६०. वर्णाश्रम धर्म
मैं ऐसा मानता हूं कि हर एक आदमी दुनिया में कुछ स्वाभाविक प्रवृत्तियां लेकर जन्म लेता है । इसी तरह हर एक आदमी की कुछ निश्चित सीमायें होती हैं, जिन्हें जीतना उसके लिए शक्य नहीं होता । इन सीमाओं के ही अध्ययन और अवलोकन से वर्ण का नियम निष्पन्न हुआ है । वह अमुक प्रवृत्तियां वाले अमुक लोगों के लिए अलग-अलग कार्यक्षेत्रों की स्थापना करता है । ऐसा करके उसने समाज में से अनुचित प्रतिस्पर्धा को टाला है । वर्ण का नियम आदमियों की अपनी स्वाभाविक सीमायें तो मानना है, लेकिन वह उनमें ऊंचे और नीचे का भेद नहीं मानता । एक ओर तो वह ऐसी व्यवस्था करता है कि हर एक को उसके परिश्रम का फल अवश्य मिल जाये, और दूसरी ओर वह उसे अपने पड़ोसियों पर भार रूप बनने से रोकता है । यह ऊंचा नियम आज नीचे गिर गया है और निंदा का पात्र बन गया है । लेकिन मेरा विश्वास है कि आदर्श समाज-व्यवस्था का विकास तभी किया जा सकेगा, जब इस नियम के रहस्यों को पूरी तरह समझा जायेगा और उन्हें कार्यान्वित किया जायेगा ।
वर्णाश्रम धर्म बताता है कि दुनिया में मनुष्य का सच्चा लक्ष्य क्या है । उसका जन्म इसलिए नहीं हुआ है कि रोज-रोज ज्यादा पैसा इकट्ठा करने के रास्ते खोजे और जीविका के नये-नये साधनों की खोज करें । उसका जन्म तो इसलिए हुआ है कि वह अपनी शक्ति का प्रत्येक अणु अपने निर्माता को जानने में लगाये । इसलिए वर्णाश्रम-धर्म कहता है । कि अपने शरीर के निर्वाह के लिए मनुष्य अपने पूर्वजों का ही धन्धा करे । बस, वर्णाश्रम धर्म का आशय इतना ही है ।
वर्ण-व्यवस्था में समाज की चौमुखी रचना ही मुझे तो असली, कुदरती और जरूरी चीज दीखती है । बेशुमार जातियों और उपजातियों से कभी-कभी कुछ आसानी हुई होगी, लेकिन इसमें शक नहीं कि ज्यादातर तो जातियों से अड़चन ही पैदा होती है । ऐसी उपजातियों जितनी एक हो जायें उतना ही उसमें समाज का भला है ।
आज तो ब्राम्ह्णों, क्षत्रियों, वैश्यों और शूद्रों के केवल नाम ही रह गये हैं । वर्ण का मैं जो अर्थ करता हूं उसकी दृष्टि से देखें, तो वर्णो का पूरा संकर हो गया है और ऐसी हालत में मैं तो यह चाहता हूं कि सब हिन्दु अपने को स्वेच्छापूर्वक शूद्र कहने लगें । ब्राम्ह्ण-धर्म की सच्चाई को उजागर करने और सच्चे वर्ण-धर्म को पुन: जीवित करने का यही एक रास्ता है ।
जातपांत
जातपांत के बारे में मैनें बहुत बार कहा है कि आज के अर्थ में मैं जात-पांत को नहीं मानता । यह समाज का ‘फालतू अंग’ है और तरक्की के रास्ते में रूकावट जैसा है । इसी तरह आदमी आदमी के बीच ऊंच-नीच का भेद भी मैं नहीं मानता । हम सब पूरी तरह बरार हैं । लेकिन बराबरी आत्मा की है, शरीर की नहीं । इसलिए यह मानसिक अवस्था की बात है । बराबरों की विचार करने की और इसे जोर देकर जाहिर करने की जरूरत पड़ती है, क्योंकि दुनिया में ऊंच-नीच के भारी भेद दिखाई देते हैं । इस बाहर से दीखने वाले ऊंच-नीचपन में से हमें बराबरी पैदा करती है । को भी मनुष्य अपने को दूसरे से ऊंचा मानता है, तो वह ईश्वर और मनुष्य दोनों के सामने पाप करता है । इस तरह जातपांत जिस हद तक दरजे का फर्क जाहिर करती है उस हद तक वह बुरी चीज है ।
लेकिन वर्ण को मैं अवश्य मानता हूं । वर्ण की रचना पीढ़ी-दर-पीढ़ी के धंधों की बुनियाद पर हुई है । मनुष्य के चार धंधे सार्वत्रिक हैं-विद्यामान करना, दुखी को बेचना, खेती तथा व्यापार और शरीर की मेहनत से सेवा इन्हीं को चलाने के लिए चार वर्ण बनाये गये हैं। ये धंधे सारी मानव-जाति के लिए समान हैं, पर हिन्दु धर्म ने उन्हें जीवन-धर्म करार देकर उनका उपयोग समाज के संबंधों और आचार-व्यवहार का नियमन में लाने के लिए किया है । गरूत्वाकर्षण के कानून को हम जानें या न जानें, उसका असर तो हम सभी पर होता है । लेकिन वैज्ञानिकों ने उसके भीतर से ऐसी बातें निकाली हैं, जो दुनिया को चौंकाने वाली हैं । इसी तरह हिन्दु धर्म ने वर्ण-धर्म की तलाश करके और उसका प्रयोग करके दुनिया को चौंकाया है । जब हिन्दु अज्ञान के शिकार हो गये, तब वर्ण के अनुचित उपयोग के कारण अनगिनत जातियां बनीं और रोटी-बेटी व्यवहार के अनावश्यक और हानिकारक बन्धन पैदा हो गये । वर्ण-धर्म का इन पाबन्दियों के साथ कोई नाता नहीं है । अलग-अलग वर्ण के लोग आपस में रोटी-बेटी व्यवहार रख सकते हैं । चरित्र और तन्दुरूस्ती के खातिर ये बंधन जरूरी हो सकते है । लेकिन जो ब्राम्ह्ण शूद्र की लड़की से या शूद्र ब्राम्ह्ण की लड़की से ब्याह करता हैं वह वर्ण-धर्म को नहीं मिटाता ।
अस्पृश्यता की बुराई से खीझकर जाति-व्यवस्था का ही नाश करना उतना ही गलत होगा, जितना कि शरीर में कोई कुरूप वृद्धि हो जाय तो शरीर का या फसल में ज्यादा घास-पात उगा हुआ दिखे तो फसल का ही नाश कर डालना है। इसलिए तो अस्पृश्यता का नाश तो जरूर करना है । सम्पूर्ण जाति-व्यवस्था को बचाना हो तो समाज में बढ़ी हुई इस हानिकारक बुराई को दूर करना ही होगा । अस्पृश्यता जाति-व्यवस्था की उपज नहीं है, बल्कि उस ऊंच-नीच-भेद की भावना का परिणाम है, जो हिन्दु धर्म में घुस गयी है और उसे भीतर-ही-भीतर कुतर रही है । इसलिए अस्पृश्यता के खिलाफ हमारा आक्रमण इस ऊंच-नीच की भावना के खिलाफ ही है । ज्यों ही अस्पृश्यता नष्ट होगी जाति-व्यवस्था स्वयं शुद्ध हो जायेगी । यानी मेरे सपने के अनुसार वह चार वर्णो वाली सच्ची वर्ण-व्यवस्था का रूप ले लेगी । ये चारों वर्ण एक-दूसरे के पूरक और सहायक होंगे, उनमें से कोई किसी से छोटा-बड़ा नहीं होगा; प्रत्येक वर्ण हिन्दु धर्म के शरीर के पोषण के लिए समान रूप से आवश्यक होगा।
आर्थिक दृष्टि से जातिप्रथा का किसी समय बहुत मूल्य था । उसके फलस्वरूप नयी पीढि़यों को उनके परिवारों में चले आये परम्परागत कला-कौशल की शिक्षा सहज ही मिल जाती थी और स्पर्धा का क्षेत्र सीमित बनता था । गरीबी और कंगाली से होने वाली तकलीफ को दूर करने का वह एक उत्तम इलाज थी । और पश्चिम में प्रचलित व्यापारियों के संधों की संस्था के सारे लाभ उसमें भी मिलते थे । यद्यपि यह कहा जा सकता है कि वह साहस और आविष्कार की वृत्ति को बढ़ावा नहीं देती थीं, लेकिन हम जानते है कि वह उनके आड़े भी नहीं आती थी ।
इतिहास की दृष्टि से जातिप्रथा को भारतीय समाज की प्रयोग-शाला में किया गया मनुष्य का ऐसा प्रयोग कहा जा सकता है, जिसका उद्देश्य समाज के विविध वर्गो का पारस्परिक अनुकूलन और संयोजन करना था । यदि हम उसे सफल बना सकें तो दुनिया में आजकल लोभ के कारण जो क्रुर प्रतिस्पर्धा और सामाजिक विघटन होता दिखाई देता है, उसके उत्तम इलाज के रूप में उसे दुनिया को भेंट में दिया जा सकता है ।
अंतर्जातीय विवाह और खान-पान
वर्णाश्रम में अन्तर-जातिय विवाह या खान-पान का निषेध नहीं है, लेकिन इसमें कोई जो-जबरदस्ती भी नहीं हो सकती । व्यक्ित को इस बात का निश्चय करने की पूरी छूट मिलनी चाहिये कि वह कहां शादी करेगा और कहां खायेगा ।
अनुक्रमणिका
- १. मेरे सपनो का भारत
- २. स्वराज्य का अर्थ
- ३. राष्ट्रवाद का सच्चा स्वरूप
- ४. भारतीय लोकतंत्र
- ५. भारत और समाजवाद
- ६. भारत और साम्यवाद
- ७. उद्योगवाद का अभिशाप
- ८. वर्गयुध्द
- ९. हड़ताल
- १०. मज़दूर क्या चुनेंगे?
- ११. अधिकार या कर्तव्य ?
- १२. बेकारी का सवाल
- १३. दरिद्र-नारायण
- १४. शरीर-श्रम
- १५. सर्वोदय
- १६. संरक्षता का सिद्धांत
- १७. अहिंसक अर्थ-व्यवस्था
- १८. सामान वितरण का रास्ता
- १९. भारत में अहिंसा की उपासना
- २०. सर्वोदयी राज्य
- २१. सत्याग्रह और दुराग्रह
- २२. किसान
- २३. गांवों की ओर
- २४. ग्राम-स्वराज्य
- २५. पंचायत राज
- २६. ग्रामोद्योग
- २७. सरकार क्या कर सकती है?
- २८. ग्राम-प्रदर्शनियां
- २९. चरखे का संगीत
- ३०. मिल-उद्योग
- ३१. स्वदेशी
- ३२. गोरक्षा
- ३३. सहकारी गो पालन
- ३४. गांवों की सफाई
- ३५. गांव का आरोग्य
- ३६. गांवों का आहार
- ३७. ग्राम सेवक
- ३८. समग्र ग्राम सेवा
- ३९. युवकों को आह्वान
- ४०. राष्ट्र का आरोग्य, स्वच्छता और आहार
- ४१. शराब और अन्य मादक द्रव्य
- ४२. शहरों की सफाई
- ४३. विदेशी माध्यम की बुराई
- ४४. मेरा अपना अनुभव
- ४५. भारत की सांस्कृतिक विरासत
- ४६. नई तालीम
- ४७. बुनियादी शिक्षा
- ४८. उच्च शिक्षा
- ४९. शिक्षा का आश्रमी आदर्श
- ५०. राष्ट्रभाषा और लिपि
- ५१. प्रान्तीय भाषायें
- ५२. दक्षिण में हिन्दी
- ५३. विद्यार्थियों के लिए अनुशासन के नियम
- ५४. भारतीय स्त्रियों का पुनरूत्थान
- ५५. स्त्रियों की शिक्षा
- ५६. संतति-नियमन
- ५७. काम-विज्ञान की शिक्षा
- ५८ (……..)
- ५९. साम्प्रदायिक एकता
- ६०. वर्णाश्रम धर्म
- ६१. अस्पृश्यता का अभिशाप
- ६२. भारत में धार्मिक सहिष्णुता
- ६३. धर्म – परिवर्तन
- ६४. (…)
- ६५. प्रान्तों का पुनर्गठन
- ६६. अल्पसंख्यकों की समस्यायें
- ६७. भारतीय गवर्नर
- ६८. समाचार-पत्र
- ६९. शान्ति सेना
- ७०. भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस
- ७१. भारत पाकिस्तान और काश्मीर
- ७२. भारत में विदेशी बस्तियां
- ७३. भारत और विश्वशांति
- ७४. पूर्व का संदेश
- ७५. स्फूट वचन
