६६. अल्‍पसंख्‍यकों की समस्‍यायें

अगर हिन्‍दू लोग विविध जातियों के बीच एकता चाहते हैं, तो उनमें अल्‍पसंख्‍यक जातियों का विश्‍वास करने की हिम्‍मत होनी चाहिये। किसी भी दूसरी बुनियाद पर आधारित मेल सच्‍चा मेल नहीं होगा। करोड़ों सामान्‍य जन न तो विधान- सभा के सदस्‍य होना चा‍हते हैं और न म्‍युनिसिपल कौंसिलर बनना चाहते हैं। और यदि हम सत्‍याग्रह का सही उपयोग करना सीख गये हैं, तो हमें जानना चाहिये कि उसका उपयोग किसी भी अन्‍यायी शासक के खिलाप- वह हिन्‍दू, मुसलमान या अन्‍य किसी भी कौम का हो- किया जा सकता है और किया जाना चाहिये। इसी तरह न्‍यायी शासक या प्रतिनिधि हमेशा और समान रूप से अच्‍छा होता है, फिर वह हिन्‍दू हो या मुसलमान। हमें साम्‍प्रदायिक भावना छोड़नी चाहिये। इसलिए इस प्रयत्‍न में बहुसंख्‍यक समाज को पहल करके अल्‍पसंख्‍यक जातियों में अपनी ईमानदारी के विषय में विश्‍वास पैदा करना चाहिये। मेल और समझौता तभी हो सकता है जब कि ज्‍यादा बलवान पक्ष दूसरे पक्ष के जवाब की राह देखे बिना सही दिशा में बढ़ना शुरू कर दें।

जहां तक सरकारी महकमों में नौकरियों का सवाल है, मेरी राय है कि यदि हम साम्‍प्रदायिक भावना को यहां भी दाखिल करेंगे, तो यह चीज सुशासन के लिए घातक सिद्ध होगी। शासन सुचारू रूप से चले, इसके लिए यह जरूरी है कि वह सबसे योग्‍य आदमियों के हाथ में रहे। उसमें किसी तरह का पक्षपात तो होना ही नहीं चाहिये। अगर हमें पांच इंजीनियरों की जरूरत हो तो ऐसा नहीं होना चाहियेकि हम हर एक जाति से एक- एक लें; हमें तो पांच सबसे सुयोग्‍य इंजीनियर चुन लेने चाहिये, भले वे सब मुसलमान हों या पारसी हों। सबसे निचले दरजें की जगहें, यदि जरूरी मालूम हों तो, परीक्षा के जरिये भरी जायं और यह परीक्षा किसी ऐसी समि‍ति की निगरानी में हो जिसमें विविध जातियों के लोग हों। लेकिन नौकरियों का यह बंटवारा विविध जातियों की संख्‍या के अनुपात में नहीं होना चाहिये। राष्‍ट्रीय सरकार बनेगी तब शिक्षा में पिछड़ी हुई जातियों को शिक्षा के मामले में जरूर दूसरों की अपेक्षा विशेष सुविधायें पाने का अधिकार होगा। ऐसी व्‍यवस्‍था करना कठिन नहीं होगा। लेकिन जो लोग देश के शासन- पंत्र में बड़े- बड़े पदों को पाने की आकांक्षा रखते हैं, उन्‍हें उसके लिए जरूरी परीक्षा अवश्‍य पास करनी चाहिये।

स्‍वतंत्र भारत साम्‍प्रदायिक प्रतिनिधित्‍व की प्रथा को कोई प्रश्रय नहीं दे सकता। लेकिन यदि अल्‍पसंख्‍यकों पर जोर- जबरदस्‍ती नहीं करना है, तो उसे सब जातियों को पूरा संतोष देना पड़ेगा।

हिन्‍दुस्‍तान उन सब लोगों का है, जो यहां पैदा हुए हैं और पले हैं और दूसरे किसी देश का आसरा नहीं ताक सकते। इसलिए वह जितना हिन्‍दुओं का है उतना ही पारसियों, बेनी इजरायलों, हिन्‍दुस्‍तानी ईसाइयों, मुसलमानों और दीगर गैर- हिन्‍दुओं का भी है। आजाद हिन्‍दुस्‍तान में राज्‍य हिन्‍दूओं का न‍हीं, बल्कि हिन्‍दुतानियों का होगा; और उसका आधार किसी धार्मिक पंथ या सम्‍प्रदाय के बहुमत पर नहीं, बल्कि बिना किसी धार्मिक भेदभाव के समूचे राष्‍ट्र के प्रतिनिधियों पर होगा। मैं एक ऐसे मिश्र बहुमत की कल्‍पना कर सकता हूं, जो हिन्‍दुओं को अल्‍पतम बना दे। स्‍वतंत्र हिन्‍दुस्‍तान में लोग अपनी सेवा और योग्‍यता के आधार पर ही चुने जायेंगे। धर्म ऐ निजी विषय है, जसका राजनीति में कोई स्‍थान नहीं होना चाहिये। विदेशी हुकूमत की वजह से देश में जो अस्‍वाभाविक परिस्थिति पाई जाती है, उसी की बदौलत हमारे यहां धर्म के अनुसार इतने बनावटी फिरके बन गये हैं। जब इस देश से विदेशी हुकूमत उठ जायेगी, तो हम इन झूठे नारों और आदर्शों से चिपके रहने की अपनी इस बेवकूफी पर खुद ही हँसेंगे।

अपने धर्म पर मेरा अटूट विश्‍वास है। मैं उसके लिए अपने प्राण दे सकता हूं। लेकिन वह मेरा निजी मामला है। राज्‍य को उससे कुछ लेना-देना नहीं है। राज्‍य हमारे लौकिक कल्‍याण की स्‍वाथ्‍य, आवामन, विदेशों से सम्‍बंध, करेंसी(मुद्रा) आदि की देखभाल करेगा, लेकिन हमारे या तुम्‍हारे धर्म की नहीं। धर्म हर एक का निजी मामला है।

एंग्‍लो- इंण्डियन समाज और विदेशी लोग

सब विदेशियों को यहां रहने और बसने की पूरी आजादी है, बशर्ते कि वे अपने को इस देश की जनता से अभिन्‍न समझें। जो विदेशी यहां अपने अधिकारों के लिए विशेष संरक्षण चाहतें हों, उन्‍हें भारत आश्रय नहीं दे सकता। अधिकारों के लिए संरक्षण मांगने का अर्थ यह होगा कि वे यहां ऊंचे दरजे के आदमियों की तरह रहना चाहते हैं। लेकिन उन्‍हें ऐसा नहीं करने दिया जा सकता, क्‍योंकि उससे संघर्ष पैदा होगा।

अगर एक यूरोपियन ऐसा कर सकता है, तो एंग्‍लो-इण्डियन और वे दूसरे लोग तो और भी ऐसा कर सकते हैं, जिन्‍होंने यूरोपियन आचार-व्‍यवहार और रीति- रिवाज महज इसलिए अपनाये हैं कि विदेशी सरकार से अच्‍छे व्‍यवहार की मांग करने वाले यूरोपियनों में उनकी गिनती हो सके। अगर ऐसे लोग यह उम्‍मीद रखें कि अब तक जो खास सहूलियतें उन्‍हें मिलती रही हैं वेसी आगे भी मिलती रहें, तो उन्‍हें परेशानी ही होगी। उन्‍हें तो इस बात के लिए अपने को धन्‍य समझना चाहिये कि जिन ,खास सहूलियतों को भोगने का उन्‍हें किसी भी तर्कसम्‍मत कानून से कोई हक नहीं था, और जो उनकी इज्‍जत को बट्टा लगाने वाली थीं, उनका बोझ उनके सिर से उतर जायेगा।

एंग्‍लो- इंडियन के राजनीतिक अधिकारों को कोई खतरा नहीं है। उसे अपनी सामाजिक स्थिति की चिन्‍ता है, जो कि फिलहाल अस्तित्‍व में ही नहीं है। उसे एक ओर तो इस बात पर बहुत गुस्‍सा आता है कि उसकी मां या तो उसके पिता भारतीय थे और दूसरी ओर यूरोपियन लोग उसे अपने समाज में स्‍वीकार नहीं करते। इस तरह उसकी स्थिति कुएं और खाई के बीच खड़े रहने जैसी है। मुझे उससे अक्‍सर मिलने का मौका आता है। यूरोपियनों की तरह रहने और यूरोपियन दिखने की कोशि श में उसे अपने साधनों की सीमा से ज्‍यादा खर्चीला जीवन बिताना पड़ता है और उसका नतीजा यह है कि वह नैतिक और आर्थिक दृष्‍िट से बिलकुल कमजोर हो गया है। मैंने उसे समझाया है कि उसे चुनाव कर लेना चाहिये और अपना भाग्‍य भारत की विशाल जनता के साथ जोड़ देना चाहिये। अगर इन लोगों में इस अत्‍यंत सीधी और स्‍वाभाविक स्थिति को समझने और स्‍वीकार करने का साहस और दूरदर्शिता होगी, तो वे न सिर्फ अपान बल्कि भारत का भी भला करेंगे ओर अपनी मौजूदा अपमानजनक स्थिति से भी अपना उद्धार कर सकेंगे। बेजुबान एंग्‍लो-इण्डियन के सामने सबसे बडा़ सवाल अपनी सामाजिक स्थिति का निर्णय करने का है। ज्‍यों ही वह अपने को भररतीय समझने और मानने लगेगा और एक भारतीय की ही तरह रहने लगेगा, त्‍यों ही वह महसूस करेगा कि वह सुरक्षित है।

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