८. वर्गयुध्‍द

मैं आम लोगों को यह नहीं सिखाता कि वे पूंजीपतियों को अपना दुश्‍मन मानें। मैं तो उन्‍हें यह सिखाता हूं कि वे आप ही अपने दुश्‍मन हैं। (1)

वर्गयुध्‍द भारत के मूल स्‍वभाव के खिलाप है। भारत में समान न्‍याय और सबके बुनियादी हकों के विशाल आधार पर स्‍थापित एक उदार किस्‍म का साम्‍यवाद निर्माण करने की क्षमता है। मेरे सपने के रामराज्‍य में राजा और रंक सबके अधिकार सुरक्षित होंगे। (2)

मैंने यह कभी नहीं कहा कि शोषकों और शोषितों में सहयोग होना चाहिये। जब तक शोषण और शोषण करने की इच्‍छा कायम है तब तक सहयोग नहीं हो सकता। अलबत्‍ता, मैं यह नहीं मानता कि सब पूंजीपति और ज़मीदार अपनी स्थिति की किसी आंतरिक आवश्‍यकता के फलस्‍वरूप शोषक ही हैं और न मैं यह मानता हूं कि उनके और जनता के हितों में कोई बुनियादी या अकाट्य विरोध हैं। हर प्रकार का शोषण शोषित के सहयोग पर आधारित है, फिर वह सहयोग स्‍वेच्‍छा से दिया जाता हो या लाचारी से। हम हम इस सच्‍चाई को स्‍वीकार करने से कितना ही इनकार क्‍यों न करें, फिर भी सच्‍चाई तो यही है कि यदि लोग शोषक की आज्ञा न मानें तो शोषण हो ही नहीं सकता। लेकिन उसमें स्‍वार्थ आड़े आता है और हम उन्‍हीं ज़ंजीरों को अपनी छाती से लगाये रहते हैं जो हमें बांधती हैं। यह चीज़ बन्‍द होना चाहिये। ज़रूरत इस बात की नहीं है कि पूंजीपति और ज़मींदार खतम हो जायें; उनमें और आम लोगों में आज जो सम्‍बन्‍ध है उसे बदलकर ज्‍यादा स्‍वस्‍थ और शुध्‍द सम्‍बन्‍ध बनाने की ज़रूरत है।

वर्गयुध्‍द का विचार मुझे नहीं भाता। भारत में वर्गयुध्‍द न स‍िर्फ अनिवार्य नहीं है, बल्कि यदि हम अहिंसा के सन्‍देश को समझ गये हैं तो उसे टाला जा सकता है। जो लोग वर्गयुध्‍द को अनिवार्य बताते हैं, उन्‍होंने या तो अहिंसा के फलितार्थों को समझा नहीं है, या ऊपरी तौर पर ही समझा है।

हमें पश्चिम से आये हुए मोहक नारों के असर में आने से बचना चाहिये। क्‍या हमारे पास हमारी विशिष्‍ट पूर्वी परम्‍परा नहीं है? क्‍या हम और पूंजी के सवाल का कोई अपना हल नहीं निकाल सकते? वर्णाश्रम की व्‍यवस्‍था बड़े और छोटे का भेद दूर करने या पूंजी और श्रम में मेल साधने का एक उत्‍तम साधन नहीं तो और क्‍या है? इस विषय में सम्‍बन्धित जो कुछ भी पश्चिम से आया है वह हिंसा के रंग में रंगा हुआ है। मैं उसका विरोध करता हूं, क्‍योंकि मैंने उस नाश को देखा है जो इस मार्ग के आखिरी छोर पर हमारी प्रतीक्षा कर रहा है। पश्चिम के भी ज्‍यादा विचारवान लोग अब यह समझने लगे हैं कि उनकी व्‍यवस्‍था उन्‍हें एक गहरे गर्त की ओर ले जा रही है और वे उससे भयभीत हैं। पश्चिम में मेरा जो भी प्रभाव है उसका कारण हिंसा और शोषण के इस दुष्‍चक्र से उध्‍दार का रास्‍ता ढूंढ़ निकालने का मेरा अथक प्रयत्‍न ही है। मैं पश्चिम की समाज-व्‍यवस्‍था का सहानुभूतिशील विद्यार्थी रहा हूं और मैं इस निष्‍कर्ष पर पहुंचा हूं कि पश्चिम की इस बेचैनी और संघर्ष के पिछे सत्‍य की व्‍याकुल खोज की भावना ही है। मैं इस भावना की कीमत करता हूं। वैज्ञानिक जांच की उसी भावना से हम पूर्व की अपनी संस्‍थाओं का अध्‍ययन करें तो मेरा विश्‍वास है कि दुनिया ने अभी तक जिसका सपना देखा है उससे कहीं ज्‍यादा सच्‍चे समाजवाद और सच्‍चे साम्‍यवाद का हम विकास कर सकेंगे। यह मान लेना गलत है कि लोगों की गरीबी के सवाल पर पश्चिमी समाजवाद या साम्‍यवाद ही अन्तिम शब्‍द हैं। (3)

मैं ज़मींदार का ना श नहीं करना चाहता, लेकिन मुझे ऐसा भी नहीं लगता की ज़मींदार अनिवार्य है। मैं ज़मींदारो और दूसरे पूंजीपतियों का अहिंसा के द्वारा ह्दय-परिर्वतन करना चाहता हूं और इसलिए वर्गयुध्‍द की अनिवार्यत‍ा को मैं स्‍वीकार नहीं करता। कम-से-कम संघर्ष का रास्‍ता लेना मेरे लिए अहिंसा के प्रयोग का एक ज़रूरी हिस्‍सा है। ज़मीन पर मेहनत करने वाले किसान और मज़दूर ज्‍यों ही अपनी ताकत पहचान लेंगे, त्‍यों ही ज़मींदारी की बुराई का बुरापन दूर हो जायेगा। अगर वे लोग यह कह दें कि उन्‍हें सभ्‍य जीवन की आवश्‍यकताओं के अनुसार अपने बच्‍चों के भोजन, वस्‍त्र और शिक्षण आदि के लिए जब तक काफी मज़दूरी नहीं दी जायेगी, तब तक वे जमीन को जोतेंगे-बोयेंगे ही नहीं, तो ज़मींदार बेचारा कर ही क्‍या सकता है? सच तो यह है कि मेहनत करने वाला जो कुछ पैदा करता है उसका मालिक वही है। अगर मेहनत करने वाले बुध्दिपूर्वक एक हो जायं, तो वे एक ऐसी ताकत बन जायेंगे जिसका मुकाबला कोई नहीं कर सकता। और इसलिए मैं वर्गयुध्‍द की कोई ज़रूरत नहीं देखता। यदि मैं उसे अनिवार्य मानता होता तो उसका प्रचार करने में और लोगों को उसकी तालीम देने में मुझे कोई संकोच नहीं होता। (4)

सवाल एक वर्ग को दूसरे वर्ग के खिलाफ भड़काने और भिड़वाने का नहीं है, बल्कि मज़दूर-वर्ग को अपनी स्थिति के महत्‍व का ज्ञान कराने का है। आखिर तो अमीरों की संख्‍या दुनिया में इनी-गिनी ही है। ज्‍यों ही मज़दूर-वर्ग को अपनी ताकत का भान होगा और अपनी ताकत जानते हुए भी वह ईमानदारी का व्‍यवहार करेगा, त्‍यों ही वे लोग भी ईमानदारी का व्‍यवहार करने लगेंगे। मज़दूरो को अमीरों के खिलाफ भड़काने का अर्थ वर्ग द्वेष को और उससे निकलने वाले तमाम बुरे नतीजों को जारी रखना होगा। संघर्ष एक दुष्‍चक्र है और उसे किसी भी कीमत पर टालना ही चाहिये। वह दुर्बलता की स्‍वीकृति का, हीनता-ग्रंथि का चिहृ है। श्रम ज्‍यों ही अपनी स्थिति का महत्‍व और गौरव पहचान लेगा, त्‍यों ही धन को अपना उचित दरजा मिल जायेगा, अर्थात् अमीर उसे अपने पास मज़दूरों की धरोहर के ही रूप में रखेंगे। कारण,श्रम धन से श्रेष्‍ठ है। (5)

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मेरे सपनों का भारत (कापीराइट नवजीवन ट्रस्ट, अहमदाबाद)