७२. भारत में विदेशी बस्तियां

गोआ

आजाद हिन्‍दुस्‍तान में गोआ हिन्‍दुस्‍तान से बिलकुल अलग रहकर अपनी मनमानी नहीं कर सकेगा। गोआवाले आजाद हिन्‍दुस्‍तान की नागरिकता के हकों का दावा कर सकेंगे और वे उन हकों को पा भी सकेंगे। और इसके लिए उन्‍हें न तो एक गोली चलानी होगी और न एक कतरा खून बहाना होगा।

सचमुच ही फ्रांसीसी और फिंरगी सल्‍तनत में ऐसा कोई खास फर्क नहीं है, जिसकी वजह से एक को ठुकराया जाय और दूसरी को अपनाया जाय। सल्‍तनतों के हाथ हमेशा खून से तर रहे है। अच्‍छा हो कि ये साम्राज्‍यवादी ताकतें जल्‍दी ही अशोक महान की तरह अपने साम्राज्‍यवाद को छोंड़ दें।… पुर्तगाली सरकार के इन्‍फरमेशन ब्‍यूरो के मुख्‍य अफसर का यह लिखना कि पुर्तगाल गोआ के हिन्‍दुस्‍तानियों की मातृभूमि है, एक हंसी लाने वाली चीज है। जिस हद तक हिन्‍दुस्‍तान मेरी मातृभूमि है, उसी हद तक वह गोआवालों की भी मातृभूमि है। आज गोआ ब्रिटिश हिन्‍दुस्‍तान की हद में नहीं है, मगर समूचे भौगोलिक हिन्‍दुस्‍तान के अन्‍दर तो वह है ही। फिर, गोआ के हिन्‍दुस्‍तानियों और पुर्तगालियों के बीच बहुत थोडी़ समानता है- अगर कुछ हो।

फ्रांसीसी बस्तियां

उन्‍हीं के सामने जब उनके करोडो़ देशवासी ब्रिटिश हुकूमत से आजाद हो रहे हैं, तब इन छोटी- छोटी विदेशी बस्तियों के निवासियों के लिए गुलामी में रहन सम्‍भव नहीं है।… मैं उम्‍मीद करता हूं कि… महान फ्रांसीसी राष्‍ट्र भारत के या दूसरी जगहों के काले या भूरे लोगों को दबाकर रखने की नीति का हामी कभी नहीं होगा।

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"मेरे सपनों का भारत" विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में महात्मा गांधी द्वारा लिखे गए लेखों का संकलन है। इस पुस्तक को आनलाइन लाने का उद्देश्य नई पीढ़ी को महात्मा गांधी के विचारों से अवगत कराना है।
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मेरे सपनों का भारत (कापीराइट नवजीवन ट्रस्ट, अहमदाबाद)