६२. भारत में धार्मिक सहिष्‍णुता

हिन्‍दु धर्म

मैं जितने धर्मों को जानता हूं उन सब में हिन्‍दू धर्म सबसे अधिक सहिष्‍णु है। इसमें कटटरताका जो अभाव है वह मुझे बहुत पसंद आता है क्‍योकि इसमें उसके अनुयायी को आत्‍मा भविष्‍य के लिए अधिक-से – अधिक अवसर मिलता है हिन्‍दू धर्म एकांगी धर्म न होने के कारण उसके अनुयायी न सिर्फ अन्‍य सब धर्मों का आदर कर सकते है परन्‍न्तु दूसरे धर्मों में जो कुछ अच्‍छाई हो सकती है प्रशंशा भी कर सकते हैं। और उसे हतब भी कर सकते है। अहिंसा सब धर्मों में समान है परन्‍तु हिन्‍दु धर्म में वह सर्वोच्‍च्‍ा रूप में प्रगट हुई है उसका प्रयोग भी हुआ है। ( मैं जैन धर्म या बौद्व धर्म को हिन्‍दू धर्म से अलग नहीं मानता। ) हिन्‍दू धर्म न केवल मनुष्‍य मात्र की बल्कि प्राणीमात्र की एकता में विश्‍वास रखता है। मेरी राय में गाय की पूजा करके उसने दयाधर्म के विकास में अदभूत सहायता की है। यह प्राणीमात्र की एकता में और इसलिए पवित्रता में विश्‍वास रखने का व्‍यावहारिक प्रयोग है। पुनर्जन्‍म की महान धारणा इस विश्‍वास का सीधा परिणाम है। अन्‍त में वर्णा श्रम धर्म का आविष्‍कार सत्‍य की निरन्‍तर शोध का भ्‍ाव्‍य परिणाम है।

बौद्ध धर्म
मेरा दृढ़ मत है बौद्ध धर्म या बुद्ध की शिक्षा का पूरा परिणत विकास भारत
में ही हुआ ; इससे भिन्‍न कुछ हो भी नहीं सकता था, क्‍योंकि गौतम स्‍वयं एक श्रेष्‍ठ हिन्‍दू ही तो थे। वे हिन्‍दू धर्म में जो कुछ उत्‍तम है उससे ओतप्रोत थे और उन्‍होंने अपना जीवन कतिपय ऐसी शिक्षाओं की शोध और प्रसार के लिए दिया, जो वेदों में छिपी पडी़ थीं और जिन्‍हें समय की काई ने ढक दिया था ।…. बुद्ध ने हिन्‍दू धर्म का कभी त्‍याग नहीं किया; उन्‍होंने तो इसके आधार का विस्‍तार किया। उन्‍होंने उसे नया जीवन और नया अर्थ दिया ।

बेशक, उन्‍होंने इस धारणा को अस्‍वीकार कर दिया था कि ईश्‍वर नामधारी कोई प्राणी द्धे ष वश काम करता है, अपने कर्मों पर पश्‍चात्‍ताप कर सकता है, पार्थिव राजाओं की तरह वह भी प्रलोभनों और रिश्‍वतों में फंस सकता है और उसका कृपा पात्र बना जा सकता है। उनकी सारी आत्‍मा ने इस विश्‍वास के विरूध प्रबल विद्रोह किया था । कि ईश्‍वर नामधारी प्राणी को अपने ही पैदा किये हुए जीवित प्राणियों का ताजा खून अच्‍छा लगता है और इससे वह प्रशन्‍न होता है। इसलिए बुद्ध ने ईश्‍वर को फिर से उसके उचित स्‍थान पर बैठा दिया और जिस अनधिकारी ने उस सिंहासन को हस्‍तगत कर लिया था उसे पदाभ्रष्‍ट कर दिया। उन्‍होंने जोर देकर पुन: इस बात की घोषणा की कि इस विश्‍व का नैतिक शासन शाश्‍वत हैऔर अपरिवर्तनीय है। उन्‍होंने नि: संकोच यह कहा कि नियम ही ईश्‍वर है।

ईसाई धर्म
मैं यह नहीं मान सकता कि केवल ईसा में ही देवांश था। उनमें उतना ही दिव्‍यांश था जितना कृष्‍ण, राम,मुहम्‍मद या जरथुस्‍त्र में था । इसी तरह जैसे मैं वेदों या कुरान के प्रत्‍येक शब्‍द को ईश्‍वर – प्रेरित नहीं मानता, वैसे ही बाइबल के प्रत्‍येक शब्‍द को भी ईश्‍वर – प्रेरित नहीं मानता। बेशक, इन पुस्‍तकों की समस्‍त वाणी ईश्‍वर- प्रेरित है, परन्‍तु अलग- अलग वस्‍तुओं को देखने पर उनमें से अनेंकों में मुझे ईश्‍वर – प्रेरण नहीं मिलती। मेरे लिए बाइबल उतनी ही आदरणीय धर्म – पुस्‍तक है, जितनी गीता और कुरान है।

यह मेरी पक्‍की राय है कि आज का यूरोप न तो ईश्‍वर की भावना का प्रतिनिधी है, न ईसाई धर्म की भावना का ,बल्कि शैतान कि भावना का प्रतिक है। और शैतान की सफलता तब सब से अधिक होती है जब वह अपनी जबान पर खुदा का नाम लेकर सामने आता है। यूरोप आज नाममात्र को ही ईसाई है। वह सचमुच धन की पूजा कर रहा है। ‘उंट के लिए सुई की नोक में होकर निकलना आसान है, मगर किसी धनवान का स्‍वर्ग में जाना मुश्‍किल है। ईसा मसीह ने यह बात ठीक ही कही थी। उनके तथाकथित अनुयायी अपने नैतिक प्रगति को अपनी धन- दौलत से ही नापते है।

इस्‍लाम
अवश्‍य ही मैं इस्‍लाम को उसी अर्थ में शान्ति का धर्म मानता हूं, जिस अर्थ में इसाई , बौद्ध और हिन्‍दू धर्म शान्ति के धर्म हैं। बेशक, मात्रा का फर्क है, परन्‍तु इन सब धर्मों का उददेश्‍य शान्ति ही है।भारत की राष्‍ट्रीय संस्‍कृति के लिए इस्‍लाम की विशेष देन तो यह है कि वह एक ईश्‍वर में शुद्ध विश्‍वास रखता है और जो लोग उसके दायरे के भीतर हैं उनके लिए व्‍यवहार में वह मानव – भ्रातृत्‍व के सत्‍य को लागू करता है। इन्‍हें मैं इस्‍लाम की दो विशेष देने मानता हूं , क्‍योंकि हिन्‍दू धर्म में भ्रातृत्‍व बहुत अधिक दार्शनिक बन गया है। इसी तरह दार्शनिक हिन्‍दू धर्म में ईश्‍वर के सीवा और कोई देवता नहीं है, फिर भी इससे इंनकार नहीं किया जा सकता कि व्‍यवहारिक हिन्‍दू धर्म इस मामले में इनता कटटर और दृढ़ आग्रह नहीं रखता जितना इस्‍लाम रखता है।

मैं इसी आशा नहीं करता हूं कि मेरे सपनों के आदर्श भारत में केवल एक ही धर्म रहेगा, यानी वह संपूर्णत: हिन्‍दू या ईसाई या मुसलमान बन जायेगा । मैं तो यह चाहता हूं कि वह पूर्णत:उदार और सहिष्‍णु बने और उसके सब धर्म साथ- साथ चलते रहें।

मूर्तिपूजा

हम सब मूर्तिपूजा हैं। अपने आध्‍यात्मिक विकास के लिए और ईश्‍वर में अपने विश्‍वास को दृढ़ करने के लिए हमें मन्दिरों, मसजिदों , गिरजाघरों आदि की जरूरत महसूस होती है। अपने मन में ईश्‍वर के प्रति भक्तिभाव प्रेरित करने के लिए लोगों को पत्‍थर या धातु की मूर्तियों चाहिये, कुछ को वैदी चाहिये, तो कुछ को किताब या तस्‍वीर चाहिये ।

मंदिर, मसजिद या गिरजाघर….. ईश्‍वर के इन विभिन्‍न निवास- स्‍थानों में मैं कोई फर्क नहीं करता । मनुष्‍य की श्रद्धा ने उनका निर्माण किया है और उसने उन्‍हें जो माना है वही वे हैं। वे मनुष्‍य की किसी तरह ‘अदृश्‍य शक्ति ‘ तक पहुचने की आकांशा के परिणाम है ।

मेरे खयाल से मूर्ति- पूजक और मूर्ति- भंजक शब्‍दों का जो सच्‍चा अर्थ है उस अर्थ में मैं दोनों ही हूं। मैं मूर्ति पूजा की भावना की कद्र करता हूं। इसका मानव जाति के उत्‍थान में अत्‍यंत महत्‍वपूर्ण भा्ग रहता है। और मैं चाहूंगा कि मुझमें हमारे देशको पवित्र करने वाले हजारों पावन देवालयों की रक्षा पने प्राणों की बाजी लगाकर भी करने का सामर्थ्‍य हो।….. मैं मूर्ति – भंजक इस अर्थ में हूं कि कटटरता के रूप में मूर्ति – पूजा का जो सूक्ष्‍म रूप प्रचलित है उसे मैं तोड़ता हूं । ऐसी कटटरता रखेने वाले को अपने ही ढंग के शिवा और किसी भी रूप में ईश्‍वर की पूजा करने में कोई अच्‍छाई नजर नहीं आती । मूर्ति पूजा का यह रूप अधिक सूक्ष्‍म होने के कारण पूजा के उस ठोस और स्‍थल रूप से अधिक घातक जिसमें ईश्‍वर को पत्‍थर के एक छोटे से टुकडें के साथ सोने की मूर्ति के साथ एक समझ लिया जाता है।

जब हम किसी पुस्‍तक को पवित्र समझकर उसका आदर करते है, तो हम मूर्ति की पूजा ही करते है । पवित्रता या पूजा के भाव से मंदिरों या मसजिदों में जाने का भी वही अर्थ है। लेकर इन सब बातों में मुझें कोई हानि नहीं दिखाई देती । उलटे , मनुष्‍य की बुद्धि सीमित है , इसलिए वह और कुछ कर ही नहीं सकता । ऐसी हालत में वृक्षपूजा में कोई मौलिक बुराइ या हानि दिखाई देने की बजाय मुझे तो इसमें एक गहरी भावना और काव्‍यमद सौंदर्य ही दिखाई देती है। वह समस्‍त वनस्‍पति – जगत के लिए सच्‍चे पूजा भाव का प्रतिक है। वनस्‍पति – जगत तो सुन्‍दर रूपों और आकृतियों का अनन्‍त भंडार है; उनके द्धारा वह मानव असंख्‍य जिहृओं से ईश्‍वर की महानता और गौरव की घोषणा करता है । वनस्‍पति के बिना इस पृथ्‍वी पर जीवधारी एक क्षण के लिए भी नहीं रह सकते । इसलिए वैसे देश में , जहां खास तौर पर पेडों की कमी है, वृक्ष पूजा का एक गहरा आर्थिक महत्‍व हो जाता है।

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मेरे सपनों का भारत (कापीराइट नवजीवन ट्रस्ट, अहमदाबाद)