७. उद्योगवाद का अभिशाप
दुनिया में ऐसे विवेकी पुरूषों की संख्या लगातार बढ़ रही है, जो इस सभ्यता को-जिसके एक छोर पर तो भौतिक समृद्धि की कभी तृप्त न होने वाली आकांक्षा है और दूसरे छोर पर उसके फलस्वरूप पैदा होन वाला युद्ध है-अविश्वास की निगाह से देखते हैं । लेकिन यह सभ्यता अच्छी हो या बुरी, भारत का पश्चिम जैसा उद्योगीकरण करने की क्या जरूरत है ? पश्चिमी सभ्यता शहरी सभ्यता है । इग्लैंड और इटली जैसे छोटे देश अपनी व्यवस्थाओं का शहरीकरण कर सकते हैं । अमेरिका बड़ा देश है, किन्तु उसकी आबादी बहुत विरल है । इसलिए उसे भी शायद वैसा ही करना पड़ेगा । लेकिन कोई भी आदमी यदि सोचेगा तो यह मानेगा कि भारत जैसे बड़े देश को, जिसकी आबादी बहुत ज्यादा बड़ी है और ग्राम-जीवन की ऐसी पुरानी परम्परा में पोषित हुई है जो उसकी आवश्कताओं को बराबर पूरा करती आयी है, पश्चिमी नमूने की नकल करने की कोई जरूरत नहीं है और न ही उसे ऐसी नकल करनी चाहिये । विशेष परिस्थितियों वाले किसी एक देश के लिए जो बात अच्छी है वह भिन्न परिस्थतियों वाले किसी दूसरे देश के लिए भी अच्छी ही हो, यह जरूरी नहीं हैं । जो चीज किसी एक आदमी के लिए पोषक का काम देती हो, वही दूसरे के लिए जहर जैसी सिद्ध होती है । किसी देश की संस्कृति को निर्धारित करने में उसके प्राकृतिक भूगोल का प्रमुख हिस्सा होता है । ध्रुव-प्रदेश के निवासी के लिए ऊनी कोट जरूरी हो सकता है़, लेकिन भूमध्य-रेखावर्ती प्रदेशों के निवासियों का तो उससे दम ही घुट जायेगा ।
मेरा स्पष्ट मत है और मैं उसे साफ-साफ कहता हूं कि बड़े पैमाने पर होने वाला सामूहिक उत्पादन ही दुनिया की मौजूदा संकटमय स्थिति के लिए जिम्मेदार है । एक क्षण के लिए मान भी लिया जाय कि यंत्र मानव-समाज की सारी आवश्यकताओं पूरी कर सकते हैं, तो भी उसका यह परिणाम तो होगा ही कि उत्पादन कुछ विशिष्ट क्षेत्रों में केन्द्रित हो जायेगा और इसलिए वितरण की योजना के लिए हमें द्राविड़ी प्राणायाम करना पड़ेगा । दूसरी ओर यदि जिन क्षेत्रों में वस्तुओं की आवश्यकता है वहीं उनका उत्पादन हो और वहीं वितरण हो, तो वितरण की नियंत्रण अपने-आप हो जाता है । उसमें धोखाधड़ी के लिए कम गुंजाइश होती है और सट्टे के लिए तो बिल्कुल नहीं ।
यह तो आप देखते ही है कि ये राष्ट्र (यूरोप और अमेरिका) दुनिया की तथाकथित कमजोर या असंगठित जातियों का शोषण करते हैं । यदि एक बार इन जातियों को इस चीज का प्राथमिकत ज्ञान हो जाय और वे इस बात का निश्चय कर लें कि अब अपना शोषण नहीं होने देंगी, तो फिर वे जो कुछ खुद पैदा कर सकती हैं उतने से ही संतोष कर लेगीं, ऐसा हो तो जहां तक मुख्य आवश्यकताओं का सम्बन्ध है सामूहिक उत्पादन मिट जायेगा ।
जब उत्पादन और उपभोग दोनों किसी सीमित क्षेत्र में होते हैं, तो उत्पादन को अनश्चित हद तक और किसी भी मूल्य पर बढ़ाने का लोभ फिर नहीं रह जाता । उस हालत में हमारी मौजूदा अर्थ-व्यवस्था से जो कठिनाइयां और समस्यायें पैदा होती हैं वे भी नहीं रह जायेंगी ।
यंत्रों का भी स्थान है । और यंत्रों ने अपना स्थान प्राप्त भी कर लिया हैं । लेकिन मनुष्यों के लिए जिस प्रकार की मेहनत करना अनिवार्य होना चाहिये, उसी प्रकार की मेहनत का स्थान उन्हें ग्रहण न कर लेना चाहिये । घर में चलाने लायक यंत्रों में सुधार किये जायं, तो मैं उसका स्वागत करूंगा । लेकिन मैं यह भी समझता हूं कि जब तक लाखों किसानों को उनके घर में कोई दूसरा धंधा करने के लिए न दिया जाय, तब तक हाथ-मेहनत से चरखा चलाने के बदले किसी दूसरी शक्ति से कपड़े का कारखाना चलाना गुनाह है ।
यंत्रों की ऊपरी विजय से चमत्कृत होने से मैं इनकार करता हूं । और मारक यंत्रों के में एकदम खिलाफ हूं; उसमें मैं किसी तरह का समझौता स्वीकार नहीं कर सकता । लेकिन ऐसे सादे औजारों, साधनों या यंत्रों का, जो व्यक्ति की मेहनत को बचायें और झोंपडि़यों में रहने वाले लाखों-करोड़ों लोगों का बोझ कम करें, मैं जरूर स्वागत करूंगा ।
हिन्दुस्तान के सात लाख गांवों में फैले हुए ग्रामवासी-रूपर करोड़ों जीवित यंत्रों के विरूद्ध इन जड़ यंत्रों को प्रतिद्वंद्विता में नहीं लाना चाहिये । यंत्रों का सदुपयोग तो यह कहा जायेगा कि उससे मनुष्य के प्रयत्न को सहारा मिले और उसे वह आसान बना दे । यंत्रों के मौजूदा उपयोग का झुकाव तो इस ओर ही बढ़ता जा रहा है कि कुछ इने-गिने लोगों के हाथ में खूब संपत्ति पहुंचाई जाय और भी परवाह न की जाय ।
बड़े पैमाने पर उद्योगीकरण का अनिवार्य परिणाम यह होगा कि ज्यों-ज्यों प्रतिस्पर्धा और बाजार की समस्यायें खड़ी होगी त्यों-त्यों गांवों का प्रगट या अप्रगट शोषण होगा । इसलिए हमें अपनी सारी शक्ति इसी प्रयन्त पर केन्द्रित करनी चाहिये कि गांव स्वयं पूर्ण बनें और वस्तुओं का निर्माण और उत्पादन तो फिर गांव वाले ऐसे आधुनिक यंत्रों और औजारों का, जिन्हें वे बना सकते हों और जिनका उपयोग उन्हें आर्थिक दृष्टि से पुसा सकता हो, उपयोग खुशी से करें । उस पर आपत्ति नहीं की जा सकती । अलबत्ता, उनका उपयोग दूसरों का शोषण करने के लिए नहीं होना चाहिये ।
मैं नहीं मानता कि उद्योगीकरण हर हालत में किसी भी देश के लिए जरूरी ही है । भारत के लिए तो वह उससे भी कम जरूरी है । मेरा विश्वास है कि आजाद भारत दु:ख से कराहती हुई दुनिया के प्रति अपने कर्तव्य का ऋण अपने गांवों का विकास करके और दुनिया के साथ मित्रता का व्यवहार करके और इस तरह सादा परन्तु उदात्त जीवन अपनाकर ही चुका सकता है । धन की पूजा ने है, उसके साथ ‘उच्च चिन्तन’ का मेल नहीं बैठता । जीवन का सम्पूर्ण सौन्दर्य तभी खिल सकता है जब हम उच्च कोटि का जीवन जीना सीखें ।
खतरों वाला जीवन जीने रोमांच और उत्तेजना का अनुभव हो सकता है । पर खतरों का सामना करने हुए जीने में और खतरों वाला जीवन जीने में भेद है । जो आदमी जंगली जानवरों से और उनसे भी ज्यादा जंगली आदमियों से भरपूर जंगल में अकेले, बिना बन्दूक के और केवल ईश्वर के सहारे रहने की हिम्मत हवा में उड़ता हुआ रहता है और टकटकी लगाकर देखने वाले दर्शक-समुदाय की वाहवाही लूटने के खयाल से नीचे की ओर उड़ी लगाता है; वह खतरों वाला जीता है । पहले आदमी का जीवन लक्ष्यपूर्ण है, दूसरे का लक्ष्यहीन ।
किसी अलग-अलग रहने वाले देश के लिए, भले वह भूविस्तार और जनसंख्या की दृष्टि से कितना भी बड़ा क्यों न हो, ऐसी दुनिया में जो शस्त्रास्त्रों से सिर से पांव तक लदी है और जिसमें सर्वत्र वैभव-विलास का ही वातावरण नजर आता है, ऐसा सादा जीवन जीना सम्भव है या नहीं-यह ऐसा सवाल है जिसमें संशयशील आदमी को अवश्य संन्देह होगा । लेकिन इसका उत्तर सीधा है । यदि सादा जीवन जीने योग्य है तो यह प्रयन्त भी करने योग्य है, चाहे वह प्रयन्त किसी एक ही व्यक्ति या किसी एक ही समुदाय द्वारा उद्योग जरूर होने चाहिये । आराम-कुर्सी वाले या हिंसा वाले समाजवाद में मेरा विश्वास नहीं है । मैं तो अपने विश्वास के अनुसार आचरण करने में मानता हूं और उसके लिए सब लोग मेरी बात मान लें तब तक ठहरना अनावश्यक समझता हूं । इसलिए इन प्रमुख्ा उद्योगों को गिनाये बिना ही मैं कह देता हूं कि जहां कहीं भी लोगों को काफी बड़ी संख्या में मिलकर काम करना पड़ता है वहां मैं राज्य की मालिकी की हिमायत करूंगा । उनकी कुशल या अकुशल मेहनत से जो कुछ उत्पन्न होगा, उसकी मालिकी राज्य के द्वारा उनकी ही होगी । लेकिन चूंकि मैं तो इस राज्य के अहिंसा पर ही आधारित होने की कल्पना कर सकता हूं, इसलिए मैं अमीरों से उनकी सम्पत्ति बलपूर्वक नहीं छीनूंगा, बल्कि उक्त उद्योगों पर राज्य की मालिकी कायम करने की प्रक्रिया में उनका सहयोग मागूंगा । अमीर हों या कंगाल, समाज में कोई भी अछूत या पतित नहीं हैं । अमीर और गरीब दोनों एक ही रोग के दा रूप हैं । और सत्य यह है कि कोई कैसा भी हो, हैं तो सब मनुष्य ही।
और मैं अपना यह विश्वास उन सारी बर्बरताओं के बावजूद घोषित करना हूं, जो हमने भारत मे और दूसरे देशों में घटित होते देखी हैं और जिन्हें शायद हमें आगे और भी देखना पड़े । हम खतरों का सामना करते हुए जीना सीखें ।
अनुक्रमणिका
- १. मेरे सपनो का भारत
- २. स्वराज्य का अर्थ
- ३. राष्ट्रवाद का सच्चा स्वरूप
- ४. भारतीय लोकतंत्र
- ५. भारत और समाजवाद
- ६. भारत और साम्यवाद
- ७. उद्योगवाद का अभिशाप
- ८. वर्गयुध्द
- ९. हड़ताल
- १०. मज़दूर क्या चुनेंगे?
- ११. अधिकार या कर्तव्य ?
- १२. बेकारी का सवाल
- १३. दरिद्र-नारायण
- १४. शरीर-श्रम
- १५. सर्वोदय
- १६. संरक्षता का सिद्धांत
- १७. अहिंसक अर्थ-व्यवस्था
- १८. सामान वितरण का रास्ता
- १९. भारत में अहिंसा की उपासना
- २०. सर्वोदयी राज्य
- २१. सत्याग्रह और दुराग्रह
- २२. किसान
- २३. गांवों की ओर
- २४. ग्राम-स्वराज्य
- २५. पंचायत राज
- २६. ग्रामोद्योग
- २७. सरकार क्या कर सकती है?
- २८. ग्राम-प्रदर्शनियां
- २९. चरखे का संगीत
- ३०. मिल-उद्योग
- ३१. स्वदेशी
- ३२. गोरक्षा
- ३३. सहकारी गो पालन
- ३४. गांवों की सफाई
- ३५. गांव का आरोग्य
- ३६. गांवों का आहार
- ३७. ग्राम सेवक
- ३८. समग्र ग्राम सेवा
- ३९. युवकों को आह्वान
- ४०. राष्ट्र का आरोग्य, स्वच्छता और आहार
- ४१. शराब और अन्य मादक द्रव्य
- ४२. शहरों की सफाई
- ४३. विदेशी माध्यम की बुराई
- ४४. मेरा अपना अनुभव
- ४५. भारत की सांस्कृतिक विरासत
- ४६. नई तालीम
- ४७. बुनियादी शिक्षा
- ४८. उच्च शिक्षा
- ४९. शिक्षा का आश्रमी आदर्श
- ५०. राष्ट्रभाषा और लिपि
- ५१. प्रान्तीय भाषायें
- ५२. दक्षिण में हिन्दी
- ५३. विद्यार्थियों के लिए अनुशासन के नियम
- ५४. भारतीय स्त्रियों का पुनरूत्थान
- ५५. स्त्रियों की शिक्षा
- ५६. संतति-नियमन
- ५७. काम-विज्ञान की शिक्षा
- ५८ (……..)
- ५९. साम्प्रदायिक एकता
- ६०. वर्णाश्रम धर्म
- ६१. अस्पृश्यता का अभिशाप
- ६२. भारत में धार्मिक सहिष्णुता
- ६३. धर्म – परिवर्तन
- ६४. (…)
- ६५. प्रान्तों का पुनर्गठन
- ६६. अल्पसंख्यकों की समस्यायें
- ६७. भारतीय गवर्नर
- ६८. समाचार-पत्र
- ६९. शान्ति सेना
- ७०. भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस
- ७१. भारत पाकिस्तान और काश्मीर
- ७२. भारत में विदेशी बस्तियां
- ७३. भारत और विश्वशांति
- ७४. पूर्व का संदेश
- ७५. स्फूट वचन
