभी नहीं कर सकती, वहीं अहिंसात्मक असहयोग द्वारा सिद्ध की जा सकती है। और अंत में जाकर उससे अत्याचारियों का हृदय-परिवर्तन भी हो सकता है। हमने हिंदुस्तान में अहिंसा को उसके अनुरूप मौका अभी तक दिया ही नहीं। फिर भी आश्चर्य है कि अपनी इस मिलावतटी अहिंसा द्वारा भी म इतनी शक्ति प्राप्त कर सके है।। 3
प्रतिष्ठित जीवन के लिए जितनी जमीन की आवश्यकता है, उससे अधिक किसी आदमी के पास नहीं होनी चाहिये। ऐसा कौन है जो इस हकीकत से इनकार कर सके कि आम जनता की घोर गरीबी का कारण आज यही है कि उसके पास उसकी अपनी कही जाने वाली कोई जमीन नहीं है।

लेकिन यह याद रखना चाहिये कि इस तरह के सुधार तुरंत नहीं किये जा सकते। अगर ये सुधार अहिंसात्मक तरीकों से करने हैं, तो जमींदारों और गैर जमीदारों दोनों को सुशिक्षित बनाना लाजिमी हो जाता है। जमींदारों को यह विश्वास दिलाना होगा कि उनके साथ कभी जोर-जबरदस्ती नहीं की जायेगी, और गैर जमींदारों को यह सिखाना और समझाना होगा कि उनसे उनकी मरजी के खिलाफ जबरन कोई काम नहीं ले सकता, और यह कि कष्ट-सहने या अंिहंसा की कला को सीखकर वे अपनी स्वतंत्रता प्राप्त कर सकते है। अगर इस लक्ष्य को हमें प्राप्त करना है, तो ऊपर मैंने जिस शिक्षा का जिक्र किया है उसका आरंभ अभी से हो जाना चाहिये। इसके लिए पहली जरूरत ऐसा वातावरण तैयार करने की है, जिसमें पारस्परिक आदर और सद्भाव का सुमेल हो। उस अवस्था में वर्गों और आम के बीच किसी प्रकार का हिंसात्मक संघर्ष हो ही नहीं सकता।4

समाजवादी कौन है ?

समाजवाद एक सुदंर शब्द है। जहां तक मैं जानता हूं, समाजवाद में समाज के सारे सदस्य बराबर होते हैं, न कोई नीचा और न कोई ऊंचा। किसी आदमी के शरीर में सिर इसलिए ऊंचा नहीं है कि वह सबसे ऊपर है और पांव के तलुवे इसलिए नीचे नहीं है कि वे जमीन को छूते है। जिस तरह मनुष्य के शरीर के सारे अंग बराबर है, उसी तरह समाजरूपी शरीर के सारे अंग भी बराबर हैं। यही समाजवाद है।

इस वाद में राजा और प्रजा, धनी और गरीब, मालिक और मजदूर सब बराबर हैं। इस तरह समाजवाद यानी। उसमें द्वैत या भेदभाव की गुंजाइश ही नहीं है।

सारी दुनिया के समाज पर नजर डालें तो हम देखेंगे कि हर जगह द्वैत-ही-द्वैत है एकता या अद्वैत कहीं नाम को भी नहीं दिखाई देता। वह आदमी ऊंचा है, वह आदमी नीचा है। वह हिंदू है, वह मुसलमान है, तीसरा ईसाई है, चैथा पारसी है, पांचवां सिक्ख है, छटा यहूदी है। इनमें भी बहुत सी उप-जातियां है। मेरे अद्वैतवाद में ये सब लोग एक हो जाते हैं, एकता में समा जाते हैं।

इस वाद तक पहुंचने के लिए हम एक-दूसरे की तरफ ताकते न बैंठे। जब तक सारे लोग समाजवादी न बन जाएं तब तक हम कोई हलचल न करें, अपनी जीवन में कोई फेरफार न करके हम भाषण देते रहें, पार्टियां बनाते रहें और बाज पक्षी की तरह जहां शिकार मिल जाय वहां उस पर टूट पडे़-यह समाजवाद हरगिज़ नहीं है। समाजवाद जैसी शानदान चीज झड़प मारने से हमसे दूर ही जाने वाली है।

समाजवाद की शुरूआत पहले समाजवादी से होती है। अगर एक भी ऐसा समाजवादी हो तो उस पर सिफर बढ़ाये जा सकते हैं। पहले सिफर से उसकी कीमत दस गुनी बढ़ती जायेगी। लेकिन अगर पहला सिर ही हो, दूसरे शब्दों में अगर कोई आरंभी ही न करे, तो उसके आगे कितने ही सिफर क्यों न बढ़ाये जायं उनकी कीमत सिफर ही रहेगी। सिफरों को लिखने में मेहनत और कागज की बरबादी ही होगी।

यह समाजवाद बडी शुद्ध चीज़ है। इसलिए इसे पाने के साधन भी शुद्ध ही होने चाहिये। गंदे साधनों से मिलने वाली चीज़ भी गंदी ही होगी। इसलिए राजा को मारकर राजा और प्रजा एक से नहीं बन सकेंगे। यही बात सब पर लागू की जा सकती है।

कोई असत्य से सत्य को नहीं पा सकता। सत्य को पाने के लिए हमेशा सत्य का आचरण करना ही होगा। अहिंसा और सत्य की तो जोड़ी है न ? हरगिज़ नहीं। सत्य में अहिंसा छिपी हुई है और अहिंसा में सत्य। इसीलिए मैंने कहा है कि सत्य और अहिंसा एक ही सिक्के के दो रूप है। दोनोेें की कीमत एक ही है। केवल पढ़ने में ही फर्क है, एक तरह अहिंसा है, दूसरी तरफ सत्य। संपूर्ण पवित्रता के बिना अहिंसा और सत्य निभ ही नहीं सकते। शरीर या मन की अपवित्रता को छिपाने से असत्य और अहिंसा ही पैदा होगी।

इसलिए केवल सत्यवादी, अहिंसक और पवित्र समाजवादी ही दुनिया में या हिंदुस्तान में समाजवाद फैला सकता है। जहां तक में जानता हूं, दुनिया में ऐसा कोई देश नहीं है जो पूरी तरह समाजवादी हो। मेरे बताये हुए साधनांें के बिना ऐसा समाज कायम करना असंभव है।5

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