६१. अस्‍पृश्‍यता का अभिशाप

आजकल हिन्‍दू धर्म में जो अस्‍पृश्‍यता देखने में आती है, वह उसका एक अमिट कलंक है। मैं यह मानने से इनकार करता हूं कि वह हमारे समाज में स्‍मरणातीत काल से चली आयी है। मेरा खयाल है कि अस्‍पृश्‍यता की यह धृणित भावना हम लोगों में तब आयी होगी जब हम अपने पतन की चरम सीमा पर रहे होंगे। और तब से यह बुराई हमारे साथ लग गयी और आज भी लगी हुई है। मैं मानता हूं कि यह एक भयंकर अभिशाप है। और यह अभिशाप जब तक हमारे साथ रहेगा जब तक मुझे लगता है कि इस पावन भूमि में हमें जब जो भी तकलीफ सहना पडे़ वह हमारे इस अपराध का, जिसे हम आज भी कर रहे हैं, उचित दण्‍ड होगी।

मेरी राय में हिन्‍दू धर्म में दिखायी पड़ने वाला अस्‍पृश्‍यता का वर्तमान रूप ईश्‍वर और मनुष्‍य के खिलाफ किया गया भंयकर अपराध है और इसलिए वह एक ऐसा विष है जो धीरे- धीरे हिन्‍दू धर्म के प्राण को ही नि: शेष किये दे रहा है। मेरी राय में शास्‍त्रों में, यदि हम सब शास्‍त्रों को मिलाकर पढ़ें तो, इस बुराई का कहीं कोई समर्थन नहीं है। शास्‍त्रों में एक तरह ही हितकारी अस्‍पृश्‍यता का विधान जरूर है, लेकिन उस तर‍ह की अस्‍पृश्‍यता तो सब धर्मों में पायी जाती है। वह अस्‍पृश्‍यता तो स्‍वच्‍छता के नियम का ही एक अंग है। वह तो सदा रहेगी। लेकिन भारत में हम आज जैसी अस्‍पृश्‍यता देख रहे हैं वह एक भयंकर चीज है और उसके हर एक प्रान्‍त में, यहां तक की हर एक जिले में, अलग- अलग कितने ही रूप हैं। उसने अस्‍पृश्‍यों और स्‍पृश्‍यों, दोनों को नीचे गिराया है। उसने लगभ्‍ाग चार करोड़ मनुष्‍यों का विकास रोक रखा है। उन्‍हें जीवन की सामान्‍य सुविधायें भी नहीं दी जातीं। इसलिए इस बुराई को जितनी जल्‍दी निर्मूल कर दिया जाय, उतना ही हिन्‍दू धर्म, भारत और शायद समग्र मानव- जाति के लिए वह कल्‍याणकारी सिद्ध होगा।

यदि हम भारत की आबादी के पांचवें हिस्‍से को स्‍थायी गुलाम की हालत में रखना चाहते हैं और उन्‍हें जान- बुझकर राष्‍ट्रीय संस्‍कृति के फलों से वंचित रखना चाहते हैं, तो स्‍वरराज्‍य एक अर्थहीन शब्‍द मात्र होगा। आत्‍मशुद्धि के इस महान आन्‍दोंलन में हम भगवान की मदद की आकांक्षा रखते हैं, लेकिन उसकी प्रजा के सबसे ज्‍यादा सुपात्र अंश को हम मानवता के अधिकारों से वंचित रखते हैं। यदि हम स्‍वयं मानवीय दया से शून्‍य हैं, तो उसके सिंहासन के निकट दूसरों की निष्‍ठुरता से मुक्ति पाने की याचना हम नहीं कर सकते।

इस बात से कभी किसी ने इनकार नहीं किया है कि अस्‍पृश्‍यता एक पुरानी प्रथा है। लेकिन यदि वह एक अनिष्‍ट वस्‍तु है, तो उसकी प्राचीनता के आधार पर उसका बचाव नहीं किया जा सकता। यदि अस्‍पृश्‍य लोग आर्यों के समाज के बाहर हैं, तो इसमें उस समाज की ही हानि है। ओर यदि यह कहा जाय कि आर्यों ने अपनी प्रगति-यात्रा में किसी मंजिल पर किसी वर्ग- विशेष को दण्‍ड के तौर पर समाज से बहिष्‍कृत कर दिया था, तो उनके पूर्वजों को किसी भी कारण से दण्डित किया गया हो, परन्‍तु वह दण्‍ड उस वर्ग की सन्‍तान को देते रहने का कोई कारण नहीं हो सकता। अस्‍पृश्‍य लोग भी आपस में अस्‍पृश्‍यता का जो पालन करते हैं, उससे इतना सिद्ध होता है कि किसी अनिष्‍ट वस्‍तु को सीमित नहीं रखा जा सकता और उसका धातक प्रभाव सर्वत्र फैल जाता है। अस्‍पृश्‍यों में भी अस्‍पृश्‍यता का होना इस बात के लिए एक अतिरक्‍त कारण है कि सुसंस्‍कृत हिन्‍दू समाज को इस अभिशाप से जल्‍दी- से- जल्‍दी मुक्‍त हो जाना चाहिये। यदि अस्‍पृश्‍यों को अस्‍पश्‍य इसलिए माना जाता है कि वे जानवरों को मारता हैं और मांस, रक्‍त , हड्डियां और मैला आदि छूते हैं, तब तो हर एक नर्स और डॉक्‍टर को भी अस्‍पृश्‍य माना जाना चाहिये; और इसी तरह मुसलमानों, ईसाइयों और तथाकठित ऊंचे वर्गों के उन हिन्‍दुओं को भी अस्‍पृश्‍य माना जाना चाहिये, जो आहार अथवा बलि के लिए जानवरों की हत्‍या करते हैं। कसाईखाने, शराब की दुकानें, वेश्‍यालय आदि बस्‍ती से अलग होते हैं या होने चाहिये, इसलिए अस्‍पृश्‍यों को भी समाज से दूर और अलग रखा जाना चाहिये- यह दलील अस्‍पृश्‍यों के खिलाफ लोगों के मन में चले आ रहे उत्‍कट पूर्वाग्रह को ही बताती है। कसाईखाने और ताडी़- शराब की दुकानें आदि जरूर बस्‍ती से दूर और अलग होते हैं और होने चाहिये। लेकिन कसाइयों और ताडी़ अथवा शराब के विक्रेताओं को शेष समाज से अलग नहीं रखा जाता।

हम आन्‍तरिक प्रलोभनों तथा मोह में लिप्‍त हैं और अत्‍यंत अस्‍पृश्‍य और पापपूर्ण विचारों के प्रवाह हमारे मन में चलते हैं और उसे कलुषित करते हैं। हमें समझना चाहिये कि हमारी कसौटी हो रही है। ऐसी स्थिति में हम अभिमान के आवेश में अपने उन भाइयों के स्‍पर्श के प्रभाव के बारे में, जिन्‍हें हम अक्‍सर अज्ञानवश और ज्‍यादातर तो दुरभियान के कारण अपने से नीचा समझते हैं, अत्‍युक्ति न करें। भगवान के दरबार में हमारी अच्‍छाई- बुराई का निर्णय इस बात से नहीं किया जायेगा कि हम क्‍या खाते- पीते रहे हैं या कि हमें किस- किसने छुआ है; उसका निर्णय तो इस आधार पर किया जायेगा कि हमने किन- किन की सेवा की है ओर किस तर‍ह की है। यदि हमने एक भी दीन- दुखी आदमी की सेवाकी होगी, तो हमें भगवान की कृपा दृष्टि प्राप्‍त होगी।… अमुक वस्‍तुएं न खाने की बात का उपयोग हम कपट- जाल, पाखण्‍ड और उससे भी अधिक पापपूर्ण कार्यो को छिपाने के लिए नहीं कर सकते। इस आश्‍ांका से कि कहीं उनका स्‍पर्श हमारी आध्‍यामिक उन्‍नति में बाधक न हो, हम किसी पतित अथवा गंदी रहन- सहन वाले भाई- बहन की सेवा से इनकार नहीं कर सकते।

भंगी

जिस समाज में भंगी का अलग पेशा माना गया है। वहां कोई बडा़ दोष पैठ गया है, ऐसा मुझे तो बरसों से लगता रहा है। इस जरूरी और तन्‍दुरूस्‍ती बढा़ने वाले काम को सबसे नीच काम पहले- पहल किसने माना, इसका इतिहास हमारे पास नहीं है। जिसने भी माना उसने हम पर उपकार तो नहीं ही किया। हम सब भंगी हैं, यह भावना हमारे मन में बचपन से ही जम जानी चाहिये; और उसका सबसे आसान तरीका यह है कि जो समझ गये हैं वे जात- मेहनतका आरम्‍भ पखाना- सफाई से करें। जो समझ- बूझकर ज्ञानपूर्वक यह कहेगा, वह उसी क्षण से धर्म को निराले ढंग से और सही तरीके से समझने लगेगा।
1. प्रारम्‍भ में अस्‍पृ श्‍यता स्‍वच्‍छता के नियमों में से एक थी और भारत के बाहर दुनिया के कई हिस्‍सों में आज भी उसका यही रूप है। वह नियम यह है कि चीज गंदी हो गयी हो या आदमी किसी कारण गंदा हो गया हो तो उसे छूना नहीं चाहिये, लेकिन ज्‍यों ही उसका गंदापन दूर हो जाय या कर दिया जाय त्‍यों ही उसे छू सकते हैं। इसलिए भंगी काम करने वाले व्‍यक्ति – फिर चाहे वह भंगी हो जिये कि उस काम का पैसा मिलता है या मां हो जिसे अपने इस काम का कोई पैसा नहीं मिलता- तब तक गंदे और अस्‍पृश्‍य माने जायेंगे, जब तक वे नहा- धोकर इस गंदगी को दूर नहीं कर देते। इसलिए भंगी हमेशा के लिए अस्‍पृश्‍य न माना जाय, बल्कि उसे हमअपना भाई मानें। वह समाज की एक ऐसी सेवा करता है, जिसमें उसका शरीर गंदा हो जाता है; हमें चाहिये कि हम उसे इस गंदगी को साफ करने का साफ करने का मौका दें, बल्कि उस कार्य में उसकी सहायता करें और फिर उसे समाज के किसी भी सदस्‍य की तरह स्‍वीकार करें।

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